"Sab ka Malik ek Hai" ( सब का मालिक एक है )

"Sab ka Malik ek Hai" (  सब का मालिक एक है  ) सब का मालिक एक है

राजस्थान में अजमेर और नागौर की सीमा पर खुंडियास में लोकदेवता बाबा रामदेव का भव्य मंदिर है. भक्तों के लिए यह स्थान प्रमुख...
25/08/2025

राजस्थान में अजमेर और नागौर की सीमा पर खुंडियास में लोकदेवता बाबा रामदेव का भव्य मंदिर है. भक्तों के लिए यह स्थान प्रमुख रामदेवरा से कम नहीं है. यह मिनी रामदेवरा के नाम से भी जाना जाता है. बताया जाता है कि एक भक्त की भक्ति से यह स्थान तीर्थ बन गया. खुंडियास के बाबा रामदेव मंदिर में श्रद्धालु की गहरी आस्था है. दूर-दूर से श्रद्धालु यहां अपनी परेशानियों का हल जानने के लिए आते हैं. ऐसे भी कई श्रद्धालु हैं जो कई वर्षों से यहां मेले में दर्शनों के लिए हर वर्ष आते हैं.

वहीं, जिले और आसपास के जिलों से तो हर दूज पर लोग मंदिर में बाबा रामदेव के चरणों मे ढोक लगाने आते हैं, फिर चाहे कैसी भी परिस्थियां क्यों ना हो. इन दिनों बाबा रामदेव का मेला चल रहा है. वहीं, बारिश का भी दौर जारी है, लेकिन आस्था सब पर भारी है. एक दंपती सवाईमाधोपुर से पैदल चलकर बाबा के धाम पहुंचा है. यहां आने के बाद रास्ते की तकलीफ को वे भूल गए और उन्हें कुछ याद है तो बाबा रामदेव और उनका यह अद्भुत स्थान. इसी तरह टोंक जिले के गोपाल भी वर्षों से यहां आ रहे हैं. उनका विश्वास है कि यहां बिगड़े हुए काज संवर जाते हैं. हर रोग से मुक्ति बाबा के आशीर्वाद से मिल जाती है.

प्रसाद मानकर खाते हैं मिट्टी : श्रद्धालु दर्शन करने के बाद बाबा रामदेव की अखंड धूनी के दर्शन और परिक्रमा करते हैं, साथ ही सामने की ओर भक्त भोजराज गुर्जर की समाधि के दर्शन करना नहीं भूलते. मंदिर सेवा समिति मंदिर का ही नहीं, बल्कि हर आने वाले श्रद्धालु का भी पूरा ख्याल रखती है. समिति के सदस्य बनाराम ने बताया कि भक्त भोजराज गुर्जर की समाधि की परिक्रमा श्रद्धा से की जाती है. समाधि के चारों ओर फैली महीन मिट्टी का भी विशेष महत्व है. श्रद्धालू इस मिट्टी को प्रसाद मानकर खा लेते हैं और इसे शरीर पर मलते हैं.

अजमेर के खुंडियास में बाबा रामदेव ने भक्त को दिए थे दर्शन, रामदेवरा नहीं जा पाने वाले भक्त यहां लगाते हैं ढोक
अजमेर की पावन धरा पर बाबा रामदेव का एक ऐसा अद्भुत पवित्र धाम है, जिसके बारे में मान्यता है कि जो श्रद्धालु रामदेवरा नहीं जा पाते, वे खुंडियास में ढोक लगाते हैं. बाबा रामदेव का यह प्राचीन मंदिर एक भक्त की गहरी और पवित्र आस्था का प्रमाण है. यहां भक्त की समाधि के आसपास की मिट्टी को श्रद्धालु प्रसाद के रूप में खाते और शरीर पर मलते हैं.
अजमेर: राजस्थान में अजमेर और नागौर की सीमा पर खुंडियास में लोकदेवता बाबा रामदेव का भव्य मंदिर है. भक्तों के लिए यह स्थान प्रमुख रामदेवरा से कम नहीं है. यह मिनी रामदेवरा के नाम से भी जाना जाता है. बताया जाता है कि एक भक्त की भक्ति से यह स्थान तीर्थ बन गया. खुंडियास के बाबा रामदेव मंदिर में श्रद्धालु की गहरी आस्था है. दूर-दूर से श्रद्धालु यहां अपनी परेशानियों का हल जानने के लिए आते हैं. ऐसे भी कई श्रद्धालु हैं जो कई वर्षों से यहां मेले में दर्शनों के लिए हर वर्ष आते हैं.

