Bharatiya Vidya Mandir

Bharatiya Vidya Mandir Over the years, Bharatiya Vidya Mandir has created a niche for itself in education, as well as preservation and propagation of Indian culture and heritage.

20/09/2020

Bharatiya Vidya Mandir and Bharatiya Samskriti Samsad organized a talk on Kargil War 1999 and Current Sitiuation on 18th September 2020 by Col Nish*th Bihari...

24/10/2019

http://bharatiyavidyamandir.org/…/uploads/2019/10/lok-saura…

‘दीप ज्योति नमोस्तुते, शुभं करोति कल्याणं’
संस्कृति को सुवासित करते इस अंक में इस बार खास तौर पर संकलन किया गया है कि दीपावली के साथ अन्य देशों में भी दीपावली जैसे ही रोशनी के त्यौहार मनाए जाते हैं। दीपावली पर मां लक्ष्मी के पूजन के महत्व के साथ गजवाहिनी और उलूकवाहिनी लक्ष्मी के बारे में भी जानकारी बेहद रुचिपूर्ण होगी। इसी तरह बिटिया के महत्व को समझाने वाली हमारी संस्कृति में तुलसी विवाह की परम्परा भी इस अंक का हिस्सा है। दीपोत्सव की अग्रिम मंगलकामनाओं के साथ ‘लोक सौरभ’ का यह अंक आपको समर्पित है। इस बार के अंक में शामिल हैं..
-दीपावली
-उजास का मास
-सुहाग का पर्व
-संस्कृति में महत्व बिटिया का
-गजवाहिनी एवं उलूकवाहिनी
-सूर्य उपासना का महापर्व
-सिक्ख पंथ प्रवर्तक
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भारतीय विद्या मंदिर की इस पत्रिका का यह नया अंक भारतीय संस्कृति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और इसमें छिपे चराचर जगत के संरक्षण पर चिंतन को और मजबूत करेगा, इसी विश्वास के साथ आपका सहयोग अपेक्षित है। आपके अमूल्य सुझावों और विचारों का इंतजार रहेगा।
आप अपने सुझाव [email protected] पर भेज सकते हैं।

भारतीय विद्या मंदिर शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है। इस संस्थान ने अपने लगभग 7 दशक के सफर ...
22/09/2019

भारतीय विद्या मंदिर शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है। इस संस्थान ने अपने लगभग 7 दशक के सफर में लाखों विद्यार्थियों को लाभान्वित किया है। वहीं शोध परक गतिविधियों से भारतीय संस्कृति और साहित्य के कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया है। भारतीय विद्यामंदिर की ओर से लोक संस्‍कृति के विभिन्‍न पहलुओं को उजागर करने के लिए ऑन लाइन पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है। पत्रिका का नया अंक आपके अवलोकनार्थ प्रस्‍तुत है।
http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2805/
भारतीय विद्यामंदिर की ओर से प्रकाशित ऑनलाइन पत्रिका के नए अंक में
1- बंगाल का लोक पर्वदुर्गापूजा
2- बीकानेर की अधिष्‍ठात्री देवी मॉं करणी
3- समर्पण राजा बलि और दधीचि का
4- हिंदी बने राष्‍ट्र की सम्‍पर्क भाषा

https://web.whatsapp.com/[10:45 am, 21/08/2019] rajivharsh: http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2795/'नंद के आनंद भयोÓ लो...
21/08/2019

https://web.whatsapp.com/
[10:45 am, 21/08/2019] rajivharsh: http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2795/
'नंद के आनंद भयोÓ लोकजीवन के इस अंक में भाद्रपद के प्रमुख लोक पर्व रक्षाबंधन और नटखट कान्हा के जन्मोत्सव का लोक जीवनशैली में महत्व तो दिया ही गया है, साथ ही 'तुलसी के श्रीरामÓ आलेख में गोस्वामी तुलसीदास जी के श्रीराम के चरित्र को लोक आस्थाओं के प्रतीक के रूप में प्रतिपादित किया गया है। हमारी लोक परम्पराओं, लोक जीवनचर्या में भी राम चरित की सीख कहीं न कहीं नजर आती ही है। इनके साथ ही लोकतंत्र के उत्सव स्वाधीनता दिवस के महत्व के साथ लोक साहित्य के रसपूर्ण होने की जरूरत को भी बताया गया है। सभी को रक्षाबंधन, स्वाधीनता दिवस, जन्माष्टमी की मंगलकामनाएं। इस बार के अंक में शामिल हैं...
- तिरंगे के नाम बांधिये राखी
- तुलसी के श्रीराम
- रेशम की डोर से बंधता संसार
- नंद घर आनंद भयो
- वाक्यं रसात्मकं काव्यं
- बीकानेर के ताल तलैया
- वीर तेजाजी
- सखियों का मेला
http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2795/
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यह नया अंक भारतीय संस्कृति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और लोक जीवनशैली में समाहित चराचर जगत के संरक्षण पर चिंतन को और मजबूत करेगा, इसी विश्वास के साथ आपका सहयोग अपेक्षित है। आपके अमूल्‍य सुझावों और विचारों का इंतजार रहेगा।
[email protected]
पता : भारतीय विद्या मंदिर, रतन बिहारी पार्क, बीकानेर

