Hanuman Mandir Sirpur-Kagaznagar

Hanuman Mandir  Sirpur-Kagaznagar Telangana state ke sirpur-kagaznagar Namak gauo me subse purana aur prachin hanuman Mandir hai.iss Mandir me 2006 me HanumanJi ne aapna bal swarup Dharn Ki

।। हनुमद्-बन्दीमोचन पाठ ।।दोहा-बीर बखानौं पवनसुत,जनत सकल जहान।धन्य-धन्य अंजनि-तनय , संकर, हर, हनुमान्।।अर्थ-वीर पवनकुमार...
09/09/2026

।। हनुमद्-बन्दीमोचन पाठ ।।

दोहा-
बीर बखानौं पवनसुत,जनत सकल जहान।
धन्य-धन्य अंजनि-तनय , संकर, हर, हनुमान्।।

अर्थ-
वीर पवनकुमार की कीर्ति का वर्णन करता हूँ जिसको सारा संसार जानता है। हे आंजनेय ! हे भगवान शंकर के अवतार हनुमानजी ! आप धन्य हैं, धन्य हैं।

जय जय जय हनुमान अडंगी।
महावीर विक्रम बजरंगी।।

जय कपीश जय पवन कुमारा।
जय जगबन्दन सील अगारा।।

जय आदित्य अमर अबिकारी।
अरि मरदन जय-जय गिरधारी।।

अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा।
जय-जयकार देवतन कीन्हा।।

अर्थ-
हे हनुमानजी ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आपकी गति अबाध है। कोई आपका मार्ग नहीं रोक सकता। हे वज्र के समान कठोर अंगों वाले महावीर ! आपकी जय हो, जय हो। हे कपियों के राजा ! आपकी जय हो। हे पवनपुत्र ! आपकी जय हो। हे सारे संसार के वंदनीय ! हे गुणों के भंडार ! आपकी जय हो। हे कर्तव्य- प्रवीण, हे देवता, हे अविकारी ! आपकी जय हो। हे शत्रुओं का नाश करने वाले ! आपकी जय हो। हे द्रोणाचल को उठाने वाले ! आपकी जय हो। आपने माता अंजनी के गर्भ से जन्म लिया, तब देवताओं ने जय- जयकार की।

बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा।
सुर मन हर्ष असुर मन पीरा।।

कपि के डर गढ़ लंक सकानी।
छूटे बंध देवतन जानी।।

ऋषि समूह निकट चलि आये।
पवन तनय के पद सिर नाये।।

बार-बार अस्तुति करि नाना।
निर्मल नाम धरा हनुमाना।।

अर्थ-
आकाश में नगाड़े बजे, देवता मन में हर्षित हुए, असुरों के मन में पीड़ा हुई। आपके डर से लंका के किले में रहने वाले भयभीत हो गये। आपने देवताओं को कारागार से छुड़ाया। यह सब जानते हैं। ऋषियों का समूह आपके पास आया और हे पवनकुमार ! आपके चरणों में सिर नवाया और बहुत प्रकार से बार-बार स्तुति की और आपका पावन नाम ‘हनुमान्' रखा गया।

सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना।
दीन्ह बताय लाल फल खाना।।

सुनत बचन कपि मन हर्षाना।
रवि रथ उदय लाल फल जाना।।

रथ समेत कपि कीन्ह अहारा।
सूर्य बिना भए अति अंधियारा।।

विनय तुम्हार करै अकुलाना।
तब कपीस की अस्तुति ठाना।।

अर्थ-
सब ऋषियों ने सर्वसम्मति से आपको लाल फल खाने की प्रेरणा दी जिसे सुनकर आप बहुत हर्षित हुए और सूर्य को लाल फल समझ कर रथ समेत पकड़ लिया। आपने सूर्य को रथ सहित मुँह में रख लिया। तब अत्यन्त भय छा गया और हाहाकार मच गया। सूर्य के बिना सब देवता और मुनि व्याकुल होकर आपकी स्तुति करने लगे।

