श्री गोवर्धननाथ जी हवेली खाचरोद - म.प्र"

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श्री गोवर्धननाथ जी हवेली खाचरोद - म.प्र" श्री गोवर्धननाथजी हवेली मुखिया गली खाचरोद उज्जैन (म.प्र) जय श्री कृष्ण

व्रज –  फाल्गुन कृष्ण एकादशीMonday, 24 February 2025होरी के रसिया -“कान्हा धर्यो रे मुकुट खेले होरी कान्हा धर्यो रे lइतत...
24/02/2025

व्रज – फाल्गुन कृष्ण एकादशी
Monday, 24 February 2025

होरी के रसिया -

“कान्हा धर्यो रे मुकुट खेले होरी कान्हा धर्यो रे l
इततें आयें कुंवर कन्हाई उततें आई राधा गोरी, कान्हा धर्यो रे ll”

राजभोग दर्शन

साज – प्रातः की पिछवाई ग्वाल उपरांत बड़ी कर (हटा) दी जाती है और उसके स्थान पर राजभोग में सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल अबीर से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र, श्रृंगार में परिवर्तन नहीं किया जाता. पीले एवं लाल पुष्पों की विविध पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. प्रातः के वस्त्रों पर ही अबीर, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है. प्रभु के कपोल पर भी गुलाल, अबीर लगाये जाते हैं.

राजभोग में प्रभु की दाढ़ी गुलाल से रंगी जाती है. चोवा की चोली पर रंग (गुलाल, अबीर आदि) नहीं लगाया जाता.

राजभोग के कीर्तनों में अष्टपदी गायी जाती है.

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संध्या-आरती दर्शन उपरांत श्रीमस्तक व श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े किये जाते हैं. काछनी भी बड़ी की जाती है.

चोवा के घेरदार वागा व श्रीमस्तक पर गोलपाग धरायी जाती है जिसके ऊपर लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं. श्रीकंठ में छेड़ान के (छोटे) आभरण धराये जाते हैं.
आज के दिन यदि शीत कम हो गयी हो तो प्रभु को शयन में पुष्पों के आभरण धराये जाते हैं.


व्रज - फाल्गुन शुक्ल षष्ठी (द्वितीय)Wednesday, 19 February 2025श्री गोकुल राजकुमार लाल रंग भीने हें ।खेलत डोलत फाग सखा स...
19/02/2025

व्रज - फाल्गुन शुक्ल षष्ठी (द्वितीय)
Wednesday, 19 February 2025

श्री गोकुल राजकुमार लाल रंग भीने हें ।
खेलत डोलत फाग सखा संग लीने हें ।।१।।
चित्र विचित्र सुदेश सबे अनुकुले हें ।
राजत रंग विरंग सरोजसे फुले हें ।।२।।
अेकनके कर कंठण जोरी जराय की ।
अेकनके पिचकाई सु हेम भराय की ।।३।।
अेसोई ध्यान सदा हरीको जीय जो रहे ।
तापे गदाधर याके भाग्यकी को रहे ।।४।।

श्वेत लट्ठा के चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग के ऊपर जमाव का क़तरा एवं तुर्री के शृंगार

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : बिलावल)

वंदो मुनसाई नंदके जुवती झंडा केसें लेहोजु l ये सब सुंदरि घोखकि क्यों परिरंभन देहो ll 1 ll
फाल्गुन मास देत फगुआ अति क्रीड़ा रस खेलो l तनकी गति ओर भई बोली ढोली मेलो ll 2 ll
काहेको अकुलात हो मन को भायो करि हैं l हो भैया बलदेवको पृथक पृथक करि धरि है ll 3 ll
पांच सखी मिलि एक व्है बीच झंडा ले रोप्यो l फरहर रतिपति ऊपरे बहोत नगन जट ओप्यो ll 4 ll....अपूर्ण

साज – आज श्रीजी में श्वेत मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया जाता है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को श्वेत लट्ठा का सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं गुलाबी रंग के मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र अमरसी रंग के धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि की टिपकियों से कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को फ़ागण का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर गुलाबी रंग की छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, जमाव का क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में दो जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
गुलाबी एवं पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी सुन्दर थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, स्याम मीना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का एवं गोटी फागुन की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर लूम तुर्रा रूपहरी आवे.




व्रज - फाल्गुन कृष्ण पंचमीMonday, 17 February 2025दोहरा मनोरथ ( भलका चौथ) के वस्त्र का शृंगारआज श्रीजी को दोहरा मनोरथ ( ...
17/02/2025

व्रज - फाल्गुन कृष्ण पंचमी
Monday, 17 February 2025

दोहरा मनोरथ ( भलका चौथ) के वस्त्र का शृंगार

आज श्रीजी को दोहरा मनोरथ ( भलका चौथ) के केसरी डोरिया के दोहरी किनारी का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा का श्रृंगार धराया जायेगा.
श्रीमस्तक पर केसरी रंग की गोल पाग एवं मोर चंद्रिका धरायी जायेगी.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : वसंत) (अष्टपदी)

खेलत वसंत गिरिधरनलाल, कोकिल कल कूजत अति रसाल ll 1 ll
जमुनातट फूले तरु तमाल, केतकी कुंद नौतन प्रवाल ll 2 ll
तहां बाजत बीन मृदंग ताल, बिचबिच मुरली अति रसाल ll 3 ll
नवसत सज आई व्रजकी बाल, साजे भूखन बसन अंग तिलक भाल ll 4 ll
चोवा चन्दन अबीर गुलाल, छिरकत पिय मदनगुपाल लाल ll 5 ll
आलिंगन चुम्बन देत गाल, पहरावत उर फूलन की माल ll 6 ll
यह विध क्रीड़त व्रजनृपकुमार, सुमन वृष्टि करे सुरअपार ll 7 ll
श्रीगिरिवरधर मन हरित मार, ‘कुंभनदास’ बलबल विहार ll 8 ll

साज – आज श्रीजी में आज सफ़ेद मलमल की सादी पिछवाई धरायी जाती है जिसके ऊपर गुलाल, चन्दन से खेल किया गया है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को दोहरा मनोरथ ( भलका चौथ) के केसरी डोरिया एवं सफ़ेद ज़री की तुईलैस की दोहरी किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, घेरदार वागा एवं कटि-पटका धराये जाते हैं.
लाल ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं. सभी वस्त्रों पर अबीर, गुलाल आदि को छांटकर कलात्मक रूप से खेल किया जाता है.

