धर्म आस्था ज्योतिष सेवा संस्थान, कानपुर

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धर्म आस्था ज्योतिष सेवा संस्थान, कानपुर भारतीय वैदिक ज्योतिष का प्रचार प्रसा?

30/11/2020

*कार्तिक पूर्णिमा - 30 नवंबर 2020 दिन सोमवार*
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आज दिनांक 30 नवंबर दिन सोमवार, को कार्तिक माह की पूर्णिमा है। हिन्दू धर्म में इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसी तिथि पर गुरुनानक देव की जयंती भी है। इस कारण ये दिन सिख धर्म के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन चंद्रमा ठीक 180 अंश पर होता है। अतः इस दिन चंद्रमा से जो किरणें निकलती हैं, वह काफी सकारात्मक होती है। यह किरणें सीधे दिमाग पर असर डालती है। इस दिन उपवास करने से हजार अश्वमेघ और सौ राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।

*कार्तिक पूर्णिमा का महत्व*

हिन्दी पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। इसे *त्रिपुरी पूर्णिमा* भी कहते हैं। प्राचीन समय में इस तिथि पर शिवजी ने त्रिपुरासुर नाम के दैत्य का वध किया था, इस कारण इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसके अलावा मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर ही भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार भी लिया था।

*कार्तिक पूर्णिमा पर किये जाने वाले कार्य*

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। स्नान के बाद दीपदान, पूजा, आरती और दान किया जाता है। अगर आप पवित्र नदी में स्नान नहीं कर सकते हैं तो पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय सभी तीर्थों का ध्यान करना चाहिए। स्नान करने के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं। भगवान विष्णु के लिए सत्यनारायण भगवान की कथा करनी चाहिए। इस दिन गरीबों को फल, अनाज, दाल, चावल, गरम वस्त्र आदि चीजों का दान करना चाहिए। इस दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाकर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें।

कार्तिक पूर्णिमा का दिन मां लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है। इस दिन माता लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में खुशियों की कमी नहीं रहती है। पीपल में लक्ष्मी माता का वास माना गया है इसीलिए इस दिन पीपल की पूजा करके उस पर दीपक लगाना चाहिए।
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*DAJSS*

24/11/2019

*क्यों नहीं करते राहुकाल में कोई शुभ काम?*
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भारतीय ज्योतिष में हर कार्य के लिए एक विशेष मुहूर्त निकाला जाता है। ऐसा मानते हैं कि शुभ मुहूर्त में किया गया कार्य सफल व शुभ होता है। लेकिन भारतीय ज्योतिष के अनुसार दिन में एक समय ऐसा भी आता है जब कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। वह समय होता है राहुकाल।
राहुकाल के बारे में ऐसा कहते हैं कि इस दौरान यदि कोई शुभ कार्य, लेन-देन, यात्रा या कोई नया काम शुरू किया जाए तो वह अशुभ फल देता है। राहुकाल में ऐसा क्या होता है कि इसमें किए गए कार्य अशुभ या असफल होते हैं?
इसका पीछे का तर्क यह है कि ज्योतिष के अनुसार राहु को पाप ग्रह माना गया है। दिन में एक समय ऐसा आता है जब राहु का प्रभाव काफी बढ़ जाता है और उस दौरान यदि कोई भी शुभ कार्य किया जाए तो उस पर राहु का प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण या तो वह कार्य अशुभ हो जाता है या उसमें असफलता हाथ लगती है। यही समय राहुकाल कहलाता है।

*कब-कब होता है राहुकाल?*

प्रत्येक दिन एक निश्चित समय राहुकाल होता है। यह डेढ़ घंटे का होता है। वारों के हिसाब से इसका समय इस प्रकार है-

सोमवार सुबह 7:30 से 9:00

मंगलवार दोपहर 3:00 से 4:30

बुधवार दोपहर 12:00 से 1:30

गुरुवार दोपहर 1:30 से 3:00

शुक्रवार सुबह 10:30 से 12:00

शनिवार सुबह 9:00 से 10:30

रविवार शाम 4:30 से 6:00.

03/06/2019

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*तनाव प्रबंधन भगवान शंकर से सीखें*

1- जटा में गंगा और त्रिनेत्र में अग्नि (जल और आग की दुश्मनी).

2- चन्द्रमा में अमृत और गले मे जहर (अमृत और जहर की दुश्मनी).

3- शरीर मे भभूत और भूत का संग ( भभूत और भूत की दुश्मनी).