सकल लोक वृतान्त सुनावा।
चतुरानन तब रवि उगिलावा।।

कहा बहोरि सुनहु बलसीला।
रामचन्द्र करिहैं बहु लीला।।

तब तुम उन्हकर करेहू सहाई।
अबहिं बसहु कानन में जाई।।

असकहि विधि निजलोक सिधारा।
मिले सखा संग पवन कुमारा।।

अर्थ-
सारे संसार की दशा सुनकर ब्रह्माजी ने सूर्य को मुक्त करने के लिए आपको मनाया। तब आपसे विनती की, हे महावीर ! सुनिये। श्रीरामचंद्र जी महान लीला करेंगे तब आपा उनकी सहायता करियेगा। अभी तो आप वन में जाकर रहिये। यह कहकर ब्रह्माजी अपने लोक को चले गए और हे पवनकुमार ! आप अपने सखाओं में मिल गए।

खेलैं खेल महा तरु तोरैं।
ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं।।

जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई।
गिरि समेत पातालहिं जाई।।

कपि सुग्रीव बालि की त्रासा।
निरखति रहे राम मगु आसा।।

मिले राम तहं पवन कुमारा।
अति आनन्द सप्रेम दुलारा।।

अर्थ-
खेल-खेल में आपने बड़े-बड़े वृक्ष तोड़ डाले और पर्वतों को फोड़-फोड़ कर मार्ग बनाया। हे हनुमानजी ! जिस पर्वत पर आपने चरण रखे वह प्रकाशमान होकर रसातल में चला गया। सुग्रीवजी बाली से डरे हुए थे। श्रीरामचन्द्र की प्रतीक्षा करते हुए निर्भय रहते थे। हे पवनकुमार ! आपने लाकर उन्हें श्रीरामचन्द्र जी से मिला दिया और हे पवनदेव ! आपको इसमें बहुत आनन्द हुआ।

मनि मुंदरी रघुपति सों पाई।
सीता खोज चले सिरु नाई।।

सतयोजन जलनिधि विस्तारा।
अगम अपार देवतन हारा।।

जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा।
लांघि गये कपि कहि जगदीशा।।

सीता चरण सीस तिन्ह नाये।
अजर अमर के आसिस पाये।।

अर्थ-
हे हनुमानजी ! श्री राघवेंद्र से आपको मणि जड़ित अंगूठी मिली जिसे लेकर आप श्रीसीताजी की खोज करने चले। हे हनुमानजी ! सौ योजन का विशाल, अथाह, समुद्र जिसे देवता और मुनि भी पार नहीं कर सकते थे, उसे आपने ‘जय श्रीराम' कहकर बिना थके हुए सहज ही गऊ के खुर के समान लाँघ लिया और सीताजी के पास पहुँचकर उनके चरणकमल में सिर नवाया जिस पर सीताजी से आपने अजर अमर होने का आशीर्वाद पाया।

रहे दनुज उपवन रखवारी।
एक से एक महाभट भारी।।

तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा।
दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा।।

सिया बोध दै पुनि फिर आये।
रामचन्द्र के पद सिर नाये।।

मेरु उपारि आप छिन माहीं।
बांधे सेतु निमिष इक मांहीं।।

अर्थ-
एक-से-एक भयंकर योद्धा , राक्षस वाटिका की रखवाली करते थे। उन्हें आपने मारा, उपवन को नष्ट किया, लंका को जलाया जिससे रावण भयभीत होकर काँप गया। आपने सीताजी को धीरज दिया और लौट कर श्रीरामचन्द्र के चरणों में सिर नवाया। बड़े-बड़े पर्वतों को लाकर आपने पलभर में समुद्र पर पुल बँधाया।

लछमन शक्ति लागी उर जबहीं।
राम बुलाय कहा पुनि तबहीं।।

भवन समेत सुषेन लै आये।
तुरत सजीवन को पुनि धाये।।

मग महं कालनेमि कहं मारा।
अमित सुभट निसिचर संहारा।।

आनि संजीवन गिरि समेता।
धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता।।

अर्थ-
जब लक्ष्मणजी को शक्ति लगी तब श्रीरामचंद्र ने बहुत विलाप किया। आप सुषेन वैद्य को भवन समेत ही उठा लाए आप बड़े वेग से संजीवनी बूटी लेने गए। रास्ते में कालनेमि को मारा और असंख्य योद्धा- निशाचरों को नष्ट किया। आपने पर्वत सहित संजीवनी को लाकर करुणानिधान श्रीरामचंद्र के पास रख दिया।