लोकजीवन जून 2019  http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2740/लोकजीवन की ओर से गंगा दशहरे की शुभकामनाएं। इस बार हमने लोकजीवन...
17/06/2019

लोकजीवन जून 2019

http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2740/

लोकजीवन की ओर से गंगा दशहरे की शुभकामनाएं। इस बार हमने लोकजीवन का अंक मां गंगा को समर्पित किया है। राजा सगर से शुरू हुआ स्‍वर्ग की गंगा का सफर आज भारतीय जनमानस के साथ इतना घुला मिला है कि जहां थोड़ा सा तृप्तिदायक जल दिखे, उसे श्रेष्‍ठता देने के लिए हम उसे गंगाजल की उपमा देते हैं। इस बार के अंक में शामिल हैं...

- गंगा का अवतरण
- गंगा में प्रदूषण
- बीकानेर के ताल तलैया
- लोकदेवता हड़बूजी सांखला
- माहेश्‍वरी समाज
http://bharatiyavidyamandir.org/hi/2740/

देखिएगा, आपके अमूल्‍य सुझावों और विचारों का इंतजार रहेगा।

lok jeevan june 2019 लोकजीवन जून 2019 भारतीय विद्या मंदिर कोलकाता बीकानेर

मान्यवर, भारतीय संस्कृति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के अपने निरंतर प्रयासों में एक कदम और जोड़ते हुए भा...
19/05/2019

मान्यवर,
भारतीय संस्कृति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के अपने निरंतर प्रयासों में एक कदम और जोड़ते हुए भारतीय विद्या मंदिर ने इस एक और मासिक पत्रिका 'लोक जीवन' का डिजिटल प्रकाशन अपनी वेबसाइट पर शुरू किया है।
लोकजीवन के मई माह के अंक में इस बार जल के साथ आमजन के संबंध और अक्षय तृतीया को शामिल किया गया है।
- पुण्‍य की प्‍यास
- ताल तलैया
- परंपराओं में जल
- आखातीज – बीकानेर का स्‍थापना दिवस
- परंपरागत व्‍यंजन खीचड़ा और इमलाणी
- उदयपुर का स्‍थापना दिवस
- लोकदेवता पीर मांगलिया
और कई महत्‍वपूर्ण आलेख, देखने और डाउनलोड करने के लिए लिंक पर क्लिक करें।
http://bharatiyavidyamandir.org/en/2726
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यह नया अंक भारतीय संस्कृति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर चिंतन को और मजबूत करेगा, इसी विश्वास के साथ आपका सहयोग अपेक्षित है। आपकी प्रतिक्रिया और आपके आलेख इस पते पर भेज सकते हैं।
[email protected]
पता: भारतीय विद्या मंदिर, रतन बिहारी पार्क, बीकानेर