4- गले मे सर्प और पुत्र गणेश का वाहन चूहा और पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर ( तीनो की आपस मे दुश्मनी).

5- नन्दी (बैल) और मां भवानी का वाहन सिंह ( दोनों में दुश्मनी).

6- एक तरफ तांडव और दूसरी तरफ गहन समाधि ( विरोधाभास).

7- देवाधिदेव लेकिन स्वर्ग न लेकर हिमालय में तपलीन.

8- भगवान विष्णु इन्हें प्रणाम करते है और ये भगवान विष्णु को प्रणाम करते है।

इत्यादि इतने विरुद्ध स्वभाव के वाहन और गणों के बाद भी, सबको साथ लेकर चिंता से मुक्त रहते है। तनाव रहित रहते हैं।

और हम लोग विपरीत स्वभाव वाले सास-बहू, दामाद-ससुर, बाप-बेटे , माँ-बेटी, भाई-बहन, ननद-भाभी इत्यादि की नोकझोंक में तनावग्रस्त हो जाते है। ऑफिस में विपरीत स्वभाव के लोगों के व्यवहार देखकर तनावग्रस्त हो जाते हैं।

भगवान शंकर बड़े बड़े राक्षसों से लड़ते है और फिर समाधि में ध्यानस्थ हो जाते है, हम छोटी छोटी समस्या में उलझे रहते है और नींद तक नहीं आती।

युगनिर्माण में आने वाली कठिनाई से डर जाते है, सँगठित विपरीत स्वभाब वाले एक उद्देश्य के लिए रह ही नहीं पाते है।

भगवान शंकर की पूजा तो करते है, पर उनके गुणों को धारण नहीं करते।
।। ॐनमः शिवाय।। 🙏🌹

20/02/2018

पंचम भाव विशेष
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पंचम भाव हमारी विद्या, बुद्धि, पुत्र और पुत्री, योजनाओ का आदि आदि होता है । किसी भी विचारणीय भाव से पंचम भाव उसकी बुद्धि , योजना और विद्या का होता है । जैसे 10 भाव कर्म का है तो हम उस कर्म को कितना जानते है उसके लिए 2 भाव को देखना चाहिए। 2 भाव बली है तो हम अपने कर्म के बारे में पूर्ण रूप से जानकार होंगे ।

2 भाव भोजन का है भोजन की योजना 6 भाव होता है। अतः 6 भाव में बैठे गृह या राशि से यह जानकारी होगी कि हमे खाने का क्या शौक है । जैसे 6 भाव में शनि चन्द्र या चन्द्र राहू मदिरा की तरफ संकेत करते हैं। इस तरह 6 भाव से हम यह बता सकते है कि हम क्या खाते है क्या नहीं ।

8 भाव गूढ़ ज्ञान का होता है। 8 भाव का विद्या स्थान 12 भाव होगा । अतः 12 भाव में शनि रहू या इनकी द्रष्टि हमें तंत्र की तरफ आकर्षित करती है । इसी तरह हम पंचम भाव से बहुत कुछ जान सकते है ।
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आचार्य मनोज कुमार शुक्ला
ज्योतिषाचार्य
धर्म आस्था ज्योतिष शोध संस्थान
कानपुर

02/05/2017

शहद
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‪‎ज्योतिष‬ के अनुसार घर में शहद रखने से शनि संबंधी दोषों का निवारण होता है। यदि आपके घर में किसी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा है तो शहद की सकारात्मक ऊर्जा उसे नष्ट कर देती है। शहद के
शुभ प्रभाव से परिवार के सदस्यों को चमत्कारी लाभ प्राप्त होता है। इतने फायदों को देखते हुए शहद को अपने घर में अवश्य ही रखें। इसे किसी सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही घर में
पूरी तरह से साफ-सफाई रखें, जिससे आपके घर में बरकत बनी रहेगी और फिजूल खर्चों में कमी आएगी।
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DAJSS

10/03/2017

आप सभी को होली की शुभकामनाएं !!
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होली में निभाएं अपनी सामाजिक जिम्मेदारी -
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जल के बिना जीवन असंभव है। यह हम सभी जानते हैं, इसके बाद भी जल का जमकर दुरुपयोग करते हैं। होली भी ऐसा ही मौका है, जब सबसे ज्यादा जल की बर्बादी होती है। होली का पर्व प्रतीक है श्रृंगारित प्रकृति के स्वागत करने का। जल का दुरुपयोग कर हम इस पवित्र त्योहार का अर्थ ही बदल देते हैं, क्योंकि जल के अभाव में प्रकृति का श्रृंगार ही अधूरा होगा। इस होली पर हम संकल्प लें कि सूखी होली खेलकर अपने नैतिक कर्तव्यों का पालन करेंगे तथा जल के दुरुपयोग पर रोक लगाएंगे। हमारे धर्मग्रंथों में भी जल के महत्व का वर्णन मिलता है।