श्रृंगार – आज श्रीजी को छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मीना एवं सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर केसरी रंग की गोल-पाग के ऊपर सिरपैंच, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में कर्णफूल धराये जाते हैं. लाल एवं सफ़ेद पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं एक वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट चीड़ का व गोटी फाल्गुन की आती है.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम-तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं.



व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशीSunday, 18 August 2024प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ गौस्वामी श्री विट्ठलेशरायजी महाराज (१६५७) क...
18/08/2024

व्रज - श्रावण शुक्ल चतुर्दशी
Sunday, 18 August 2024

प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ गौस्वामी श्री विट्ठलेशरायजी महाराज (१६५७) का उत्सव

आज श्रीजी को नियम का पिले रंग का पिछोड़ा और श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर सुनहरी घेरा का श्रृंगार धराया जाता है.

श्रावण शुक्ल एकादशी से श्रावण शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन श्रृंगार समय मिश्री की गोल-डली का भोग अरोगाया जाता है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से श्रीजी को केशरयुक्त जलेबी के टूक एवं दूधघर में सिद्ध की गयी केशरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता सखड़ी में मीठी सेव व केशरयुक्त पेठा अरोगाये जाते हैं.

कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा श्री गुसांईजी के ज्येष्ठ पुत्र गिरधरजी के द्वितीय पुत्र और आज के उत्सव नायक के पितृचरण गौस्वामी दामोदरजी का भी कल प्राकट्योत्सव है.

छप्पनभोग मनोरथ (बड़ा मनोरथ)

आज श्रीजी में श्रीजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.
नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं.
इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.
आज दो समय की आरती थाली की आती हैं.

मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.
श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के मीठा अरोगाये जाते हैं.
राजभोग की अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात) अरोगाये जाते हैं.

छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते है.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

आंगन नंद के दधि कादौ ।
छिरकत गोपी ग्वाल परस्पर प्रकटे जगमें जादौ ।१।।
दूध लियो दधि लियो लियो घृत माखन माट संयुत ।
घर घरते सब गावत आवत भयो महरि के पुत्र ।।२।।
बाजत तूर करत कोलाहल वारि वारि दै दान ।
जीयो जशोदा पूत तिहारो यह घर सदा कल्यान ।।३।।
छिरके लोग रंगीले दीसे हरदी पीत सुवास ।
मेहा आनंद पुंज सुमंगल यह व्रज सदा हुलास ।।४।।

साज – श्रीजी में आज पिले रंग की मलमल पर रुपहली ज़री की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है.
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.
पीठिका व पिछवाई के ऊपर रेशम के रंग-बिरंगे पवित्रा धराये जाते हैं.

वस्त्र - श्रीजी को आज पिले रंग रंग का रूपहरी पठानी किनारी का पिछोड़ा धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार - श्रीजी को आज मध्य (घुटने तक) का श्रृंगार धराया जाता है. माणक एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व-आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर पिले रंग की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी घेरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में माणक के मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
श्रीकंठ में कली की मालाजी धराई जाती हैं. हास,त्रवल नहीं धराए जाते हैं.बग्घी धरायी जाती हैं.पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी मालाजी एवं विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं. श्रीहस्त में कमलछड़ी, माणक के वेणुजी एवं दो वेत्रजी(एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट पिला एवं गोटी स्याम मीना की आती हैं.



व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण नवमीSaturday, 01 June 2024             यमुना दशमीराजभोग दर्शन पश्चात मणिकोठा और डोल-तिबारी में घुटन...
01/06/2024

व्रज - ज्येष्ठ कृष्ण नवमी
Saturday, 01 June 2024

यमुना दशमी

राजभोग दर्शन पश्चात मणिकोठा और डोल-तिबारी में घुटनों तक जल भरा जाता है.
डोल तिबारी की सभी दिशाओं में कुंज के भाव से केले के स्तम्भ खड़े किये जाते हैं.
प्रभु के सम्मुख रुई की बतखें रखी जाती है वहीँ लकड़ी के खिलौना (मगरमच्छ, कछुआ रुई की बतखें आदि) जल में तैराये जाते हैं. सुन्दर कमल और अन्य पुष्प भी जल में तैराये जाते हैं.
डोल-तिबारी में ध्रुव-बारी के छोर पर नीचे की ओर चांदी का सिंहासन और यमुनाजी के घाट के भाव से चार सीढियाँ भी साजी जाती हैं.

पनघट और जल-विहार के पद गाये जाते हैं.

उत्थापन समय उत्सव भोग में प्रभु को रत्नागिरी आम की चांदी की डबरिया और शाककेरी (आम की छिलके बगैर की फांक) की डबरिया अरोगायी जाती है.

आज से प्रतिदिन भोग समय प्रभु के सम्मुख रखे जाने वाले खिलौना के थाल (जिसे यमुनाजी का थाल भी कहा जाता है) में रुई की बतख भी तैराई जाती है.

उत्थापन के दर्शन नहीं खोले जाते और भोग समय सर्व-सज्जा हटाकर डोल-तिबारी का जल छोड़ दिया जाता है.
वैष्णव जल में ही खड़े हो कर दर्शनों का आनंद लेते हैं.
मणिकोठा का जल संध्या-आरती के पश्चात छोड़ा जाता है.

