Ram Janki Ashram

Ram Janki Ashram Here you can see one and only 1 Anandeswar mahadev made of spatick, Ekadash muki hanuman ji having 11 heads.

27/01/2020

*अवश्य पढ़ें*
अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती
🙏जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले... तो काल आया और जैसे ही काल आया ...
तो गीधराज जटायु ने मौत को ललकार कहा, --

"खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना... मैं मृत्यु को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकता... जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु "श्रीराम" को नहीं सुना देता...!

मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...
मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला।
किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे... आँखों में आँसू हैं ... रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...!
कितना अलौकिक है यह दृश्य ... रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं...
प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं...
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?
अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली....!
जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है....
प्रभु "श्रीराम" की शरण में..... और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं....
ऐसा अंतर क्यों?...
ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था...विरोध नहीं कर पाये थे ...!
दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते... लेकिन द्रौपदी रोती रही... बिलखती रही... चीखती रही... चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... नारी की रक्षा नहीं कर पाये...!
उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और ....
जटायु ने नारी का सम्मान किया...
अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...!
जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति भीष्म जैसी होती है ...
जो अपना परिणाम जानते हुए भी...औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है।
*🙏 गलत का विरोध जरूर करना चाहिए। "सत्य परेशान जरूर होता है, पर पराजित नही"।*🙏🇮🇳

26/01/2020
22/01/2020

पवनपुत्र हनुमान भगवान श्रीराम के परम भक्त हैं। वे स्वयं शास्त्रों के महान ज्ञाता और ज्ञानी हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि हनुमानजी ने स्वयं रामायण क्यों नहीं लिखी? श्रीराम की भक्ति से उनको अनेक सिद्धियां प्राप्त थीं। किसी ग्रंथ की रचना करना उनके लिए मुश्किल कार्य नहीं था।

यूं तो श्रीराम पर अनेक रामायण लिखी गई हैं, परंतु इनमें 2 सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं। एक वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और दूसरी तुलसीकृत रामचरित मानस। कहा जाता है कि सबसे पहले हनुमानजी ने ही रामायण लिखी थी लेकिन बाद में उन्होंने वह समुद्र में प्रवाहित कर दी थी। उन्होंने ऐसा क्यों किया? पढ़िए यह कथा..

हनुमानजी ने भगवान राम को समर्पित वह रामायण चट्टान पर लिखी थी। उन्होंने लेखनी के लिए अपने नाखूनों का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह कथा वाल्मीकि से भी पहले लिखी थी। इसका नाम हनुमद रामायण था।

जब श्रीराम ने रावण सहित अनेक राक्षसों का अंत कर दिया और वे पुनः अयोध्या आ गए तब हनुमानजी हिमालय पर चले गए। वहां वे अपने नाखूनों से रामकथा रचते थे।

इधर वाल्मीकि भी अपना ग्रंथ पूरा कर चुके थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि ये ग्रंथ भगवान शिव को अर्पित किया जाए। शिव को यह ग्रंथ भेंट करने के लिए वे कैलास पर्वत गए। वहां उन्होंने हनुमानजी द्वारा रची हुई रामायण देखी।

वाल्मीकि महान कवि थे लेकिन हनुमानजी की रचना देखकर तो वे भी चकित रह गए। एक योद्धा ऐसी सुंदर रचना कर सकता है, यह वाल्मीकि के लिए बहुत आश्चर्य की बात थी। उन्होंने हनुमानजी के काव्य की प्रशंसा की और बोले, आपकी रचना के सामने तो मेरा लेखन कुछ भी नहीं है।

यह सुनकर हनुमानजी ने सोचा, वाल्मीकि कवि हैं और श्रीराम के भक्त भी। उनका काव्य मेरी रचना जैसा सुंदर नहीं है तो क्या हुआ, उसमें है तो भगवान श्रीराम की महिमा! इसलिए मुझे ऐसा कार्य करना चाहिए कि उनकी रचना ही संसार में प्रसिद्ध हो।

इसके बाद हनुमानजी ने रामायण लिखी हुई वह शिला उठाई और उसे समुद्र में विसर्जित कर दी। इस प्रकार हनुमानजी द्वारा लिखी गई वह रामायण हमेशा के लिए सागर में समा गई।

वाल्मीकि के लिए हनुमानजी इतना बड़ा त्याग करेंगे, यह उन्होंने कभी सोचा नहीं था। वे हनुमानजी को प्रणाम कर बोले, हे रामदूत हनुमान, आप धन्य हैं। धन्य है आपका त्याग और रामभक्ति।

मैं आपके सामने नतमस्तक हूं और यह वचन देता हूं कि कलियुग में रामायण की रचना के लिए एक जन्म और लूंगा। कहते हैं कि वाल्मीकि की वह इच्छा श्रीराम ने पूर्ण की और वे कलियुग में तुलसीदास बनकर आए।

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