जीवन का दूसरा नाम जल है। जल नहीं होगा तो जीवन समाप्त हो जाएगा। यह सृष्टि और इस सृष्टि के सबसे सुंदर रूप अर्थात मनुष्य का निर्माण भी जल के सम्मिश्रण से हुआ है। पंच महाभूत जिनसे सृष्टि और हम बने हैं, उनमें जल प्रमुख है। धरती, आकाश, वायु, अग्नि और जल में केवल जल को ही जीवन की संज्ञा दी गई है। धरती पर भी पचहत्तर फीसदी से ज्यादा जल है और मनुष्य के शरीर में भी सत्तर फीसदी से ज्यादा जल की ही सत्ता है। हम भोजन के बगैर जीवित रह सकते हैं किंतु जल के बगैर जीवन की परिकल्पना संभव नहीं है। जल ही है जिसकी सत्ता धरती से लेकर आकाश तक है। धरती के भीतर भी जल है और आकाश से भी वह अमृत के रूप में बरसता है।

समुद्र मंथन की कथा जिसका लक्ष्य अमृत पाना था, जल से ही जुड़ी है। अमृत जल से ही प्रकट हुआ है। इसीलिए जल ही अमृत कहा गया है। आज जब यह अमृत घट रहा है और प्रदूषण का विष बढ़ रहा है तब जीवन की रक्षा के लिए जल का संरक्षण कर्तव्य से आगे धर्म तक पहुंच गया है। आज यदि हम जल बचाते हैं तो सच्चे अर्थों में जीवन धर्म, मानव धर्म और प्रकृति धर्म को धारण करते हैं। उसकी रक्षा करते हैं, उसका पोषण और संवद्र्धन करते हैं। यही कारण है हमारे धर्मग्रंथ एक कुएं के निर्माण का फल सौ अश्वमेध यज्ञों पर भारी बताते हैं।
ऋग्वेद में भी जल के महत्व का वर्णन इस प्रकार है-

या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति
खनित्रिमा उत वा या: स्वयंजा:।
समुद्रार्था या: शुचय: पावका-
स्ता आपो देवी रिह मामवंतु॥

जो जल आकाश से आता है जो जल धरती पर बहता है, जो जल खोदने से मिलता है। अथवा वह जो स्वयं फूट पड़ा (झरना) है। समुद्र के लिए प्रस्थान करने वाली पवित्र जल की देवी इस धरती पर हमारी रक्षा करें।

अत: होली पर हम संकल्प लें कि हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाकर सूखी होली खेलकर अपने नैतिक कर्तव्यों का पालन करेंगे तथा जल के दुरुपयोग पर रोक लगाएंगे।
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आप सभी को होली की शुभकामनाएं !!

24/03/2016

गुड फ्राइडे - 25 मार्च, शुक्रवार पर विशेष
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गुड फ्राइडे प्रभु यीशु के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। सही मायनों में यह प्रभु यीशु द्वारा मानवता के लिए प्राण का न्यौछावर करने का दिन है। इस बार गुड फ्राइडे कल 25 मार्च, शुक्रवार को है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार यीशु मसीह का जन्म इजराइल के एक गांव बेतलेहम में हुआ था। बालक यीशु को बेतलेहम के राजा हेरोदेस ने मरवाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। जब यीशु बड़े हुए तो जगह-जगह जाकर लोगों को मानवता और शांति का संदेश देने लगे। उन्होंने धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों को मानव जाति का शत्रु कहा। उनके संदेशों से परेशान होकर धर्म पंडितों ने उन्हें धर्म की अवमानना का आरोप लगाकर उन्हें मौत की सजा दी।

यीशु को कई तरह की यातनाएं दी गयीं। यीशु के सिर पर कांटों का ताज रखा गया। इसके बाद यीशु क्रूस (सलीब) को अपने कंधे पर उठाकर गोल गोथा नामक जगह ले गए। जहां उन्हें सलीब पर चढ़ा दिया गया। जिस दिन यीशु को सूली पर चढ़ाया गया, वह शुक्रवार का दिन था। तीन घंटे बाद यीशु ने ऊंची आवाज में परमेश्वर को पुकारा- हे पिता मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंपता हूं। इतना कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

