Hanuman Mandir Sirpur-Kagaznagar

Hanuman Mandir  Sirpur-Kagaznagar Telangana state ke sirpur-kagaznagar Namak gauo me subse purana aur prachin hanuman Mandir hai.iss Mandir me 2006 me HanumanJi ne aapna bal swarup Dharn Ki

27/03/2026

#त्रिपुरसुंदरी ललिता चालीसा।।
इसका नित्य एक पाठ करने मात्र से धन की समस्या दूर होने लगती हैं और तो और शत्रुबाधा कम होती है कार्यों में अनुकूलता मिल कर इच्छाये पूरी होने लगती हैं। इसे कोई भी स्त्री या पुरुष दिन या रात में कर सकता है, गुरुदेव और गणपति को स्मरण करें और नित्य पाठ करें। अधिक परेशानी में 21 बार 21 दिन करेंगे। 11सुबह और 11 शाम को कर सकते हैं।

🪷श्रीललिता चालीसा प्रारम्भ:-🪔
जयति जयति जय ललिते माता।
तव गुण महिमा है विख्याता ॥ १ ॥
तू सुन्दरि, त्रिपुरेश्वरी देवी।
सुर नर मुनि तेरे पद सेवी ॥ २ ॥

तू कल्याणी कष्ट निवारिणी।
तू सुख दायिनी, विपदा हारिणी ॥ ३ ॥
मोह विनाशिनी दैत्य नाशिनी।
भक्त भाविनी ज्योति प्रकाशिनी ॥ ४ ॥

आदि शक्ति श्री विद्या रूपा।
चक्र स्वामिनी देह अनूपा ॥ ५ ॥
हृदय निवासिनी भक्त तारिणी।
नाना कष्ट विपति दल हारिणी ॥ ६ ॥

दश विद्या है रूप तुम्हारा।
श्री चन्द्रेश्वरि! नैमिष प्यारा ॥ ७ ॥
धूमा, बगला, भैरवी, तारा।
भुवनेश्वरी, कमला, विस्तारा ॥ ८ ॥

षोडशी, छिन्नमस्ता, मातंगी।
ललिते! शक्ति तुम्हारी संगी ॥ ९ ॥
ललिते तुम हो ज्योतित भाला।
भक्त जनों का काम संभाला ॥ १० ॥

भारी संकट जब-जब आये।
उनसे तुमने भक्त बचाये ॥ ११ ॥
जिसने कृपा तुम्हारी पाई।
उसकी सब विधि से बन आई ॥ १२ ॥

संकट दूर करो माँ भारी।
भक्त जनों को आस तुम्हारी ॥ १३ ॥
त्रिपुरेश्वरी, शैलजा, भवानी।
जय जय जय शिव की महारानी ॥ १४ ॥

योग सिद्धि पावें सब योगी।
भोगें भोग, महा सुख भोगी ॥ १५ ॥
कृपा तुम्हारी पाके माता।
जीवन सुखमय है बन जाता ॥ १६ ॥

दुखियों को तुमने अपनाया।
महामूढ़ जो शरण न आया ॥ १७ ॥
तुमने जिसकी ओर निहारा।
मिली उसे सम्पत्ति, सुख सारा ॥ १८ ॥

आदि शक्ति जय त्रिपुर-प्यारी।
महाशक्ति जय जय, भयहारी ॥ १९ ॥
कुल योगिनी, कुण्डलिनी रूपा।
लीला ललिते करें अनूपा ॥ २० ॥

महा-महेश्वरी, महा शक्ति दे।
त्रिपुर-सुन्दरी सदा भक्ति दे ॥ २१ ॥
महा महानन्दे, कल्याणी।
मूकं को देती हो वाणी ॥ २२ ॥

इच्छा-ज्ञान-क्रिया का भागी।
होता तब सेवा अनुरागी ॥ २३ ॥
जो ललिते तेरा गुण गावे।
उसे न कोई कष्ट सतावे ॥ २४ ॥

सर्व मंगले ज्वाला-मालिनी।
तुम हो सर्व शक्ति संचालिनी ॥ २५ ॥
आया माँ जो शरण तुम्हारी।
विपदा हरी उसी की सारी ॥ २६ ॥

नामा-कर्षिणी, चित्ता-कर्षिणी।
सर्व-मोहिनी सब सुख-वर्षिणी ॥ २७ ॥
महिमा तब सब जग विख्याता।
तुम हो दयामयी जगमाता ॥ २८ ॥

सब सौभाग्य-दायिनी ललिता।
तुम हो सुखदा करुणा कलिता ॥ २९ ॥
आनन्द, सुख, सम्पत्ति देती हो।
कष्ट भयानक हर लेती हो ॥ ३० ॥

मन से जो जन तुमको ध्यावे।
वह तुरन्त मनवांछित पावे ॥ ३१ ॥
लक्ष्मी, दुर्गा, तुम हो काली।
तुम्हीं शारदा चक्र-कपाली ॥ ३२ ॥

मूलाधार निवासिनी जय जय।
सहस्त्रार गामिनी माँ जय जय ॥ ३३ ॥
छ: चक्रों को भेदने वाली।
करती हो सबकी रखवाली ॥ ३४ ॥

योगी भोगी क्रोधी कामी।
सब हैं सेवक सब अनुगामी ॥ ३५ ॥
सबको पार लगाती हो माँ।
सब पर दया दिखाती हो माँ ॥ ३६ ॥

हेमावती, उमा, ब्रह्माणी।
भण्डासुर का, हृदय विदारिणी ॥ ३७ ॥
सर्व विपत्ति हर, सर्वाधारे।
तुमने कुटिल कुपंथी तारे ॥ ३८ ॥

चन्द्र-धारणी, नैमिषवासिनी।
कृपा करो ललिते अघनाशिनी ॥ ३९ ॥
भक्त जनों को दरस दिखाओ।
संशय भय सब शीघ्र मिटाओ ॥ ४० ॥

जो कोई पढ़े ललिता चालीसा।
होवे सुख आनन्द अधीसा ॥ ४१ ॥
जिस पर कोई संकट आवे।
पाठ करे संकट मिट जावे ॥ ४२ ॥

ध्यान लगा पढ़े इक्कीस बारा।
पूर्ण मनोरथ होवे सारा ॥ ४३ ॥
पुत्र-हीन सन्तति सुख पावे।
निर्धन धनी बने गुण गावे ॥ ४४ ॥

