13/08/2026
महाराष्ट्र में एक चोखामेला नाम के महान भक्त थे, वो गृहस्थ अवश्य थे मगर उनका चित्त हमेशा विठ्ठल भगवान में रहता था। मनुष्य द्वारा बनाई हुई जातियों में वो ऐसी जाति के थे जिनका उस समय मंदिर में प्रवेश वर्जित था। एक दिवस चोखामेला जी बाज़ार में अपने घर के लिए सब्जी आदि खरीद रहे थे, तभी एक फल विक्रेता के पास उनको केले देख कर प्रेरणा आयी कि क्यों न ठाकुर जी को केले का भोग लगाया जाए। वो केले खरीद कर विट्ठल भगवान के मंदिर की तरफ चल दिये। वहां पुजारी ने उनका तिरस्कार कर दिया और कहा कि इतने बुरे दिन नहीं आए कि विट्ठल भगवान तुम्हारे दिए हुए केले खाएं। चोखा मेला जी वापस अपने घर आ गए उन्होंने मन ही मन विट्ठल भगवान से शिकायत की कि प्रभु मुझे यह बुरा नहीं लगा कि मेरा अपमान हुआ परंतु जब आपको ऐसा ही करना था तो मेरे मन में आपने केले का भोग लगाने की क्यों प्रेरणा दी। उन्होंने विट्ठल भगवान से कहा आपने मुझे ऐसे कुल में क्यों पैदा किया जिसमें जन्म लेने के बाद मैं आपकी सेव नहीं कर सकता, उन्होंने निर्णय लिया कि यदि मैं विट्ठल भगवान की सेवा नहीं कर सकता तो फिर मैं शरीर का त्याग ही कर देता हूँ।
उन्होंने अपने आप को कमरे में बंद कर लिया और तय किया कि वह अन्न जल का त्याग कर के अपने प्राण त्याग देंगे।
देर रात्रि में चोखामेला जी के दरवाजे पर दस्तक हुई और किसी ने आवाज़ लगाई, "चोखामेला जी ओ चोखामेला जी"। चोखामेला जी को लगा कि इस वक्त कौन आ सकता है, जो आवाज़ चोखामेला जी के कानों में पड़ी वो बड़ी मधुर आवाज़ थी और चोखामेला जी अपने आपको रोक न सके, उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही चोखामेला जी के अश्रु निकल गए, सामने साक्षात विठ्ठल भगवान खड़े थे, चोखामेला जी रोते रोते प्रभु के चरणों मे लेट गए, विठ्ठल भगवान ने उन्हें उठाया और कहा ये रोने धोने का समय नहीं है, मुझे भूख लगी है, वो जो तुम केले लाये थे वो कहाँ हैं, चोखामेला जी ने कहा प्रभु आप आसन पर बैठिए मैं अभी लाता हूँ। प्रभु ने कहा मैं आसन पर नहीं तुम्हारी गोद मे बैठकर केले खाऊंगा। प्रभु ने बड़े प्यार से चोखामेला जी की गोद में बैठकर केले खाये। प्रभु ने कहा, मैं जाति, कुल, पूजा, आराधना से नहीं रीझता, मुझे तो मेरे भक्तों का मेरे प्रति सच्चा भाव खींचता है, खूब आंनद से रहो। ऐसा कह कर प्रभु वापस चले गए।
अगली सुबह जब पुजारियों ने पट खोलने चाहे तो पट खुले ही नहीं, बहुत कोशिश की गई, अब पुजारियों के जीवन का सहारा केवल विठ्ठल भगवान ही थे, प्रगट में भी और परमार्थ में भी, पुजारियों ने रो रो कर विठ्ठल भगवान से प्रार्थना की, तब विठ्ठल भगवान अंदर से बोले, पहले चोखामेला जी को आदर सहित पालकी में बिठा कर लाओ, वो कहेंगे तब ही पट खोलूँगा। सारे पुजारी भाग कर पालकी लेकर चोखामेला जी घर पहुँचे और उनके चरणों मे लोट गए, कहा हम जान गए हैं कि आप किस चोटी के भक्त हैं, कृपया हमको क्षमा करिए और मंदिर चल कर प्रभु के पट खुलवाईये। चोखामेला जी बहुत झिझकते हुए पालकी में बैठे और मंदिर पहुँचे, मंदिर पहुँच कर उन्होंने प्रभु से बहुत ही दीन भाव से उनकी यह लीला समाप्त करने की प्रार्थना की ताकि श्रद्धालु दर्शनों का लाभ उठा सकें और मंदिर का कार्य सुचारू रूप से चल सके।
राधे राधे
मार्गदर्शक - श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
प्रेरणास्त्रोत - श्री श्री १००८ श्री स्वामी हरिहरानंद जी महाराज , होलीपुरा