फनपति केर सोक हरि लीन्हा।
वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा।।

अहिरावण हरि अनुज समेता।
लै गयो तहां पाताल निकेता।।

जहां रहे देवि अस्थाना।
दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना।।

पवनतनय प्रभु कीन गुहारी।
कटक समेत निसाचर मारी।।

अर्थ-
आपने लक्ष्मणजी के संकट को दूर कर दिया। देवताओं ने पुष्प-वर्षा करके जय-जयकार की। अहिरावण श्रीराम-लक्ष्मण को पाताल में ले गया। वहाँ देवीजी के स्थान पर उनकी बलि देने के लिए तलवार निकाल ली। उसी समय हे हनुमानजी ! आपने वहाँ पहुँच कर उस राक्षस को ललकारा और उसे सेना समेत मार डाला।

रीछ कीसपति सबै बहोरी।
राम लषन कीने यक ठोरी।।

सब देवतन की बन्दि छुड़ाये।
सो कीरति मुनि नारद गाये।।

अछयकुमार दनुज बलवाना।
कालकेतु कहं सब जग जाना।।

कुम्भकरण रावण का भाई।
ताहि निपात कीन्ह कपिराई।।

अर्थ-
जहाँ जामवंत और सुग्रीव थे, वहाँ आप श्रीरामलक्ष्मण को लौटा लाए। आपने सब देवताओं को बंधन से छुड़ा दिया। नारद मुनि ने आपका यशगान किया अक्षयकुमार राक्षस बहुत बलवान था। जिसे स्वामी केतु कहते यह सब संसार जानता है। रावण का भाई कुम्भकरण था। हे हनुमान जी ! इन सबका आपने विनाश किया।

मेघनाद पर शक्ति मारा।
पवन तनय तब सो बरियारा।।

रहा तनय नारान्तक जाना।
पल में हते ताहि हनुमाना।।

जहं लगि भान दनुज कर पावा।
पवन तनय सब मारि नसावा।।

जय मारुत सुत जय अनुकूला।
नाम कृसानु सोक सम तूला।।

अर्थ-
आपने युद्ध में मेघनाद को पछाड़ा। हे पवनकुमार! आपके समान कौन बलवान है ? मूल नक्षत्र में जन्म लेनेवाले नारान्तक- नामक रावण के पुत्र को हे हनुमानजी ! आपने क्षण भर में परास्त कर दिया। जहाँ-जहाँ आपने राक्षसों को पाया, हे शिव अवतार ! आपने उन्हें मारकर ढकेल दिया। हे पवनपुत्र ! आपकी जय हो। आप सेवकों के कार्य-सिद्ध में सहायक हुए। उनके शोक रूपी रूई को जलाने में आपका नाम अग्नि के समान है।

जहं जीवन के संकट होई।
रवि तम सम सो संकट खोई।।

बन्दि परै सुमिरै हनुमाना।
संकट कटै धरै जो ध्याना।।

जाको बांध बामपद दीन्हा।
मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा।।

सो भुजबल का कीन कृपाला।
अच्छत तुम्हें मोर यह हाला।।

अर्थ-
जिसके जीवन में कोई संकट हो, आप उसे वैसे ही दूर कर देते हैं जैसे अँधेरे को सूर्य। हे हनुमानजी ! बंदी होने पर जो आपका स्मरण करता है उसकी रक्षा करने के लिये आप गदा और चक्र लेकर चल पड़ते हैं। यमराज को भी ऊपर दिशा में फेंक देते हैं और मृत्यु को भी बाँधकर उसकी बुरी दशा करते हैं। हे कृपासागर ! आपकी वह शारीरिक शक्ति कहाँ गयी जो आपके रहते मेरी यह दशा हो रही है।