इस विधि पाठ करे जो कोई।
दुःख बन्धन छूटे सुख होई ॥ ४५ ॥
जितेन्द्र चन्द्र भारतीय बतावें।
पढ़ें चालीसा तो सुख पावें ॥ ४६ ॥

सबसे लघु उपाय यह जानो।
सिद्ध होय मन में जो ठानो ॥ ४७ ॥
ललिता करे हृदय में बासा।
सिद्धि देत ललिता चालीसा ॥ ४८ ॥
॥ दोहा ॥
ललिते माँ अब कृपा करो, सिद्ध करो सब काम।
श्रद्धा से सिर नाय कर, करते तुम्हें प्रणाम।।

श्रीराम नवमी कब मनाये शंका समाधान〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️श्रीराम का जन्म मध्याहृव्यापिनी चैत्रशुक्ल नवमी में हुआ था, अतः...
25/03/2026

श्रीराम नवमी कब मनाये शंका समाधान
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श्रीराम का जन्म मध्याहृव्यापिनी चैत्रशुक्ल नवमी में हुआ था, अतः मध्याह्वव्यापिनी चैत्र शुक्ल नवमी के ही दिन 'श्रीरामनवसी व्रत 'करने का विधान है।

अतः पुनर्वसुयुता मध्याहृव्यापिनी नवमी में व्रत का विशेष माहात्म्य है। परन्तु पूनर्वसु नक्षत्र निर्णायक नहीं है।

यथा-

चैत्रशुक्ल नवमी रामनवमी। अस्यां मध्याह्नाव्यापिन्यामुपोषणं कार्यम् ।। पूर्वेद्युरेव मध्याह्नो सत्वे सैव ग्राह्या।।..... शुद्धाया नवय्यां अलाभे मुहूर्तत्रय-न्यूनत्वे वा सर्वैरप्यष्टमी विद्धैवोपोष्येत्याहुः ।। इदं व्रतं नित्यं काम्यं च ।।

(धर्मसिन्धुः)

अर्थात चैत्रशुक्ल नवमी रामनवमी है। इसमें मध्याह्न-व्यापिनी में उपवास करें। नवमी तिथी पहले दिन मध्याह्न-व्यापिनी हो, तो ग्रहण करें। अपरं च दूसरे दिन शुद्ध नवमी (सूर्योदय-व्यापिनी) न मिलने पर अथवा तीन मुहूर्त से न्युन होने पर अष्टमीयुता नवमी को उपवास करें। यह व्रत नित्य और काम्य है।

इस वर्ष 26 मार्च, 2026 ई. को मध्याह्न के समय नवमी आर्द्रा नक्षत्रयुता है। अतः यह व्रत इस वर्ष इसी दिन किया जाएगा। यहाँ पुनर्वसु निर्णायक तत्व नहीं है, एंव 27 मार्च को नवमी मध्याह्नकाल को स्पर्श भी नहीं कर रही। अतएव रामनवमी व्रत 26 मार्च, गुरूवार को ही शास्त्रसम्मत एंव ग्राह्य होगा

दुर्गाष्टमी भी इसी दिन 26 मार्च को ही मनाई जाएगी।
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"होली विशेष"    हिरण्यकश्यप, जिसका पुत्र हैं प्रह्लाद जी, जो भगवान विष्णु का परम भक्त हैं। वहीं हिरण्यकश्यप, भगवान नाराय...
02/03/2026

"होली विशेष"

हिरण्यकश्यप, जिसका पुत्र हैं प्रह्लाद जी, जो भगवान विष्णु का परम भक्त हैं। वहीं हिरण्यकश्यप, भगवान नारायण को अपना घोर शत्रु मानता था। पिता हिरण्यकश्यप के लाख मना करने के बावजूद प्रह्लाद जी विष्णु की भक्ति करते रहे। असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने कई बार अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने की भरपूर कोशिश की, किन्तु भगवान विष्णु जी की कृपा से उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान मिला था कि उसे अग्नि नहीं जला सकती। उसने अपने भाई से कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर अग्नि की चिता पर बैठेगी और उसके हृदय के कांटे को निकाल देगी। वह प्रह्लाद को लेकर चिता पर बैठी भी, पर भगवान विष्णु की ऐसी माया कि होलिका जल गई, जबकि प्रह्लाद को हल्की सी आंच भी नहीं आई। इस प्रकार भगवान ने भक्तराज प्रह्लाद की रक्षा की व होलिका का दहन हो गया। तब से होलिका का दहन किया जाता रहा है।

13/02/2026

शिवजी से संबंधित गायत्रीमंत्र।।
1..ॐ ह्रीं ह्रीं सौं तत्पुरूषाय विदमहे महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।
2..ॐ तत्पुरूषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र
प्रचोदयात्।
3..ॐ सदाशिवाय विदमहे जटाधराय च धीमहि तन्नो
रूद्र प्रचोदयात्
4..ॐ पन्चवक्त्राय विदमहे अतिशुद्बाय धीमहि तन्नो
रूद् प्रचोदयात्
5..ॐ शिवात्माय च विदमहे महोत्तमाय च धीमहि तन्नो
शिव: प्रचोदयात् ।
6..ॐ तम्महेशाय विदमहे वाग्विशुद्धाय च धीमहि तन्नो
शिव: प्रचोदयात्।
7..ॐ तत्पुरूषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो
शंकरप्रचोदयात्।
7..ॐ पन्चवक्त्राय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र
प्रचोदयात्।
8..ॐ तत्पुरूषाय विदमहे सहस्त्राक्षाय महादेवाय
धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्
9..ॐ तन्महेश्वराय विदमहे वाग्वीसुताय धीमहि तन्नो
शिव प्रचोदयात्।
10...ॐ पन्चवक्त्राय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो
शिव प्रचोदयात्।
11...ॐ आदिपुरुषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो
रुद्र प्रचोदयात्।
12. ॐ पशुपाशाय विदमहे विश्व कर्मणे धीमहि तन्नो
जीव:प्रचोदयात्।
13.. ॐ अष्टपादाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र
प्रचोदयात्।
14...ॐ महादेवाय विदमहे महाघोराय धीमहि तन्नो रुद्र
प्रचोदयात्।
15...ॐ महादेवाय विदमहे रुद्रमूर्तये च धीमहि तन्नो शिव
प्रचोदयात्।
16...ॐ शूलहस्ताय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो
ईश: प्रचोदयात्।
17...ॐ पाशुपतये च विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो
शिव:प्रचोदयात्।
18...ॐ कालवर्णाय विदमहे महाकोपाय धीमहि तन्नो
भद्र: प्रचोदयात्।
19...ॐ चण्डकोपाय विदमहे वीरभद्राय धीमहि तन्नो
भद्र: प्रचोदयात्।
20...ॐ ईशपुत्राय विदमहे महातपाय धीमहि तन्नो भद्र
प्रचोदयात्।
21...ॐ तत्पुरूषाय विदमहे विद्यावासाय धीमहि तन्नो
दक्षिणामूर्ति शिव: प्रचोदयात्।
22... ॐ कालकालाय विदमहे कालातीताय धीमहि तन्नो
महाकाल प्रचोदयात्।
23....ॐ वृषभध्वजाय विदमहे मृगहस्ताय धीमहि तन्नो
रुद्र प्रचोदयात्
24...ॐ दिगम्बराय च विदमहे दीर्घ शिश्नाय धीमहि तन्नो
उन्मत रुद्र प्रचोदयात्m
25...ॐ शालुवेशाय विदमहे पक्षीराजाय धीमहि तन्नो
रुद्र प्रचोदयात्।
26....ॐ पक्षीराजाय विदमहे शरभेश्वराय धीमहि तन्नो
रूद्र प्रचोदयात्।
27...ॐ आदि पुरुषाय विदमहे शाम्बशिवाय धीमहि
तन्नो परमात्मा प्रचोदयात्।
28...ॐ चण्ड चण्डाय विदमहे महाचण्डाय धीमहि तन्नो
चण्ड प्रचोदयात्।
29...ॐ ज्ञानमुद्राय च विदमहे तत्वबोधाय धीमहि तन्नो
शंभू प्रचोदयात्।
30....ॐकारायै च विदमहे भवतारायै च धीमहि तन्नो
प्रणव प्रचोदयात्।
31...ॐ सदाशिवाय विदमहे सहस्त्राक्षाय धीमहि तन्नो
साम्बा: प्रचोदयात्।
32...ॐ वृषभध्जाय विदमहे मृगहस्ताय धीमहि तन्नो
महेश्वर प्रचोदयात्।