वहीं, जिले और आसपास के जिलों से तो हर दूज पर लोग मंदिर में बाबा रामदेव के चरणों मे ढोक लगाने आते हैं, फिर चाहे कैसी भी परिस्थियां क्यों ना हो. इन दिनों बाबा रामदेव का मेला चल रहा है. वहीं, बारिश का भी दौर जारी है, लेकिन आस्था सब पर भारी है. एक दंपती सवाईमाधोपुर से पैदल चलकर बाबा के धाम पहुंचा है. यहां आने के बाद रास्ते की तकलीफ को वे भूल गए और उन्हें कुछ याद है तो बाबा रामदेव और उनका यह अद्भुत स्थान. इसी तरह टोंक जिले के गोपाल भी वर्षों से यहां आ रहे हैं. उनका विश्वास है कि यहां बिगड़े हुए काज संवर जाते हैं. हर रोग से मुक्ति बाबा के आशीर्वाद से मिल जाती है.

प्रसाद मानकर खाते हैं मिट्टी : श्रद्धालु दर्शन करने के बाद बाबा रामदेव की अखंड धूनी के दर्शन और परिक्रमा करते हैं, साथ ही सामने की ओर भक्त भोजराज गुर्जर की समाधि के दर्शन करना नहीं भूलते. मंदिर सेवा समिति मंदिर का ही नहीं, बल्कि हर आने वाले श्रद्धालु का भी पूरा ख्याल रखती है. समिति के सदस्य बनाराम ने बताया कि भक्त भोजराज गुर्जर की समाधि की परिक्रमा श्रद्धा से की जाती है. समाधि के चारों ओर फैली महीन मिट्टी का भी विशेष महत्व है. श्रद्धालू इस मिट्टी को प्रसाद मानकर खा लेते हैं और इसे शरीर पर मलते हैं.

दूज और दशमी पर भरता है मेला : रक्षाबंधन पर आने वाली पूर्णिमा के दिन से अगली पूर्णिमा तक बाबा रामदेव का मेला हर्षोल्लास के साथ हर वर्ष भरता है. इसमें राजस्थान ही नहीं हरियाणा, पंजाब, गुजरात , मध्यप्रदेश, यूपी समेत कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु लोकदेवता बाबा रामदेव के दर्शन के लिए रामदेवरा आते हैं. इनमें बड़ी संख्या पैदल यात्रियों की होती है. लाखों लोगों के विश्वास और आस्था का बड़ा केंद्र रामदेवरा है. रामदेवरा अजमेर होकर जाने वाले श्रद्धालुओं में से अधिकांश श्रद्धालू खुंडियावास जरूर आते हैं.

इसका कारण एक भक्त की भक्ति है. यहां एक भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर बाबा रामदेव ने अपनी ऊर्जा से ना केवल इस स्थान को पवित्र किया, बल्कि यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए बाबा रामदेव ने यहां उपस्थित रहने का वचन भी अपने भक्त को दिया था. बताया जाता है कि खुंडियास में बाबा रामदेव का मंदिर है. यहां कभी घोर जंगल हुआ करता था. रामदेवरा पैदल जाने वाले यात्री इस मार्ग से होकर ही जाया करते थे. इन जातरुओं में लोकदेवता बाबा रामदेव का एक अनन्य भक्त भोजराज गुर्जर भी थे. बूंदी जिले के लाखेरी तहसील में देवपुरा गांव के निवासी भोजराज गुर्जर थे. इनकी समाधि खुंडियास में बाबा रामदेव मंदिर के समीप ही है. खुंडियास आकर बाबा रामदेव के दर्शन करने वाले भक्त भोजराज गुर्जर की समाधि पर भी ढोक लगाना नहीं भूलते.