मैग्‍जीन डाउनलोड के लिए यहां क्लिक करें

18/01/2018
16/01/2018

हिंदीतर प्रांतों एवं विदेशों में हिंदी भाषा-साहित्य : दशा और दिशा

हिंदी देश के आम आदमी की भाषा

भारतीय विद्या मंदिर और भारतीय संस्कृति संसद के संयुक्त तत्वावधान में कोलकाता में 5,6 व 7 जनवरी को आयोजित हिंदीतर प्रांतों एवं विदेशों में हिंदी भाषा-साहित्यि : दशा और दिशा विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश विदेश से आए लेखकोंं ने हिंदी को देश के आम व साधारण आदमी के सम्पर्क की और उपयोग की भाषा बताया। सम्मेलन में साधारण आदमी के ज्ञान, कौशल और चारित्रिक विकास के लिए हिंदी में लेखन पर बल दिया गया। देश में निर्माण उद्योग में अग्रणी संस्थान सिम्पलेक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड के सौजन्य से आयो‍जित यह सम्मे‍लन दोनों संस्थाओं के संस्थापक श्री माधोदास मूंधड़ा के जन्म शताब्दी वर्ष पर उनकी स्मृ‍ति को समर्पित किया गया। सन 1924 से निर्माण क्षेत्र में कार्यरत सिम्प‍लेक्स् इन्फ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड ने देश के लगभग सभी प्रांतों के अलावा कई अन्य देशों में अलग अलग प्रांतों के श्रमिकों के साथ कार्य किया है। सिम्पलेक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड का यह अनुभव रहा है कि देश के अलग- अलग प्रांतों के , अलग-अलग भाषा बोलने वाले श्रमिक जब आपस में मिलते हैं , एक दूसरे से बात करते हैं तो उनकी सम्पर्क भाषा हिंदी होती है। देश के हर प्रांत के लोग हिंदी बोल सकते हैं और समझ सकते हैं , इसलिए हिंदी को सम्पंर्क भाषा के रूप में विकसित करने की जरूरत है। अपने इसी अनुभव के चलते सिम्पलेक्स इन्फ्रांस्ट्रक्चर्स लिमिटेड ने भारतीय विद्यामंदिर और भारतीय संस्कृति संसद की ओर से आयोजित इस सम्मे‍लन के प्रायोजन का जिम्मा् उठाया।
भारतीय विद्यामंदिर भारतीय संस्कृति, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण और संवर्द्धन के साथ-साथ श्रमिकों के कौशल विकास और उनके व्यकक्तित्व विकास के लिए भी निरंतर प्रयासरत है। भारतीय विद्यामंदिर की ओर से देश भर में कई स्था्नों पर श्रमिकों के कौशल विकास के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों के दौरान यह महसूस किया गया कि श्रमिकों के व्यक्तित्व विकास, चारित्रिक विकास और कौशल विकास के लिए किसी प्रकार का लेखन और साहित्य उपलब्ध नहीं है। इन कार्यक्रमों के दौरान यह महसूस किया गया कि ऐसा साहित्य और लेखन जो आम आदमी के लिए उपयोगी हो, आज देश की जरूरत है।
सम्मेलन में भारतीय विद्यामंदिर के अध्यक्ष डा बिट्ठलदास मूंधडा ने कहा कि किसी भी देश का विकास उस देश के श्रमिकों की कुशलता और उनकी उत्पादकता पर निर्भर करता है। भारतीय श्रमिकों का कौशल और उनकी उत्पादकता विकसित देशों के श्रमिकों की अपेक्षा काफी कम है। इसका मुख्य कारण व्यत्कित्व विकास, चारित्रिक विकास संबंधी साहित्य और तकनीकी पाठ्य सामग्री का हिंदी और अन्य देशी भाषाओं में उपलब्ध नहीं होना है। हमारे देश में तकनीकी पाठ्य सामग्री केवल अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। हमारे देश के लगभग 60 करोड लोग स्कूली शिक्षा से आगे नहीं पढ पाते हैं ये लोग अंग्रेजी न पढ पाते हैं और न ही समझ पाते हैं इस वजह से तकनीकी ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। डा मूंधडा ने हिंदी को जन साधारण की भाषा बताते हुए कहा कि तकनीकी पाठ्य सामग्री और चरित्र निर्माण से संबंधित साहित्य जन साधारण की भाषा में लिखा जाना चाहिए ताकि साधारण आदमी को विज्ञान और तकनीक की जानकारी हो सके और श्रमिकों के कौशल का विकास हो सके। यदि हमारे श्रमिकों के कौशल का विकास होता है और उनकी उत्पादकता बढती है तो वे हमारे देश के विकास की गति को तेज करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
