30/07/2025
प्राचीन काल में, भगवान शिव की पहली पत्नी सती थीं, जो प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। सती ने अपने पिता के विरोध के बावजूद शिव से विवाह किया। लेकिन दक्ष द्वारा आयोजित एक यज्ञ में, शिव का अपमान होने पर सती ने यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया। इससे क्रोधित और दुखी होकर शिव ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया और गहन ध्यान में लीन हो गए।
सती ने आत्मदाह करते समय संकल्प लिया कि वे अगले जन्म में पुनः शिव की पत्नी बनेंगी। इसके बाद सती का पुनर्जनम हिमालय के घर में पार्वती के रूप में हुआ। पार्वती बचपन से ही शिव की भक्ति में लीन थीं और उन्हें अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं।
पार्वती की कठोर तपस्या
पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या शुरू की। वे जंगल में चली गईं और वर्षों तक बिना भोजन-पानी के शिव की आराधना करती रहीं। ठंड, गर्मी, और वर्षा को सहते हुए उनकी तपस्या अटल रही। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने एक साधु का रूप धारण कर उनकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
साधु के रूप में शिव ने पार्वती से कहा, "तुम इतनी कठिन तपस्या क्यों कर रही हो? शिव तो एक सन्यासी हैं, जो श्मशान में रहते हैं, भस्म लपेटे रहते हैं, और सर्पों को गले में धारण करते हैं। वे तुम्हारे लिए उपयुक्त पति नहीं हैं।" लेकिन पार्वती अडिग रहीं और बोलीं, "मुझे केवल शिव ही चाहिए, चाहे वे जैसे भी हों। मेरी भक्ति सच्ची है।"
पार्वती की दृढ़ भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर शिव ने अपना असली रूप प्रकट किया और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद, कैलाश पर्वत पर शिव और पार्वती का विवाह धूमधाम से हुआ। यह विवाह सृष्टि में शक्ति (पार्वती) और शिव के मिलन का प्रतीक माना जाता है।
इस कथा का महत्व
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम किसी भी कठिनाई को पार कर सकता है। पार्वती की तपस्या और शिव के प्रति उनकी अटूट निष्ठा भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह कथा विशेष रूप से महाशिवरात्रि और सावन के महीने में सुनाई जाती है, क्योंकि यह शिव-पार्वती के पवित्र मिलन का उत्सव है।