पुष्टिमार्ग में प्रभु के सुख के लिए बहुत छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखा जाता है.
आज की अद्भुत विशेषता यह है कि ऊष्णता की अधिकता के चलते आज यमुना दशमी के दिन राजभोग व संध्या-आरती में प्रभु की आरती मणिकोठा में भरे जल में खड़े हो कर की जाती है.
सामान्यतया प्रभु की आरती निज मंदिर में ही होती है.

प्रभु सुखार्थ कितना सूक्ष्म भाव है कि आरती की लौ से भी प्रभु को गर्मी का अनुभव होगा.

शीतकाल में आरती में जहाँ 16 तक बत्तियां होती हैं वहीँ ऋतु अनुसार उनमें परिवर्तन होकर इन दिनों प्रभु की आरती में केवल 4 बत्तियां ही होती है.

कीर्तन :

संध्या-आरती - कृपा रस नैन कमल दल
शयन - धीर समीरे यमुना तीरे
मान - उठ चल बेग राधिका प्यारी
पोढवे - नवल किशोर नवल नागरी

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व्रज - वैशाख शुक्ल चतुर्दशीWednesday, 22 May 2024अपनो जन प्रह्लाद उबार्यो ।कमला हरिजू के निकट न आवत ऐसो रूप हरि कबहूँ न ...
22/05/2024

व्रज - वैशाख शुक्ल चतुर्दशी
Wednesday, 22 May 2024

अपनो जन प्रह्लाद उबार्यो ।
कमला हरिजू के निकट न आवत ऐसो रूप हरि कबहूँ न धार्यो ।।१।।
प्रह्लादै चुंबत अरु चाटत भक्त जानि कै क्रोध निवार्यो ।
सूरदास' बलि जाय दरस की भक्त विरोधी दैत्य निस्तार्यो ।।२।।

नृसिंह जयंती

नियम का केसर से रंगे मलमल का पिछोड़ा एवं श्रीमस्तक पर केसर से रंगी मलमल की कुल्हे के ऊपर तीन मोरपंख की मोर-चंद्रिका की जोड़ धरायी जाती है.
आज प्रभु को आभरण में विशेष रूप से बघनखा धराया जाता है. इसके अतिरिक्त प्रभु के श्रीहस्त में सिंहमुखी कड़े और एक छड़ीजी (वेत्रजी) भी सिंहमुखी धराये जाते हैं (चित्र में दृश्य नहीं परन्तु धराये जाते हैं).

श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से मनोर (इलायची-जलेबी) के लड्डू व दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता व सखड़ी में केसरी पेठा व मीठी सेव अरोगाये जाते हैं. आज भोग के फीका के स्थान पर बीज चालनी का घी में तला सूखा मेवा आरोगाया जाता है.
संध्याआरती के ठोड़ के स्थान पर सतुवा के बड़े गोद के लड्डू अरोगाये जाते हैं.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

जाको वेद रटत ब्रह्मा रटत शम्भु रटत शेष रटत
नारद शुकव्यास रटत पावत नही पारही l
ध्रुवजन प्रह्लाद रटत कुंती के कुंवर रटत
द्रुपद सुता रटत नाथ अनाथन प्रति पालरी ll 1 ll
गणिका गज गीध रटत गौतम की नार रटत
राजन की रमणी रटत सुतन दे दे प्याररी l
‘नंददास’ श्रीगोपाल गिरिवरधर रूपजाल
यशोदा को कुंवर प्यारी राधा उर हार री ll 2 ll

साज – आज श्रीजी में केसरी रंग की मलमल की, उत्सव के कमल के काम (Work) वाली एवं रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी के हांशिया से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफ़ेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज प्रभु को केसर से रंगे मलमल का पिछोड़ा धराया जाता हैं. सभी वस्त्र रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित होते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को वनमाला का (चरणारविन्द तक) ऊष्णकालीन श्रृंगार धराया जाता है.
मोती की प्रधानता के हीरा मोती के मिलवा आभरण धराये जाते हैं. आभरण में नीचे पदक व ऊपर हीरा, मोती के माला एवं हार आते हैं.
आज हांस, पायल व चोटीजी नहीं धराये जाते.
श्रीमस्तक पर केसर से रंगी मलमल की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, तीन मोरपंख की मोर-चंद्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
श्वेत पुष्पों की सुन्दर थागवाली दो कलात्मक वनमाला धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में चार कमल की कमलछड़ी, मोती के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (एक मोती व एक नृसिंहजी के) धराये जाते हैं.
पट ऊष्णकाल का, गोटी सोने की कूदते बाघ-बकरी की व आरसी श्रृंगार में हरे मख़मल की एवं राजभोग में सोने की डांडी की आती है.

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श्री नृसिंह भगवान का जन्म सूर्यास्त पश्चात एवं रात्रि से पूर्व हुआ था अतः इस भाव से संध्या-आरती दर्शन पश्चात नृसिंह भगवान के जन्म के दर्शन होते हैं और जन्म के दर्शन में प्रभु के सम्मुख शालिग्रामजी को झांझ, घंटा, झालर और शंख की मधुर ध्वनियों के मध्य पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और बूरा) स्नान कराया जाता है. स्नान के पश्चात शालिग्रामजी को तिलक कर तुलसी समर्पित की जाती है व पुष्प-माला धरायी जाती है.

प्रभु को जन्म के उपरांत जयंती फलाहार के रूप में दूधघर में सिद्ध खोवा (मिश्री-मावे का चूरा) एवं मलाई (रबड़ी) का भोग अरोगाया जाता है.