08/02/2026

बगलामुखी वशीकरण साधना विधि :-

“ #बगलामुखी साधना और सिद्धी” ..एक ऐसी साधना जिससे किसी भी तरह के मनवांछित फल की प्राप्ति होती है | इस साधना को सिद्ध करने के बाद उपासक अपनी अभिष्ट सिद्धि को प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है | कई विद्वानों के अनुसार किसी भी साधक के अभिलाषा की पूर्णता हेतु यह साधना अन्य किसी साधना से सर्वोपरी है | मनवांछित संतान की प्राप्ति, धन की प्राप्ति, बंदीगृह (कारागार) से मुक्ति, किसी को भी वश में करना, किसी भी बैरी(दुश्मन) पर विजय, मारण, आकर्षण इत्यादि प्रयोगों के लिए इस साधना को अपनाया जाता है | अगर, आप भी इसी तरह की कुछ इच्छा रखते हैं तो इस आर्टिकल के द्वारा सहायता प्राप्त करें | यहां पर आपको जानकारी मिलेगी बगलामुखी साधना और सिद्धि /मंत्र प्रयोग/ शाबर मंत्र साधना/ वशीकरण प्रयोग इत्यादि के विषय में |

बगलामुखी #वशीकरण साधना विधि
बगलामुखी वशीकरण साधना विधि
बगलामुखी साधना और सिद्धी

सामग्री–इस साधना के लिए खुले हुए स्थान का चुनाव ना करें अर्थात आसमान के नीच खुले में साधना ना करें | अगर खुला स्थान हो तो ऊपर से चादर अथवा तिरपाल आदि से चंदोबा (टेंट) तान लें | स्थान की शुद्धता का ध्यान रहे | वस्त्रों के चुनाव में पीले रंग का ध्यान रखें | फूल भी पीले रंग के ही होने चाहिए | जप के लिए माला ले हल्दी की गांठ की बनी हुई | आसन भी पीला रंग का ही लें | भोजन में भी पीले रंग की वस्तुओं का विशेष ध्यान रखें |

मंत्र –” ओम् ह्वीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्वीं ओम् स्वाहा”

विधि– सबसे पहले किसी पाटे/चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछा कर उस पर अष्टदल का कमल बनाएं पीले चावलों द्वारा| यह करने के बाद इसपर मां बगलामुखी की तस्वीर अथवा यंत्र को स्थापित करें | अब पूजन करें षोडसी का | उसके बाद जाप करना प्रारंभ करें | जाप संख्या आप अपने कार्य के अनुसार दस हजार अथवा एक लाख तक रखें | इसे आप ७, ९, ११ या २१ दिनों के भीतर पूरा करें | लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि हर दिन जाप की संख्या को उतना ही रखें जितना संख्या अपने पहले दिन रखी थी, इसमें परिवर्तन कदापि न करे | हवन जाप की संख्या का दशांश, तर्पण हवन की संख्या का दशांश, मार्जन तर्पण की संख्या का दशांश और ब्राह्मण भोजन मार्जन की संख्या का दशांश कराएं | सिद्धि प्राप्त करने हेतु इसी तरह से साधना करें |

बगलामुखी #मंत्र प्रयोग –साधना की सिद्धी हो जाने पर इससे निम्नलिखित प्रयोग किये जा सकते हैं–

* मनवाछिंत संतान की प्राप्ति के लिए हवन करते समय करवीर एवं अशोक के पत्तों द्वारा हवन करें | * धन धन की प्राप्ति के लिए तिल, चावल एवं दूध से बनी हुए खीर से हवन करें |

* गुगल और तिल से हवन यदि हवन किया जाए तो कैदी को जेल से मुक्ति मिलती है |

* सिमर के फलों द्वारा हवन किए जाने पर निश्चय ही शत्रु को पराजित किया जा सकेगा |

* रोग निवारण हेतु कुम्हार के चाक की मिट्टी, चीनी का बुरा (शक्कर), शहद, चार अंगुल की लकड़ियां रेड़ी की, घी और खील लव को मिलाकर हवन करें | विभिन्न प्रकार के सभी रोगों से मुक्ति मिलेगी |

* हवन में अगर सरसों का व्यवहार किया जाए तो वशीकरण प्रभाव पैदा होता है |

* आकर्षण शक्ति बढ़ाने के लिए शक्कर, घी, शहद और नमक के साथ हवन करें |



बगला मुखी साबर मंत्र साधना

मन्त्र–”ओम ह्वलीं ब्रह्मस्त्राये विद्महे स्तंभन बाणाय धीमही तन्नो बगला प्रचोदयात् “