अमर हो गया भक्त भोजराज गुर्जर का नाम : खुंडियास मंदिर में पुजारी सत्यनारायण बताते हैं कि बूंदी के लाखेरी क्षेत्र में देवपुरा निवासी भोजराज गुर्जर लोकदेवता बाबा रामदेव के भक्त थे. भक्त भोजराज गुर्जर की बाबा रामदेव में इतनी गहरी आस्था थी कि वे सदा बाबा रामदेव का नाम जपा करते थे और हर वर्ष दंडवत करते हुए बूंदी से रामदेवरा जाया करते थे. 24 वर्षों तक उनकी यह यात्रा जारी रही. सन 1986 में भक्त भोजराज गुर्जर दंडवत करते हुए खुंडियास पहुंचे. उनकी भक्ति और गहरी आस्था से वशीभूत होकर बाबा रामदेव ने उन्हें इस स्थान पर ही दर्शन देकर कहा कि अब तुम्हें रामदेवरा आने की जरूरत नहीं है. मैं खुद यहीं पर आ गया हूं.

इसके बाद भक्त भोजराज गुर्जर ने उस स्थान पर ध्वजा लगा दी, जहां पर बाबा रामदेव ने उन्हें दर्शन दिए थे. भक्त भोजराज गुर्जर जब से रहने लग गए. उस वक्त यहां घोर जंगल होने के कारण भोजराज गुर्जर समीप ही जामुन वाले देव जी के स्थान पर रहे, फिर मंदिर के उत्तर दिशा में पहाड़ी पर धूनीवाले बाबा के मंदिर में रहे. इसके बाद में भक्त भोजराज गुर्जर ने बाबा रामदेव के भक्तों के सहयोग से यहां मंदिर का निर्माण करवाना शुरू किया, साथ ही मंदिर के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर अपना आश्रम बनाया. दर्शन के लिए दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था आज भी आश्रम में की जाती है.

शाम की आरती है दिव्य : खुंडियास आने वाले श्रद्धालुओं की कोशिश रहती है कि वह शाम की आरती में जरूर रुकें. शाम की आरती विशेष होती है. मान्यता है कि जिन लोगों के शरीर में किसी भी प्रकार की कोई व्याधि है, वह शाम को होने वाली आरती में जरूर शामिल होते हैं. इस दौरान उनका शरीर खुद ब खुद हिलने लगता है. आरती के बाद उन्हें उस ऊपरी हवा (व्याधि) से छुटकारा मिल जाता है. यहां हर श्रद्धालु का अपना अनुभव और अपनी आस्था है, जो उन्हें इस पवित्र स्थान से जोड़े हुए है.

07/12/2020
20/11/2020
लक्ष्मी की बहिन दरिद्रा की कथा🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁मां लक्ष्मी के परिवार में उनकी एक बड़ी बहन भी है जिसका नाम है- दरिद्रा।इस संबंध म...
16/11/2020