मानवता के लिए बलिदान का वो दिन गुड फ्राइडे के रूप में मनाया जाता है। ईसाई धर्म के अनुयायी यीशु को उनके त्याग के लिए याद करते हैं। इसके बाद यीशु को कब्र में दफना दिया गया, लेकिन ईश्वरीय कृपा से तीन दिन बाद यानी रविवार को यीशु पुन: जीवित हो उठे। कहते हैं पुन: जीवित होने के बाद यीशु चालीस दिन तक अपने शिष्यों और मित्रों के साथ रहे और अंत में स्वर्ग चले गए।

प्रायश्चित व प्रार्थना करने का दिन
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प्रभु ईसा मसीह मानवता के रक्षक थे। उन्होंने ईश्वर के मार्ग पर चलते-चलते अपने प्राणों का त्याग कर दिया। ईसा मसीह के बलिदान की याद में ईसाई समुदाय के लोग पवित्र सप्ताह मनाते हैं। ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस दिन ईशु ने प्राण त्यागे थे, उस दिन शुक्रवार था। इसी की याद में गुड फ्राइडे मनाया जाता है। इस घटना के तीन दिन बाद ईशु पुन: जीवित हो गए थे, इस दिन को ईस्टर सण्डे कहते हैं।

गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे या ग्रेट फ्राइडे भी कहते हैं। गुड फ्राइडे के दिन ईसाई धर्म के लोग गिरिजाघर जाकर प्रभु यीशु को याद करते हैं। जिस सलीब (क्रॉस) पर ईसा मसीह को लटकाया गया था, उसके प्रतीक रूप में लकड़ी का एक तख्ता गिरजाघरों में रखा जाता है। ईशु के भक्त एक-एक कर आकर उसे चूमते हैं। इसके बाद दोपहर से तीन बजे तक सर्विस की जाती है।

सर्विस में ईसाई सिद्धांतों (चार गोस्पेल्स) में से किसी एक का पठन किया जाता है। तत्पश्चात समारोह में प्रवचन, ध्यान और प्रार्थनाएं की जाती हैं। इस दौरान श्रद्धालु प्रभु यीशु द्वारा तीन घंटे तक क्रॉस पर भोगी गई पीड़ा को याद करते हैं। इसके बाद आधी रात को सामान्य कम्यूनियन सर्विस होती है। चूंकि गुड फ्राइडे प्रायश्चित और प्रार्थना का दिन है, अत: इस दिन गिरजाघरों में घंटियां (बेल) नहीं बजाई जातीं।
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02/01/2016

पंचक के प्रकार

1. रोग पंचक
रविवार को शुरू होने वाला पंचक रोग पंचक कहलाता है। इसके प्रभाव से ये पांच दिन शारीरिक और मानसिक परेशानियों वाले होते हैं। इस पंचक में किसी भी तरह के शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। हर तरह के मांगलिक कार्यों में ये पंचक अशुभ माना गया है।

2. राज पंचक
सोमवार को शुरू होने वाला पंचक राज पंचक कहलाता है। ये पंचक शुभ माना जाता है। इसके प्रभाव से इन पांच दिनों में सरकारी कामों में सफलता मिलती है। राज पंचक में संपत्ति से जुड़े काम करना भी शुभ रहता है।

3. अग्नि पंचक
मंगलवार को शुरू होने वाला पंचक अग्नि पंचक कहलाता है। इन पांच दिनों में कोर्ट कचहरी और विवाद आदि के फैसले, अपना हक प्राप्त करने वाले काम किए जा सकते हैं। इस पंचक में अग्नि का भय होता है। ये अशुभ होता है। इस पंचक में किसी भी तरह का निर्माण कार्य, औजार और मशीनरी कामों की शुरुआत करना अशुभ माना गया है। इनसे नुकसान हो सकता है।

4. मृत्यु पंचक
शनिवार को शुरू होने वाला पंचक मृत्यु पंचक कहलाता है। नाम से ही पता चलता है कि अशुभ दिन से शुरू होने वाला ये पंचक मृत्यु के बराबर परेशानी देने वाला होता है। इन पांच दिनों में किसी भी तरह के जोखिम भरे काम नहीं करना चाहिए। इसके प्रभाव से विवाद, चोट, दुर्घटना आदि होने का खतरा रहता है।

5. चोर पंचक
शुक्रवार को शुरू होने वाला पंचक चोर पंचक कहलाता है। विद्वानों के अनुसार इस पंचक में यात्रा करने की मनाही है। इस पंचक में लेन-देन, व्यापार और किसी भी तरह के सौदे भी नहीं करने चाहिए। मना किए गए कार्य करने से धन हानि हो सकती है।