उपरोक्त विधि द्वारा ही अश्विनी नक्षत्र में इस मंत्र को १००० बार जाप कर सिद्ध कर ले |

प्रयोग

* लाभ किसी भी प्रकार के लाभ की प्राप्ति के लिए इस मंत्र का दो हजार बार

जाप करें भरणी नक्षत्र में |

* कृतिका नक्षत्र में जागृत हो जाता है मंत्र अगर २००० बार जाप किया जाए तो |

* कामना पूर्ति के लिए १०० या १००० बार जाप करें रोहिणी नक्षत्र में |

* तीव्र बुद्धि करने के लिए ५००० बार जाप करें मृगशिरा नक्षत्र में |

* किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए आद्रा नक्षत्र में मंत्र जाप करें ६००० बार |

* देवत्व की प्राप्ति होती है पुनर्वसु नक्षत्र में १००० बार जाप करने से |

* ७००० बार पुष्य में जाप करने से भी मंत्र की सिद्धि होती है |

* कामना पूर्ति के लिए अश्लेषा नक्षत्र में ६००० बार जाप करें |

* किसी भी अधिकार की प्राप्ति के लिए १०००० बार जाप करें मघा नक्षत्र में |

* तीनों पूर्वा नक्षत्र में ११००० बार जाप करने से प्राप्ति होती है धन की |

* उत्तरा नक्षत्र में १२००० बार जाप करने से किसी भी प्रकार के कामना की

पुर्ति सम्भव है |

* १३००० बार जाप करें हस्त नक्षत्र में तेजस्वी बनने के लिए|

* दो हजार बार जाप करें चित्रा नक्षत्र में सफलता की प्राप्ति के लिए |

* सौम्यता प्राप्त करने के लिए विशाखा नक्षत्र में जाप करें ४००० बार |

* परिवारिक सुख प्राप्त करने के लिए पूरे समय अनुराधा नक्षत्र में जाप करें |

* २००० बार जाप करें जेष्ठा नक्षत्र में | इससे भी मंत्र की सिद्धि होती है |

* ५००० बार जाप करें मूला नक्षत्र में साधना सफल करने के लिए |

* यशस्वी बनने के लिए २००० बार जाप करें श्रवन नक्षत्र में |

* कार्य सिद्धि के लिए २००० बार जाप करें घनिष्ठा में |

* किसी भी पाप की मुक्ति के लिए सतभिषा नक्षत्र में जाप करें २००० बार |

* अधिकार बढ़ाने के लिए ४ हजार बार जाप करें रेवती में |

* स्तंभन, उच्चाटन, वशीकरण आदि कार्यों की सिद्धि के लिए ८००० बार जाप

करें स्वाति नक्षत्र में |



बगलामुखी वशीकरण प्रयोग

“ ओम बगलामुखी सर्व अमुक (स्त्री/ पुरुष का नाम) हृदय मम् वश्यं कुरु एं ह्वीं स्वाहा” “.. पूरे विधि विधान से इस मंत्र का जाप करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करें

बगलामुखी साधना की पू्र्णता के बाद निम्नलिखित मंत्र द्वारा मां से क्षमा की प्रार्थना भी करें —

“ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ,

पूजा चैद न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी |

मंत्रहीनं क्रिसरहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरी,

यात्यूजितम मायां देवी परिपूर्ण तदस्तु मे |”

ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः
ज्योतिष परामर्श एवं यज्ञ अनुष्ठान केंद्र

हनुमान मन्दिर .
सिरपुर काग़ज़नगर तेलगण
7989217646.
पंडित नारायण शर्म.

काली पंच बाण स्तोत्रमाँ महाकाली के काली पंच बाण स्तोत्र को “काली पंच बाण” के नाम से भी जाना जाता है। जब भी रोजगार संबंधी...
05/02/2026

काली पंच बाण स्तोत्र

माँ महाकाली के काली पंच बाण स्तोत्र को “काली पंच बाण” के नाम से भी जाना जाता है। जब भी रोजगार संबंधी कोई समस्या हो तो काली पंच बाण स्तोत्र का 11 बार सुबह और 11 बार शाम को जाप करें। यह अपने आप में एक सिद्ध मंत्र है इसलिए इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी बड़े भारी विधान की आवश्यकता है।

प्रथम बाण ( माँ काली साधक)

ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ब्याली
चार वीर भैरों चौरासी
बीततो पुजू पान ऐ मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई।

द्वितीय बाण (माँ काली साधक)

ॐ काली कंकाली महाकाली
मुख सुन्दर जिए ज्वाला वीर वीर
भैरू चौरासी बता तो पुजू पान मिठाई।

तृतीय बाण (माँ काली साधक)

ॐ काली कंकाली महाकाली
सकल सुंदरी जीहा बहालो
चार वीर भैरव चौरासी
तदा तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दुहाई।

चतुर्थ बाण (माँ काली साधक)

ॐ काली कंकाली महाकाली
सर्व सुंदरी जिए बहाली
चार वीर भैरू चौरासी
तण तो पुजू पान मिठाई
अब राज बोलो
काली की दुहाई।

पंचम बाण (माँ काली साधक)

ॐ नमः काली कंकाली महाकाली
मख सुन्दर जिए काली
चार वीर भैरू चौरासी
तब राज तो पुजू पान मिठाई
अब बोलो काली की दोहाई।

।। इति श्री काली-पंचम समाप्तं ।।

03/02/2026

श्री ललितासहस्रनामस्तोत्रम्।।
〰️〰️🌼सर्वसौभाग्य एवं ऐश्वर्य दायक श्रीललिता सहस्त्रनाम का पाठ कर धन सम्बंधित समस्याओ से छुटकारा पाये इस पाठ को नित्य संध्याकाल में शुद्ध मन से पाठ करने पर माँ त्रिपुर सुंदरी प्रसन्न होकर धन ऐश्वर्य प्रदान करती है।।

||अथ श्री ललितासहस्रनामस्तोत्रम् ||
〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️
अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमाला मन्त्रस्य वशिन्यादि वाग्देवता ऋषयः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीललितापरमेश्वरी देवता । श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् । मध्यकूटेति शक्तिः । शक्तिकूटेति कीलकम् । श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी प्रसादसिद्धिद्धारा चिन्तित फलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः । लमित्यादिञ्चपूजां कुर्यात् ।

।। ध्यानम् ।।
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सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोफळं बिभ्रतीं
सौम्या रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्पराम्बिकाम् ।।