🌼आज के दिन श्रीजी मथुरा सतघरा से गोपालपुर (जतीपुरा) श्री गिरिराजजी के ऊपर पधारे थे.
वहां पधारकर शयन समय राजभोग भी संग अरोगें इस भाव से आज प्रभु को शयनभोग में आधे राजभोग जितनी सखड़ी की सामग्रियां अरोगायी जाती है.

श्री नृसिंह भगवान उग्र अवतार हैं और उनके क्रोध का शमन करने के भाव से शयन की सखड़ी में आज विशेष रूप से शीतल सामग्रियां - खरबूजा का पना, आम का बिलसारू, घोला हुआ सतुवा, शीतल, दही-भात, श्रीखण्ड-भात आदि अरोगाये जाते हैं.

सभी वैष्णवजन को नृसिंह जयंती की बधाई



व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशीTuesday, 22 November 2022श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव, ब...
22/11/2022

व्रज – मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी
Tuesday, 22 November 2022

श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव, बड़ा मनोरथ (छप्पनभोग)

विशेष – आज श्री गुसांईजी के सप्तम लालजी श्री घनश्यामजी का प्राकट्योत्सव है. श्री गुसांईजी ने आपको श्री मदनमोहनजी का स्वरुप सेवा हेतु प्रदान किया था.

आज श्री घनश्यामजी की ओर से श्रीजी को कुल्हे जोड़ का श्रृंगार धराया जाता है.
श्री घनश्यामजी षडऐश्वर्य में वैराग्य के स्वरुप थे अतः प्रभु को मयूरपंख की जोड़, प्रभु में आपका अनुराग था अतः अनुराग के भाव के लाल वस्त्र एवं उभय स्वामिनी जी के भाव से पीले ठाड़े वस्त्र धराये जाते हैं.

आज गोपमास के भाव से श्री नवनीतप्रियाजी और कई अन्य कई पुष्टिमार्गीय वैष्णव मंदिरों में विशेष रूप से उड़द दाल की कचौरी अरोगायी जाती है.

आज श्रीजी को नियम के लाल साटन के चाकदार वागा धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर पन्ना की जडाऊ कुल्हे के ऊपर पांच मोरपंख की चन्द्रिका धरायी जाती है.

गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में श्रीजी को दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.
इसके अतिरिक्त आज गोपीवल्लभ भोग में ही श्री नवनीतप्रियाजी में से उड़द दाल की कचौरी व छुकमां दही श्रीजी के भोग हेतु आते हैं.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.

श्री गुसांईजी के सभी पुत्रों के उत्सव सातों गृहों में मनाये जाते हैं अतः आज द्वितीय पीठाधीश्वर प्रभु श्री विट्ठलनाथजी एवं तृतीय गृहाधीश्वर प्रभु श्री द्वारिकाधीशजी (कांकरोली) के घर से भी श्रीजी के भोग हेतु सामग्री आती है.

बड़ा मनोरथ (छप्पनभोग)

आज श्रीजी में श्रीजी में किन्हीं वैष्णव द्वारा आयोजित छप्पनभोग का मनोरथ होगा.
नियम (घर) का छप्पनभोग वर्ष में केवल एक बार मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को ही होता है. इसके अतिरिक्त विभिन्न खाली दिनों में वैष्णवों के अनुरोध पर श्री तिलकायत की आज्ञानुसार मनोरथी द्वारा छप्पनभोग मनोरथ आयोजित होते हैं. इस प्रकार के मनोरथ सभी वैष्णव मंदिरों एवं हवेलियों में होते हैं जिन्हें सामान्यतया ‘बड़ा मनोरथ’ कहा जाता है.

मणिकोठा, डोल-तिबारी, रतनचौक आदि में छप्पनभोग के भोग साजे जाते हैं अतः श्रीजी में मंगला के पश्चात सीधे राजभोग अथवा छप्पनभोग (भोग सरे पश्चात) के दर्शन ही खुलते हैं.
श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसर युक्त बासोंदी की हांडी व शाकघर में सिद्ध चार विविध प्रकार के फलों के पणा (मुरब्बा) का भोग अरोगाया जाता है. राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता एवं सखड़ी में मीठी सेव, केसरयुक्त पेठा व पाँच-भात (मेवा-भात, दही-भात, राई-भात, श्रीखंड-भात, वड़ी-भात ) अरोगाये जाते हैं.

छप्पनभोग दर्शन में प्रभु सम्मुख 25 बीड़ा सिकोरी (सोने का जालीदार पात्र) में रखे जाते हैं.
प्रातः लगभग 11.30 बजे मनोरथी वैष्णव अपने मेहमानों के साथ बैंड-बाजे के साथ श्रीजी मंदिर की परिक्रमा कर श्री नवनीतप्रियाजी के बगीचे में एकत्र होंगे.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

जयति रुक्मणी नाथ पद्मावती प्राणपति व्रिप्रकुल छत्र आनंदकारी l
दीप वल्लभ वंश जगत निस्तम करन, कोटि ऊडुराज सम तापहारी ll 1 ll
जयति भक्तजन पति पतित पावन करन कामीजन कामना पूरनचारी l
मुक्तिकांक्षीय जन भक्तिदायक प्रभु सकल सामर्थ्य गुन गनन भारी ll 2 ll
जयति सकल तीरथ फलित नाम स्मरण मात्र वास व्रज नित्य गोकुल बिहारी l
‘नंददास’नी नाथ पिता गिरिधर आदि प्रकट अवतार गिरिराजधारी ll 3 ll

साज – आज श्रीजी में लाल साटन की सुनहरी ज़री की किनारी के हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल साटन के सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं इसी प्रकार के टंकमां हीरा के काम वाले मोजाजी धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र पीले रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – श्रीजी को वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर पन्ना की जड़ाऊ कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल धराये जाते हैं.
बायीं ओर मीना की चोटी धरायी जाती है.
कली, कस्तूरी आदि सभी माला धरायी जाती है.
श्वेत एवं पीले पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. श्रीहस्त में पन्ना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (सोने व पन्ना के) धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी स्याम मीना की आती हैं.
आरसी शृंगार में पिले खंड की एवं राजभोग में सोना की डांडी की आती हैं.