मूंधडा ने कहा कि हिंदी सार्वदेशिक सम्पर्क भाषा है। इस लिए श्रमिकों के हिंदी भाषा ज्ञान को समृद़ध करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही देश की एकता और अखण्डता के लिए यह जरूरी है कि देश के सभी लोग सभी प्रांतों के लोगों को समझें, उनकी संस्कृति को समझें, हर प्रांत का साहित्य हमें हमारी भाषा में उपलब्ध होना चाहिए इसके लिए अन्य भाषाओं के साहित्य का हिंदी में और हिंदी साहित्य का अन्य‍ भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए।
कोलकाता के जीडी बिडला सभागार में सम्मे्लन का उद्घाटन करते हुए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी ही हमारी सम्पर्क भाषा हो सकती हे क्योंकि यह देश के लगभग सभी प्रांतों में बोली जाती है। हिंदी में नये शब्द गढने की क्षमता है। यह सरल और ग्राह्य है।
उन्होंने भाषा को अपने देश और अपने क्षेत्र की संस्कृति से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इंडोलोजी विषय को स्कूल कालेज के पाठ्यक्रम में अनिवार्य कर देना चाहिए इससे हिंदी के प्रचार प्रसार को बल मिलेगा। राज्यपाल ने अनुवाद को साहित्य की महत्वपूर्ण विधा बताते हुए कहा कि अनुवाद के जरिये ही हम एक दूसरे के साहित्य को पढ सकेंगे और दूसरों के विचारों को समझ सकेंगे। राज्यपाल ने कहा कि जो लेखन हमारे व्यावहारिक जीवन में काम आता है वह भाषा के प्रचार में ज्यादा सहयोगी होता है। उन्हों ने कंप्यूटर में हिंदी के प्रयोग और दवाओं के पत्तों पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के इस्‍तेमाल को इसका ज्व्लंत उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर इतना स्वाभिमान होना चाहिए कि हम अपनी भाषा बोल सकें।
सम्मेलन के संयोजक डा बाबूलाल शर्मा ने कहा कि भाषा हमारी पहचान है किंतु हमारे देश की स्थिति यह है कि हम अंग्रेजी को तो स्वीकार करने को तैयार हैं मगर हिंदी का विरोध है। डा शर्मा ने हिंदी को अन्य प्रांतीय भाषाओं से जोड़ने पर बल दिया। शर्मा ने कहा कि आम तौर पर हिंदी के सम्मेलनों में हिंदीतर प्रांतों के लेखकों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता यह सम्मेलन हिंदीतर प्रांतों के लेखकों को उचित मंच देगा।
मुख्यं अतिथि केंद्रीय हिंदी निदेशालय के प्रो अवनीश कुमार ने कहा कि आम जन में ज्ञान के प्रसार के लिए जन जन की भाषा को अपनाना जरूरी है। भाषा से ज्ञान मिलता है और देश के विकास के लिए जरूरी है। इस लिए यह आवश्यक है कि ज्ञान हमारी भाषा में हो।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि डा रविप्रभा बर्मन ने कहा कि हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाना चाहते हैं तो हमें भी कोई न कोई दक्षिण भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से सीखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी को आगे बढाने के लिए महिलाओं को आगे आना होगा। आज के दौर में हम घरों में अपने बच्चों से अंग्रेजी में बात करने में गर्व महसूस करते हैं। अंग्रेजी सीखना अच्छीं बात है मगर घरों में माताओं को अपने बच्चों से बात हिंदी में करनी चाहिए , तभी हिंदी का विकास हो सकेगा। डा बर्मन ने श्री माधोदास मूंधडा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि माधोदास मूंधड़ा संगीत और कला प्रेमी थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, कला तथा धर्म व दर्शन के प्रेमियों को मंच प्रदान करने के लिए भारतीय संस्कृंति संसद की स्थापना की और उसमें महिलाओं को भी स्थान दिया।

