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अंतरराष्ट्रीय सनातन परिषद् सनातन धर्म का सत्य
सत्यम शिवम सुंदरम

27/08/2026
🕉️ मयंदी और हनुमान जी की अद्भुत कथालंका युद्ध अपने चरम पर था। श्रीराम और रावण के बीच धर्म-अधर्म का अंतिम संग्राम चल रहा ...
12/08/2026

🕉️ मयंदी और हनुमान जी की अद्भुत कथा
लंका युद्ध अपने चरम पर था। श्रीराम और रावण के बीच धर्म-अधर्म का अंतिम संग्राम चल रहा था। तभी लोककथाओं के अनुसार, रावण की बहन मयंदी ने पाताल लोक में भयंकर साधना करके 60 हजार मकर योद्धाओं को उत्पन्न किया। उसने आदेश दिया—“जाओ और राम की वानर सेना का संहार कर दो।”
मकर योद्धाओं ने रणभूमि में भयंकर उत्पात मचा दिया। वानर सेना संकट में पड़ गई। तभी पवनपुत्र हनुमान जी गर्जना करते हुए युद्धभूमि में उतरे।
उन्होंने कहा—
“रामभक्तों! भय मत करो। जब तक हनुमान जीवित है, प्रभु श्रीराम की सेना का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।”
हनुमान जी ने अकेले ही मकर सेना का सामना किया। उनकी गदा और पराक्रम के सामने हजारों योद्धा धराशायी होने लगे।
अंततः मयंदी स्वयं युद्धभूमि में उतरी। उसने अपनी सारी मायावी शक्तियाँ प्रयोग कीं, लेकिन श्रीराम के नाम के आगे उसकी सारी माया निष्फल हो गई।
पराजित होकर मयंदी ने हनुमान जी के चरणों में सिर झुका दिया और क्षमा माँगी।
हनुमान जी ने कहा—
“अहंकार का अंत निश्चित है, लेकिन जो समय रहते सत्य को स्वीकार कर ले, उस पर कृपा अवश्य होती है।”
मयंदी ने अपना अभिमान त्याग दिया और प्रभु श्रीराम को प्रणाम किया।
यह कथा हमें सिखाती है—सच्ची भक्ति, साहस और प्रभु पर विश्वास हो तो बड़ी से बड़ी शक्ति भी पराजित हो सकती है।
🙏 जय श्रीराम! जय बजरंगबली! 🙏
नोट: मयंदी और 60,000 मकर योद्धाओं वाली कथा को लोक कथा है

**-प्याला और समुद्र-**समुद्र का किनारा था। सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। लहरें बार-बार तट को छूकर लौट रही थी...
09/08/2026

**-प्याला और समुद्र-**
समुद्र का किनारा था। सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। लहरें बार-बार तट को छूकर लौट रही थीं और वातावरण में एक अद्भुत शांति थी।
उसी तट पर एक महान संत धीरे-धीरे टहल रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि एक छोटे से बालक पर पड़ी। बालक रेत पर बैठा जोर-जोर से रो रहा था और उसके हाथ में एक छोटा-सा प्याला था।
संत ने पास जाकर बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और पूछा—
"बेटा, तुम क्यों रो रहे हो?"
बालक ने आँसू पोंछते हुए समुद्र की ओर इशारा किया और बोला—
"मैं इस प्याले में पूरा समुद्र भरना चाहता हूँ, लेकिन समुद्र मेरे प्याले में समाता ही नहीं।"
बालक की बात सुनकर संत अचानक शांत हो गए। उनकी आँखों से भी आँसू बहने लगे।
बालक ने आश्चर्य से पूछा—
"बाबा! आप क्यों रोने लगे? आपका प्याला कहाँ है?"
संत मुस्कुराए और बोले—
"बेटा, आज तुमने मेरी सबसे बड़ी भूल दिखा दी। तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो और मैं अपनी छोटी-सी बुद्धि में पूरे संसार और परमात्मा के ज्ञान को भरने का प्रयास कर रहा हूँ। जब समुद्र तुम्हारे प्याले में नहीं समा सकता, तो अनंत परमात्मा मेरी छोटी बुद्धि में कैसे समा सकते हैं?"
यह सुनते ही बालक ने अपना प्याला समुद्र में फेंक दिया और बोला—
"जब मेरा प्याला समुद्र में नहीं समा सकता, तो मेरा प्याला समुद्र में समा तो सकता है!"
संत स्तब्ध रह गए। वे बालक के चरणों में झुक गए और बोले—
"बेटा, आज तुमने वह सत्य बता दिया, जिसे बड़े-बड़े ज्ञानी जीवनभर खोजते रहते हैं।"
सच ही कहा गया है—कभी-कभी ज्ञान उम्र नहीं, अनुभव और निर्मल हृदय देता है।