इसके अलावा बुधवार और गुरुवार को शुरू होने वाले पंचक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है।

02/01/2016

भगवानों के वाहन पशु ही क्यों होतेहैं?
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किसी भी मंदिर में जाइए, किसी भी भगवान को देखिए, उनके साथ एक चीज सामान्य रूप से जुड़ी हुई है, वह है उनके वाहन।
लगभग सभी भगवान के वाहन पशुओं को ही माना गया है। शिव के नंदी से लेकर दुर्गा के शेर तक और विष्णु के गरूढ़ से लेकर इंद्र के ऐरावत हाथी तक। लगभग सारे देवी-देवता पशुओं पर ही सवार हैं।

आखिर क्यों सर्वशक्तिमान भगवानों को पशुओं की सवारी की आवश्यकता पड़ी, जब की वे तो अपनी दिव्यशक्तियों से पलभर में कहीं भी आ-जा सकते हैं? क्यों हर भगवान के साथ कोई पशु जुड़ा हुआ है?
भगवानों के साथ जानवरों को जोडऩे केपीछे कई सारे कारण हैं।
इसमें अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप पशु-पक्षियों को जोड़ा है। वास्तव में देवताओं के साथ पशुओं कोउनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है।
दूसरा सबसे बड़ा कारण है प्रकृति की रक्षा।
अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता।

हर भगवान के साथ एक पशु को जोड़ कर भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए। मूलत: इसके पीछे एक यही संदेश सबसे बड़ा है।

16/12/2015

॥ सम्पूर्ण गीता का सार ॥

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं...

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
(गीता २/४७)

हे अर्जुन! तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में अधिकार नहीं है, इसलिए तू न तो अपने-आप को कर्मों के फलों का कारण समझ और न ही कर्म करने में तू आसक्त हो।

कर्म करना और फल की इच्छा न करना ही "निष्काम कर्म-योग यानि भक्ति-योग" है, बिना भक्ति-योग के भगवान की प्राप्ति असंभव है।

कर्म का बीज बो देने पर फल का उत्पन्न होना निश्चित ही होता है, फल जायेगा कहाँ? फल तो बीज बोने वाले को ही मिलेगा, कोई दूसरा तो उस फल को खा ही नहीं सकता है तो हमें चिन्ता करने की क्या आवश्यकता है।

जब हम अपने कर्म एवं दूसरों के हितों को देखते हैं तब हमसे पुण्य-कर्म हो रहा होता है, और जब हम दूसरों का कर्म एवं अपना हित देखते हैं तब हमसे पाप-कर्म ही हो रहा होता है। इसलिये हमें केवल स्वयं के कर्म को ही देखना चाहिये कि हमसे कौन सा कर्म हो रहा है।

बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होय।

जैसा कर्म रूपी बीज हम बोते हैं वैसा ही फल प्राप्त होता है, जब हम बबूल (पाप-कर्म) का बीज बोते हैं तो हमें काँटे (दुख) ही मिलते हैं, और जब हम आम (पुण्य-कर्म) का बीज बोते हैं तो हमें आम (सुख) मिलता है।

जो बीज बोता है फल भी केवल वही खाता है, यही आध्यात्म (सत्य) है, लेकिन भौतिक संसार में यह उल्टा दिखलाई देता है, बीज कोई बोता हुआ दिखाई देता है और फल कोई और खाता दिखाई देता है।

इसी स्थिति पर गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को उल्टे वृक्ष की उपमा दी है।

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥
(गीता १५/१)

हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है।

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
(गीता १५/२)

इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं।

जब हम फल की इच्छा से कर्म करते हैं तब सकाम-फल यानि दुख-सुख रूपी विष के समान विषय-भोगों की प्राप्ति होती है, इस फल को भोगने के लिये हमें बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

जब हम बिना फल की इच्छा से कर्म करते हैं तब निष्काम-फल यानि अमृत-फल की उत्पत्ति होती है जिसे प्राप्त कर हम परम-आनन्द अवस्था में स्थित होकर जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्त हो परमगति को प्राप्त हो सकते हैं.

16/12/2015

॥ भक्ति का वास्तविक स्वरूप ॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
(गीता १२/६)!