आरत हरन नाम हनुमाना।
सादर सुरपति कीन बखाना।।

संकट रहै न एक रती को।
ध्यान धरै हनुमान जती को।।

धावहु देखि दीनता मोरी।
कहौं पवनसुत जुगकर जोरी।।

कपिपति बेगि अनुग्रह करहु।
आतुर आइ दुसै दुख हरहु।।

अर्थ-
हे हनुमानजी ! आपका नाम संकटमोचन है। श्रीसरस्वती जी और देवराज इंद्र ऐसा वर्णन करते हैं कि जो व्यक्ति ब्रह्मचारी हनुमानजी आपका ध्यान धरता है उस पर एक रत्ती के बराबर भी संकट नहीं रह सकता। आप मेरी दीनता देखकर अति तीव्र गति से आइये और मेरे बंधनों को काट दीजिए। मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। हे हनुमानजी ! शीघ्र कृपा कीजिये। मुझ दास का दुःख दूर करने के लिए आप उतावले होकर आइये।

राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया।
जवन गुहार लाग सिय जाया।।

यश तुम्हार सकल जग जाना।
भव बन्धन भंजन हनुमाना।।

यह बन्धन कर केतिक बाता।
नाम तुम्हार जगत सुखदाता।।

करौ कृपा जय जय जग स्वामी।
बार अनेक नमामि नमामी।।

अर्थ-
हे शिव अवतार ! यदि आप मेरी पुकार सुनकर न आओ तो मैं आपको श्रीराम की शपथ देता हूं। आपका यश सारा संसार जानता है, हे हनुमानजी, आप संसार में बार-बार जन्म लेने के भय को भी दूर कर देते हैं फिर मेरा यह बंधन कितना सा है ? आपका जगत्- सुखदाता नाम है। हे जग के स्वामी ! आपकी जय हो। आप कृपा कीजिये। मैं अनेक बार आपको नमस्कार करता हूँ।

भौमवार कर होम विधाना।
धूप दीप नैवेद्य सुजाना।।

मंगल दायक को लौ लावे।
सुन नर मुनि वांछित फल पावे।।

जयति जयति जय जय जग स्वामी।
समरथ पुरुष सुअन्तरजामी।।

अंजनि तनय नाम हनुमाना।
सो तुलसी के प्राण समाना।।

अर्थ-
जो कोई मंगलवार को विधिपूर्वक हवन करे, धूप- दीप- नैवद्य समर्पित करे और मंगलकारक श्रीहनुमानजी में लगन लगावे, वह चाहे देवता हो या मनुष्य हो या मुनि हो, तुरंत ही उसका फल पायेगा। हे जगत् के स्वामी ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो, जय हो ! हे हनुमानजी ! आप समर्थविश्वात्मा, मन की बात जानने वाले, ‘आंजनेय' आपका नाम है। आप तुलसी के कृपा-निधान हैं।

दोहा-
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्यान।।

बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्यान।।

जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि।।

अर्थ-
सुग्रीवजी की जय, अंगदजी की जय, हनुमानजी की जय, श्रीराम लक्ष्मणजी, सीताजी सहित सदा कल्याण कीजिये। मंगलवार को प्रमाण मानकर हनुमानजी का यह पाठ जो भी करता है, मनुष्य निश्चय कर ध्यान करे तो कल्याणकारी परमपद प्राप्त करता है। तुलसीदास की यह घोषणा है कि जो इस हनुमान साठिका को नित्य पढ़ेगा वह कभी संकट में नहीं पड़ेगा। श्री शिवजी साक्षी हैं।

सवैया-
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी।
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी।।

जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी।
दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी।।

अर्थ-
श्री तुलसीदासजी कहते हैं- हे हनुमानजी ! मैं भारी विपत्ति में पड़कर आपको पुकार रहा हूँ। आप मेरी विनय सुनिये। अंगद, नल, नील, महादेव, राजा बलि, भगवान राम (देव) बलराम, शूरवीर, जाम्वान्, सुग्रीव, पवनपुत्र हनुमान, द्विविद और मयन्द- इन बारह वीरों की मैं बलिहारी (न्यौछावर) हूँ , भक्त के दुःख और दोष को दूर कीजिये।