श्री ललितासहस्रनामस्तोत्रम्
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्रि – कुण्ड – सम्भूता- देवकार्य -समुद्यता ।।

उद्भानु -सहस्राभा -चर्तुबाहू -समन्विता ।
रागस्वरुप –पाशाढ्या- क्रोधाकारांक्कुशोज्ज्वाळा ।।

मनोरुपेक्षु -कोदण्डा -पञ्चतन्मात्र -सायका ।
निजारुण -प्रभापूर -मज्जद्वह्याण्ड -मण्डला ।।

चम्पकाशोक – पुन्नाग – सौगन्धिक –लसत्कचा ।
कुरुविन्द – मणि-श्रेणी – कनत्कोटीर – मण्डिता ।।

अष्टमीचन्द्र – विभ्राज – दलिकस्थल – शोभिता ।
मुखचन्द्र – कलंक्काभ – मृगनाभि – विशेषका ।।

वदनस्मर – माङ्गळ्य – गृहतोरण – चिळ्लिका ।
वक्त्रलक्ष्मी – परिवाह- चलन्मीनाभ – लोचना ।।

नवचम्पक – पुष्पाभ- नासादण्ड – विराजिता ।
ताराकान्ति- तिरस्कारि – नासाभरण-भासुरा ।।

कदम्बमञ्जरी – क्लृप्त-कर्णपूर-मनोहरा ।
ताटङ्क – युगली-भूत – तपनोडुप – मण्डला ।।

पद्य्मरागशिलादर्श – परिभावि – कपोलभूः ।
नवविद्रुम – बिम्बश्री – न्यक्कारि – रदनच्छदा ।।

शुद्धविद्यांकुराकार – द्विजपंक्ति – द्वयोज्ज्वला ।
कर्पूरवीटिकामोद – समाकर्ष-द्विगन्तरा ।।

निज – सळ्लाप – माधुर्य – विनर्भिर्त्सित – कच्छपी ।
मन्दस्मित – प्रभापूर – मज्ज्तकामेश – मानसा ।।

अनाकालित – सादृश्य – चुबुकश्री – विराजिता ।
कामेश – बद्ध-माङ्ग्ल्य-सूत्र-शोभित – कन्धरा ।।

कनकाङ्ग्द – केयूर – कमनीय – भुजानविता ।
रत्नग्रैवेय – चिन्ताक – लोल- मुक्ता- फलान्विता ।।

कामेश्वर – प्रेमरत्न-मणि – प्रतिपण – स्तनी ।
न्याभ्यालवाल – रोमालि – लता-फल-कुचद्वयी ।।

लक्ष्यरोम - लताधारता – समुन्नेय – मध्यमा ।।
स्तनभार – दलन्मध्य – पट्टबन्ध – वलित्रया ।।

अरुणारुणकौसुम्भ – वस्त्र – भास्वत् – कटीतटी ।
रत्न – किङ्किणिका – रम्य – रशना – दाम – भूषिता ।।

कामेश – ज्ञात – सौभाग्य – मार्दुवोरु – द्वयान्विता ।
माण्यिकामुकुटाकार – जानुद्वय – विराजिता ।।

इन्द्रगोप – परिक्षिप्तस्मरणतूनाभ – जंघिका ।
गूढगुळ्फा – कूर्मपृष्ठ- ययिष्णु – प्रपदान्विता ।।

नख – दीधित – संछन्न – नमज्जन – तमोगुणा ।
पदद्वय – प्रभाजाल – पराकृत – सरोरुहा ।।

सिञ्जान – मणिमञ्जीर मण्डित – श्री-पदाम्बुजा ।
मराली-मन्दगमना – महालावण्य – शेवधिः ।।

सर्वारुणाऽनवद्यांगी – सर्वाभरण – भूषिता ।
शिव कामेश्वराङ्कस्था – शिवा स्वाधीन – वल्लभा ।।

सुमेरु – मध्य – शृङ्गत्था – श्रीमन्नगर- नायिका ।
चिन्तामणि गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन – स्थिता ।।

महापद्य्माटवी – संस्था कदम्बवन – वासिनी ।
सुधासागर – मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ।।

देवर्षि- गण- संघात – स्तूयमानात्म – वैभवा ।
भण्डासुर – वधोद्युक्त – शक्तिसेना – समान्विता ।।

सम्पत्करी – समारुढ – सिन्धुर – वज्र – सेविता ।
अश्र्वारुढाधिष्ठिताश्र – कोटि – कोटिभि – रावृता ।।

चक्रराज – रथारुढ – सर्वायुध – परिष्कृता ।
गेयचक्र – रथारुढ – मंत्रिणी – परिसेविता ।।

किरिचक्र – रथारुढ – दण्डनाथा – पुरस्कृता ।
ज्वालामालिनिकाक्षिप्त – मह्निप्राकार – मध्यगा ।।

भण्डसैन्य – वधोयुक्त – शक्ति – विक्रम – हर्षिता ।
नित्या – पराक्रमाटोप – निरीक्षण- समुत्सुका ।।

भण्डपुत्र – वधोद्युक्त – बाला – विक्रम – नन्दिता ।
मन्त्रिण्यम्बा – विरचित – विषङ्ग – वध – तोषिता ।।

विशुक्र – प्राणहरण – वाराही – वीर्य- नन्दिता ।
कामेश्वर – मुखालोक – कल्पित – श्रीगणेश्वरा ।।

महागणेश – निभिन्न – विघ्नयन्त्र – प्रहर्षिता ।
भण्डासुरेन्द्र – निर्मुक्त – शस्त्र – प्रयस्र – वर्षिणी

कराङ्गुलि – नखोत्पन्न – नारायण-दशाकृतिः ।
महा – पाशुपतास्राग्रि-निर्दग्धासुर – सैनिका ।।

कामेश्वरास्र – निर्दग्ध – सभण्डासुर – शून्यका ।
ब्रह्मोपेन्द्र – महेन्द्रादि – देव – संस्तुत – वैभवा ।।

हर- नेत्राग्रि – संदग्ध – काम – सञ्जीवनौषधिः ।
श्रीमद्वाग्भव – कूटैक – स्वरुप – मुख – पंक्कजा ।।

कण्ठाधः – कटि – पर्यन्त – मध्यकूट – स्वरुपिणी ।
शक्तिकूटैकतापन्न – कट्यधोभाग – धारिणी ।।

मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय – कलेवरा ।
कुलामृतैक – रसिका – कुलसंकेत – पालिनी ।।

कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।
अकुला समयान्तरस्था समयाचार – तत्परा ।।

मूलाधारैक – निलया ब्रह्माग्रन्थि – विभेदिनी ।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि विभेदनी ।।

आज्ञाचक्रकान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि – विभेदनी ।
सहस्राम्बुजारुढा सुधासाराभिवर्षिणी ।।

तडिलता समरुचिऋ षट्चक्रोपरि – संस्थिता ।
महाशक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु – तनीयसी ।।

भवानी भावनागम्या भवारण्य – कुठारिका ।
भद्रप्रिया भद्रमूर्ति – भक्त- सौभाग्यदायिनी ।।

भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ।।

शाक्करी श्रीकरी साध्वी शरचन्द्र – निभानना ।
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ।।

निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ।।

नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्जा निराश्रया ।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ।।

निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधि – र्निरीश्वरा ।
नीरागा रागथनी निर्मदा मदनाशिनी ।।

निश्रिन्ता निरहङ्कारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
निमर्मा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ।।

निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाषिनी ।
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाषिनी ।।

निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ।।

निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ।।

दुष्टदूरा दुराचारशमनी दोष-वर्जिता ।
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक – वर्जिता ।।

सर्वशक्तिमयी सर्वमाङ्ग्ला सद्गति – प्रदा ।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र सर्वरुपिणी ।।

सर्व – यन्त्रात्मिका सर्व – तन्त्ररुपा मनोन्मनी ।
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मी – मृडप्रिया ।।

महारुपा महापूज्या महा – पातक-नाशिनी ।
महामाया महासत्वा महाशक्ति – र्मकारतिः ।।

महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।
महाबुद्धि – महासिद्धि – र्महायोगेश्वरेश्वरी ।।

महातन्त्रा – महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।
महायाग – महाक्रमाराध्या – महाभैरव – पूजिता ।

महेश्वर – महाकल्प –महाताण्डव – साक्षिणी ।
महाकामेश – महिषी महारात्रिपुरसुन्दरी ।।

चतुष्टषष्ट्युपचाराढ्या चतुष्टषष्टकलामयी ।
महाचतुःषष्टकोटि –योगिनी – गणसेवीता ।।

मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल मध्यगा ।
चारुरुपा चारुहासा चारुचन्द्र – कलाधरा ।।

चराचर – जगन्नाथा चक्ररात – निकेतना ।
पार्वती पद्य्मनयना पद्य्मराग – समप्रभा ।।

पञ्चप्रेतासनासीना पञ्चब्रब्मस्वरुपिणी ।
चिरमयी परमानन्दा विज्ञानज्ञनस्वरुपिणी ।।

ध्यान – ध्यातृ – ध्येयरुपा धर्माधर्मविवर्जिता ।
विश्वरुपा जागरणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ।।

सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था – विवर्जिता ।
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरुपा गोप्त्री गोविन्दरुपिणी ।।

संहारिणी रुद्ररुपा तिरोधानकरीश्वरी ।
सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्यपरायणा ।।

भानुमण्डल – मध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।
पद्य्मासना भगवती पद्य्मनाभ – सहोदरी ।।

उन्मेष – निमिषोत्पन्न – विपन्न – भुवनावलिः ।
सहस्रशीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ।।

आब्रह्मकीटजननी वर्णाश्रम विधायनी ।
निजाज्ञारुप – निगमा पुण्यापुण्य – फलप्रदा ।।

श्रुति सिमन्त सिन्दुरी – कृत – पादाब्जधूलिका ।
सकलागम सन्दोह – सूक्ति – सम्पुट – मौक्तिका ।।

पुरुषार्थ प्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।
अम्बिकाऽनादि – निधना हरिब्रह्मेनदु सेविता ।।

नारायणी नादरुपा नामरुप – विवर्जिता ।
ह्रीं कारी ह्रीमती ह्रया हेयोपादेय वर्जिता ।।

राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीव लोचना ।
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणी – मेखला ।।

रमा राकेन्दु – वदना रतिरुपा रतिप्रिया ।
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ।।

काम्या कामकलारुपा कदम्ब-कुसुम-प्रिया ।
कल्याणी जगती – कन्दा करुणा रस सागरा ।।

कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरी – प्रिया ।
वरदा वामनयना वारुणी – मद – विह्वला ।।

विश्वाशिका वेदवेद्या विन्ध्याचल – निवासनी ।
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासनी ।।

क्षेत्रस्वरुपा क्षेत्रेशी क्षेत्र – क्षेत्र्यज्ञ – पालिनी ।
क्षयवृद्धि – विर्निमुक्ता क्षेत्रपाल – समर्जिता ।।

विजया विमला वन्ध्या वन्दारु –जन-वत्सला ।
वाग्वादिनी वामकेशी वह्मिमण्डल वासिनी ।।

भक्तिमय कल्पलतिका पशुपाश – विमोचनी ।
संह्रताशेष – पाषण्डा सदाचार – प्रवर्तिका ।।

तापत्रयाग्रि – सन्तप्त – समाह्वदन – चन्द्रिका ।
तरुणी तापसा राध्या तनुमध्या तमोऽपहा ।।

चिति – स्ततपद – लक्ष्यार्थी चिदेकरस – रुपिणी ।
स्वात्मानन्द लयाभूत – ब्रह्माद्यानन्द – सन्तति ।।

परा प्रत्यक चित्तरुपा पश्यन्ती परदेवता ।
मध्यमा वैखरी रुपा भक्तृमानस – हंसिका ।।

कामेश्वर – प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।
श्रृंगार रस- सम्पूर्णा जया जालन्धर स्थिता ।।

ओड्यपाण-पीठ – विलया बिन्दु – माण्डलवासिनी ।
रहायोग – क्रमाराध्या रहस्तपर्ण – तर्पिता ।।

सद्यः प्रसादिनी विश्वसाक्षिणी साक्षिवर्जिता ।
षडङ्गदेवता – युक्ता षाड्गुण्य – परिपूरिता ।।

नित्या – क्लिन्ना निरुपमा निर्वाण सुख दायिनी ।
नित्याषोडशिका – रुपा श्रीकण्ठार्ध – शरीरिणी ।।

प्रभावती प्रभारुपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।
मूलप्रकृति – रव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त – स्वरुपिणी ।।

व्यापिनी विविधाकारा विद्याऽविद्या – स्वरुपिणी ।
महाकामेश नयन-कुमुदाह्वाद – कौमुदी ।।

