08/05/2026
जय श्रीमन्नारायण जय श्री राधे।
जो ब्रह्मांड में है वही इस शरीर में है"यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे"इस शरीर के दो रूप हैं व्यवहारिक और पारमार्थिक ।
पुराणों के अनुसार इस व्यवहारिक शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम ,32 दांत, सिर में 7 लाख बाल,20 नाखून, 38 किलो ग्राम मांस, 3.74 लीटर रक्त ,10 पल मेदा
(1 पल= 37.36 ग्राम),10 पल त्वचा, 12 पल मज्जा, 3 पल महारक्त, दो कुण्डव ( अन्न की एक माप है जो बारह मुठ्ठी के बराबर है) शुक्र तथा 1 कुणडव संतानोत्पत्ति के लिए उपयोगी स्त्री के विद्यमान शोणित ( रज) है।
मानव शरीर में 6 प्रकार के कफ, 6 प्रकार की विष्ठा,6 प्रकार के मूत्र, और 306 हड्डियां है । यही इस व्यवहारिक शरीर का वैभव है इसके अलावा कुछ नहीं।
इस शरीर द्वारा ही जीव उत्तम से उत्तम अधम से अधम गति प्राप्त करता है । जीव को दो अवस्थाओं में सभी जन्मो और कर्मों की स्मृतियां आ जाता है ।
1 जब व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में होता है आपने कभी अनुभव किया होगा सुषुप्तावस्था में पड़ा हुआ कभी रोता है, हंसता है ,डर जाता है पर कुछ बोल नहीं पाता क्योंकि कफ गला रोक देती है । घर वाले बार बार बुलाते हैं तो चिंहुक कर उठता है। अपने उस परमार्थिक जगत से भौतिक जगत में आता है।
2 जब जीव गर्भावस्था में होता है तो जीव को सभी जन्मो की स्मृतियां होती है जैसे ही मां के पेट से बाहर आता है वैष्णवी नाम की माया अपने प्रभाव में ले लेती है और उसकी स्मृतियां लुप्त हो जाती है टोटल ब्लैंक हो जाता है।
इसलिए किसी पैदा हुए बच्चे को रोते हुए देखिएगा वो आम बच्चों के तरह चिखकर, चिल्लाकर नहीं रोता, कहां-कहां कर के रोता है , अनजान के तरह इधर-उधर देखता है , मैं कहां आ गया जहां मेरा मस्तिष्क शून्य हो गया ज्ञान शून्य हो गया पर प्रकृति के नियमानुसार वो बोल नहीं सकता शरीर से चेष्टा नहीं कर सकता । आप इसका अनुभव स्वयं कर सकते हैं।
शरीर का परमार्थिक (spiritual ) रूप
पैर के नीचे तललोक, पैर के उपर वितललोक, दोनों जानुओं में सुतललोक,सक्थिप्रदेश में महातल लोक, गुह्य प्रदेश में रसातल ( इसलिए शायद देहाती में कहते हैं रसातल में पहुंच गया) कमर में पाताल होता है।
नाभि के मध्य भूर्लोक, नहि के उपर भूवर्लोक, हृदय में स्वर्ग लोक, कण्ठ में महर्लोक,मुख में जन लोक ,मस्तक में तपोलोक, महारन्रध में सत्यलोक है।
शरीर में सभी सागर भी है मूत्र में क्षारोद सागर, क्षारतत्व के उपर क्षीरसागर ( मां बच्चे को दूध पिलाती है पर ये दूध अपने आप कैसे आ जाता है कैसे बनता है इस क्षीरसागर का अनुपम उदाहरण है जिसका विज्ञान भी ठीक जबाब नहीं दे पाता) श्लेष्मा ( कफ) में सुरा सागर, रक्त में दधि सागर ( खून जम जाता है) मज्जा में घृत सागर ( स्कीन आयली) हो जाती है, लम्बीका ( गले में लटका हुआ जिसे घंटी भी बोलते हैं) स्वादूसागर, शूक्र में गर्भोदक सागर स्थित है।
