28/05/2026
जय श्री मन्नारायण,,प्रश्न–शास्त्र अनुसार पत्नी का परित्याग कब कर देना चाहिए?
उत्तर–सनातन धर्मग्रंथों में पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहने का आदेश दिया गया है। हालाँकि, सुखी दांपत्य और कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, और नीति शास्त्रों में उन विशेष कारणों और श्लोकों का स्पष्ट उल्लेख है जिनके आधार पर पत्नी के अधिकारों का सीमित परित्याग (अधिवेदन या दूरी बनाना) उचित माना गया है।
1. व्यभिचार और कुल का नाश करना (चरित्रहीनता)
यदि पत्नी परपुरुषगामिनी (अवैध संबंधों में लिप्त) हो या कुल की मर्यादा को नष्ट करने वाली हो, तो शास्त्र उसके परित्याग की आज्ञा देते हैं।
व्यभिचारादृतौ शुद्धिर्गर्भे त्यागो विधीयते।
गर्भभर्त्तृवधादौ च तथा महति पातके॥
अर्थ: यदि पत्नी मानसिक रूप से बहलाने फुसलाने डराने धमकाने या जबरन करने पर विचलित होकर व्यभिचार की ओर प्रवृत्त हो, तो ऋतुकाल (मासिक धर्म) के बाद उसकी शुद्धि हो जाती है। परंतु, यदि व्यभिचार के कारण वह गर्भधारण कर ले,या इच्छा से व्यभिचार करे, पति की हत्या का प्रयास करे, अथवा कोई अन्य महापातक (घोर पाप) करे, तो उसका पूर्ण त्याग कर देना चाहिए।
निरंतर कटु वचन बोलना और कलह करना
जो स्त्री स्वभाव से अत्यंत क्रूर हो, सदैव क्लेश करती हो और जिसके कारण घर नरक के समान हो जाए, उसका परित्याग व्यावहारिक जीवन के लिए आवश्यक माना गया है।
चाणक्य नीति
त्यजेद् धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्या बान्धवान्स्नेहवर्जितान्॥ [2]
अर्थ: दया से रहित धर्म को छोड़ देना चाहिए, विद्या विहीन गुरु को छोड़ देना चाहिए। ठीक इसी प्रकार, सदैव क्रोधित रहने वाली, कटु वचन बोलने वाली और झगड़ालू पत्नी का त्याग कर देना चाहिए और स्नेह न रखने वाले बंधु-बांधवों को भी छोड़ देना चाहिए।
पति से घृणा और द्वेष करना
यदि पत्नी बिना किसी कारण के पति का निरंतर तिरस्कार करे और उसके प्रति शत्रुता का भाव रखे:
एकसंवत्सरं कांक्षेत पतिव्रतां प्रद्विषन्तीं भार्याम्।
संवत्सरात्परं तु तां समुपयुक्तशयनमलंकारं च त्यजेत्॥
अर्थ: यदि पत्नी पति से द्वेष या घृणा करती है, तो पति को उसे सुधरने के लिए एक वर्ष की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि वह एक वर्ष के बाद भी न सुधरे, तो उसके साथ सहशयन (शारीरिक संबंध) तथा आभूषणों का त्याग कर देना चाहिए (अर्थात् उसे केवल भोजन-वस्त्र देकर अलग कर देना चाहिए)।
मदिरापान, दुराचार और धन का नाश
यदि स्त्री सामाजिक और नैतिक मर्यादाओं को पूरी तरह तोड़ दे, तो उसके स्थान पर दूसरा विवाह (अधिवेदन) करने का विधान है:
मनुस्मृति
मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत्।
व्याधिता वाऽधिवेत्तव्या हिंस्राऽर्थघ्नी च सर्वदा॥
अर्थ: जो स्त्री मदिरापान (नशा) करने वाली, दुराचारिणी, पति का निरंतर विरोध करने वाली, अत्यंत हिंसक स्वभाव की और हमेशा पति के धन का नाश करने वाली हो, उसका परित्याग करके (अधिकार सीमित करके) पति दूसरा विवाह कर सकता है।
# # 5. गर्भपात (भ्रूण हत्या) करना
सनातन धर्म में भ्रूण हत्या को ब्रह्महत्या के समान घोर पाप माना गया है।
व
चतस्रस्तु परित्याज्याः शिष्यगा च गुरुगा च या।
पतिघ्नी च विशेषेण गर्भघ्नी च या भवेत्॥
