सत्यमार्ग

सत्यमार्ग यह पृष्ठ सनातन धर्म के आदेशों उपदेशों के प्रचार प्रसार हेतु बनाया गया है। जय श्री राम ।
(1)

स्वामी विवेकानंद से पूछा गया कि आपको हिंदू होने का गर्व क्यों है? उनका उत्तर था- मुझे बचपन से गीता सुनाई गई. जीवन में जब भी भटकाव महसूस हुआ,गीता के ज्ञान ने राह दिखा दी. चार वेदों को देखता हूं तो गर्व होता है कि हमारे पूर्वज विज्ञान, योग, चिकित्सा, संगीत, शस्त्र-शास्त्र के ज्ञान में हमसे कहीं आगे थे.
पुराणों-उपनिषदों से जाना कि मनुष्य को संकट के बीच से राह निकालने का हुनर आना चाहिए. संकटकाल में अन

ुभव ही काम आता है. ज्ञान के इस सागर को देखकर हिंदू होने का गर्व तो होगा ही.
पर क्या नई पीढ़ी को विवेकानंद जैसा गर्व हो रहा है? शायद नहीं. क्यों कट रही है नई पीढ़ी धर्म से?
बच्चे के साथ हनुमान मंदिर गए. उसने पूछा भगवान को सिंदूर क्यों लगाया गया? आप उत्तर जानते नहीं थे. इसलिए अपनी झेंप मिटाने के लिए बच्चे को झिड़क दिया-सवाल नहीं पूछते, बस भगवान को प्रणाम करो. उस बच्चे से आप धर्म से जुड़े रहने की आशा कैसे रखेंगे?
कड़ियां टूट रही हैं. बात कड़वी है, पर सोचकर देखिए क्या सच नहीं है? खैर, बीती ताहि बिसारिए आगे की सुधि लेहि. अनगिनत ग्रथों में समाए सनातन के ज्ञान को आज से भी थोड़ा-थोड़ा करके लेना शुरू कर दें, तो बात बनने लगेगी.
इसीलिए सत्य मार्ग बनाया गया है. हिंदू अपनी सांस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत से जुड़े रहें इसकी एक कोशिश हुई है.समय के अभाव में ग्रंथों को विस्तार से पढ़ना संभव नहीं किंतु थोड़ा-थोड़ा करके मिलने लगे तो असंभव भी नहीं.
जय श्री राम

28/05/2026

जय श्री मन्नारायण,,प्रश्न–शास्त्र अनुसार पत्नी का परित्याग कब कर देना चाहिए?
उत्तर–सनातन धर्मग्रंथों में पति और पत्नी दोनों को एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहने का आदेश दिया गया है। हालाँकि, सुखी दांपत्य और कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, और नीति शास्त्रों में उन विशेष कारणों और श्लोकों का स्पष्ट उल्लेख है जिनके आधार पर पत्नी के अधिकारों का सीमित परित्याग (अधिवेदन या दूरी बनाना) उचित माना गया है।
1. व्यभिचार और कुल का नाश करना (चरित्रहीनता)
यदि पत्नी परपुरुषगामिनी (अवैध संबंधों में लिप्त) हो या कुल की मर्यादा को नष्ट करने वाली हो, तो शास्त्र उसके परित्याग की आज्ञा देते हैं।
व्यभिचारादृतौ शुद्धिर्गर्भे त्यागो विधीयते।
गर्भभर्त्तृवधादौ च तथा महति पातके॥
अर्थ: यदि पत्नी मानसिक रूप से बहलाने फुसलाने डराने धमकाने या जबरन करने पर विचलित होकर व्यभिचार की ओर प्रवृत्त हो, तो ऋतुकाल (मासिक धर्म) के बाद उसकी शुद्धि हो जाती है। परंतु, यदि व्यभिचार के कारण वह गर्भधारण कर ले,या इच्छा से व्यभिचार करे, पति की हत्या का प्रयास करे, अथवा कोई अन्य महापातक (घोर पाप) करे, तो उसका पूर्ण त्याग कर देना चाहिए।

निरंतर कटु वचन बोलना और कलह करना
जो स्त्री स्वभाव से अत्यंत क्रूर हो, सदैव क्लेश करती हो और जिसके कारण घर नरक के समान हो जाए, उसका परित्याग व्यावहारिक जीवन के लिए आवश्यक माना गया है।