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥
(गीता १२/७)

जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को मुझे अर्पित करके मेरी शरण होकर अनन्य भाव से भक्ति-योग में स्थित होकर निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी आराधना करते हैं। मुझमें स्थिर मन वाले उन मनुष्यों का मैं जन्म-मृत्यु रूपी संसार-सागर से अति-शीघ्र ही उद्धार करने वाला होता हूँ।

भगवान, परमात्मा और ब्रह्म एक होते हुए भी अलग ही हैं। किसी भी मनुष्य की वास्तविक भगवद भक्ति तो ब्रह्म-ज्ञान प्रकट होने के बाद ही आरम्भ होती है। मनुष्य में ब्रह्म-ज्ञान का प्रकट होना ही ब्रह्म साक्षात्कार कहलाता है। जिस मनुष्य में ब्रह्म-ज्ञान प्रकट हो जाता है वही ब्राह्मण अवस्था को प्राप्त होता है और वही वास्तविक ब्राह्मण होता है, उसके द्वारा बोले जाने वाला प्रत्येक शब्द ब्रह्म-वाक्य होता है।

ब्रह्म-ज्ञान सभी प्राणी मात्र में स्थित है, क्योंकि जहाँ ब्रह्म है वहीं ब्रह्मज्ञान है, आत्मा ही ब्रह्म है जो प्रत्येक प्राणी मात्र में स्थित है।

जगदगुरु आदि शंकराचार्य जी कहते हैं.

अहं ब्रह्मास्मि!

हम सभी परब्रह्म के अंश ब्रह्म स्वरूप ही हैं।

इसी पर गुरु नानक देव जी कहते हैं.

हर घट मेरा सांइया, खाली घट न कोय।
बलिहारी जा घट की, ता में प्रकट होय॥

हर प्राणी के शरीर में भगवान ब्रह्म स्वरूप में रहते है, कोई भी प्राणी का शरीर ऎसा नहीं है जिसमें भगवान नहीं हैं। सार्थकता तो उस उस शरीर रूपी मनुष्य की है, जिसमें वह प्रकट होता है।

संसार में प्रत्येक कर्म को करने के लिये क्रमश: ही चलने का विधान है, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिये पिछले कदम को छोड़ना पड़ता है, जब तक पिछले कदम को नहीं छोड़ते है तो अगला कदम नहीं उठ सकता है तब तक कोई आगे नहीं बढ़ सकता हैं। उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिये.

(१) जब तक मनुष्य निष्काम भाव से कर्म नहीं करता है तब तक मनुष्य का अज्ञान दूर नहीं हो सकता है।

(२) जब तक मनुष्य का अज्ञान दूर नहीं होता है तब तक मनुष्य में ज्ञान प्रकट नहीं हो सकता है।

(३) जब तक मनुष्य में ज्ञान प्रकट नहीं हो जाता है तब तक कोई भी मनुष्य पूर्ण शरणागत नहीं हो सकता है।

(४) जब तक मनुष्य पूर्ण शरणागत नहीं होता है तब तक मनुष्य को भगवान की शरणागति प्राप्त नहीं हो सकती है।

(५) जब तक मनुष्य को भगवान की शरणागति प्राप्त नहीं होती है तब तक मनुष्य वास्तविक भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती है।

(६) जब तक मनुष्य को वास्तविक भक्ति प्राप्त नहीं होती है तब तक मनुष्य को भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

(७) जब तक मनुष्य को भगवान की प्राप्ति नहीं होती है तब तक मनुष्य की जन्म-मृत्यु रूपी यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती है।

(८) जब तक मनुष्य की जन्म-मृत्यु रूपी यात्रा पूर्ण नहीं होती है तब तक मनुष्य का जन्म-मृत्यु का क्रम चलता रहता है।

जगदगुरु आदि शंकराचार्य जी कहते हैं....

पुनरपि जननम पुनरपि मरणम,
पुनरपि जननी जठरे शयनम।
बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना, फिर से जन्म लेना और फिर से मर जाना। जन्म से पहले हम कहाँ थे और मरने के बाद कहाँ होंगे यह कोई नहीं जानता है।

भक्ति के द्वारा ही भक्ति प्राप्त होती है, एक भक्ति वह होती है जिसे किया जाता है और दूसरी भक्ति वह होती है जो भगवान की कृपा से प्राप्त होती है।

जो भक्ति की जाती है वह तो भक्ति रूपी कर्म होता है, और जो भक्ति भगवान की कृपा से प्राप्त होती है वह भक्ति पथ होता है। सभी अन्य कर्मों की अपेक्षा भक्ति-कर्म श्रेष्ठ है।

जो कुछ भी किया जाता वह कर्म होता है, जो कुछ भी प्राप्त होता है वह भगवान की कृपा होती है इस बात से यह सिद्ध होता है कि एक साधारण मनुष्य जिसे भक्ति के नाम से जानता है वह वास्तव में भक्ति कर्म ही है।

गीता के अनुसार.

