09/08/2026
**-प्याला और समुद्र-**
समुद्र का किनारा था। सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। लहरें बार-बार तट को छूकर लौट रही थीं और वातावरण में एक अद्भुत शांति थी।
उसी तट पर एक महान संत धीरे-धीरे टहल रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि एक छोटे से बालक पर पड़ी। बालक रेत पर बैठा जोर-जोर से रो रहा था और उसके हाथ में एक छोटा-सा प्याला था।
संत ने पास जाकर बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और पूछा—
"बेटा, तुम क्यों रो रहे हो?"
बालक ने आँसू पोंछते हुए समुद्र की ओर इशारा किया और बोला—
"मैं इस प्याले में पूरा समुद्र भरना चाहता हूँ, लेकिन समुद्र मेरे प्याले में समाता ही नहीं।"
बालक की बात सुनकर संत अचानक शांत हो गए। उनकी आँखों से भी आँसू बहने लगे।
बालक ने आश्चर्य से पूछा—
"बाबा! आप क्यों रोने लगे? आपका प्याला कहाँ है?"
संत मुस्कुराए और बोले—
"बेटा, आज तुमने मेरी सबसे बड़ी भूल दिखा दी। तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो और मैं अपनी छोटी-सी बुद्धि में पूरे संसार और परमात्मा के ज्ञान को भरने का प्रयास कर रहा हूँ। जब समुद्र तुम्हारे प्याले में नहीं समा सकता, तो अनंत परमात्मा मेरी छोटी बुद्धि में कैसे समा सकते हैं?"
यह सुनते ही बालक ने अपना प्याला समुद्र में फेंक दिया और बोला—
"जब मेरा प्याला समुद्र में नहीं समा सकता, तो मेरा प्याला समुद्र में समा तो सकता है!"
संत स्तब्ध रह गए। वे बालक के चरणों में झुक गए और बोले—
"बेटा, आज तुमने वह सत्य बता दिया, जिसे बड़े-बड़े ज्ञानी जीवनभर खोजते रहते हैं।"
सच ही कहा गया है—कभी-कभी ज्ञान उम्र नहीं, अनुभव और निर्मल हृदय देता है।