* अर्थ: चार प्रकार की स्त्रियों का अनिवार्य रूप से परित्याग कर देना चाहिए: अपने शिष्य से संबंध बनाने वाली, गुरु से कुसंबंध रखने वाली, पति के प्राण लेने की चेष्टा करने वाली, और गर्भपात (भ्रूण हत्या) करने वाली स्त्री।
शास्त्रों का मुख्य नियम: यदि पत्नी गलती समझकर भूल सुधारने की और अग्रसर हो तो 'सीमित परित्याग'
सनातन धर्म के अनुसार, 'त्याग' का अर्थ पत्नी को घर से बाहर निकालकर बेसहारा छोड़ना नहीं है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, यदि स्त्री घोर अपराधी भी हो, तो भी उसे घर के भीतर ही एक सुरक्षित स्थान (कुटी/कक्ष) देकर न्यूनतम भोजन और वस्त्र प्रदान करना पति का कर्तव्य है, ताकि वह जीवित रह सके और उसे सुधरने या प्रायश्चित करने का अवसर मिले।
सनातन धर्मग्रंथों में विवाह विच्छेद (तलाक) जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, क्योंकि विवाह को एक अटूट संस्कार माना गया है। मनुस्मृति
न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते।
(अर्थात्: किसी भी क्रय-विक्रय या त्याग द्वारा पत्नी अपने पति के वैवाहिक बंधन से मुक्त नहीं होती।)
हालाँकि, यदि कोई स्त्री गंभीर रूप से कुलघाती या व्यभिचारी हो, तो शास्त्रों में पूर्ण परित्याग के बजाय 'अधिवेदन' (दूसरा विवाह करना या अधिकार सीमित करना) और विशेष परिस्थितियों में घर के भीतर ही 'सीमित परित्याग' के श्लोक प्रमाण मिलते हैं:
व्यभिचार के आधार पर त्याग
यदि पत्नी परपुरुषगामिनी हो, तो मनुस्मृति के अनुसार उसे सुधारने का अवसर दिया जाता है, लेकिन बार-बार अपराध करने पर उसके अधिकारों का त्याग कर दिया जाता है:।
एकसंवत्सरं कांक्षेत पतिव्रतां प्रद्विषन्तीं भार्याम्।
संवत्सरात्परं तु तां समुपयुक्तशयनमलंकारं च त्यजेत्॥
(अर्थात्: यदि पत्नी पति से द्वेष या परपुरुष का चिंतन करती है, तो पति को एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा (सुधरने का समय) करनी चाहिए। यदि वह एक वर्ष बाद भी न सुधरे, तो उसके साथ सहशयन (शारीरिक संबंध) और आभूषणों का त्याग कर देना चाहिए, अर्थात् उसे केवल जीवन-यापन की न्यूनतम सामग्री देकर अलग कक्ष में रखना चाहिए।
क्रूर स्वभाव और पति के प्राण संकट में डालना
यदि पत्नी अत्यंत हिंसक, क्रूर और पति के धन व जीवन को नष्ट करने वाली हो, तो मनुस्मृति के अध्याय 9, श्लोक 80 में उसके स्थान पर दूसरा विवाह करने (अधिवेदन) और उसे अधिकारों से वंचित करने का आदेश है:।
मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत्।
व्याधिता वाऽधिवेत्तव्या हिंस्राऽर्थघ्नी च सर्वदा॥
अर्थात्: जो स्त्री मदिरापान करने वाली, दुराचारिणी, पति का निरंतर विरोध करने वाली, अत्यंत हिंसक (क्रूर स्वभाव) और हमेशा पति के धन का नाश करने वाली हो, उसका परित्याग करके पति दूसरा विवाह कर सकता है।
चाणक्यके अनुसार पूर्ण त्याग
आचार्य चाणक्य ने व्यावहारिक जीवन के आधार पर दुष्ट स्वभाव वाली पत्नी का पूरी तरह से परित्याग करने का निर्देश दिया है:
त्यजेद् धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्या बान्धवान्स्नेहवर्जितान्॥
(अर्थात्: दया से हीन धर्म को छोड़ देना चाहिए, विद्या से हीन गुरु को छोड़ देना चाहिए, हमेशा क्रोध करने वाली व कटु वचन बोलने वाली पत्नी का त्याग कर देना चाहिए और स्नेहहीन सगे-संबंधियों को छोड़ देना चाहिए।)