चाणक्य नीति
त्यजेद् धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्या बान्धवान्स्नेहवर्जितान्॥ [2]

अर्थ: दया से रहित धर्म को छोड़ देना चाहिए, विद्या विहीन गुरु को छोड़ देना चाहिए। ठीक इसी प्रकार, सदैव क्रोधित रहने वाली, कटु वचन बोलने वाली और झगड़ालू पत्नी का त्याग कर देना चाहिए और स्नेह न रखने वाले बंधु-बांधवों को भी छोड़ देना चाहिए।

पति से घृणा और द्वेष करना
यदि पत्नी बिना किसी कारण के पति का निरंतर तिरस्कार करे और उसके प्रति शत्रुता का भाव रखे:

एकसंवत्सरं कांक्षेत पतिव्रतां प्रद्विषन्तीं भार्याम्।
संवत्सरात्परं तु तां समुपयुक्तशयनमलंकारं च त्यजेत्॥

अर्थ: यदि पत्नी पति से द्वेष या घृणा करती है, तो पति को उसे सुधरने के लिए एक वर्ष की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि वह एक वर्ष के बाद भी न सुधरे, तो उसके साथ सहशयन (शारीरिक संबंध) तथा आभूषणों का त्याग कर देना चाहिए (अर्थात् उसे केवल भोजन-वस्त्र देकर अलग कर देना चाहिए)।
मदिरापान, दुराचार और धन का नाश
यदि स्त्री सामाजिक और नैतिक मर्यादाओं को पूरी तरह तोड़ दे, तो उसके स्थान पर दूसरा विवाह (अधिवेदन) करने का विधान है:

मनुस्मृति
मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत्।
व्याधिता वाऽधिवेत्तव्या हिंस्राऽर्थघ्नी च सर्वदा॥

अर्थ: जो स्त्री मदिरापान (नशा) करने वाली, दुराचारिणी, पति का निरंतर विरोध करने वाली, अत्यंत हिंसक स्वभाव की और हमेशा पति के धन का नाश करने वाली हो, उसका परित्याग करके (अधिकार सीमित करके) पति दूसरा विवाह कर सकता है।

# # 5. गर्भपात (भ्रूण हत्या) करना
सनातन धर्म में भ्रूण हत्या को ब्रह्महत्या के समान घोर पाप माना गया है।


चतस्रस्तु परित्याज्याः शिष्यगा च गुरुगा च या।
पतिघ्नी च विशेषेण गर्भघ्नी च या भवेत्॥

* अर्थ: चार प्रकार की स्त्रियों का अनिवार्य रूप से परित्याग कर देना चाहिए: अपने शिष्य से संबंध बनाने वाली, गुरु से कुसंबंध रखने वाली, पति के प्राण लेने की चेष्टा करने वाली, और गर्भपात (भ्रूण हत्या) करने वाली स्त्री।

शास्त्रों का मुख्य नियम: यदि पत्नी गलती समझकर भूल सुधारने की और अग्रसर हो तो 'सीमित परित्याग'
सनातन धर्म के अनुसार, 'त्याग' का अर्थ पत्नी को घर से बाहर निकालकर बेसहारा छोड़ना नहीं है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार, यदि स्त्री घोर अपराधी भी हो, तो भी उसे घर के भीतर ही एक सुरक्षित स्थान (कुटी/कक्ष) देकर न्यूनतम भोजन और वस्त्र प्रदान करना पति का कर्तव्य है, ताकि वह जीवित रह सके और उसे सुधरने या प्रायश्चित करने का अवसर मिले।
सनातन धर्मग्रंथों में विवाह विच्छेद (तलाक) जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, क्योंकि विवाह को एक अटूट संस्कार माना गया है। मनुस्मृति

न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते।

(अर्थात्: किसी भी क्रय-विक्रय या त्याग द्वारा पत्नी अपने पति के वैवाहिक बंधन से मुक्त नहीं होती।)

