Sadhvi Bahan Rajbala

Sadhvi Bahan Rajbala श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर, कोलकाता

30/09/2023
12/02/2023

एक पाप से सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं"

महाभारत के युद्ध पश्चात जब "श्री कृष्ण" लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी " ने उनसे पूछा ??

युद्ध में बाकी सब तो ठीक था। किंतु आपने "द्रोणाचार्य" और "भीष्म पितामह" जैसे धर्मपरायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया ??

"श्री कृष्ण" ने उत्तर दिया। ये सही है की उन दोनों ने जीवन भर धर्म का पालन किया। किन्तु उनके किये एक "पाप" ने उनके सारे "पुण्यों" को नष्ट कर दिया।

वो कौन से पाप थे ??

जब भरी सभा में "द्रोपदी" का चीरहरण हो रहा था। तब यह दोनों भी वहां उपस्थित थे। बड़े होने के नाते ये दुशासन को रोक भी सकते थे। किंतु इन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके इस एक पाप से बाकी सभी धर्मनिष्ठता छोटी पड़ गई।

और "कर्ण" वो तो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। कोई उसके द्वार से कोई खाली हाथ नहीं गया। उसके मृत्यु मे आपने क्यों सहयोग किया।

उसकी क्या गलती थी ??

हे प्रिये! तुम सत्य कह रही हो। वह अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था और उसने कभी किसी को ना नहीं कहा। किन्तु जब अभिमन्यु सभी युद्धवीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में घायल हुआ भूमि पर पड़ा था,,तो उसने कर्ण से पानी मांगा कर्ण जहां खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था। किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया। इसलिये उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ "पुण्य" नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया।

हे रुक्मणी! अक्सर ऐसा होता है। जब मनुष्य के आसपास कुछ गलत हो रहा होता है और वे कुछ नहीं करते। वे सोचते हैं की इस "पाप" के भागी हम नहीं हैं।

अगर वे मदद करने की स्थिति में नही हैं तो सत्य बात बोल तो सकते हैं कि वह कुछ नहीं कर सकते। वह मदद करने की स्थिति में नहीं हैं।

परंतु वे ऐसा भी नही करते। ऐसा ना करने से वे भी उस "पाप" के उतने ही हिस्सेदार हो जाते हैं। जितना "पाप" करने वाला होता है..!!

जयश्रीराधे सभी भक्तों को

29/01/2023
15/09/2022

पितृ श्राद्ध

माथे का पसीना अपने दुपट्टे से पोंछती हुई ,नियति किचन से निकल कर आई और लिविंग रूम में रखे सोफे पर, धम्म से बैठ गई। थकान से पूरा शरीर दर्द कर रहा था उसका। सितंबर का महीना था और पितृपक्ष चल रहे थे। आज उसके ससुर जी का श्राद्ध था। बस थोड़ी देर पहले ही पण्डित जी और कुछ रिश्तेदार भोजन ग्रहण कर घर से गए थे।

सबने उसके हाथ के बनाए भोजन की खूब तारीफ़ की थी,खासकर उसकी बनाई हुई खीर सबको खूब पसंद आई थी। सभी मेहमान तृप्त होकर गए थे। इस बात की संतुष्टि साफ झलक रही थी नियति के चेहरे पर।

कहते है यदि पितृ श्राद्ध में भोजन करने वाले लोग तृप्त होकर जाएं तो समझ लीजिए आपके पितृ भी तृप्त हो गए।

"चलो ज़रा खीर चखी जाए । मैं भी तो देखूं कैसी बनी है खीर, जो सब इतनी तारीफ कर रहे थे।"

बुदबुदाते हुए नियति, एक कटोरी में थोड़ी सी खीर लिए वापस लिविंग रूम में आ गई। ड्राई फ्रूट्स से भरी हुई खीर वाकई बहुत स्वदिष्ट बनी थी।

वैसे नियति को मीठा ज्यादा पसंद नही था। पति और बच्चे भी मीठे से ज्यादा ,चटपटे व्यंजन पसंद करते थे तो खीर घर में कभी कभार ही बनती थी।

पर एक व्यक्ति थे घर में ,जो खीर के दीवाने थे। वो थे नियति के ससुर , स्वर्गीय मणिशंकर जी। वे अक्सर अपनी पत्नी ,उमा से खीर बनाने को कहा करते और उमा जी भी ,खूब प्रेम से उनके लिए खीर बनाया करती किंतु उमा जी के स्वर्गवास के बाद सब बदल गया।