।। जय संकटमोचन श्रीरामभक्त हनुमान ।।

03/09/2026
03/09/2026

श्री गोपाल हृदय स्तोत्रम्॥{श्री विष्णु हृदय स्तोत्रम्
श्री गणेशाय नमः।
॥विनियोग:॥ॐ अस्य श्रीगोपालहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य । श्रीभगवान् सङ्कर्षण ऋषिः । गायत्री छन्दः । ॐ बीजम् । लक्ष्मीः शक्तिः । गोपालः परमात्मा देवता । प्रद्युम्नः कीलकम् । मनोवाक्कायार्जितसर्वपापक्षयार्थे श्रीगोपाल प्रीत्यर्थे गोपाल हृदय स्तोत्र जपे विनियोगः॥

🍁श्री सङ्कर्षण उवाच :~
ॐ ममाग्रतः सदा विष्णुः पृष्ठतश्चापि केशवः ।
गोविन्दो दक्षिणे पार्श्वे वामे च मधुसूदनः ॥१॥

उपरिष्टात्तु वैकुण्ठो वाराहः पृथिवीतले ।
अवान्तरदिशः पातु तासु सर्वासु माधवः ॥२॥

गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा ।
नरसिंहकृताद्गुप्तिर्वासुदेवमयो ह्ययम् ॥३॥

अव्यक्तं चैवास्य योनिं वदन्ति व्यक्तं देहं दीर्घमायुर्गतिश्च ।
वह्निर्वक्त्रं चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे दिशः श्रोते घ्राणमायुश्च वायुम् ॥४॥

वाचं वेदा हृदयं वै नभश्च पृथ्वी पादौ तारका रोमकूपाः ।
अङ्गान्युपाङ्गान्यधिदेवता च विद्यादुपस्थं हि तथा समुद्रम् ॥५॥

तं देवदेवं शरणं प्रजानां यज्ञात्मकं सर्वलोकप्रतिष्ठम् ।
अजं वरेण्यं वरदं वरिष्ठं ब्रह्माणमीशं पुरुषं नमस्ते ॥६॥

आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरस्कृतम् ।
ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्तासक्तं सनातनम् ॥७॥

महाभारतमाख्यानं कुरुक्षेत्रं सरस्वतीम् ।
केशवं गां च गङ्गां च कीर्तयेन्मां प्रसीदति ॥८॥

ॐ भूः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ भुवः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ स्वः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ महः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ जनः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ तपः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ सत्यं पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ भूर्भुवः स्वः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ वासुदेवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ सङ्कर्षणाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ प्रद्युम्नाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ अनिरुद्धाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ हयग्रीवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ भवाद्भवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ केशवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ नारायणाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ माधवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ गोविन्दाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ विष्णवे पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ मधुसूदनाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ वैकुण्ठाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ अच्युताय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ त्रिविक्रमाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ वामनाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ श्रीधराय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ हृषीकेशाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ पद्मनाभाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ मुकुन्दाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ दामोदराय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ सत्याय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ ईशानाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ तत्पुरुषाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ पुरुषोत्तमाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ श्री रामचन्द्राय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ श्री नृसिंहाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ अनन्ताय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ विश्वरूपाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
ॐ प्रणवेन्दुवह्निरविसहस्रनेत्राय पुरुषाय
पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः ।
य इदं गोपालहृदयमधीते स ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति ।
सुरापानात् स्वर्णस्तेयात् वृषलीगमनात् पति सम्भाषणात्
असत्यादगम्यागमनात् अपेयपानादभक्ष्यभक्षणाच्च पूतो भवति।
अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति । भगवान्महाविष्णुरित्याह ।
॥ इति श्री गोपाल हृदय स्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

03/09/2026

#बगलामुखी_वशीकरण_प्रयोग।।
भगवती बगलामुखी की उपासना कलियुग में सभी कष्टों एवं दुखों से मुक्ति प्रदान करने वाली है। संसार में कोई कष्ट अथवा दुख ऐसा नही है जो भगवती पीताम्बरा की सेवा एवं उपासना से दूर ना हो सकता हो, बस साधकों को चाहिए कि धैर्य पूर्वक प्रतिक्षण भगवती की सेवा करते रहें।

