Baba kailash pati shiwala kanpur

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21/01/2024
जय सियाराम
20/01/2024

जय सियाराम

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा
08/09/2023

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा

30/08/2023

#रक्षा_बन्धन का मूल नाम #श्रावणी_उपाकर्म, #ऋषि_तर्पण, #वेद_स्वाध्याय #यज्ञोपवीत_धारण_पर्व है।

१) #श्रावणी_उपाकर्म - " #श्रावण" शब्द का अर्थ सुनना और श्रावणी जिसका अर्थ होता है सुनाये जाने वाली। क्या सुनाये जाने वाली? जिसमें वेदों की वाणी को सुना जाये। वह "श्रावणी" कहाती है। अर्थात् जिसमें निरन्तर वेदों का श्रवण और स्वाध्याय और प्रवचन होता रहे। वह श्रावणी है।इस लिए इस महीने का नाम ही श्रवण मास / सावन मास है।

२) " #उपाकर्म" जिसमें ईश्वर और वेद के समीप ले जाने वाले यज्ञ कर्मादि श्रेष्ठ कार्य किये जायें वह "उपाकर्म" कहाता है। यह समय धर्म पुस्तकें पढ़ने का उपकरण था। जनता को ऋषि-मुनियों, समाज के विद्वानों के समीप ले आना।

३) #ऋषि_तर्पण - जिस कर्म के द्वारा ऋषि मुनियों का और आचार्य, पुरोहित, पंडित जो विशेषकर वेदों के विद्वान है उनका तर्पण किया जाता है उन्हें यथेष्ट दान देना अर्थात् उनके वचनों को सुनकर उनका सम्मान करना ही "ऋषि-तर्पण" कहाता है।

४) #वेद_स्वाध्याय_पर्व - स्वाध्याय (वेदों को पढ़ना )भारत की संस्कृति का प्रधान अंग है।

श्रावण माह में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यासी, ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र सभी को वेदों का स्वाध्याय में लगने का आदेश है।

५) #यज्ञोपवीत_धारण_पर्व - इस समय जिन लोगों ने यज्ञोपवीत नहीं धारण किया हुआ है, उन्हें नया यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए। अर्थात इस बात का संकल्प करना चाहिए कि वे अज्ञान, अंधकार से बाहर निकलेंगे और और ज्ञानवान होकर परिवार, समाज, राष्ट्र को प्रकाशित करेंगे। जिन लोगों ने यज्ञोपवीत धारण किया हुआ है, उन्हें पुराने यज्ञोपवीत को उतारकर नया धारण करना चाहिए। अर्थात् इस बात का संकल्प करना चाहिए कि वह अपने जीवन में स्वाध्याय और यज्ञ को कभी नहीं छोडेंगे। विशेषकर यज्ञोपवीत में तीन धागे होते है वे तीन ऋणों के प्रतीक है। ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृ ऋण। मनुष्य को इन तीनों ऋणों का बोध हो और अपना कर्तव्य निभाता रहे यही उद्देश्य है।

६) #रक्षाबन्धन - रक्षाबंधन का पर्व भारत की संस्कृति से जुड़ा पर्व है। राजपूत काल में अबलाओं द्वारा अपनी रक्षा के लिए वीरों के हाथ में राखी बांधने की परिपाटी का प्रचार हुआ। जिस किसी वीर क्षत्रियों को कोई अबाला राखी भेजकर अपना राखी बंद भाई बना लेती थी वो उसकी रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता था। इतिहास

30/08/2023
पञ्चाङ्ग की उपयोगिता~~~~~~~~~~~भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है जिसका सम्बंध राजा विक्रमादित्य के शासन काल से है। ये...
19/08/2023

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता
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भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है जिसका सम्बंध राजा विक्रमादित्य के शासन काल से है। ये कैलेंडर विक्रमादित्य के शासनकाल में जारी हुआ था। इसी कारण इसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। पंचाग पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं:-

1👉 तिथि (Tithi) 2:- वार (Day) 3:- नक्षत्र (Nakshatra) 4:- योग (Yog) 5:- करण (Karan)
पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग का श्रवण करते थे ।

👉 शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।

👉 वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।

👉 नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।

👉 योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।

👉 करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।

इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना और बोल कर पढ़ना चाहिए।
चन्द्रमा की एक कला को एक तिथि माना जाता है जो उन्नीस घंटे से 24 घंटे तक की होती है । अमावस्या के बाद प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियों को शुक्लपक्ष और पूर्णिमा से अमावस्या तक की तिथियों को कृष्ण पक्ष कहते हैं।