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संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ व श्रीमस्तक के श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के (छोटे) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लाल कुल्हे धरायी जाती है परन्तु लूम तुर्रा नहीं धराये जाते हैं.

व्रज - कार्तिक शुक्ल तृतीयाFriday, 28 October 2022फ़िरोज़ी बड़े बूटा का सूथन, चोली एवं चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर छज्ज...
28/10/2022

व्रज - कार्तिक शुक्ल तृतीया
Friday, 28 October 2022

फ़िरोज़ी बड़े बूटा का सूथन, चोली एवं चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग और जमाव के क़तरा के श्रृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को आसमानी सलीदार ज़री का सूथन, चोली एवं चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर छज्जेदार पाग पर जमाव के क़तरा का श्रृंगार धराया जायेगा.

ये इन्द्रमान भंग के दिन है अतः कार्तिक शुक्ल तृतीया से अक्षय नवमी तक इन्द्रमान भंग के कीर्तन गाये जाते हैं.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : धनाश्री)

माधोजु राखो अपनी ओट ।
वे देखो गोवर्धन ऊपर उठे है मेघ के कोट ।।१।।
तुम जो शक्रकी पूजा मेटी वेर कियो उन मोट l
नाहिन नाथ महातम जान्यो भयो है खरे टे खोट ।।२।।
सात घौस जल वर्ष सिरानो अचयो एक ही घोट l
लियो उठाय गरुवो गिरी करपर कीनो निपट निघोट ।।३।।
गिरिधार्यो तृणावर्त मार्यो जियो नंदको ढोट l
‘परमानन्द’ प्रभु इंद्र खिस्यानो मुकुट चरणतर लोट ।।४।।

साज – श्रीजी में आज फ़िरोज़ी रंग की सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली एवं हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर सफेद बिछावट की जाती है.

वस्त्र – आज श्रीजी को फ़िरोज़ी बड़े बूटा का रुपहली ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, चोली एवं चाकदार वागा धराये जाते हैं. ठाडे वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – आज प्रभु को मध्य का (घुटने तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर फ़िरोज़ी छज्जेदार पाग के ऊपर सिरपैंच, जमाव का क़तरा एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में दो जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं.
पीले एवं गुलाबी पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती हैं.
श्रीहस्त में पुष्पछड़ी, लाल मीना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट फ़िरोज़ी एवं गोटी चाँदी की आती हैं.

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संध्या-आरती दर्शन उपरांत श्रीकंठ व श्रीमस्तक पर धराये श्रृंगार बड़े कर छेड़ान के आभरण धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम तुर्रा रूपहरी धराये जाते हैं.

व्रज - कार्तिक शुक्ल द्वितीयाThursday, 27 October 2022आज दूज भैया की कहियत, कर लिये कंचन थाल के lकरो तिलक तुम बहन सुभद्र...
27/10/2022

व्रज - कार्तिक शुक्ल द्वितीया
Thursday, 27 October 2022

आज दूज भैया की कहियत, कर लिये कंचन थाल के l
करो तिलक तुम बहन सुभद्रा, बल अरु श्रीगोपाल के ll १ ll
आरती करत देत न्यौछावर, वारत मुक्ता माल के l
‘आशकरण’ प्रभु मोहन नागर, प्रेम पुंज ब्रजबाल के ll २ ll

भाईदूज, यम द्वितीया

विशेष – आज का दिन यम द्वितीया कहलाता है. ऐसा कहा जाता है कि आज के दिन श्री यमुनाजी ने अपने भाई यम को तिलक कर भोजन कराया था.
सुभद्रा बहन भी आज प्रभु श्रीकृष्ण व बलदाऊजी को तिलक करती है.
भारतीय संस्कृति में आज के दिन भाई बहन के घर जाते हैं और बहन उन्हें तिलक कर भोजन कराती है. इस प्रकार रीती करने से भाई सुख-समृद्धिशाली बनता है व बहन को भी मनवांछित फल की प्राप्ति होती है.

उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.
दिनभर सभी समय आरती थाली में की जाती है. बंटा, कुंजा, तकिया सब जडाऊ आते हैं.

श्रीजी को आज नियम के लाल खीनखाब के चोली, सूथन, घेरदार वस्त्र धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर फुलक शाही ज़री का चीरा (ज़री की पाग) व पटका रुपहली ज़री का धराया जाता है.

उत्सव भोग के रूप में गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में विशेष रूप से प्रभु को चाशनी वाले कसार के गुंजा व दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है. सखड़ी में मूंग की द्वादशी अरोगायी जाती है.

राजभोग में आगे के भोग धरकर श्रीजी को राजभोग की माला धरायी जाती है. झालर, घंटा, नौबत व शंख की ध्वनि के मध्य दण्डवत कर प्रभु को तिलक किया जाता है.
प्रभु को बीड़ा व तुलसी समर्पित की जाती है. तदुपरांत विराजित सभी स्वरूपों को तिलक किया जाता है.
आटे की चार मुठियाँ वार के चून (आटे) की आरती की जाती है और न्यौछावर की जाती है.
तदुपरांत पहले श्रीजी के मुखियाजी श्री तिलकायतजी को तिलक करते हैं और फिर श्री तिलकायतजी सभी उपस्थित सेवकों को तिलक करते हैं.