ईश्वर प्राप्ति के दो ही मार्ग है, "सांख्य-योग" और "निष्काम कर्म-योग"।

इन दोनों मार्गों में से किसी एक मार्ग का धर्मानुसार अनुसरण करके ही भक्ति-मार्ग में प्रवेश मिलता है, भक्ति मार्ग में प्रवेश पाना ही मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य है।

इन दोनों ही मार्गों में कर्म का आचरण तो करना ही होता हैं, प्रत्येक व्यक्ति इन दोनों में से ही किसी एक का अनुसरण कर रहा है। परन्तु आधिकतर मनुष्य सकाम भाव से कर्म करते है। जब तक निष्काम भाव उत्पन्न नहीं होगा तब तक "कर्म-योग" का आचरण नहीं हो सकता है और तब तक किसी भी मनुष्य का योग सिद्ध नहीं हो सकता है।

॥ भक्ति का वास्तविक स्वरूप ॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं....

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
(गीता १२/६)!

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥
(गीता १२/७)

जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को मुझे अर्पित करके मेरी शरण होकर अनन्य भाव से भक्ति-योग में स्थित होकर निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी आराधना करते हैं। मुझमें स्थिर मन वाले उन मनुष्यों का मैं जन्म-मृत्यु रूपी संसार-सागर से अति-शीघ्र ही उद्धार करने वाला होता हूँ।

भगवान, परमात्मा और ब्रह्म एक होते हुए भी अलग ही हैं। किसी भी मनुष्य की वास्तविक भगवद भक्ति तो ब्रह्म-ज्ञान प्रकट होने के बाद ही आरम्भ होती है। मनुष्य में ब्रह्म-ज्ञान का प्रकट होना ही ब्रह्म साक्षात्कार कहलाता है। जिस मनुष्य में ब्रह्म-ज्ञान प्रकट हो जाता है वही ब्राह्मण अवस्था को प्राप्त होता है और वही वास्तविक ब्राह्मण होता है, उसके द्वारा बोले जाने वाला प्रत्येक शब्द ब्रह्म-वाक्य होता है।

ब्रह्म-ज्ञान सभी प्राणी मात्र में स्थित है, क्योंकि जहाँ ब्रह्म है वहीं ब्रह्मज्ञान है, आत्मा ही ब्रह्म है जो प्रत्येक प्राणी मात्र में स्थित है।

जगदगुरु आदि शंकराचार्य जी कहते हैं.

अहं ब्रह्मास्मि!

हम सभी परब्रह्म के अंश ब्रह्म स्वरूप ही हैं।

इसी पर गुरु नानक देव जी कहते हैं.

हर घट मेरा सांइया, खाली घट न कोय।
बलिहारी जा घट की, ता में प्रकट होय॥

हर प्राणी के शरीर में भगवान ब्रह्म स्वरूप में रहते है, कोई भी प्राणी का शरीर ऎसा नहीं है जिसमें भगवान नहीं हैं। सार्थकता तो उस उस शरीर रूपी मनुष्य की है, जिसमें वह प्रकट होता है।

संसार में प्रत्येक कर्म को करने के लिये क्रमश: ही चलने का विधान है, जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिये पिछले कदम को छोड़ना पड़ता है, जब तक पिछले कदम को नहीं छोड़ते है तो अगला कदम नहीं उठ सकता है तब तक कोई आगे नहीं बढ़ सकता हैं। उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिये.

(१) जब तक मनुष्य निष्काम भाव से कर्म नहीं करता है तब तक मनुष्य का अज्ञान दूर नहीं हो सकता है।

(२) जब तक मनुष्य का अज्ञान दूर नहीं होता है तब तक मनुष्य में ज्ञान प्रकट नहीं हो सकता है।

(३) जब तक मनुष्य में ज्ञान प्रकट नहीं हो जाता है तब तक कोई भी मनुष्य पूर्ण शरणागत नहीं हो सकता है।

(४) जब तक मनुष्य पूर्ण शरणागत नहीं होता है तब तक मनुष्य को भगवान की शरणागति प्राप्त नहीं हो सकती है।

(५) जब तक मनुष्य को भगवान की शरणागति प्राप्त नहीं होती है तब तक मनुष्य वास्तविक भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती है।

(६) जब तक मनुष्य को वास्तविक भक्ति प्राप्त नहीं होती है तब तक मनुष्य को भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

(७) जब तक मनुष्य को भगवान की प्राप्ति नहीं होती है तब तक मनुष्य की जन्म-मृत्यु रूपी यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती है।

(८) जब तक मनुष्य की जन्म-मृत्यु रूपी यात्रा पूर्ण नहीं होती है तब तक मनुष्य का जन्म-मृत्यु का क्रम चलता रहता है।

जगदगुरु आदि शंकराचार्य जी कहते हैं....

