21/04/2023
अनन्त श्रीविभूषित जगतगुरु निम्बार्काचार्य पीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य श्री "श्रीजी" महाराज की #जयन्ती_उत्सव पर आप सभी भक्त-वृन्दों को हार्दिक बधाई-शुभकामनाएं ।
इस धर्मप्राण देश में जब-जब धर्म की क्षति एवं अधर्म की अभिवृद्धि हुई है, तब तक सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीसर्वेश्वर प्रभु ने अवतार ग्रहण कर अपने स्वरूपभूत धर्म की रक्षा की है । अब भी आवश्यकतानुसार अपनी दिव्य विभूतियों (पार्षदों) को धर्माचार्यों के रूप में भेजकर समयोचित उद्देश्यों की पूर्ति करवाते हैं । उन्हीं धर्माचार्यों की सम्प्रदाय परम्पराएं अद्यावधि अक्षुण्ण रूप में चली आ रही है । इन परम्पराओं में भी बीच-बीच में जब कभी कभी किसी प्रकार की कोई शिथिलता आ जाती है, तो भगवान् कृपा से किसी न किसी शक्ति सम्पन्न महापुरुष का प्राकट्य हो जाता है, जिनके द्वारा पुन: जागृति का संचार हो उठता है । बस, उन्हीं दिव्य विभूतियों में एक हमारे परम पूज्य प्रातः स्मरणीय श्रीनिंम्बार्काचार्य पीठाधिपति जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्री "श्रीजी" श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य जी महाराज हैं ।
आपश्री का जन्म विक्रम सम्वत् 1986 वैशाख शुक्ल प्रतिपदा, शुक्रवार, कृतिका नक्षत्र तदनुसार, दिनांक 10 मई 1929 ईस्वी में श्रीनिंम्बार्क तीर्थ (परशुरामपुरी) सलेमाबाद- किशनगढ़ (राजस्थान) निवासी परम पावन गौड़ ब्राह्मण वंश के एक परिवार में प्रात: 5 बजकर 45 मिनिट पर हुआ था । माता का नाम श्रीस्वर्णलता (सोनीबाई) और पिता का नाम श्रीरामनाथ शर्मा गॉड था । यह समस्त परिवार श्रीनिम्बार्क- सम्प्रदाय परम्परानुयायी परम वैष्णव रहा है ।
प्राक्तन पुण्य कर्मानुसार किसी भाग्यशाली दम्पत्ति को ही ऐसे महापुरुषों को जन्म देने एवं लालन-पालन का सुयोग प्राप्त होता है ।
जिस वसुन्धरा पर ऐसे महापुरुषों का जन्म होता है, वह वसुन्धरा तथा उसका कुल (परिवार) माता-पिता एवं उनके स्वर्गस्थ पितृगण आदि परम धन्य हो जाते हैं । आपका बाल्यकालीन प्रचलित (बोलता) नाम रतनलाल था । यधपि कृतिका नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म होने के कारण आपका जन्म नाम उत्तमंचन्द रखा गया था, यद्यपि नामकरण के दिन पीठ के व्यास पं. श्रीगोवर्धनलालजी के द्वारा यह बोलता नाम रतन लाल रखा जाने के कारण सब रतनलाल ही कहते थे ।एक दिन की बात है --- आपके जन्म स्थान पर एक अज्ञात वैष्णव जटाधारी महात्मा भिक्षावृत्ति के बहाने आयै । माताजी नै आपको गोद में लिए हुए ही श्रद्धापूर्वक उठकर उन्हें भिक्षा दी । माता की गोद में हंसते हुए बालक रतन को देखकर प्रसन्न मुद्रा में महात्माजी ने कहा -- माता! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त तेजस्वी एक रतन है, आगे चलकर यह बालक एक अच्छे (उत्तम) पद को प्राप्त करेगा । इस शुभाशीर्वाद को श्रवणकर माताजी बड़ी प्रसन्न हुई । महात्माजी पधार गये, तब उनके चले जाने के बाद माताजी को तुरन्त स्मरण आया कि हो न हो ये महात्माजी श्रीनिम्बार्काचार्य पीठ के संस्थापक श्रीपरशुरामदेवाचार्य (स्वामी) जी महाराज जी होंगे, जो इस बालक को आशीर्वाद देने के को आये हो । माताजी ने पहले यह बात बड़े-बूढ़ों से सुन भी रखी थी कि इसी प्रकार इस पीठ में तथा श्रीपुष्करराज के परशुरामद्वारे में कई लोगों को स्वामीजी महाराज के दर्शन हुए हैं ।
बाल्यकाल में ही आपका लौकिक खेल-खिलौनों में मन न जाकर स्वाभाविक रूप से धार्मिक कार्यों जैसे भगवान् श्रीराधामाधव की मंगला, श्रृंगार एवं सायंकालीन आरती के दर्शन तथा स्तुति-संकीर्तनादि में सम्मिलित होने तथा पुजारी श्रीरघुनाथदासजी से श्रीलड्डू-गोपालजी की सेवा प्राप्त कर दैनिक पूजा करने आदि में प्रवृत्ति रहती थी । जिस प्रकार प्राची दिशा में सूर्योदय से पूर्व ही अरुणोदय-वेला में एक प्रकाशमयी लालिमा की दिव्य छटा दिखाई देने लगती है, ठीक उसी प्रकार -- होनहार विरवान के होत चीकने पात वाली कहावत के अनुसार भगवत्कृपापात्र सद्गुण सम्पन्न महापुरुषों की भी उनके बालकपन में भी प्रतिभा झलकने लगती है । श्रीनिम्बार्कतीर्थ (सलेमाबाद) के सुयोग्य विद्वान ज्योतिषी पं. श्रीलादूरामजी व्यास द्वारा निर्मित आपकी जन्म कुण्डली का फलादेश जन्म से लेकर आज पर्यंत ज्यों का त्यों मिलता हुआ आ रहा है ।
दीक्षा - युवराज पद नियुक्ति एवं आरम्भिकी शिक्षा ---
वैष्णव घराने में उत्पन्न हुए बालक घर अपने माता-पिता और बन्धु -बान्धवों का शिष्टाचार पूर्व रहन-सहन, आचार विचार, पाठ-पठन एवं धर्म - कर्मादि आदि नियमों को जैसा देखते हैं, उसी प्रकार उनके हृदय पटल पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और फिर वे यन्नवे भाजने लग्न: संस्कारों नान्यथा भवेत् के अनुसार बालकपन से लेकर आजीवन पर्यंत अमित बन जाते हैं । आपके बालकपन से ही आपमें इन सदाचार सुद्विचार संबंधी भावों को देखकर अनन्त श्रीविभूषित जगतगुरु निम्बार्काचार्यपीठाधिपति श्री "श्रीजी" बालकृष्णदेवाचार्यजी महाराज बड़े प्रसन्न होते थे ।
हिन्दुसूर्य उदयपुर नरेश महाराणा श्रीभूपालसिंहजी के आवाहन और स्थलाधीश महन्त श्रीगंगादासजी की विनीत प्रार्थना पर विक्रम संवत 1994 वैशाख शुक्ल तृतीया को भूतपूर्व आचार्यश्री का उदयपुर पादार्पण हुआ । आपकी समारोहपूर्ण एक आदर्श यात्रा थी । पं. अमोलकरामजी शास्त्री, पं. वैष्णवदासजी शास्त्री, पं. गणपतिजी शास्त्री, अखिल भारतीय श्रोनिम्बार्क महासभा के महामंत्री श्रीनन्दकुमारदासजी ब्रह्मचारी तथा दामोदर स्वामी की रास मंडली व अधिकारी मनोहर दास जी आदि वृंदावन परिक्रमा निकट भविष्य में आने वाले कुम्भ अवसर पर आचार्यश्री के वृन्दावन मे पादार्पण का प्रस्ताव