'भक्त –हार्द – तमो – भेद – मद्भानु संततिः ।
शिवदूती शिवराध्या शिवमूर्तिः शिवक्करि ।।

शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनो-वाचामगोचरा ।।

च्छिछक्ति – श्चेतना – रुपा जडशक्ति – र्जडात्मिका ।
गायत्री – व्याह्रती संध्या द्विजबृन्द – निषेविता ।।

तत्वासना तत्तवमयी पञ्चकोशान्तर – स्थिता ।
निःसीम – महिमा नित्य – यौवना मदशालिनी ।।

मद्घूर्णित रक्ताक्षी मदपाट्ल-गण्डभूः ।
चन्दन – द्रव – दिग्धाङ्की चाम्पेय –कुसुम – प्रिया ।।

कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।
कुलकुण्डलया कौलमार्ग – तत्पर – सेविता ।।

कुमार – गणनाशाम्बा तुष्टिः पुष्टि-र्मति-धृतिः ।
शान्तिः स्वस्तिमयी कान्ति-र्नन्दिनी विघ्ननाशिनी ।।

तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी – कामरुपिणी ।
मालिनी हंसिनी माता मलयाचल – वासिनी ।।

सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।
कालकण्ठी कान्तिमयी क्षोभिणी सूक्ष्मरुपिणी ।।

वज्रेश्वरी वामदेवी वयोवस्था – विवर्जिता ।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्वनी ।।

विशुद्धि – चक्र – निलया - ऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।
खट्वाङ्गदि – प्रहरणा वदवैक – समन्विता ।।

पायसान्न प्रिया त्वकस्था पशुलोक भयंक्करी ।
अमृतादि – महाशक्ति –संवृता डाकिनीश्वरी ।।

अनाहाताब्ज – निलया श्यामाभा वदनद्वया ।
दंष्ट्रोज्ज्वलाक्षमालादि – धरा रुधिर – संस्थिता ।।

कालरात्र्यादि – शक्त्यौघ – वृता स्न्गिधौदन – प्रिया ।
महावीरेन्द्र वरदा राकिण्यम्बा – स्वरुपिणी ।।

मणिपूराब्ज निलया वदहत्रय – संयुता ।
वज्राधिकायुधोपेता डामर्यादिभि – रावृता ।।

रक्तिवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न – प्रीत – मानसा ।
समस्तभक्त – सुखदा लाकिन्यम्बा – स्वरुपिणी ।।

स्वाधिष्ठानाम्बुजकता चर्तुवक्त्र – मनोहरा ।
शूलाद्यायुद्ध – सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ।।

मेदो निष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि – समन्विता ।
दध्यन्नासक्त – ह्रदया काकिनी – रुप – धारिणी ।।

मूलाधाराम्बुजारुढा पञ्चवक्त्रास्थि – संस्थिता ।
अङ्कुशादि –प्रहरणा वरदादि – निषेविता ।।

मुद्गौदनासक्त – चित्ता साकिन्यम्बा – स्वरुपिणी ।
आज्ञा – चक्राब्ज – निलया शुक्लवर्णा षडानना ।।

मज्जा – संस्था हंसवती – मुख्य – शक्ति – समान्विता ।
हरिद्रान्नैक – रसिका हाकिनी – रुप – धारिणी ।।

सहस्रदल – पद्य्मस्था सर्व – वर्णोप – शोभिता ।
सर्वायुध – धरा शुक्ल – संस्थिता सर्वतोमुखी ।।

सर्वौदन- प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा – स्वरुपिणी ।
स्वाहा स्वधाऽमति – र्मेधा श्रुति- स्मृति- रन्नुमत्ता ।।

पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण – कीर्तिना ।
पुलोमजार्चिता बन्धमोचनी बन्धुरालका ।।

विमर्शरुपिणी विद्या वियदादि – जगत्प्रसूः ।
सर्वव्याधि – प्रशमनी सर्वमृत्यु – निवारणी ।।

अग्रगण्या - ऽचिन्त्यरुपा कलिकल्मष – नाशिनी ।
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष – निषेविता ।।

ताम्बूल – पूरित – मुखी दाडिमी –कुसुम – प्रभा ।
मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररुपिणी ।।

नित्य – तृप्ता भक्तिनिधि – र्नियन्त्री निखिलेश्वरी ।
मैत्र्यादि – वासनालभ्या महा-प्रलय-साक्षिणी ।।

पराशक्तिः परानिष्ठा प्रज्ञानघन – रुपिणी ।
माध्वीपानालसा मत्ता मातृका – वर्ण-रुपिणी ।।

महाकैलास-निलया – मृणाल-मृदु-दोर्लता ।
महनीया दयामूर्ति – र्महासाम्राज्य-शालिनी ।।

आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।
श्रीषोडाशाक्षरीविद्या त्रिकुटा कामकोटिका ।।

कटाक्ष – किंक्करी-भूत – कमला – कोटि – सेविता ।
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्रु – धनुः प्रभा ।।

ह्दयास्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर – दीपिका ।
दाक्षायणी दैन्त्यहन्त्री दक्षयज्ञविनाशनी ।।

दरान्दोलित दीर्घाक्षी दरहासोज्ज्वलमुखी ।
गुरु-मूर्ति-गुण-निधि-र्गोमाता गुहजन्म – भूः ।।

देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश – रुपिणी ।
प्रतिपन्मुख्य – राकान्त –तिथि-मण्डल – पूजिता ।।

कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप – विनोदनी ।
सचामर – रमा – वाणी – सव्य – दक्षिण – सेविता ।।

आदिशक्ति - रमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः ।
अनेक –कोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्य-विग्रहा ।।

क्लीं कारी केवला गुह्या कैवल्य-पद-दायिनी ।
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्ति-स्रिदशेश्वरी ।

त्र्यक्षरी दिव्य – गन्धाढ्या सिन्दुर-तिलकाञ्जिता ।
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व – सेविता ।।

विश्वगर्भा स्वर्णगर्भा - ऽवरदा वागधीश्वरी ।
ध्यानगम्या - ऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ।।

सर्व-वेदान्त-सम्यवेद्या सत्यानन्द स्वरुपिणी ।
लोपामुदार्चिता लीलाक्लृप्त – ब्रह्माण्ड-मण्डला ।।

अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वैद्य-वर्जिता ।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ।।

इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरुपिणी ।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप धारिणी ।।

अष्टमूर्ति – रजाजैत्री लोकयात्रा विधायिनी ।
एकाकिनी भूमरुपा निर्द्वैता – द्वैतवर्जिता ।।

