Maa Phoolmati Devi Mandir

Maa Phoolmati Devi Mandir महाराजा वेणुचक्र की सात पुत्रियों मे? This page is about the temple of Maa Phoolmati Devi situated in Kannauj.

नवरात्रि की शुभकामनाएं 🙏देवी माँ कृपादृष्टि बनायें रखें
25/09/2023

नवरात्रि की शुभकामनाएं 🙏
देवी माँ कृपादृष्टि बनायें रखें

27/10/2022
10/04/2022
14/01/2021

एक संक्रांति वह भी थी.... सन १७६१ तारीख़ १४ जनवरी...पानीपत का तृतीय युध्द..!

अगर मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ, सिंध और पंजाब पर दावा छोड़ने की शर्त स्वीकार कर लेते तो पानीपत का युद्ध भी नहीं होता ।

पानीपत के तीसरे युद्ध की रणभूमि सजी हुई थी । दोनों तरफ से सुलह की शर्तों के लिए ख़लीते लिखे जा रहे थे । तोल-मोल जारी था लेकिन मराठों को सुलह की जरूरत ज्यादा थी क्योंकि उनकी रसद अब्दाली ने काट दी थी... पानीपत के पेड़ों के छालें भी मराठों ने उतार ली थी क्योंकि खाने के लिए अनाज नहीं बचा था ।

जिन घोड़ों पर बैठकर मराठों को जंग लड़नी थी उन घोड़ों को सूखी घास भी नहीं मिल रही थी... जिन्हें सवारों को सँभालना था वो खुद ही फिसल रहे थे । दूसरी तरफ अब्दाली के खेमे में जश्न का आलम था । अवध के नवाब शुजाउद्दौला और रुहेलखंड के नवाब नजीबुद्दौला, अहमद शाह अब्दाली के साथ दस्तरख़ान में मुर्गियों की टांगे उड़ा रहे थे । रसद की कोई कमी नहीं थी क्योंकि शुजाउद्दौला के अवध से बोरियाँ भर भर कर अनाज अब्दाली के ख़ेमे में पहुंच रहा था ।

नजीबुद्दौला तो खुला ग़द्दार था । ग़द्दार कहना भी उचित नहीं... दुश्मन था । ग़द्दार तो शुजाउद्दौला था वो शिया मुसल$मान था उसके पिता सफ़दर जंग मुगल बादशाह के वज़ीर थे । लेकिन शिया होने की वजह से उसकी प्रताड़ना होती थी । आखिर अपने बीवी बच्चों के साथ उसको दिल्ली छोड़नी पड़ी ।अवध को उसने अपना ठिकाना बनाया । पेशवा बाजीराव के सेनापति मल्हार राव होलकर की बाज़ुओं के दम पर वो मुगलों को आँखें दिखाता था । पेशवा का भी हाथ सफदरजंग के सिर पर था ।

पेशवा तो गुज़र गए लेकिन कुछ सालों के बाद जब अब्दाली ने भारत पर हमला किया तो पेशवा बाजीराव के बेटे शमशेर बहादुर ने नवाब शुजाउद्दौला को चिट्ठी लिखी.. पुराने अहसानों की याद दिलाई । लेकिन सब बेकार गया क्योंकि ला इलाहा इलल्ला का रिश्ता अब्दाली के साथ था.. मराठों के साथ नहीं ।

पानीपत के उस रेगिस्तान में भाऊ पर लाखों लोगों के जीवन को पालने की ज़िम्मेदारी थी । हजारों की संख्या में महिलाएँ थीं.. हजारों व्यापारी, दुकानदार थे और फौज भी साथ में थी । इसके अलावा वो लाखों पशु भी थे जिनके दाना पानी का इंतज़ाम करना भी भाऊ की ज़िम्मेदारी थी ।

संधि हो जाती तो भाऊ इस आफ़त से निकल जाते लेकिन नजीबुद्दौला संधि में सबसे बड़ा संकट था ! अब्दाली भारत के वीरों की तलवारों का इतिहास जानता था वो बीच का रास्ता निकालना चाहता था । उसने बड़ी उम्मीदों से भाऊ को खलीता भेजा कि आप हमें पंजाब और सिंध का पूरा इलाक़ा दे दें झगड़ा खत्म !!

भाऊ मुसीबतों में घिरे थे । उन पर दबाव बहुत ज्यादा था लेकिन ये फैसला लेना आसान नहीं था । क्योंकि ये साधारण युद्ध नहीं था ये भारत की सीमाएँ तय करने वाला युद्ध था । अगर एक हिंदू राजा ही पंजाब और सिंध अब्दाली को सौंप देता तो भविष्य में पंजाब और सिंध पर हिंदुओं का कभी दावा ही नहीं रहता । आखिरकार भाऊ ने अब्दाली की ये शर्त अस्वीकार कर दी ।

इसके बाद घनघोर युद्ध हुआ । महाराष्ट्र का ऐसा कोई घर नहीं था जहां से कोई ना कोई बलिदान नहीं हुआ हो । भयंकर रक्तपात और हिंदुओं का नरसंहार हुआ... जंग जीतने के बाद भी अब्दाली सावधान था उसने अपने वज़ीर शाह वली से पूछा.. मराठे रात में दोबारा हमला तो नहीं कर देंगे.. शाह वली ने कहा.. हुज़ूर सारा दक्खिन फ़ना हो गया.. अब कौन बाकी है जो हमला करेगा ।

पानीपत की ये तीसरी लड़ाई अब्दाली जीत कर भी हार गया... उसने वापस अफ़ग़ानिस्तान का रुख़ किया और फिर कभी हिंदुस्तान की तरफ़ नहीं आया .... एक साल के अंदर ही मराठों ने उत्तर भारत में फिर अपना राज्य क़ायम किया... अब्दाली को हिंदुस्तान लाने वाले नजीब खान रोहिला का नामोनिशान महादजी सिंधिया ने ख़त्म किया ...होलकर और सिंधिया की सेनाओं ने दिल्ली पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया... 1772 से दिल्ली के लाल क़िले पर मराठों का झण्डा फहराने लगा और सन 1803 तक फहराता रहा...!

पानीपत के तृतीय युध्द में बलिदान देकर स्वराज्य की रक्षा करने वाले सभी हुतात्मा वीर मराठा सैनिकों को शत शत नमन पहुँचे...🙏👏🚩

05/12/2020

सीखिए रामचन्द्र जी से ....

22/11/2020
क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वाप...
17/11/2020

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ?

इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है की हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है।

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं।

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था उस स्थिति में महाराणा ने #गुरिल्ला_युद्ध की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया महराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे।

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी बस फिर क्या था महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया है।

बात सन १५८२ की है विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे. कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलेखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलों को भयभीत करने के लिए बहुत थी बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए।

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा उसका सर काट दिया जायेगा इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी।

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलों में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।

#पोस्ट_को_शेयर_जरूर_करें

12/11/2020

Celebrate Diwali 🪔
It's our festival 🎉🎉

27/10/2020

Dear Tanishq! This is for you ..... 😡😡😡😡

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