उदयपुर में ही पारित हुआ था । महाराणा साहब ने इसका हार्दिक अनुमोदन किया और सेवा - शुश्रुषा की भी आपने अभ्यर्थना की । आचार्यश्री की अत्यन्त वृद्धावस्था थी, भावी उत्तराधिकारी मनोनीत नहीं किया था जो मनोनीत किए थे देव उनके अनुकूल नहीं था, वस्तुतः वह इस पद के योग्य नहीं थे । सम्प्रदाय के विशिष्ट महन्त - सन्त और सेवकगण इसलिए चिंतित थे । आतुरतापूर्वक आचार्श्री से निवेदन करते रहते थे, उस समय आचार्यपीठ के प्रबन्धक अधिकारी भी नहीं रहे, अतः कुम्भ अवसर पर वृन्दावन यात्रा के सम्बन्ध में संकल्प - विकल्प चल रहा था । दैवयोग से निम्बार्क महासभा के कार्यकर्ता पं. व्रजवल्लभशरणजी आचार्यश्री के दर्शनार्थ मार्गशीर्ष मास आचार्यपीठ पहुंचे, आचार्यश्री बड़े प्रसन्न हुए, विचार विमर्श के अनन्तर आचार्यश्री के अनुरोधपूर्ण आदेश से आप ठहरे और वृन्दावन यात्रा में आचार्यश्री के साथ ही रहे । कुम्भ पर्व सानन्द संपन्न हुआ । उसी समय महन्त-संतो के अनुरोध से आचार्यश्री ने पं. लाडिलीशरणजी और नरहरिदासजी की अधिकारी पद पर नियुक्ति की और भावी उत्तराधिकारी भी सोच समझकर जहां तक हो शीघ्र ही नियुक्त किया जाए, यह सर्वसम्मति से निश्चित हुआ ।
दो वर्ष (1995-96) में अकालों की स्थिति और दोनों अधिकारियों के अनमेल के कारण सफलता नहीं मिल सकी । विक्रम संवत 1997 बैशाख शुक्ल प्रतिपदा को आचार्यश्री पं.व्रजवल्लभशरणजी को अधिकारी पद पर नियुक्त किया, उस समय उदयपुर महन्तजी के आदेशानुसार समय-समय पर वियोगीविश्वेवरजी की आचार्यपीठ आते जाते थे, विचार-विमर्श होता था, सभी ने हमारे चरित्र नायक 11 वर्षीय बालक चि. रतनलाल को आचार्यपीठ के भावी उत्तराधिकारी पद की नियुक्ति का प्रस्ताव आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत किया, इस प्रस्ताव से किशनगढ़ राज्य के दीवान पंचोली श्री केशरीसिंहजी भी सहमत थे । तब आपकी जन्म कुंडली देख, प्रतिभा संपन्न जान आपके माता-पिता से सत्परामर्श कर विक्रम संवत 1997 के आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (रथयात्रा) दिनांक 7 जुलाई सन् 1940 ईस्वी में उक्त आचार्यश्री ने आपको विधि - विधानपूर्वक पंच संस्कार युक्त विरक्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान कर युवराज पद पर नियुक्त कर दिया तथा आपके रतनलाल नाम को परिवर्तित कर श्रीराधासर्वेश्वरशरण नाम से आप को संबोधित किया ।आपकी प्रारम्भिक संस्कृत शिक्षा आरम्भ करा दी गई । उससे पूर्व आपने राजकीय स्थानीय प्राथमिकशाला से चतुर्थ कक्षा उत्तीर्ण कर ली थी । कुछ समय तक आपने निम्बार्कतीर्थ के व्यास श्रीबजरंगलालजी से भी अध्ययन किया था । तत्पश्चात आपके अध्यापनार्थ विरक्त वैष्णव ब्रह्मचारी पंडित श्री लाडिलीशरणजी न्याय - वेदान्तशास्त्री काव्यतीर्थ को नियुक्त किया,,जो कि बड़े श्री श्रीजी महाराज के ही कृपापात्र (शिष्य) थे ।