नाद चक्र में सूर्य,बिंदू चक्र में चंद्र, नेत्र में मंगल, हृदय में बुध, विष्णु स्थान में गुरु,शुक्र में शुक्र, नाभि में शनि,मुख में राहु ,वायु स्थान में केतु विराजमान माना गया है।
हर व्यक्ति अपने हाथ से साढ़े तीन हाथ का होता है ,
दिन - रात, उत्तरायण - दक्षिणायन, वायु सभी इस शरीर में है। मनुष्य के शरीर में नाभि मुख्य स्थान, ब्रह्म स्थान है,नाभि ही वह प्रवेश द्वार है, जिससे जन्म से पहले हमारे शरीर के लिए आवश्यक समस्त संसाधन माँ के गर्भ से आता है।
नाभि के नीचे सोलर प्लेक्सस (सेलिएक) होता है, जो वायरलेस तरीके से हमारे जीवन में भौतिक संसाधन ब्रह्माण्ड से आकर्षित करता है।
महिलाओं में इड़ा नाड़ी प्रबल होती है स्त्री उर्जा और ग्रहणशील है , कोमल है मन प्रभावित करती है चंद्र है निगेटिव और पाज़िटिव कि असर बहुत जल्दी होता है।
ऐसा होने के दो मुख्य स्थान है नाभि और ब्रह्मरंध (चोटी वाली जगह) इसलिए भारतीय संस्कृति में इन दो जगह को ढककर रखने की सलाह दी जाती है।
नाभि अग्नि का स्थान है उर्जा केंद्र है, अग्नि तत्व तो सब खत्म महादेव ने ब्रम्ह देव का अग्नि मुख काट दिया था इसलिए ब्रह्मदेव की सब जगह पूजा नहीं होती।
नाभिके अधोभाग में कन्द (मूलाधार) है, उससे अङ्कुरोंकी भाँति नाड़ियाँ निकली हुई हैं।
नाभिके मध्यमें बहत्तर हजार नाड़ियाँ स्थित हैं। इन नाड़ियोंने शरीरको ऊपर-नीचे, दायें-बायें सब ओरसे व्याप्त कर रखा है।और ये चक्राकार होकर स्थित हैं।
इनमें प्रधान दस नाड़ियाँ हैं—इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पृथा, यशा, अलम्बुषा, कुहू और दसवीं शङ्खिनी। ये दस प्राणोंका वहन करनेवाली प्रमुख नाड़ियाँ है।
प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय—ये दस 'प्राणवायु' हैं। कई से आप परिचित भी है।
इन सभी का स्वामी और आदेश देने वाला प्राण वायु है ।
प्राण वायु रिक्तताकी पूर्ति प्रति प्राणोंको प्राणयन (प्रेरण) करता है और सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदय में स्थित रहकर मल-मूत्रादिके त्यागसे होनेवाली रिक्तताको नित्य पूर्ण करता है।
जीव में रहने वाला यह प्राण श्वासोच्छ्वास ( स्वसन respiration) और कास (खांसी) आदि द्वारा प्रयाण (गमनागमन) करता है, इसलिये इसे 'प्राण' कहा गया है।
अपानवायु - मनुष्यों के आहारको नीचे की ओर ले जाता है और मूत्र एवं शुक्र आदि का भी नीचे की ओर वहन करता है, इस अपानन के कारण इसे 'अपान' कहा जाता है। जिसे हम(fart पाद) कहते हैं। गति में गड़बड़ी गैस का कारण होता है।