भगवती पीताम्बरा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को चलाने वाली शक्ति हैं। नवग्रहों को भगवती के द्वारा ही विभिन्न कार्य सौपे गये हैं जिनका वो पालन करते हैं। नवग्रह स्वयं भगवती की सेवा में सदैव उपस्थित रहते हैं। जब साधक भगवती की उपसना करता है तो उसे नवग्रहों की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यदि साधक को उसके कर्मानुसार कहीं पर दण्ड भी मिलना होता है तो वह दण्ड भी भगवती की कृपा से न्यून हो जाता है ।

एवं जगदम्बा अपने प्रिय भक्त को इतना साहस प्रदान करती हैं कि वह दण्ड साधक को प्रभवित नही कर पाता। इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई भी इतना शक्तिवान नही है जो जगदम्बा कें भक्तो का एक बाल भी बांका कर सके। कहने का तात्पर्य यह है कि कारण चाहें कुछ भी हो भगवती बगलामुखी की उपासना आपको किसी भी प्रकार की समस्या से मुक्त करा सकती है।

दस महाविद्याओं में भी बगलामुखी के बारे में विशेष लिखा गया है और कहा गया है कि यह शिव की त्रि-शक्ति है –

"सत्य काली च श्री विद्या कमला भुवनेश्वरी।
सिद्ध विद्या महेशनि त्रिशक्तिबर्गला शिवे॥"

दुर्लभ ग्रंथ ‘मंत्र महार्णव’ में भी लिखा है कि –

"ब्रह्मास्त्रं च प्रवक्ष्यामि सदयः प्रत्यय कारणम।
यस्य स्मरण मात्रेण पवनोऽपि स्थिरायते॥"

बगलामुखी मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र स्मरण से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाता है। भगवती बगलामुखी को ‘पीताम्बरा’ भी कहा गया है। इसलिए इनकी साधना में पीले वस्त्रों, पीले फूलों व पीले रंग का विशेष महत्व है किन्तु साधक के मन में यह प्रश्न उठता है, कि इस सर्वाधिक प्रचण्ड महाविद्या भगवती बगलामुखी का विशेषण पीताम्बरा क्यों?

वह इसलिए कि यह पीताम्बर पटधारी भगवान् श्रीमन्नारायण की अमोघ शक्ति, उनकी शक्तिमयी सहचरी हैं। सांख्यायन तन्त्र के अनुसार बगलामुखी को सिद्घ विद्या कहा गया है।

तंत्र शास्त्र में इसे ब्रह्मास्त्र, स्तंभिनी विद्या, मंत्र संजीवनी विद्या तथा प्राणी प्रज्ञापहारका एवं षट्कर्माधार विद्या के नाम से भी अभिहित किया गया है। सांख्यायन तंत्र के अनुसार कलौ जागर्ति पीताम्बरा अर्थात् कलियुग के तमाम संकटों के निराकरण में भगवती पीताम्बरा की साधना उत्तम मानी गई है। अतः आधि व्याधि से त्रस्त मानव मां पीताम्बरा की साधना कर अत्यन्त विस्मयोत्पादक अलौकिक सिद्घियों को अर्जित कर अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कर सकता है।
बगलामुखी के ध्यान में बताया गया है कि –

"ये सुधा समुद्र के मध्य स्थित मणिमय मंडप में रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं। ये पीत वर्ण के वस्त्र, पीत आभूषण तथा पीले पुष्पों की माला धारण करती हैंं इनके एक हाथ में शत्रु की जिह्वा और दूसरे हाथ में मुद्गर है।"

इन्हीं की शक्ति पर तीनों लोक टिके हुए हैं। विष्णु पत्नी सारे जगत की अधिष्ठात्री ब्रह्म स्वरूप हैं। तंत्र में शक्ति के इसी रूप को श्री बगलामुखी महाविद्या कहा गया है।
इनका आविर्भाव प्रथम युग में बताया गया है।

बगलामुखी महाविद्या दस महाविद्याओं में से एक हैं। इन्हें ब्रह्मास्त्र विद्या, षड्कर्माधार विद्या, स्तम्भिनी विद्या, त्रैलोक्य स्तम्भिनी विद्या आदि नामों से भी जाना जाता है। माता बगलामुखी साधक के मनोरथों को पूरा करती हैं। जो व्यक्ति मां बगलामुखी की पूजा-उपासना करता है, उसका अहित या अनीष्ट चाहने वालों का शमन स्वतः ही हो जाता है। मां भगवती बगलामुखी की साधना से व्यक्ति स्तंभन, आकर्षण, वशीकरण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन आदि के साथ अपनी मनचाही कामनाओं की पूर्ति करने में समर्थ होता है।