दूसरा दिन
तीन दिवसीय सम्मेलन के दूसरे दिन देश के भिन्न-भिन्न प्रांतों से आए साहित्यकारों ने हिंदी को सम्पूर्ण भारत की सम्पर्क भाषा स्वीेकार करते हुए कहा कि देश में कहीं भी आम आदमी हिंदी के विरोध में नहीं है। पहले सत्र में केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पॉंडीचेरी से आए साहित्यकारों ने बताया कि इन राज्यों में विभिन्न सामाजिक और साहित्यिक संस्थाेएं अनुवाद के जरिये उत्तर और दक्षिण के बीच सेतु का कार्य कर रही हैं। ये संस्थाएं हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाने की दिशा में भी कार्य कर रही हैं। फिल्मों व अन्य माध्यमों से भी हिंदी का प्रसार हो रहा है। वक्ताओं ने कहा कि इन प्रदेशों में भी अलग-अलग भाषाओं के लोगों के बीच संवाद का जरिया हिंदी ही है। दक्षिण भारत से आए वक्ताओं का कहना था कि आम लोगों के बीच हिंदी का कोई विरोध नहीं है, राजनीतिेक लोगों में कहीं हिंदी का विरोध हो सकता है । वक्ताओं ने हिंदी के प्रसार के लिए शिक्षण संस्थानों में हिंदी को अनिवार्य करने की जरूरत पर बल दिया। इस सत्र की अध्यक्षता तमिलनाडु से आए प्रो. ज्ञानम ने की। प्रो. एच अच्युयतन केरल, प्रो. सरराजू आंध्रप्रदेश, डॉ. श्रीधर हेगड़े कर्नाटक, डॉ. रजिया बेगम चेन्नई, श्रावणी भट्टाचार्य चेन्नई, डॉ. रवि कुमार हैदराबाद, वी काम कोटि तमिलनाडु, रमेश गुप्त नीरद तमिलनाडु, दिव्यात रेजिंग पॉंडीचेरी, सुनीता जाजोदिया तमिलनाडु, डॉ. लता चौहान तमिलनाडु और डॉ. मोहना केरल ने अपने विचार व्यक्त किये।
दूसरे सत्र में गुजरात, महाराष्ट्र्, गोआ, दमन दीव और लक्षदीव प्रांतों से आए साहित्यकारों ने हिंदी को रोजगार से जोड़ने की जरूरत बताई। वक्ताओं ने कहा कि बच्चों में बचपन से ही हिंदी बोलने के संस्कार विकसित किये जाने चाहिए। हिंदी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि फिल्मों ने हिंदी को जन-जन तक पहुंचाया है। सत्र की अध्यक्षता महाराष्ट्रं के सरदार मुजावर ने की और संचालन गीता दूबे ने किया। सत्र में डॉ. तारा सिंह, डॉ. वर्षा पुनवटकर, डॉ. रणछोड़ भाई हीरा भाई बजकर और डॉ. हरीश द्वीवेदी ने विचार व्यक्त किये।
सम्मे़लन के तीसरे सत्र में पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर के साहित्यकारों ने कहा कि भाषा को लेकर देश में व्याप्त मानसिक गुलामी को दूर करने की आवश्यकता है। सत्र में पंजाब में हिंदी भाषा और साहित्य पर हुए काम की विवेचना की गई। हिन्दी का विकास न होने के कारणों पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा कि आपसी संवाद एवं सौहार्द्र बढ़ने के लिए हिन्दी से अन्य भाषाओं में अधिक से अधिक अनुवाद होना चाहिए। रोजगार से जुड़ी पाठ्य सामग्री तैयार होनी चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि भाषा सरल, सहज और साधारण हो और उस पर क्षेत्रीयता के प्रभाव से हमें परहेज नहीं करना चाहिए। सत्र की अध्यक्षता डॉ. मल्लिक राजकुमार ने की तथा पंजाब के डॉ. विनोद कुमार तनेजा, डॉ. शशिप्रभा, डॉ. जगमोहन कौर, डॉ. सुनीता शर्मा, डॉ. हर्ष कुमार हर्ष तथा जम्मू-कश्मीर के प्रो. राजकुमार ने विचार व्यक्त किये। सत्र का संचालन मधुलता गुप्ता ने किया।
चौथे सत्र में बंगाल –ओडिशा, मणिपुर और थाईलैंड से आए वक्ताओं ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में हिन्दी साहित्य की रचना में वृद्धि हुई है। आम जनता के बीच हिन्दी की पैठ बढ़ी है, लेकिन सरकार की भूमिका निराशाजनक है। हिन्दी के समीक्षकों एवं आलोचकों को पूर्वोत्तर के साहित्य को भी स्थान देना चाहिए और उसके प्रति उदार दृष्टि रखनी चाहिए। इसके साथ ही थाईलैंड से आए प्रो. परमत खाम-एक ने कहा कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान एवं प्रशिक्षण के जरिए थाईलैंड में हिन्दी का प्रसार बढ़ रहा है। सत्र की अध्यक्षता प्रो. सत्या उपाध्याय (बंगाल) ने की। सत्र का संचालन डॉ. ईतु सिंह ने किया। इस सत्र में ओडिशा के प्रो. अजय पटनायक, डॉ. ओम प्रकाश पाण्डेय, डॉ. संजय कुमार सिंह, डॉ. विनय षड़ंगी राजाराम, बंगाल के डॉ. कमला प्रसाद द्विवेदी तथा मणिपुर के यशवंत सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए।
सममेलन के दूसरे दिन हिंदीतर प्रांतों में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कार्य कर रहे पत्रकारों और लेखकों को सम्मानित किया गया। साहित्यिकारों में श्री सिद्धेश, श्री निवास शर्मा, गीतेश शर्मा, पत्रकारों में छपते छपते एवं ताजा टीवी के सम्पादक श्री विश्वम्भर नेवर,दैनिक विश्वामित्र के प्रदीप शुक्ला,सन्मार्ग के सुरेन्द्र् सिंह, प्रभात खबर के श्री तारकेश्वर मिश्रा , राजस्थाान पत्रिका के रविन्द्र राय, दैनिक जागरण के जयकृष्ण वाजपेयी, सलाम दुनिया के एस आनंद को सममानित किया गया।
इनके अलावा दक्षिण भारत से श्रीमती के चेलम, श्रीमती आर पार्वती, श्रीमती अहिल्या मिश्रा, श्रीमती सुलोचना, को भी सम्मानित किया गया। इन्हें संस्था के अध्यक्ष डा बिट्ठल दास मूंधडा, संयुक्त सचिव विजय झुनझुनवाला, तथा राजगोपाल सुरेखा ने शाल ओढा कर एवं स्मृति चिन्ह देकर सममानित किया। इस अवसर पर अनुवादक श्री दाउलाल कोठारी के निर्देशन में रवींद्र संगीत की प्रस्तु्ती दी गई।