बहन सुभद्रा के घर भोजन अरोगें इस भाव से प्रभु आज राजभोग अरोगते हैं.
भीतर तिलक व आरती होवें तब आशकरणदासजी द्वारा रचित निम्न कीर्तन गाया जाता है -

आज दूज भैया की कहियत, कर लिये कंचन थाल के l
करो तिलक तुम बहन सुभद्रा, बल अरु श्रीगोपाल के ll 1 ll
आरती करत देत न्यौछावर, वारत मुक्ता माल के l
‘आशकरण’ प्रभु मोहन नागर, प्रेम पुंज ब्रजबाल के ll 2 ll

भोग समय फीका के स्थान पर बीज-चालनी (घी में तले नमकीन सूखे मेवे व बीज) अरोगाये जाते हैं.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : धनाश्री)

अब न छांडो चरन कमल महिमा मैं जानी ।
सुरपति मेरो नाम धर्यो लोक अभिमानी ।।१।।
अबलों में नहि जानत ठाकर है कोई ।
गोपी ग्वाल राख लिये मेरी पत खोई ।।२।।
ऐरावत कामधेनुं गंगाजल आनी ।
हरि को अभिषेक कियो जयजय सुर बानी ।।३।।

राजभोग दर्शन –

साज – श्रीजी में आज लाल मखमल की सुरमा-सितारा की ज़री मोती के काम की, वृक्षावली के ज़रदोज़ी के काम वाली नित्य लीलास्थ श्री गोवर्धनलाल जी महाराज वाली सुन्दर पिछवाई धरायी जाती है. तकिया के ऊपर मेघश्याम रंग की एवं गादी एवं चरणचौकी के ऊपर लाल मखमल की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल रंग की खीनख़ाब का सूथन, चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. बायीं ओर कटि (कमर) पर रुपहली ज़री की किनारी वाला लाल कटि-पटका (जिसका एक छोर आगे और एक बग़ल में) धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद रंग के चिकने लट्ठा के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) चार माला का हल्का श्रृंगार धराया जाता है. मोती, विशेषकर पन्ना व सोने के सर्व आभरण धराये जाते हैं. आज के दिन सदैव ऐसा छोटा श्रृंगार ही धराया जाता है.
श्रीमस्तक पर सुनहरी फुलक शाही ज़री की पाग (चीरा) के ऊपर सिरपैंच के स्थान पर पन्ना, जिसके ऊपर नीचे मोती की लड़, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में पन्ना के कर्णफूल धराये जाते हैं. श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगे पुष्पों की थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी हीरा के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं. पट, गोटी जडाऊ व आरसी चार झाड की आती है.

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प्रातः धराये श्रीकंठ के श्रृगार संध्या-आरती उपरांत बड़े (हटा) कर शयन समय छोटे (छेड़ान के) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर चीरा पर लूम तुर्रा धराये जाते हैं.

व्रज - कार्तिक कृष्ण अमावस्याTuesday, 25 October 2022ग्रस्तास्त खण्डग्रास सूर्यग्रहणश्वेत फूलकशाही ज़री के घेरदार वागा एव...
25/10/2022

व्रज - कार्तिक कृष्ण अमावस्या
Tuesday, 25 October 2022

ग्रस्तास्त खण्डग्रास सूर्यग्रहण

श्वेत फूलकशाही ज़री के घेरदार वागा एवं श्रीमस्तक पर गोल पाग (चीरा) और चमकनी गोल चंद्रिका के शृंगार

जिन तिथियों के लिए प्रभु की सेवा प्रणालिका में कोई वस्त्र, श्रृंगार निर्धारित नहीं होते उन तिथियों में प्रभु को ऐच्छिक वस्त्र व श्रृंगार धराये जाते हैं.
ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार प्रभु श्री गोवर्धनधरण की इच्छा, ऋतु की अनुकूलता, ऐच्छिक श्रृंगारों की उपलब्धता, पूज्य श्री तिलकायत महाराजश्री की आज्ञा एवं प्रभु के तत्सुख की भावना से मुखियाजी के स्व-विवेक के आधार पर धराये जाते हैं.

ऐच्छिक वस्त्र, श्रृंगार के रूप में आज श्रीजी को लाल सलीदार ज़री का सूथन, श्वेत फूलकशाही ज़री के चोली एवं घेरदार वागा का श्रृंगार धराया जायेगा एवं श्रीमस्तक पर ज़री की गोल पाग (चीरा) पर गोल चंद्रिका का श्रृंगार धराया जायेगा.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

ब्रजजन लोचन ही को तारो ।
सुन यशोमति तेरो पूत सपुतो कुल दीपक उजियारो ।।१।।
धेनु चरावत जात दूर तब होत भवन अति भारो ।
घोष सजीवन मुर हमारो छिन इत ऊत जिन टारो ।।२।।
सात द्योस गिरिराज धर्यो कर सात बरसको बारो ।
गोविंद प्रभु चिरजियो रानी तेरो सुत गोप वंश रखवारो ।।३।।

साज – आज श्रीजी में श्वेत फूलकशाही ज़री की रुपहली ज़री की तुईलैस के हांशिया वाली पिछवाई धरायी जाती है. तकिया के ऊपर मेघश्याम रंग की एवं गादी एवं चरणचौकी के ऊपर लाल मखमल की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज लाल सलीदार ज़री पर सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, श्वेत फूलकशाही ज़री की चोली एवं घेरदार वागा धराये जाते हैं. पटका मलमल का धराया जाता हैं. ठाड़े वस्त्र मेघश्याम रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज छोटा (कमर तक) हल्का श्रृंगार धराया जाता है. पन्ना के सर्व आभरण धराये जाते हैं.
श्रीमस्तक पर श्वेत फूलकशाही ज़री के चीरा (ज़री की गोल पाग) के ऊपर सिरपैंच, गोल चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं.
श्रीकर्ण में दो जोड़ी कर्णफूल धराये जाते हैं. श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है.
नवरत्न के वेणुजी एवं वेत्रजी धराये जाते हैं.
पट रूपहरी व गोटी मीना की आती है.