हालाँकि, यदि कोई स्त्री गंभीर रूप से कुलघाती या व्यभिचारी हो, तो शास्त्रों में पूर्ण परित्याग के बजाय 'अधिवेदन' (दूसरा विवाह करना या अधिकार सीमित करना) और विशेष परिस्थितियों में घर के भीतर ही 'सीमित परित्याग' के श्लोक प्रमाण मिलते हैं:
व्यभिचार के आधार पर त्याग
यदि पत्नी परपुरुषगामिनी हो, तो मनुस्मृति के अनुसार उसे सुधारने का अवसर दिया जाता है, लेकिन बार-बार अपराध करने पर उसके अधिकारों का त्याग कर दिया जाता है:।

एकसंवत्सरं कांक्षेत पतिव्रतां प्रद्विषन्तीं भार्याम्।
संवत्सरात्परं तु तां समुपयुक्तशयनमलंकारं च त्यजेत्॥
(अर्थात्: यदि पत्नी पति से द्वेष या परपुरुष का चिंतन करती है, तो पति को एक वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा (सुधरने का समय) करनी चाहिए। यदि वह एक वर्ष बाद भी न सुधरे, तो उसके साथ सहशयन (शारीरिक संबंध) और आभूषणों का त्याग कर देना चाहिए, अर्थात् उसे केवल जीवन-यापन की न्यूनतम सामग्री देकर अलग कक्ष में रखना चाहिए।

क्रूर स्वभाव और पति के प्राण संकट में डालना
यदि पत्नी अत्यंत हिंसक, क्रूर और पति के धन व जीवन को नष्ट करने वाली हो, तो मनुस्मृति के अध्याय 9, श्लोक 80 में उसके स्थान पर दूसरा विवाह करने (अधिवेदन) और उसे अधिकारों से वंचित करने का आदेश है:।

मद्यपाऽसाधुवृत्ता च प्रतिकूला च या भवेत्।
व्याधिता वाऽधिवेत्तव्या हिंस्राऽर्थघ्नी च सर्वदा॥
अर्थात्: जो स्त्री मदिरापान करने वाली, दुराचारिणी, पति का निरंतर विरोध करने वाली, अत्यंत हिंसक (क्रूर स्वभाव) और हमेशा पति के धन का नाश करने वाली हो, उसका परित्याग करके पति दूसरा विवाह कर सकता है।
चाणक्यके अनुसार पूर्ण त्याग
आचार्य चाणक्य ने व्यावहारिक जीवन के आधार पर दुष्ट स्वभाव वाली पत्नी का पूरी तरह से परित्याग करने का निर्देश दिया है:

त्यजेद् धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखीं भार्या बान्धवान्स्नेहवर्जितान्॥
(अर्थात्: दया से हीन धर्म को छोड़ देना चाहिए, विद्या से हीन गुरु को छोड़ देना चाहिए, हमेशा क्रोध करने वाली व कटु वचन बोलने वाली पत्नी का त्याग कर देना चाहिए और स्नेहहीन सगे-संबंधियों को छोड़ देना चाहिए।)

ये क्या मुजस्समा बना दिये हो?
13/04/2026

ये क्या मुजस्समा बना दिये हो?

प्रश्न - वास्तव में हिंदू कौन है उत्तर - श्रुति - स्मृत्यादि शास्त्रोंमें प्रामाण्यबुद्धिका आश्रय लेकर उनमें कहे हुए धर्...
20/03/2026

प्रश्न - वास्तव में हिंदू कौन है

उत्तर - श्रुति - स्मृत्यादि शास्त्रोंमें प्रामाण्यबुद्धिका आश्रय लेकर उनमें कहे हुए धर्ममें जो विश्वास और निष्ठा करता है, वही वास्तवमें हिन्दु कहने योग्य है ।"

15/03/2026

तुमको 2 दिन सिलेंडर नहीं मिला तो घबरा गए

उनका सोचो जिनको 5000 साल से पानी नहीं मिला तब भी जिंदा हैं 🤣

1757 में होली के दौरान (दो दिनों के लिए), मथुरा और वृंदावन में अहमद शाह अब्दाली और उनकी सेना के हाथों हिंदुओं का नरसंहार...
09/03/2026