आज मै यहा बगलामुखी माता का एक अचुक वशीकरण प्रयोग दे रहा हूं। यह साधना प्रयोग अत्यंत तिष्ण है,इसका वार कभी खाली नही जाता है,यह बहोत साधको का अनुभव है।

इसमें बगलामुखी वशीकरण यंत्र और माला साधक के पास होना आवश्यक है। इस साधना को किसी भी पक्ष के मंगलवार से कर सकते है परंतु होली/ग्रहण/दीपावाली/दशहरा/बगलामुखी जयंती पर यह विधान करने से शिघ्र सफलता मिलता है। इस साधना को पुरुष/महिलाएं कर सकते है। साधना रात्रिकालीन है,इसमे रोज 11 माला जाप कार्यपुर्ती होने तक करें।

साधना विधि:-
साधक को माता बगलामुखी की पूजा में पीले वस्त्र धारण करना चाहिए।रात्रि मे स्नान करके उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र और वशीकरण यंत्र स्थापित करें। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पुजन,घी का दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल(हल्दि से रंगे हुए), हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर इस प्रकार संकल्प करें-

।।ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: अद्य……(अपने गोत्र का नाम) गोत्रोत्पन्नोहं ……(नाम) नाम: मम प्रिय अमुक(जिसका वशीकरण करना है,उसका नाम) व्यक्ति विशेष वशीकरण हेतु बगलामुखी वशीकरण मंत्र जाप एवं पूजनमहं करिष्ये।तदगंत्वेन अभीष्टनिर्वघ्नतया सिद्ध्यर्थं आदौ: गणेशादयानां पूजनं करिष्ये।

इसके बाद भगवान श्रीगणेश का पूजन करें।नीचे लिखे मंत्रों से मंत्र बोलते हुए मानसिक रुप से गौरी आदि षोडशमातृकाओं का पूजन करें-

गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातर:।।
धृति: पुष्टिस्तथातुष्टिरात्मन: कुलदेवता।
गणेशेनाधिकाह्योता वृद्धौ पूज्याश्च षोडश।।

इसके बाद यंत्र और चित्र पर गंध, चावल व फूल अर्पित करें ।

अब देवी का हाथ जोड़कर ध्यान करें इस प्रकार…..

सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणैव्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत ।।

तत्पश्चात इस मंत्र का जप करते हुए देवी बगलामुखी का आवाहन करें-

नमस्ते बगलादेवी जिह्वा स्तम्भनकारिणीम्।
भजेहं शत्रुनाशार्थं मदिरा सक्त मानसम्।।

आवाहन के बाद उन्हें एक फूल अर्पित कर आसन प्रदान करें और जल के छींटे देकर स्नान करवाएं व अब इस प्रकार से बगलामुखी वशीकरण यंत्र पूजन करें-

गंध- ॐ बगलादेव्यै नम: गंधाक्षत समर्पयामि।
मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीला चंदन/हल्दि लगाएं ।

पुष्प- ॐ बगलादेव्यै नम: पुष्पाणि समर्पयामि।
मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले फूल चढ़ाएं।

धूप- ॐ बगलादेव्यै नम: धूपंआघ्रापयामि।
मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को धूप दिखाएं।

दीप- ॐ बगलादेव्यै नम: दीपं दर्शयामि।
मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को दीपक दिखाएं।

नैवेद्य- ॐ बगलादेव्यै नम: नैवेद्य निवेदयामि।
मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।

अब इस प्रकार प्रार्थना करें-

जिह्वाग्रमादाय करणे देवीं, वामेन शत्रून परिपीडयन्ताम्।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि।।

बगलामुखी वशीकरण मंत्र:- ॐ बगलामुखी सर्वस्त्री ह्रदयं मम् वश्यं कुरू ऐं ह्रीं स्वाहा ।।
om bagalaamukhi sarv stree hridayam mam vashyam kuru aim hreem swaahaa