समानवायु- मनुष्योंके खाये-पीये और सूँघे हुए पदार्थोंको एवं रक्त, पित्त, कफ तथा वातको सारे अङ्गोंमें समानभावसे ले जाता है, इस कारण उसे 'समान' कहा गया है।
उदान नामक वायु - मुख और अधरों को स्पन्दित करता है, नेत्रोंकी अरुणिमा को बढ़ाता है और मर्मस्थानोंको उद्विग्न करता है, इसीलिये उसका नाम 'उदान' है।
'व्यान' - अङ्गोंको पीड़ित करता है। यही व्याधिको कुपित करता है और कण्ठको अवरुद्ध कर देता है। व्यानशील होने से इसे 'व्यान' कहा गया है।
नागवायु' उद्गार (डकार-वमन आदि)-में यही प्रबल होता है तो ही जलने लगता है
'कूर्मवायु' नयनोंके उन्मीलन (खोलने)-भोजन के मिलने के सहयोग में प्रवृत्त होता है।
'कृकर' भक्षण में खाने पीने में सहयोगी है
'देवदत्त' वायु जँभाईमें अधिष्ठित है।
'धनंजय' पवन का स्थान घोष है। यह मृत शरीरका भी परित्याग नहीं करता।
इन दसों के द्वारा जीव प्रयाण करता है, इसलिये प्राणभेद से नाड़ी चक्र के भी दस भेद हैं॥
संक्रान्ति, विषुव, दिन, रात, अयन, अधिमास, ऋण, उनरात्र एवं धन—ये सूर्यकी गतिसे होनेवाली दस दशाएँ शरीर में भी होती हैं।
इस शरीरमें हिक्का (हिचकी) उनरात्र,
विजृम्भिका (जँभाई) अधिमास,
कास (खाँसी) ऋण और निःश्वास 'धन' कहा जाता है।
शरीरगत वामनाड़ी 'उत्तरायण' और दक्षिणनाड़ी 'दक्षिणायन' है।
दोनोंके मध्यमें नासिकाके दोनों छिद्रोंसे निर्गत होनेवाली श्वासवायु 'विषुव' कहलाती है।
इस विषुववायुका ही अपने स्थानसे चलकर दूसरे स्थानसे युक्त होना 'संक्रान्ति' है।
शरीरके मध्यभागमें 'सुषुम्णा' स्थित है, वामभागमें 'इडा' और दक्षिणभागमें 'पिङ्गला' है।
ऊर्ध्वगति वाला प्राण 'दिन' माना गया है और अधोगामी अपानको 'रात्रि' कहा गया है।
एक प्राणवायु ही दस वायुके रूपमें विभाजित है।
देहके भीतर जो प्राणवायु का आयाम (बढ़ना) है, उसे 'चन्द्रग्रहण' कहते हैं। वही जब देहसे ऊपरतक बढ़ जाता है, तब उसे 'सूर्यग्रहण' मानते हैं
यही परिपूर्ण कुम्भकी भाँति स्थित हो जाय—इसे 'कुम्भक' प्राणायाम कहा जाता है।
श्वासोच्छ्वास की क्रिया द्वारा अपने शरीरमें विराजमान शिवस्वरूप ब्रह्म का ही ('सोऽहं' 'हंसः' के रूपमें) उच्चारण होता है, (स्वास खिंचने पर हं और छोड़ने पर स: की ध्वनि आती है)
श्वास-प्रश्वास ( स्वास लेने और छोड़ने) द्वारा दिन-रातमें इक्कीस हजार छः सौ (21600) की संख्या में ('सोऽहं' 'हंसः' के रूपमें) मन्त्र-जप करता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरसे सम्बन्ध रखनेवाली 'अजपा' नामक गायत्री है।
'हंस' नाम है—'सदाशिव' का।ब्रह्माका स्थान हृदयमें है, भगवान् विष्णु कण्ठमें अधिष्ठित हैं, तालुके मध्यभागमें रुद्र, ललाटमें महेश्वर और प्राणोंके अग्रभागमें सदाशिवका (स्थान है)।
जब तक जीवन है शरीर में ब्रह्म नाद सुनाई देता है तीन से 6 महिने पहले यह ब्रम्हनाद सुनाई देना बंद हो जाता है।