1757 में होली के दौरान (दो दिनों के लिए), मथुरा और वृंदावन में अहमद शाह अब्दाली और उनकी सेना के हाथों हिंदुओं का नरसंहार देखा गया। पीड़ित हजारों स्थानीय और तीर्थयात्री थे जो होली मनाने के लिए वहां एकत्र हुए थे। उन्होंने बच्चों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा। यह 28 फरवरी 1757 था। जाट राजकुमार जवाहर सिंह ने 5000 आदमियों के साथ मथुरा गाँव के बाहर अब्दाली की सेना के खिलाफ प्रतिरोध की पेशकश की थी, लेकिन व्यर्थ। 9 घंटे तक लड़ाई हुई। जवाहर सिंह के 3000 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

अब्दाली की सेना ने फिर गोकुल की ओर कूच किया। वहां के नागा साधुओं ने मंदिरों और लोगों की रक्षा की। अब्दाली की सेना के खिलाफ हुए भीषण युद्ध में नागा साधु विजयी हुए। 2000 से अधिक नागा साधु वीरगति को प्राप्त हुए।
गोकुल की रक्षा करने वाले और अब्दाली की सेना को हराने वाले नागा साधुओं की वीरता और जाटों के प्रतिरोध की कहानी केसर तलवारों की पुस्तक 2 के अध्याय 41 में शामिल है ।

।।जय मनुवाद, जय ब्राह्मण ।। 🚩
06/03/2026

।।जय मनुवाद, जय ब्राह्मण ।। 🚩

जब सनातन धर्म त्याग कर बौद्ध मत स्वीकार कर ही लिया हैतो यह शादी का कार्ड छपवानावरमाला की परम्परालाल साड़ी आदि पहनना प्रीत...
28/02/2026

जब सनातन धर्म त्याग कर बौद्ध मत स्वीकार कर ही लिया है

तो यह शादी का कार्ड छपवाना

वरमाला की परम्परा

लाल साड़ी आदि पहनना

प्रीति भोज करवाना

सेहरा बंधना

घोड़ी पर चढ़कर चलना

हवन करना

हवन की अग्नि के प्रदक्षिणा करना

वर वधु की रस्मे, वचन, उवदेश

कन्यादान आदि...

यह सब भी तो बदलो

क्यों ब्राह्मण पद्धति को ढो रहे हो

विवाह हेतु कुछ
नया design करो
कुछ नया अविष्कार करो

बाबा साहब मि 22 प्रतिज्ञाओं का कुछ तो मान रखो...

जहां तक बाबा साहब लकीर खींच गए आज तक वहीं अटका है नवबौद्ध समाज

उसके आगे बढ़ो
नवीन परम्पराओ की रचना करो

 #भगवान्_कार्तिकेय।आग्नेय, स्कन्द, दीप्तकीर्ति, अनामय, मयूरकेतु, धर्मात्मा, भूतेश, महिपमर्दन, कामजित्, कामद, कान्त, सत्य...
27/02/2026

#भगवान्_कार्तिकेय।

आग्नेय, स्कन्द, दीप्तकीर्ति, अनामय, मयूरकेतु, धर्मात्मा, भूतेश, महिपमर्दन, कामजित्, कामद, कान्त, सत्यवाक्, भुवनेश्वर, शिशु, शीघ्र, शुचि, चण्ड, दीप्तवर्ण, शुभानन, अमोघ, अनघ, रौद्र, प्रिय, चन्द्रानन, दीप्तशक्ति, प्रशान्तात्मा, भद्रकृत, कूटमोहन, पष्ठीप्रिय, धर्मात्मा, पविल, मातृवत्सल, कन्याभार्ता, विभक्त, स्वाहेय, रेवतीसुत, प्रभु, नेता, विशाख, नैगमेय, सुदुश्चर, सुव्रत, ललित, बालक्रीडनकप्रिय, खचारी, ब्रह्मचारी, शूर, शरवणोद्भव, विश्वामितप्रिय, देवसेनाप्रिय, वासुदेवप्रिय आदि नामों से अलिङ्कृत भगवान् प्रियकृत हमारा मङ्गल कल्याण करें...😍🥰😍

2000 से ज्यादा अधिवक्ता सत्य की जीत के लिए परम पूज्य गुरुदेव भगवान श्री ज्योतिष पीठाधीश्व जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री...
27/02/2026

2000 से ज्यादा अधिवक्ता सत्य की जीत के लिए परम पूज्य गुरुदेव भगवान श्री ज्योतिष पीठाधीश्व जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ कोर्ट पहुंचे जय गौ माता

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