एक बार मणि शंकर जी ने नियति से कहा " बहु थोड़ी खीर बना दे ,आज बहुत जी कर रहा है खीर खाने को।"

इतना सुनते ही नियति उन पर बरस पड़ी थी
" क्या पिता जी, आपको पता है ना घर में आपके अलावा और कोई खीर नहीं खाता। अब मैं स्पेशली आपके लिए खीर नहीं बना सकती और भी बहुत काम रहते है मुझे घर पर ,और बुढ़ापे में इतना चटोरापन अच्छा नहीं। "

बहु से इस तरह के व्यवहार की कल्पना भी नहीं की थी मणिशंकर जी ने। दिल को बहुत ठेस पहुंची थी उनके। उस दिन वे अपनी स्वर्गवासी पत्नी को याद कर, खूब रोए। बस उस दिन से उन्होंने नियति से कुछ भी कहना बंद कर दिया।कभी कभी बहुत इच्छा होती उन्हें खीर खाने की। पर बहु के डर से उन्होंने अपनी इस इच्छा को भी दबा दिया।

कुछ दिन बाद मणि शंकर जी भी इस संसार को छोड़ चले गए। परंतु खीर खाने की इच्छा उनके मन में ही रह गई।

कहते हैं श्राद्ध में पितरों का मनपसंद भोजन यदि
पंडितों को खिला दो तो पितृ देव प्रसन्न हो जाते हैं इसीलिए तो आज नियति ने खीर बनाई थी।

" चलो आज बाबूजी की आत्मा को भी तृप्ति मिल गई होगी। उनकी मनपसंद खीर जो बनाई थी आज ।" नियति मुस्कुराते हुए बुदबुदाई और बची हुई खीर खाने लगी।

तभी उसके कानो में एक आवाज सुनाई दी " बहु थोड़ी खीर खिला दे आज बहुत जी कर रहा है खीर खाने का।"
एक बार, दो बार, कई बार ये आवाज नियति के कानों में गूंजने लगी।

ये उसके ससुरजी की आवाज़ थी। नियति थर थर कांपने लगी। उसने सुना था कि पितृ पक्ष में पितृ धरती पर विचरण करते है। डर के मारे नियति के हाथ से खीर की कटोरी छटक कर ज़मीन पर गिर गई।

उसने दोनो हाथ अपने कानों पर रख दिए। उसे अपने ससुर जी से किया हुआ दुर्व्यवहार याद आ गया। अनायास ही उसके आंखों से पश्ताचाप की अश्रु धारा फूट पड़ी।

अब कमरे में एक अजीब सी शांति थी। सब कुछ एक दम शांत । अशांत था तो बस, नियति का मन। वो अब ये जान गई थी कि जो तृप्ति आप एक मनुष्य को उसके जीते जी दे सकते है, वो तृप्ति आप उसके मरणोपरांत, हजारों दान पुण्य या पूजा पाठ से कभी नहीं दे सकते इसलिये बुजुर्गों की जीतेजी सेवा मरणोपरांत श्राद्ध कर्म से बहुत बेहतर है।🙏🏼🙏🏼राधे राधे जय श्री कृष्ण

09/09/2022

मेरे तो गिरधर गोपाल, दुसरो नहीं कोय.............

मीराबाई भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त हैं। मीरा बाई जी ने भगवान श्री कृष्ण को अपना पति माना।

मीरा बाई ने सिर्फ कृष्ण को अपना माना इसलिए उन्होंने लिखा कि मेरे तो गिरधर गोपाल, दुसरो नहीं कोय।

सिर्फ कृष्ण जी मेरे हैं, दूसरा और कोई भी नहीं। वो तो हम ही है जो सबको अपना माने बैठे हैं

जैसे माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री, बहन, और आज कल तो गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड।

लेकिन क्या ये सब हमारे हैं?
थोड़ा सोचिये?