पुनरपि जननम पुनरपि मरणम,
पुनरपि जननी जठरे शयनम।
बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना, फिर से जन्म लेना और फिर से मर जाना। जन्म से पहले हम कहाँ थे और मरने के बाद कहाँ होंगे यह कोई नहीं जानता है।

भक्ति के द्वारा ही भक्ति प्राप्त होती है, एक भक्ति वह होती है जिसे किया जाता है और दूसरी भक्ति वह होती है जो भगवान की कृपा से प्राप्त होती है।

जो भक्ति की जाती है वह तो भक्ति रूपी कर्म होता है, और जो भक्ति भगवान की कृपा से प्राप्त होती है वह भक्ति पथ होता है। सभी अन्य कर्मों की अपेक्षा भक्ति-कर्म श्रेष्ठ है।

जो कुछ भी किया जाता वह कर्म होता है, जो कुछ भी प्राप्त होता है वह भगवान की कृपा होती है इस बात से यह सिद्ध होता है कि एक साधारण मनुष्य जिसे भक्ति के नाम से जानता है वह वास्तव में भक्ति कर्म ही है।

गीता के अनुसार.

ईश्वर प्राप्ति के दो ही मार्ग है, "सांख्य-योग" और "निष्काम कर्म-योग"।

इन दोनों मार्गों में से किसी एक मार्ग का धर्मानुसार अनुसरण करके ही भक्ति-मार्ग में प्रवेश मिलता है, भक्ति मार्ग में प्रवेश पाना ही मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य है।

इन दोनों ही मार्गों में कर्म का आचरण तो करना ही होता हैं, प्रत्येक व्यक्ति इन दोनों में से ही किसी एक का अनुसरण कर रहा है। परन्तु आधिकतर मनुष्य सकाम भाव से कर्म करते है। जब तक निष्काम भाव उत्पन्न नहीं होगा तब तक "कर्म-योग" का आचरण नहीं हो सकता है और तब तक किसी भी मनुष्य का योग सिद्ध नहीं हो सकता है

15/12/2015

श्रीसरस्वती स्तोत्रम्॥

या कुन्देन्दु-तुषारहार-धवला या शुभ्र-वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत-शंकर-प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥१॥

दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण।
भासा कुन्देन्दु-शंखस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ॥२॥

आशासु राशी भवदंगवल्लि भासैव दासीकृत-दुग्धसिन्धुम्।
मन्दस्मितैर्निन्दित-शारदेन्दुं वन्देऽरविन्दासन-सुन्दरि त्वाम् ॥३॥

शारदा शारदाम्बोजवदना वदनाम्बुजे।
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥४॥

सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृ-देवताम्।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः ॥५॥

पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्नः सरस्वती।
प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ॥६॥

शुद्धां ब्रह्मविचारसारपरमा-माद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥७॥

वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले
भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये।
कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महार्हे
विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥८॥

श्वेताब्जपूर्ण-विमलासन-संस्थिते हे
श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे।
उद्यन्मनोज्ञ-सितपंकजमंजुलास्ये
विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥९॥

मातस्त्वदीय-पदपंकज-भक्तियुक्ता
ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय।
ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण
भूवह्नि-वायु-गगनाम्बु-विनिर्मितेन ॥१०॥

मोहान्धकार-भरिते हृदये मदीये
मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे।
स्वीयाखिलावयव-निर्मलसुप्रभाभिः
शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥११॥

ब्रह्मा जगत् सृजति पालयतीन्दिरेशः
शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावैः।
न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे
न स्युः कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षाः ॥१२॥

लक्ष्मिर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तृष्टिः प्रभा धृतिः।
एताभिः पाहि तनुभिरष्टभिर्मां सरस्वती ॥१३॥

सरसवत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः।
वेद-वेदान्त-वेदांग-विद्यास्थानेभ्य एव च ॥१४॥

सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तु ते ॥१५॥

यदक्षर-पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥१६॥
॥इति श्रीसरस्वती स्तोत्रम् संपूर्णं॥
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