तिथियाँ इस प्रकार होती है :
1. प्रतिपदा, 2. द्वितीय , 3. तृतीया, 4. चतुर्थी, 5. पँचमी, 6. षष्टी, 7. सप्तमी, 8. अष्टमी, 9. नवमी, 10. दशमी, 11. एकादशी, 12. द्वादशी, 13. त्रियोदशी, 14. चतुर्दशी, 15. पूर्णिमा एवं 30. अमावस्या

तिथियों के प्रकार : – 1-6-11 नंदा, 2-7-12 भद्रा, 3-8-13 जया, 4-9-14 रिक्ता और 5-10-15 पूर्णा तथा 4-6-8-9-12-14 तिथियाँ पक्षरंध्र संज्ञक हैं ।

मुख्य रूप से तिथियाँ 5 प्रकार की होती है ।

👉 नन्दा तिथियाँ – दोनों पक्षों की 1 , 6 और 11 तिथि अर्थात प्रतिपदा, षष्ठी व एकादशी तिथियाँ नन्दा तिथि कहलाती हैं । इन तिथियों में अंतिम प्रथम घटी या अंतिम 24 मिनट को छोड़कर सभी मंगल कार्यों को करना शुभ माना जाता है ।

👉 भद्रा तिथियाँ – दोनों पक्षों की 2, 7, और 12 तिथि अर्थात द्वितीया, सप्तमी व द्वादशी तिथियाँ भद्रा तिथि कहलाती है । इन में कोई भी शुभ, मांगलिक कार्य नहीं किये जाते है लेकिन यह तिथियाँ मुक़दमे, चुनाव , शल्य चिकित्सा सम्बन्धी कार्यो के लिए अच्छी मानी जाती है और

श्री गंगा जल कलश यात्रा
07/08/2023

श्री गंगा जल कलश यात्रा

*वनखंडेश्वर महादेव मंदिर*, जहां हुआ था रानी लक्ष्मीबाई का कर्णछेदन संस्कार और झांसी में भी बनवाया था ऐसा ही मंदिरकानपुर ...
05/08/2023

*वनखंडेश्वर महादेव मंदिर*, जहां हुआ था रानी लक्ष्मीबाई का कर्णछेदन संस्कार और झांसी में भी बनवाया था ऐसा ही मंदिर
कानपुर में बिठूर के पास ही मंधना के बगदौधी बांगर गांव में वनखंडेश्वर महादेव मंदिर स्थापित हैं यहां एक साथ दो शिवलिंग हैं। इसी मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई का कर्णछेदन संस्कार हुआ था और उन्होंने फिर ऐसा ही मंदिर झांसी में भी बनवाया |

वनखंडेश्वर महादेव मंदिर मंधना बिठूर रोड पर स्थित है। श्रावण मास में यहां कई जिलों से भक्त आते हैं। वर्ष 1830 में मराठा बाजीराव पेशवा ने इस प्रसिद्ध मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। यह प्राचीन मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। पवित्र श्रावण मास में यहां पर भक्तों का सैलाब उमड़ता है।

*मंदिर का इतिहास* : मंधना के बगदौधी बांगर गांव में स्थित वनखंडेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास कई सौ साल पुराना है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग खोदाई के दौरान मिला था। मान्यता है कि इस स्थान पर पहले घना जंगल था। जहां पर गाय चरने के लिए आती थी और शिवलिंग वाले स्थान पर अपना दूध गिरा देती थी। जब गोपालक ने इस स्थान पर खोदाई की तो एक शिवलिंग मिला।

घने जंगल में शिवलिंग मिलने के कारण इस मंदिर का नाम वनखंडेश्वर महादेव मंदिर पड़ा। इसी प्राचीन मंदिर में रानी लक्ष्मीबाई का कर्णछेदन संस्कार हुआ था। विवाह के उपरांत रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में भी बिल्कुल ऐसे ही मंदिर की स्थापना कराई थी। मंदिर में आज भी बेलपत्र के कई पेड़ लगे हैं।

मंदिर की विशेषता : लगभग 300 वर्ष पुराने मंदिर में दो शिवलिंग के अलावा नंदी, गणेश जी, बजरंगबली, मां काली की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में सोमवार के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन को पहुंचते हैं। श्रावण मास में यहां भक्तों को कोई दिक्कत न हो इसलिए व्यापक प्रबंध किए जाते हैं। यहां दिन भर आचार्यों द्वारा रुद्राभिषेक भी कराया जाता है। दिन में दो बार आरती और महादेव का अभिषेक किया जाता है।

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