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ग्रस्तास्त खण्डग्रास सूर्यग्रहण

आज कार्तिक कृष्ण अमावस्या, मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022 सूर्यग्रहण है.
श्रीनाथद्वारा में ग्रहण का स्पर्श सायं 4 बजकर 35 मिनिट पर, मध्य 5 बजकर 35 मिनिट पर व मोक्ष 6 बजकर 26 मिनिट को होगा. ग्रहण का पर्वकाल (अवधि) 1 घंटा 54 मिनिट होगा. सोमवार, 24 अक्टूबर 2022 की रात्रि के 3 बजकर 26 मिनिट से वेध लगेगा अतः उसके पूर्व ही खाया जा सकेगा.
मंगलवार 25 अक्टूबर 2022 की दोपहर 12 बजकर 18 मिनिट के पूर्व ही जल पिया जा सकेगा.
बिना जनेऊ के बालक तथा छोटी कन्याऐं दोपहर 12 बजकर 18 मिनिट के पूर्व भोजन प्रसाद ले सकेंगे.
श्रीजी की राजभोग की सखड़ी गौमाता के लिए गौशाला पधारेगी.

दोपहर 2 बजकर 15 मिनिट पर श्रीठाकुरजी को उत्थापन के शंखनाद कर जगाया जाएगा जिससे ग्रहण पूर्व संध्या-आरती पर्यन्त की सेवा हो सके.

सफेदी आदि कोरी रखी जायेगी, सखड़ी रसोईघर, बालभोग आदि स्थल तथा पात्रों की शुद्धि ग्रहण के नियमानुसार की जाएगी.

रीति अनुसार सर्वत्र दर्भ धरी जाएगी.
विविध सूखे मेवा आदि धरे जाएंगे. तबकड़ी में नए बीड़ा भी धरे जाएंगे.
शैयाजी को साज बड़ा करके शैया मंदिर के झारी, बन्टा आदि खासा करके सूखे किये जायेंगे, शैया उठाकर जहां दर्भ रखनी शेष हो वहाँ भी दर्भ रखी जाएगी. जल के घड़ा आदि सभी पात्र शुद्ध व सूखे कर के रखे जाएंगे.
ग्रहण स्पर्श से चार-पाँच मिनिट पूर्व प्रभु सम्मुख से दूधधर का भोग सरा लिए जाएंगे.
झारी, बंटा को पटवस्त्र पकड़कर उठा लिए जाएंगे.

ग्रहण स्पर्श के पूर्व मंगला की भांति श्वेत दत्तू धराया जाएगा जिसमें केवल प्रभु के श्रीमुख के दर्शन होंगे.

ग्रहण स्पर्श समय दर्शन खोलकर प्रभु सम्मुख जप आदि किये जायेंगे.
ग्रहण के मध्य सायं 5 बजकर 35 मिनिट पर प्रभु के सम्मुख चिरंजीवी श्री विशाल बावा साहब के द्वारा दान का संकल्प करके मणिकोठा से खिचड़ी का डबरा, धृत का पात्र दक्षिणा सहित दिया जाएगा व गौदान भी किया जाएगा.
ग्रहण मोक्ष के उपरान्त चार-पांच मिनिट ठहर कर सभी सेवक स्नान आदि कर शुद्ध होकर नवीन जल से पात्र तथा स्थल खासा करके नए जल से झारी भरी जाएगी.
सामग्री सिद्ध होने को हो तब दर्शन बन्द कर प्रभु को स्नान करवाया जाता है और श्रमभोग के रूप में मान भोग व नित्य क्रम का शयनभोग धरा जायेगा. आज शयनभोग में अनसखड़ी की सामग्रियाँ ही धरी जाएगी.
तदुपरांत नित्य नियम से अनोसर की सेवा होगी.

व्रज - कार्तिक कृष्ण द्वादशी(धनतेरस के आपके शृंगार) Saturday, 22 October 2022आज माई धन धोवत नंदरानी ।कार्तिक वदि तेरस दि...
22/10/2022

व्रज - कार्तिक कृष्ण द्वादशी(धनतेरस के आपके शृंगार)
Saturday, 22 October 2022

आज माई धन धोवत नंदरानी ।
कार्तिक वदि तेरस दिन उत्तम गावत मधुरी बानी ।।१।।
नवसत साज श्रृंगार अनुपम करत आप मन मानी ।
कुम्भनदास लालगिरिधर को देखत हियो सिरानी ।।२।।

🌷🍀धनतेरस, धन्वन्तरी जयंती🍀🌷

आज मनमोहन रूपी धन को अपने ह्रदय में आत्मसात करते हुए धनतेरस के श्रृंगार के दर्शन का आनंद ले

विशेष – आज धनवन्तरी जयन्ती है. श्री धनवन्तरी, भगवान विष्णु के 17वें अवतार, देवों के वैध व प्राचीन उपचार पद्दति आयुर्वेद के जनक हैं.

आज के दिन को धनतेरस भी कहा जाता है. व्रज में गौवंश ही धन का स्वरुप है अतः श्री ठाकुरजी एवं व्रजवासी गायों का श्रृंगार करते हैं, उनका पूजन करते हैं एवं उनको थूली खिलाते हैं. आज से चार दिवस दीपदान का विशेष महत्व है अतः व्रज में सर्वत्र दीपदान और रौशनी की जाती है.

आज नन्दरानी यशोदाजी भौतिक लक्ष्मीजी की प्रतिमा को स्नान करा, श्रृंगार कर प्रभु के सम्मुख रखती हैं एवं बालक के पहनने के आभूषण को धोती हैं जिससे श्रीजी में मंगला दर्शन उपरांत ‘धन धोवत व्रजरानी’ जैसे पद गाये जाते हैं.