वास्तव में तो भगवान ही हमारे हैं।
मीरा भाई के अनेक भाव हैं।

पूज्य श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी से एक बार भागवत कथा में ये भाव सुना और बेहद पसंद आया।

इस भाव में मीरा का कृष्ण के प्रति विरह और प्रेम दोनों है। हम ऐसे भाव तो बना नहीं सकते लेकिन बने बनाये भाव में उस प्रेम का दर्शन कर सकते हैं।

आज मीरा बाई जी भगवान को एक पत्र लिखने जा रही हैं।

लेकिन मीरा बाई लिख ही नहीं पा रही है। आप इस कविता का थोड़ा दर्शन तो कीजिये। मीरा बाई जी कह रही हैं–

पतियाँ मै कैसे लिखूँ, लिखी ही ना जाय।
कलम धरत मेरो कर काँपत है और नैन रहे झड़ाये।

बात कहुँ तो कहत न आवै, जीव रह्यो डरराय।
बिपत हमारी देख तुम चाले, कहिया हरिजी सूं जाय।

मीराँ के प्रभु गिरधरनागर
चरण कमल रखाय ।।

अर्थ : मीरा जी कहती हैं- मैं पत्र कैसे लिखूं लिखा ही नहीं जा रहा है। जब मैं हाथ में कलम पकड़ती हूँ तो मेरे हाथ कांपने लग जाते हैं।

तुम्हारी याद आ जाती हैं और आँखों से आंसूं झरने लगते हैं, बहने लगते हैं..😭😭

जब कुछ बात कहना चाहती हूँ तो वह कही नहीं जाती, कहनी नहीं आ रही और मेरा जी(दिल) घबराने लगता है,
डर लगने लगता है..😭😭

हे श्याम सुंदर तुम हमारी विपदा को देख कर चले गए। ये ठीक बात नहीं है आपकी, और यह विपदा हरि से कहने से ही जाएगी...😭😭

और कोई उपचार भी नहीं हो सकता इसका।
अंत में मीरा जी कहती हैं मीरा के प्रभु गिरधर नगर मुझे हमेशा अपने चरण कमल में ही रखना।

वाह, अद्भुत प्रेम है मीरा जी का। हम भगवान से कहते हैं, प्रभु हमें सुख में रखना, दुःख ना देना लेकिन मीरा बाई तो कहती है

प्रभु! हमे तो सिर्फ और सिर्फ अपने चरण कमलों में रखना।

अगर हम आपके चरण कमलों में रहेंगे तो सुख दुःख का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

क्योंकि आपके चरण कमल तो दुःख के लिए काल है.....

प्रेम और आँसू की...
पहचान भले ही अलग - अलग हो...!
किन्तु दोनों का.... गोत्र एक ही है...
" हृदय ".
♥️मेरी राधे श्याम मिलादे

इस संसार में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो अपने जीवन में हारता है, इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है पर यही सच है। हम सब...
09/07/2022

इस संसार में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो अपने जीवन में हारता है, इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है पर यही सच है। हम सब अपने खुद के लिए जो मापदंड तय करते है, उन मापदंड के हिसाब से हम हमेशा जीतते है।

एक सहनशील व्यक्ति हर बुराई सहन करते हुए भी अपनी अच्छाई कभी नही छोड़ता, अपने सहन करने की इस क्षमता के चलते हर रिश्ते में झुक जाने में भी वह हमेशा अपनी जीत ही देखता है।

एक अहंकारी व्यक्ति , जिसके लिए उसका अहम ही सब कुछ है, अपनी अंतिम सांस तक वह अपना अहंकार नही छोड़ता, इसमें भी उसे अपनी जीत ही नज़र आती है।

एक स्वार्थी इंसान अपने फायदे के लिए अक्सर दूसरे को नुकसान पहुंचाता है, इसमें भी उसे अपनी जीत ही नजर आती है।

एक गुस्सैल इंसान को दूसरे लोगो पर अपना गुस्सा निकाल कर अपनी जीत का अनुभव होता है।

सवाल हार -जीत का कभी था ही नही, बल्कि सवाल यह है कि जो लड़ाई हमने जीवन भर लड़ी है और जिसमें हमने जीत भी हासिल की है, वह लडाई सही थी या गलत?

कहीं ऐसा तो नही की जीतने की इस धुन में मैंने उन लोगो को खो दिया जिनके साथ मुझे अपनी जीत की खुशी मनानी थी?

कहीं ऐसा तो नही की मेरे अंतिम समय में मुझे इस बात का अहसास हो कि मैंने जीवनभर एक गलत लड़ाई लड़ी ओर उसमे जीत भी हासिल की है? अगर ऐसा हुआ तो मैं जीतकर भी हारा हुआ इंसान हूँ।

जीतना तो हर किसी का तय है बस हमें यह ध्यान रखना है कि हमारे मापदण्ड और हमारी लड़ाई सही है या नही? जीवन की असली खुशी जीतने में नही बल्कि सही लड़ाई लड़ने में है। अगर हमारी लड़ाई सही है तब हार और जीत के हमारे लिये कोई मायिने नही रह जाते..

09/07/2022

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