अन्नदा वसुदा वृद्वा ब्रह्मात्मैक्य – स्वरुपिणी ।
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ।।

भाषारुपा बृहत्सेना भावाभाव – विवर्जिता ।
सुखाराध्या शुभकरी शोभनासुलभागतिः ।।

राजराजेश्वरी राज्यदायिनी राज्यवल्लभा ।
राजत्कृपा राजपीठ – निवेशित-निजाश्रिता ।।

राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुपङ्ग – बलेश्वरी ।
साम्राज्य – दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ।।

दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोकवशंक्करी ।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द- रुपिणी ।।

देशकालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।
सरस्वती शास्रमयी गुहाम्बा गुह्यारुपिणी ।।

सर्वोपाधि – विर्निमुक्ता सदाशिव – पतिव्रता ।
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल – रुपिणी ।।

कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलांगी गुरुप्रिया ।।

स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति – रुपिणी ।
सनकादि – समाराध्या शिवज्ञान – प्रदायिनी ।।

चित्कलाऽऽनन्द – कलिका प्रेमरुपा प्रियंक्करी ।
नामपारायण – प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ।।

मिथ्या – जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरुपिणी ।
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ।।

भवदाव – सुधावृष्टिः पापारण्य – दवानला ।
दौर्भाग्य – तूलवातुला जराध्वान्तरविप्रभा ।।

भाग्याब्धि – चन्द्रिका भक्त-चित्त-केकि-घनाघना ।
रोगपर्वत – दम्भोलि-र्मृत्युदारु-कुठारिका ।।

महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना ।
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर – निषूदनी ।।

क्षराक्षरात्मिका सर्वलोकेशी विश्वधारिणी ।
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ।।

स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प – निभाकृतिः ।
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरुपा प्रियव्रता ।।

दुराराध्या दुराधर्षा पाटली – कुसुम-प्रिया ।
महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया ।।

वीराराध्या विराड्रुपा विरजा विश्वतोमुखी ।
प्रत्यग् – रुपा पराकाशा प्राणदा प्राणरुपिणी ।।

मार्ताण्ड – भैरवाराध्या मन्त्रिणी-न्यस्त-राज्यधूः ।
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्रैगुण्या परापरा ।।

सत्यज्ञानान्द – रुपा सामरस्य – परायणा ।
कपर्दिनी कलामाला कामधु-क्काम-रुपिणी ।।

कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ।।

परञ्ज्योतिः परन्धाम परमाणुः परात्परा ।
पाशहत्सा पाशहन्त्री परमन्त्र – विभेदनी ।।

मूर्ताऽमूर्ता नित्यतृप्ता मुनिमानस – हंसिका ।
सत्यव्रता सत्यरुपा सर्वान्तर्यामिनी सती ।।

ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरुपा बुधार्चिता ।
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ।।

प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ – रुपिणी ।
विश्वृंखला विवित्तस्था वीरमाता वियत्सप्रसुः ।।

मुकुन्दा मक्तिनिलया मूलविग्रह-रुपिणी ।
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी ।।

छन्दः सारा शास्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।
उदारकीर्ति – रुद्दामवैभवा वर्णरुपिणी ।।

जन्ममृत्यु – जरातप्त-जन-विश्रांति-दायिनी ।
सर्वोप्निष-दुद्घुष्टा शान्त्यतीत – कलात्मिका ।।

गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।
कल्पना – रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध – विग्रहा ।।

कार्यकारण – निर्मुक्ता कामकेलि – तरङ्गिता ।
कनत्कनक –ताटंक्का लीला-विग्रह-धारिणी ।।

अजा क्षयविर्निर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र-प्रसादिनी ।
अन्तर्मुख – समाराध्या बहिर्मुख – सुदुर्लभा ।।

त्रयी त्रिवर्ग- निलया त्रिस्था त्रिपुर – मालिनी ।
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ।।

संसारपङ्क – निमर्ग्र – समुद्धरण – पण्डिता ।
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान – स्वरुपिणी ।।

धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य – विवार्धिनी ।
विप्रप्रिया विप्ररुपा विश्वभ्रमण – कारिणी ।।

विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरुपिणी ।
अयोनि –र्योनि-निलया कूटस्था कुलरुपिणी ।।

वीरगोष्ठी – प्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरुपिणी ।
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ।।

तत्तवाधिका तत्वमयी त्तत्वमर्थ – स्वरुपिणी ।
सामगन – प्रिया सोम्या सदाशिव – कुटुम्बिनी ।।

सव्यापसव्य – मार्गस्था सर्वापद्धिनिवारिणी ।
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ।।

चैतन्यार्ध्य – समाराध्या चैतन्य-कुसुम-प्रिया ।
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य – पाटला ।।

दक्षिणा – दक्षिणाराध्या दरस्मेर-मुखाम्बुजा ।
कौलिनी - केवऽनर्घ्य – कैवल्य-पद-दायिनी ।।

स्तोत्र-प्रिया स्तुतिमती श्रुति-संस्तुत-वैभवा ।
मन्स्विनी मानवती महेशी मंङ्ग्लाकृतिः ।।

विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ।।

व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।
पञ्चयज्ञ प्रिया पञ्चप्रेत-मञ्चाधिशायिनी ।।

पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्चसंख्योपचारिणी ।
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ।।

धरा धरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ।।

बन्धुक-कुसुम-प्रख्या बाला लीला-विनोदिनी ।
सुमङ्गली सुखकरी सवेषाढ्या सुवासिनी ।।

सुवासिन्यर्चन-प्रीताऽऽशोभना शुद्ध-मानसा ।।
बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ।।

दशमुद्रा-समाराध्या त्रिपुराश्रीवशंक्करी ।
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञान-ज्ञेय-स्वरुपिणी ।।

योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा ।
अनघाऽद्भुत- चारिता वाञ्छितार्थ – प्रदायिनी ।।

अभ्यासातिशय – ज्ञाता षडध्वातीत – रुपिणी ।
अव्याज-करुणा-मूर्ति-रज्ञान-ध्वान्त-दीपिका ।।

आबाल – गोप-विदिता सर्वानुल्लंघ्य-शासना ।
श्रीचक्रराज निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी ।।

श्री शिवा शिव –शक्त्यैक्य-रुपिणी ललिताम्बिका ।
एवं श्रीललितादेव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ।।
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।।इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे श्रीहयग्रीवागस्त्य-संवादे
श्री ललितासहस्रनाम-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
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