तीसरा दिन

हिंदी में हो तकनीकी लेखन

अंतरराष्ट्री य सम्मे लन के तीसरे दिन भारतीय विद्या मंदिर के अध्यक्ष डॉ. बिट्ठलदास मूंधड़ा ने विज्ञान और तकनीक संबंधी लेखन के हिंदी में उपलब्ध नहीं होने का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि भारतीय विद्या मंदिर ने इस दिशा में पहल की है और श्रमिकों तथा सुपरवाइजरों के प्रशिक्षण के लिए तकनीकी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद करवाया है जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
वैचारिकी के सम्पादक डा बाबूलाल शर्मा के संयोजन में आयोजित सम्मेलन के पांचवे सत्र में असम, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, सिक्किम, मिजोरम, से आए वक्ताओं ने कहा कि पूर्वात्तर में हिंदी की स्थिति संतोषप्रद है। पूर्वोत्तर में प्रचुर मात्रा में मौलिक हिंदी साहित्य रचा जा रहा है। अनुवाद की दिशा में भी काफी काम हो रहा है। पूर्वोत्त‍र का आमजन हिंदी को सम्पर्क भाषा के रूप में मान्यता दे चुका है। सरकार और विश्व विद्यालय के स्तर पर कुछ कमियां हैं, जिन्हेंं दूर करने की आवश्यकता है। सत्र की अध्यक्षता मेघालय से आए प्रो. शैलेन्द्रह कुमार सिंह ने की। सत्र का संचालन डॉ. शुभ्रा उपाध्याय ने किया। सत्र में असम से डॉ. अनुजा बेगम, श्रीमती हीराबाला दास, त्रिपुरा के डॉ. जय कौशल, बंगाल से डॉ. मंजूरानी सिंह, मेघालय से श्री प्रकाश सिंह, प्रो चिन्मय डेका, सिक्किम से डॉ. चुकी भुटिया तथा असम से मौसमी मालाकर तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय के डॉ. अनुपम माथुर ने अपने विचार व्यक्त किये।
छठवें सत्र में फिजी, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, मॉरिशस, नेपाल, भूटान, अमेरिका, चीन, इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, बांग्लादेश से आए विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अमेरिका के ४० विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। वकताओं ने बताया कि नेपाल में कई स्थानीय भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन सम्पर्क की भाषा हिन्दी ही है। दक्षिण कोरिया में भी हिन्दी के जरिये संवाद किया जा सकता है। बांग्लादेश में यद्यपि सरकारी स्तर पर हिन्दी नहीं पढ़ाई जाती है, मगर फिल्मों एवं प्रचार माध्यमों के चलते वहां हिन्दी का काफी प्रचार-प्रसार हुआ है। वहां लोग हिन्दी समझते एवं बोलते भी हैं। इन विदेशी वक्ताओं ने कहा कि हिन्दी को भारत में पूरी तरह से लागू करने के लिए एक योजना बना कर सरकार को सौंपनी चाहिए। इस सत्र में डॉ. सुभाषिनी लता कुमार, डॉ. परतंत खामएक, डॉ. बिर्ख खड़का डुवर्सेली, डॉ. राहुल बजोरन पारसन, प्रो. नवीनचन्द्र लोहानी, श्री कुंथी छोम, डॉ. रुखसाना जामां शानू, श्री आलोक सुन्दर सरकार, डॉ, गुरिन्दर कौर ने वक्तव्य रखे।

