26/06/2026
जिस उम्र में एक पढ़ा-लिखा नौजवान ₹20,000 की नौकरी के लिए इंटरव्यू की लाइनों में जलील हो रहा होता है, उसी उम्र में इस जैसे ढोलकिया बाबा अपने पूरे खानदान के साथ ₹5 लाख का टिकट कटाकर Business Class में हवा की सैर कर रहे होते हैं।
एक लड़का, जो कड़कड़ाती ठंड और तपती गर्मियों में इलाहाबाद, पटना, कोटा या मुखर्जी नगर की 10x10 की कोठरी में बैठकर, अपनी जवानी के सबसे खूबसूरत साल किताबों के पन्ने पलटने में गुजार देता है, इस उम्मीद में कि एक दिन वो B-Tech, MBA, BPSC या IAS बनकर अपने बूढ़े मां-बाप के दुखों को दूर करेगा।
लेकिन अंत में उसे क्या मिलता है? पेपर लीक, केंसल होती परीक्षाएं, बेरोजगारी का दंश और समाज के ताने!
और दूसरी तरफ... ज़रा नजर उठाइए और देखिए ढोलकिया बाबा या इनके जैसो के साम्राज्य को?
पढ़ाई-लिखाई? बिल्कुल शून्य (0)!
बचपन का इतिहास? मां के हाथ का बना चिकन दबाकर खाते थे। लेकिन जब समझ आया कि 'कैमरे' के सामने शाकाहारी और चमत्कारी बनना ही असली धंधा है, तो चिकन खाना पर्दे के पीछे चला गया।
सलाम है बाबा के बाप की दूरदर्शिता को!
उन्हें पता था कि अगर इस लड़के को किताबों के चक्कर में डाला, तो 50 साल की उम्र तक आते-आते भी शायद ये किसी खटारा बस या जनरल बोगी की भीड़ में धक्के खा रहा होगा।
उन्होंने लड़के को 'धर्म की दुकान' पर बैठा दिया।
आज का कड़वा और नंगा सच देखिए
एक तरफ देश का सबसे बुद्धिमान तबका (IAS-IPS) है: जो दिन-रात कानून और संविधान की किताबें रटकर साहब बनता है।
और दूसरी तरफ का नजारा: उन्हीं बड़े-बड़े अफसरों और रसूखदार नेताओं की पत्नियां और बेटियां, इन बिना पढ़े-लिखे बाबाओं के पैरों में साष्टांग दंडवत पड़ी रहती हैं। कोई संतान का आशीर्वाद मांग रही है, तो कोई पैसे और पावर की मन्नत मांग रही है।
क्या विडंबना है इस देश की...
जिस विज्ञान और संविधान के दम पर देश चलना चाहिए, वहां के सबसे पावरफुल लोग अंधविश्वास की ढोलक बजाने वालों के सामने नतमस्तक हैं।
करोड़ों की कथाएं, लाखों का चढ़ावा, और टैक्स-फ्री अकूत संपत्ति!
कलम पकड़ने वाले हाथ आज हक मांगते हुए लाठियां खा रहे हैं, और धर्म का धंधा करने वाले वीआईपी सुरक्षा में घूम रहे हैं।
ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर, ऐसे खोखले समाज पर और युवाओं की किस्मत पर ताली बजाइए साहब! क्योंकि ढोलकिया बाबा तो बिजनेस क्लास की खिड़की से बाहर देखते हुए हम सबकी डिग्रियों पर हंस रहे हैं।
आज हर बेरोजगार नौजवान अपनी डिग्रियों को देखकर अंदर ही अंदर रो रहा है और सोच रहा है— धर्म से बड़ा कोई धंधा नहीं, और अंधभक्ति से बड़ा कोई बाजार नहीं।
क्या वाकई इस देश में अब सिर्फ 'धंधा' ही पूजनीय है, योग्यता नहीं?
"जब भक्त अंधा हो जाता है, धर्म धंधा हो जाता है", विडंबना यह है कि हम आप यदि इस पर प्रश्न करे तो इनके अंधभक्त, हिंदुत्व की राजनीति मे इनके भरोसे अपना भविष्य तलाश रहे इनके follower सोशल मीडिया मे ही comments से बला त्कार कर देंगे।