लक्ष्मी की बहिन दरिद्रा की कथा
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मां लक्ष्मी के परिवार में उनकी एक बड़ी बहन भी है जिसका नाम है- दरिद्रा।
इस संबंध में एक पौराणिक कथा है कि इन दोनों बहनों के पास रहने का कोई निश्चित स्थान नहीं था इसलिये एक बार माँ लक्ष्मी और उनकी बड़ी बहन दरिद्रा श्री विष्णु के पास गई और उनसे बोली,
जगत के पालनहार कृपया हमें रहने का स्थान दो? पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त था कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा,
उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा अतः श्री विष्णु ने कहा, आप दोनों पीपल के वृक्ष पर वास करो।
इस तरह वे दोनों बहनें पीपल के वृक्ष में रहने लगी। जब विष्णु भगवान ने माँ लक्ष्मी से विवाह करना चाहा तो लक्ष्मी माता ने इंकार कर दिया क्योंकि उनकी बड़ी बहन दरिद्रा का विवाह नहीं हुआ था। उनके विवाह के उपरांत ही वह श्री विष्णु से विवाह कर सकती थी।
अत: उन्होंने दरिद्रा से पूछा, वो कैसा वर पाना चाहती हैं।
तो वह बोली कि, वह ऐसा पति चाहती हैं जो कभी पूजा-पाठ न करे व उसे ऐसे स्थान पर रखे जहां कोई भी पूजा-पाठ न करता हो।
श्री विष्णु ने उनके लिए ऋषि नामक वर चुना और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए।
अब दरिद्रा की शर्तानुसार उन दोनों को ऐसे स्थान पर वास करना था जहां कोई भी धर्म कार्य न होता हो। ऋषि उसके लिए उसका मन भावन स्थान ढूंढने निकल पड़े लेकिन उन्हें कहीं पर भी ऐसा स्थान न मिला।
दरिद्रा उनके इंतजार में विलाप करने लगी।
श्री विष्णु ने पुन: लक्ष्मी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मी जी बोली, जब तक मेरी बहन की गृहस्थी नहीं बसती मैं विवाह नहीं करूंगी।
धरती पर ऐसा कोई स्थान नहीं है।
जहां कोई धर्म कार्य न होता हो।
उन्होंने अपने निवास स्थान पीपल को रविवार के लिए दरिद्रा व उसके पति को दे दिया।
अत: हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है।
अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है। पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा,
उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा।
इसी लोक विश्वास के आधार पर लोग पीपल के वृक्ष को काटने से आज भी डरते हैं,
लेकिन यह भी बताया गया है कि यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है।

*विशेष ,,,,,,, मेरे मतानुसार "कालाधन "
जो अनैतिक अथवा भ्रष्ट " तरीकों से कमाया जाता है वह लक्ष्मी जी की बहन दरिद्रा ही है !
जो क्रय शक्ति लक्ष्मी जी की है वही दरिद्रा की है ! अंतर केवल है की नेक कमाई उसी तरह फलती फूलती है जिस प्रकार कमल की अनेक पंखुड़िआ खिलने लगाती है !
मेरे अनुभव में ये कमल की पंखुड़िआ अनेक आय के स्रोतों का उत्पन्न होना है जो नेक कमाई से ही संभव है !
दूसरी तरफ काला धन अनेक आपदाओं व् विपदाओं को उत्पन्न करने वाला होता है !
यह प्रकृति से तामसिक होने के कारण अज्ञान एवं मनोविकारों ( विषय एवं वासनाओं ) को उत्पन्न करने वाला है !
अंत में दुर्लभ मनुष्य योनि के सत्व गुणों को नष्ट कर देता है !
ज्ञान का प्रकाश शनैः शनैः समाप्त होने लगता है ! आपदा एवं विपदाए सही मोके की इंतज़ार में रहती है !
मनुष्य मूढ़ बुद्धि होने लगता है और अंत में सबकुछ यहीं छोड़ कर चला जाता है !
जबकि लक्ष्मी वान "पुण्य " की कमाई करता है और साथ ले जाता है !
अतः " देवी दारिद्रा को लक्ष्मी समझने की भूल ना करे !"

लक्ष्मी का वास परोपकारी के घर में स्थाई है !

अनैतिक एवं भ्रष्ट तरीकों से धन कमाने वाले मूढ़ प्राणी अपने घर में लक्ष्मी जी को आमंत्रित करने के स्थान पर दरिद्रा को आमंत्रित करते है जिससे कोई भी धार्मिक अनुष्ठान एवं परोपकार के कार्य संभव नहीं है या वे निष्फल और औपचारिकता मात्र होते है !

"!! जय श्री राम  !!"
22/10/2019

"!! जय श्री राम !!"

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