सम्मेलन के सातवें सत्र में संस्कृत, उर्दू, सिंधी के विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा चूंकि हिन्दी एवं उर्दू में कोई फर्क नहीं है, इसलिए उर्दू में जो कुछ लिखा जा रहा है, वह हिन्दी को ही समृद्ध कर रहा है। इसी तरह सिंधी में लिखनेवाले तमाम विद्वान जितना सिंधी में लिख रहे हैं, उतना ही हिंदी में भी लिख रहे हैं। सिंधी के लगभग १५० लेखक हैं, जिनकों हिंदी लेखन के लिए साहित्य के बड़े-बड़े पुरस्कार मिले हैं। इसी तरह संस्कृत के विद्वानों का हिन्दी लेखन में विशिष्ट स्थान है। सत्र की अध्यक्षता श्री भगवान अटलानी ने की। इसके साथ ही प्रो. सत्यव्रत शास्त्री, डॉ. रसूल अहमद सागर, श्रीमती सौम्या दुआ ने वक्तव्य रखे।
सम्मे्लन के आठवें सत्र में हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी प्रांतों की भूमिका पर विचार किया गया। इस सत्र में वक्ताओं ने कहा कि हिंदी के प्रचार में हिंदी भाषी क्षेत्रों की भूमिका महत्ववपूर्ण रही है। इन प्रांतों से प्रकाशित पत्र- पत्रिकाओं ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में महती भूमिका निभाई है। इन प्रांतों में दिये जाने वाले साहित्यिक पुरस्कारों ने हिंदी के प्रति रुझान बढाया है। इन प्रांतों की स्थानीय बोलियों ने हिंदी की शब्द् सम्पदा को बढा कर हिंदी को समृद्ध किया हे। लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि हिंदी प्रांतों के लोग हिंदी के प्रति अपनी जिम्मेिदारी इमानदारी से नहीं निभा रहे हैं। वक्ताओं ने कहा कि राज भाषा के चक्कर में हिंदी सरकारी दायरों में फंस कर रह गई है। सत्र की अध्यक्षता राजस्थान के प्रो कृष्ण्चंद्र गोस्वामी ने की और संचालन डा रश्मीै पाण्डा मुखर्जी ने किया। सत्र में बिजनोर से डा महेश दिवाकर, झारखण्डं से डा सत्यनारायण मुण्डा्, उत्तडरप्रदेश से मुकेश कुमार मिश्र, छत्तीसगढ से मृणालिका ओझा, दिल्ली् से अनीता डगोरे और राजस्थान से जीतेंद्र कुमार सिंह ने अपने विचार व्यक्त‍ किये।

मूल्यांकन एवं समापन सत्र

देश के विकास के लिए हिंदी जरूरी


सम्मेलन के मूल्यांकन एवं समापन सत्र में निर्माण उद्योग विकास परिषद के महानिदेशक डॉ. प्रियरंजन स्वरूप ने कहा कि निर्माण उद्योग में ४ करोड़ से अधिक श्रमिक हैं, जो अलग-अलग राज्यों से आते हैं, उनकी बोलचाल की भाषा हिंदी है। इनके ज्ञान में वृद्धि करनी चाहिए। इससे उनका जीवन स्तर बेहतर होगा। उन्होंने लेखकों से अपील की कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को ज्ञान से महरूम न करें, उनके लिए लिखें। इस मौके पर के आई आई टी यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रो. शरणजीत सिंह ने कहा कि डॉ, बिट्ठलदास मूंधड़ा उनके गुरु स्वरूप हैं। उनसे काफी कुछ सीखा है। उन्होंने कहा कि तकनीकी विषयों को हिन्दी में उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। इसके लिए उनका विश्वविद्यालय, निर्माण उद्योग विकास परिषद तथा भारतीय विद्या मंदिर जैसे संस्थान मिलकर काफी कार्य कर सकते हैं। कार्यक्रम में उपस्थित डॉ. आशुतोष सिंह ने कहा कि हिन्दी नवोन्मेष की भाषा है। वैश्वीकरण के दौर में यह अधिक प्रभावशाली होती जा रही है। चाहे मजदूर हों या फौजी, वे विभिन्न प्रदेशों से आते हैं और उनका सम्पर्क माध्यम हिंदी ही है। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि हिंदी की दशा और दिशा अच्छी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी ने कहा कि आनेवाली पीढ़ियां इस त्रि-दिवसीय सम्मेलन का मूल्यांकन करेंगी, वह कहेंगी कि वर्ष २०१७-१८ में इस तरह के सम्मेलन का आयोजन हुआ था। यह एक सार्थक पहल है । हिन्दी बचे कैसे, इस पर मंथन करने की आवश्यकता है। इसके लिए हिंदी में अधिक से अधिक तकनीकी एवं विधि की पुस्तकें लिखी जानी चाहिएं। कार्यक्रम के समपान सत्र में सम्मेलन के संयोजक डॉ. बाबूलाल शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर ओमप्रकाश मिश्र ने समधुर गीतों की प्रस्तुति दी।
इस सम्मे लन में देश के लगभग सभी राज्यों और 10 देशों से आए करीब 500 लेखकों साहित्यकारों ने हिस्सा‍ लिया।