30/07/2026

किस बात का प्रोटेस्ट था ये, जिसमे नीट कम हिन्दू और सवर्ण विरोधी ज्यादा लगा, जो भाषा प्रयोग की गई यदि यही भाषा घर मे माँ बाप के सामने भी प्रयोग करते है तो कुछ नहीं कहेंगे महान माँ बाप की महान संतान है, ताजुब इस बात पर है की पढ़े लिखें लोग नीट पर बात हीं नहीं कर रहे उनको आजादी चाहिए,

₹₹ हनुमान जी का समुद्र लाघना ₹₹जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया, तब श्रीराम और लक्ष्मण उनकी खोज में निकल...
27/07/2026

₹₹ हनुमान जी का समुद्र लाघना ₹₹
जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया, तब श्रीराम और लक्ष्मण उनकी खोज में निकले। खोज करते-करते वे सुग्रीव और वानर सेना से मिले। अंततः पता चला कि माता सीता समुद्र के पार लंका में हैं।
समुद्र लगभग 100 योजन चौड़ा था। वानर सेना में कोई भी इतनी दूर छलांग लगाने का साहस नहीं कर पा रहा था। तभी जाम्बवान जी ने हनुमान जी को उनकी भूली हुई शक्ति का स्मरण कराया। बचपन में ऋषियों के शाप के कारण हनुमान जी अपनी शक्तियाँ भूल गए थे, और उन्हें तभी याद आती थीं जब कोई उन्हें स्मरण कराता।
जाम्बवान जी के वचन सुनकर हनुमान जी का उत्साह जाग उठा। उन्होंने श्रीराम का स्मरण किया, "जय श्रीराम" का उद्घोष किया और महेंद्र पर्वत से एक विशाल छलांग लगाकर समुद्र पार करने निकल पड़े।
रास्ते में तीन प्रमुख घटनाएँ हुईं:
मैनाक पर्वत समुद्र से ऊपर आया और बोला, "हे हनुमान! थोड़ा विश्राम कर लो।" लेकिन हनुमान जी ने कहा, "जब तक प्रभु का कार्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक विश्राम नहीं।" उन्होंने मैनाक पर्वत को प्रणाम किया और आगे बढ़ गए।
सुरसा नाम की नागमाता ने उनकी परीक्षा ली। उसने अपना विशाल मुख खोलकर कहा कि पहले मेरे मुख में प्रवेश करो। हनुमान जी ने बुद्धि से काम लिया। वे पहले बहुत बड़े हुए, फिर अचानक बहुत छोटे होकर सुरसा के मुख में प्रवेश करके तुरंत बाहर निकल आए। सुरसा प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देने लगी।
सिंहिका नाम की राक्षसी उड़ते हुए प्राणियों की छाया पकड़कर उन्हें रोक लेती थी। उसने हनुमान जी की छाया पकड़ ली। हनुमान जी ने उससे युद्ध किया और उसका वध करके आगे बढ़ गए।
अंततः हनुमान जी लंका पहुँचे। वहाँ उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता को खोज लिया, श्रीराम की अंगूठी देकर उनका विश्वास दिलाया कि श्रीराम शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराने आएँगे।
इस कथा से मिलने वाली सीख
अपनी शक्ति पर विश्वास रखें।
बड़े लक्ष्य तक पहुँचने के लिए साहस के साथ बुद्धि और धैर्य भी आवश्यक हैं।
प्रभु के कार्य और सच्चे उद्देश्य के सामने आराम और कठिनाइयाँ छोटी हो जाती हैं।
सच्ची भक्ति व्यक्ति को असंभव कार्य करने की शक्ति देती है।

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27/07/2026

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बड़े मंगल कि सभी को बहुत बहुत बधाई
#बढ़ामंगल

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