Ramakrishna Mission Ashrama, Kanpur

Ramakrishna Mission Ashrama, Kanpur Ramakrishna Mission Ashrama, Kanpur, is a branch of the worldwide, well-known Ramakrishna Math and Ramakrishna Mission, with its headquarters at Belur Math

इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को बाहर खींच लाती हैं। मनुष्य ऐसे स्थानों में सुख और आनन्द की खोज कर रहा है, जहाँ वह उन्हें क...
22/04/2026

इन्द्रियाँ मनुष्य की आत्मा को बाहर खींच लाती हैं। मनुष्य ऐसे स्थानों में सुख और आनन्द की खोज कर रहा है, जहाँ वह उन्हें कभी नहीं पा सकता । युगों से हम यह शिक्षा पाते आ रहे हैं कि यह निरर्थक और व्यर्थ है; यहाँ हमें सुख नहीं मिल सकता। परन्तु हम सीख नहीं सकते ! अपने अनुभव के अतिरिक्त और किसी उपाय से हम सीख नहीं सकते। हम प्रयत्न करते हैं और हमें एक धक्का लगता है; फिर भी क्या हम सीखते हैं? नहीं, फिर भी नहीं सीखते । पतिगे जिस प्रकार दीपक की लौ पर टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार हम इन्द्रियों में सुख पाने की आशा से अपने को बार बार झोंकते रहते हैं। पुनः पुनः लौटकर हम फिर से नये उत्साह के साथ लग जाते हैं। बस, इसी प्रकार चलता रहता है और अन्त में लूले-लँगड़े होकर, धोखा खाकर हम मर जाते हैं। और यही माया है !
-स्वामी विवेकानन्द (विवेकानन्द साहित्य, भाग-२, पृष्ठांकन- ७४)

26/10/2025
भारत के दिव्यद्रष्टा ऋषि-मुनियों ने नारियों के भीतर जगत्-प्रसूति का विशेष विकास प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करके ही मुक्तकण्ठ...
19/10/2025

भारत के दिव्यद्रष्टा ऋषि-मुनियों ने नारियों के भीतर जगत्-प्रसूति का विशेष विकास प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करके ही मुक्तकण्ठ से घोषणा की कि नारी बुद्धिरूपा है, शक्तिरूपा है, जगज्जननी की ह्लादिनी, सृजनी और पालनी शक्तियों की जीती-जागती प्रतिमा है। परन्तु इस प्रत्यक्ष अनुभव के सर्वांगसम्पन्न होने में अनेक साधकों की दीर्घकालव्यापी साधना की आवश्यकता हुई थी - इसमें कोई सन्देह नहीं। वैदिक, औपनिषदिक तथा दार्शनिक युगों की नारी-उपासना के साथ बौद्ध एवं तान्त्रिक युगों की नारी उपासना की तुलना करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
-स्वामी सारदानन्द (भारत में शक्तिपूजा-५८)

शरीर पर उनका [स्वामी तुरीयानन्द] असाधारण नियंत्रण था। मधुमेह रोग से कष्ट पाते हुए भी वे आनन्द में रहा करते। प्रायः ही उन...
14/10/2025

शरीर पर उनका [स्वामी तुरीयानन्द] असाधारण नियंत्रण था। मधुमेह रोग से कष्ट पाते हुए भी वे आनन्द में रहा करते। प्रायः ही उनके मुख से सुनने में आता, 'शरीर और उसके दुख एक तरफ रहें, परन्तु मन ! तुम सदा आनन्द में रहो।' वे यह भी कहते, "देह-घर की दण्ड ही, सब काहूको होए । ज्ञानी भोगते ज्ञान से, मूरख भोगते रोए।" ज्ञानी और अज्ञानी के बीच अन्तर इतना ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था, "सुख-दुःख, शीत-उष्ण - ये सब 'आगमापायी' हैं आते हैं और चले जाते हैं, चिरकाल नहीं रहते, इसलिए 'तान् तितिक्षस्व' - तुम उन्हें सहन करो।" सहन करने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है। यदि होता, तो श्रीकृष्ण अपने प्रिय भक्त अर्जुन को अवश्य बताते।'
-स्वामी वीरेश्वरानन्द (दिव्य जीवन की झाँकियाँ'५५)

"सुनो। प्रतिदिन खाने के पहले स्थिर होकर मन ही मन एक बार उन्हें पुकारना; ठाकुर का नाम लेकर उनको निवेदन करके, उसके बाद खान...
13/10/2025

"सुनो। प्रतिदिन खाने के पहले स्थिर होकर मन ही मन एक बार उन्हें पुकारना; ठाकुर का नाम लेकर उनको निवेदन करके, उसके बाद खाना। केवल खाना खाने के समय ही नहीं, जो कुछ भी खाओ, उसके पहले उनको पुकार लेना (नाम ले लेना)। और रात को सोते समय यदि जप-ध्यान न कर पाओ तो भी कम से कम एक बार समस्त मन-प्राण से उन्हें प्रणाम कर लेना। इसमें कोई गलती न हो। और यदि थकान न हो तो उस दिन थोड़ा जप कर लेना।"
(स्वामी विज्ञानानन्द प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरण-२०)

यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है। किन्तु इन सब व्यक्त भावों...
12/10/2025

यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है। किन्तु इन सब व्यक्त भावों के पीछे-इन सब विरोधी भावों के पीछे वेदान्त उस एकत्व को ही देखता है। वेदान्त कहता है-बुराई छोड़ो और भलाई भी छोड़ो। ऐसा होने पर फिर शेष क्या रहा ? अच्छे-बुरे के पीछे एक ऐसी वस्तु है, जो वास्तव में तुम्हारी अपनी है, जो वास्तव में तुम्हीं हो, जो सब प्रकार के शुभ और सब प्रकार के अशुभ के अतीत है- और वह वस्तु ही शुभ और अशुभ के रूप से प्रकाशित हो रही है। पहले इसको जान लो, तभी तुम पूर्ण आशावादी हो सकते हो, इसके पूर्व नहीं। ऐसा होने पर ही तुम सब पर विजय प्राप्त कर सकोगे।
-स्वामी विवेकानन्द (विवेकानन्द साहित्य, भाग २, पृष्ठांकन-१३९)

उपनिषदों में कहा है कि ब्रह्मज्ञ पुरुष को अभयपद की प्राप्ति होती है। उत्तरकाशी में एक दिन प्रातःकाल गंगास्नान को जाते हु...
11/10/2025

उपनिषदों में कहा है कि ब्रह्मज्ञ पुरुष को अभयपद की प्राप्ति होती है। उत्तरकाशी में एक दिन प्रातःकाल गंगास्नान को जाते हुए मार्ग में स्वामी तुरीयानन्द ने देखा कि एक बाघ किसी मृतदेह को खा रहा है। त्योंही पुराने संस्कार जाग उठे और उनकी गति रुक गयी। परन्तु दूसरे ही क्षण आत्मज्ञान ने उनसे कहा, "बाघ मृतदेह खा रहा है तो खाता रहे, इससे मैं क्यों भयभीत होऊँ?" और वे पुनः अपनी राह पर बढ़ चले। जब वे टिहरी गढ़वाल में तपस्या कर रहे थे उस समय एक बार रात को गाँव में शोर मचा कि बाघ आया है। त्योंही वे व्यस्त होकर बाघ का रास्ता रोकने के लिए अपने टूटे-फूटे घर के दरवाजे पर जल्दी जल्दी ईटें सजाने लगे। परन्तु क्षणमात्र में ही देहबुद्धि को दबाती हुई आत्मबुद्धि प्रकट हुई और उन्होंने पैर से ठोकर मारकर ईटों के ढेर को गिरा दिया तथा ध्यान में डूब गये।
-स्वामी गम्भीरानन्द (श्रीरामकृष्ण भक्तमालिका, भाग १, पृष्ठांकन-३०९)

परन्तु अहंकार फिर भी बना ही रहता है। हमें यह अनुभव नहीं होता कि ईश्वर ही कर्ता हैं, हम नहीं। ईश्वर ही हमारे मन और देह का...
10/10/2025

परन्तु अहंकार फिर भी बना ही रहता है। हमें यह अनुभव नहीं होता कि ईश्वर ही कर्ता हैं, हम नहीं। ईश्वर ही हमारे मन और देह का नियन्त्रण कर रहे हैं, यह हम अनुभव नहीं कर पाते। जब पूजा की भावना में तीव्रता आती है, तब आत्म-विस्मृति होती है। और तब हमारा अहं ईश्वरीय चेतना में समाहित हो जाता है। ईश्वर हमारे जन-जीवन और संसार को परिव्याप्त कर लेते हैं। ऐसी अवस्था में हम अनुभव करते हैं कि सब कुछ ईश्वर की लीला है, उनका दैवी खेल है, हम उनके साथ एकरूप हैं तथा उनकी लीला में सहभागी हैं। यह तृतीय सोपान है। महान् सन्तों और महापुरुषों ने इस अवस्था की अनुभूति की है। उनके विचार और कार्य अब उनके नहीं होते, वरन् स्वयं ईश्वर के होते हैं।
-स्वामी अशोकानन्द (साधना और सिद्धि-९१)

दूसरा सोपान है, कर्म को पूजा की भावना से करना। अब तक हमारे भीतर ईश्वर के अस्तित्व की धारणा ऐसी दृढ़ हो गयी है कि हम क्षण...
09/10/2025

दूसरा सोपान है, कर्म को पूजा की भावना से करना। अब तक हमारे भीतर ईश्वर के अस्तित्व की धारणा ऐसी दृढ़ हो गयी है कि हम क्षणमात्र के लिए भी उससे अलग नहीं रहना चाहते। हम चाहते हैं कि जीवन का हर क्षण उसकी पूजा में व्यतीत हो। पर जब तक हम उससे प्रार्थना करते हैं, उसका नाम-जप करते हैं, उसका ध्यान करते हैं, भजन-संकीर्तन करते हैं, अथवा ईश्वर सम्बन्धी ग्रन्थों का पाठ करते हैं या पूजाघर में उसकी उपासना करते हैं, तब तक तो यह सहज है, पर दूसरे अन्य समय हम इस प्रकार सचेतन रूप से ईश्वर के साथ सम्बन्धित नहीं हो पाते, विशेषकर जब हमें अपनी जीविका के लिए अथवा सामाजिक दायित्व निभाने के लिए कार्यरत होना पड़ता है। ऐसे समय भी हमें इन तथाकथित लौकिक कार्यों को पूजा की भावना से करने का प्रयास करना चाहिए। और तब हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण पूजा बन जाता है। यहाँ पर भी अवश्य हम सभी कुछ ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं। वास्तव में इस प्रकार समर्पण की भावना ही समस्त पूजा का सार है। हम अनासक्त होने की कोशिश करते हैं, पर पूजा की भावना इसे और भी मधुर और स्वाभाविक बना देती है।
-स्वामी अशोकानन्द (साधना और सिद्धि, पृष्ठांकन ९९-९१)

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