श्रीस्वामिनीजी ने श्रीठाकुरजी को अपना सर्वस्व मान कर धन के रूप में प्राप्त किया है ऐसा भाव भी है जिसे प्रदर्शित करते पद भी प्रभु के सम्मुख गाये जाते हैं – ‘राधा मन अति मोद बढ्यो है, मनमोहन धन पाई.’

आज की सेवा ललिताजी के भाव की है.

विगत दशमी से कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाईदूज) तक प्रभु पूरे दिन झारीजी में यमुनाजल अरोगते हैं.
चारों समय (मंगला, राजभोग, संध्या व शयन) की आरती थाली में की जाती है.
गेंद, चौगान, दिवाला सभी सोने के आते हैं. आज दिनभर प्रभु को भोग स्वर्ण पात्रों में धरे जाते हैं.

उत्सव होने के कारण श्रीजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं.

श्रीजी को आज नियम के हरी सलीदार ज़री के चाकदार वागा एवं मोरपंख की चंद्रिका का वनमाला का श्रृंगार धराया जाता है. कत्थई आधारवस्त्र पर कला बत्तू के सुन्दर काम से सुसज्जित पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया पर मखमल की खोल आती है.

आज विशेष रूप से श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में केशरयुक्त चन्द्रकला अरोगायी जाती है.
उत्सव होने के कारण विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध की गयी केसरयुक्त बासोंदी की हांडी अरोगायी जाती है.

राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता अरोगाया जाता है.
सखड़ी में केसरयुक्त पेठा, मीठी सेव आदि अरोगाये जाते हैं. अदकी में गेहूं के रवा की खीर अरोगायी जाती है.
भोग समय फीका के स्थान पर बीज-चालनी (घी में तले नमकयुक्त सूखे मेवे व बीज) अरोगाये जाते हैं.

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राजभोग दर्शन –

कीर्तन – (राग : सारंग)

गोधन पूजा करके गोविंद सब ग्वालन पहेरावत l
आवो सुबाहु सुबल श्रीदामा ऊंचे लेले नाम बुलावत ll 1 ll
अपने हाथ तिलक दे माथे चंदन और बंदन लपटावत l
वसन विचित्र सबन के माथें विधिसों पाग बंधावत ll 2 ll
भाजन भर भर ले कुनवारो ताको ताहि गहावत l
‘चत्रभुज’प्रभु गिरिधर ता पाछे धोरी धेनु खिलावत ll 3 ll

साज - श्रीजी में आज लाल रंग की मखमल के ऊपर सुनहरी सुरमा सितारा के कशीदे के ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई धरायी जाती है. गादी, तकिया एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज हरे रंग सलीदार ज़री की सूथन, चोली, चाकदार वागा एवं पटका धराये जाते हैं. ठाड़े वस्त्र लाल रंग के धराये जाते हैं.

श्रृंगार – प्रभु को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) भारी श्रृंगार धराया जाता है. मिलवा - हीरा, मोती, प्रमुखतया माणक, पन्ना एवं जड़ाव स्वर्ण के सर्व आभरण धराये जाते हैं.

श्रीमस्तक पर हरे रंग की सलीदार ज़री के चीरा (ज़री की पाग) के ऊपर अनारदाना को पट्टीदार सिरपैंच (दोनों ओर मोती की माला से सुसज्जित), पन्ना की लूम, मोरपंख की सादी चन्द्रिका एवं बायीं ओर शीशफूल धराये जाते हैं. श्रीकर्ण में माणक के चार कर्णफूल धराये जाते हैं. श्रीकंठ में टोडर धराया जाता है. हांस, कड़ा, हस्त सांखला आदि सर्व श्रृंगार धराये जाते हैं.

श्वेत पुष्पों की रंग-बिरंगी थागवाली दो सुन्दर मालाजी धरायी जाती है. पीठिका के ऊपर स्वर्ण का हीरा जड़ित चौखटा धराया जाता है.
श्रीहस्त में कमलछड़ी, पन्ना के वेणुजी एवं दो वेत्रजी (माणक व पन्ना के) धराये जाते हैं.
पट हरा, गोटी शतरंज की सोने की व आरसी लाल मखमल की आती है.

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शयन समय मणिकोठा में हांडी में रौशनी की जाती है, दीपक का पाट साजा जाता है और रंगोली मांडी जाती है. निज मन्दिर में रौशनी का झाड़ आता है.
डोलतिबारी में आज से रौशनी नहीं की जाती.

आज से श्रीजी को प्रतिदिन उत्थापन के फल भोग में गन्ना के टूक (छीले हुए गन्ना के टुकड़े) अरोगाये जाने प्रारंभ हो जाते हैं. ये सामग्री प्रतिदिन आगामी डोलोत्सव तक अरोगायी जाती है.

संध्या-आरती दर्शन के उपरांत श्रीकंठ के श्रृंगार बड़ेकर छोटे (छेडान के) श्रृंगार धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर लूम, तुर्रा सुनहरी धराये जाते हैं.

शयन समय प्रभु बंगले (हटड़ी) में बिराजते हैं. मनोरथ के रूप में विविध सामग्रियां अरोगायी जाती हैं.

आज शयन उपरांत नाथद्वारा के आसपास के विभिन्न गावों से ग्रामीण लोग अपने खेतों से और श्रीजी के बगीचों से ठाकुरजी को अन्नकूट पर अरोगाने के लिए आज बैलगाड़ियों में भरकर पालक की भाजी लाते हैं. चतुर्दशी के पूरे दिन भाजी की सेवा चलती है.

दशमी से प्रतिदिन शयन के अनोसर में प्रभु को सूखे मेवे और मिश्री से निर्मित मिठाई, खिलौने आदि का थाल आरोगाया जाता है.

इसके अतिरिक्त दशमी से ही अनोसर में प्रभु के सम्मुख इत्रदान व चोपड़ा (इलायची, जायफल, जावित्री, सुपारी और लौंग आदि) भी रखे जाते हैं.

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