30/12/2017

हिंदी की संवैधानिक स्थिति
जिस समय देश को आजादी मिली उस समय देश में अंग्रेजी जानने वालों की संख्या बहुत कम थी । आम जनता में अंग्रेजी का विरोध भी था फिर भी देश में देश में अंग्रेजी फलती फूलती रही। लॉर्ड मैकाले की चाल में फंसा एक वर्ग सदैव अंग्रेजी की हिमायत करता रहा और आम जन हिंदी को महत्व देने की मांग करता रहा। अंततः 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया । यह कहा गया कि भारत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाले अंको का रूप, भारतीय अंको का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा। आजादी से पहले अंग्रेजों के राज में राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होता था इस लिए यह व्यवस्था दी गई कि संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की अवधि तक सरकारी काम काज में अंग्रेजी का प्रयोग पूर्ववत होता रहेगा। दुर्भाग्य की बात है कि आज भी सरकारी काम काज में हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी का इस्तेमाल होता हे। सच्चाई यह है कि हिंदी को जो अधिकार मिलना चाहिए था वह आज भी नहीं मिल पाया है । आज भी हम अंग्रेजी बोलने वाले को ही श्रेष्ठ समझते हैं और खुद अंग्रेजी बालने में गर्व का अनुभव करते हैं । हिंदी हमारे राष्ट्र की एकता का सूत्र है , हमारी पहचान है हमारे विकास का आधार हैँ । हमें हिेदी का सम्मान करना चाहिए ।

28/12/2017

आजादी से पहले आजादी के बाद
जब देश आजादी के लिए लड रहा था तब हिंदी ने पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधा। क्रांतिकारियों के विचारों को देश के कोने में आम जन तक पहुंचाया। क्रांतिकारियों को आपस में जोडा। सभी स्वतंत्रता सेनानियों जैसे महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू आदि ने हिंदी को सशक्त भाषा के रूप में स्वीकार किया । भारतेंदु हरिशचंद्र ने तो कहा :
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी संपूर्ण भारत को एक सूत्र में जोड़े रखने के .लिए एक सशक्त भाषा की आवश्यकता महसूस हुई । मगर अंग्रेजी भाषा के समर्थक ऐसा नहीं चाहते थे। वे अंग्रेजी को ही भारत की राष्ट्रभाषा बनाए रखना चाहते थे। परन्तु विचार विमर्श के पश्चात् इस निर्णय पर पहुंचे कि अँग्रेजी कैवल पढ़े-लिखे समाज द्वारा ही प्रयोग में लायी जाती थी, इसलिए अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया जा सकता था । दूसरा कारण यह भी था कि भारतीय दो सौ से भी अधिक वर्षों तक अंग्रेजों द्वारा सताए गए, वे उन अंग्रेजों की भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते थे ।

23/12/2017

हिंदी ही राष्ट्र भाषा क्यों ?
यह एक महत्वषपूर्ण सवाल है कि हिंदी ही राष्ट्रंभाषा क्यों ? हमारे देश में अन्य जो भाषाएं चलन में हैं वे भी बहुत समृद्ध हैं उनका भी साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध है उन्हें यह दर्जा क्यों नहीं ? इसके जवाब में कहा जा सकता है कि किसी भी राष्ट्र की सर्वाधिक प्रचलित एवं स्वेच्छा से आत्मसात की गई भाषा को ही राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जा सकता है। इसीलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि अगर हम भारत को राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा होसकती है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी ने राष्ट्रभाषा के निम्नलिखित लक्षण निश्चित किए-
१. वह भाषा सरकारी नौकरी के लिए आसान होनी चाहिए ।
२. उस भाषा के द्वारा भारत का धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक काम-काज निर्विध्न तथा सुचारु रूप से होना चाहिए ।
३. उस भाषा को भारत के ज्यादातर लोग बोलते हों ।
४. वह भाषा जन सामान्य के लिए सहज, सरल व बोधगम्य होनी चाहिए ।
५. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक अथवा अस्थायी स्थिति पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए ।
हिंदी में ये तमाम लक्षण मौजूद हैं इसके बावजूद सरकारी काम-काज में आज भी ज्यायदातर अंग्रेजी का ही प्रयोग किया जा रहा है। भले ही देश की अधिकांश जनता इसे समझ ही ना पाए।

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