इस मंत्र मे "सर्व" के जगह पर उस व्यक्ति का नाम लेना है,जिसका आप वशीकरण करना चाहते है। कोई स्त्री किसी पुरुष को वशीकरण करना चाहती हो तो मंत्र मे "स्त्री" के जगह पर "पुरुष" शब्द का उच्चारण करें।

इस तरहा से पुजन और मंत्र जाप करने से मनचाहे व्यक्ति का वशीकरण होता है। साधना के कुछ नियम है जिसे याद रखना जरुरी है। साधना काल मे ब्रम्हचैर्यत्व का पालन करे,झुट बोलने से बचे,जमिन पर ही गद्दी डालकर सोना है,हो सके तो साधना काल मे एक समय भोजन करे,किसी भी स्त्री/पुरुष के प्रती अच्छे नजर से देखे मतलब मन मे कामुकता ना आये। इन नियम को पालन करने से सफलता प्राप्त होता है। बगलामुखी वशीकरण यंत्र और माला के शक्ति से आपका कार्य शिघ्र होना सम्भव है।

अब देवि से क्षमा प्रार्थना करें-
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।

27/08/2026

#श्रीहयग्रीवसंपदास्तोत्रम‌् ।।
हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति वादिनम् ।
नरं मुञ्चन्ति पापानि दरिद्रमिव योषितः॥१॥
हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति यो वदेत्।
तस्य निस्सरते वाणी जह्नुकन्याप्रवाहवत् ॥२॥

हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति यो ध्वनिः।
विशोभते च वैकुण्ठकवाटोद्घाटनक्षमः ॥३॥
श्लोकत्रयमिदं पुण्यं हयग्रीवपदाङ्कितम्।
वादिराज यतिप्रोक्तं पठतां संपदां पदम् ।।

इति वादिराजतीर्थ विरचितं हयग्रीवसंपदास्तोत्रं संपूर्णम् ।।

22/08/2026

🔱 श्रीरुद्रचण्डी स्तोत्रम‌् ।।

घोरचण्डी महाचंण्डी चामुंडी चंण्डमुंण्ड विखंण्डनी।
चतुर्वक्त्रा महावीर्या महादेवविभूषिता।।१।।

रक्तदन्ता वरारोहा महिषासुरमर्दिनि।
तारिणी जननी दुर्गा चंण्डीका चंण्डविक्रमा।।२।।

महाकाली जगतद्धात्री चण्डी च यामलोदभवा।
शमशानवासिनी देवी घोरचंण्डी भयानका।।३।।

शिवा घोरा ऱूद्रचंण्डी महेशा गणभूषिता।
जान्हवी परमा कृष्णा महात्रिपुरसुंदरी।।४।।

श्रीविद्या परमाविद्या चण्डिका वैरिमर्दिनी।
दुर्गा दुर्गशिवाघोरा चंण्डहस्ता प्रचंण्डिका।।५।।

माहेशी स्थिरादेवी भैरवी चंण्डविक्रमा।
प्रमथैर्भूषिता कृष्णा चामुण्डामुण्ड मर्दिनी।।६।।

रणखण्डा चन्द्रघण्टा रणेरामवरप्रदा।
मारणी भद्रकाली च शिवा घोर भयानका।।७।।

शिवप्रिया महामाया नन्दगोपगृहोदभवा।
मगंला जन्नीचण्डी महाक्रुद्धा भयंकरी।।८।।

विमला भैरवी निंद्रा जातिरूपा मनोहरा।
तृष्णा निद्रा क्षुधा माया शक्तिमार्यामनोहरा।।९।।

तस्यै देव्यै नमस्तस्यै सर्वरूपणे संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः।।१०।।

भवानी च भवानी च भवानी चोच्यते बुधै।
भकारस्तु भकारस्तु भकारः केवल शिव।।११।।

महाचण्डी शिवा घोरा महाभीमा भयानका।
कांचनी कमला विधा महारोगविमर्दिनी।।१२।।

गुह्यचण्डी घोरचण्डी चण्डी त्रैलोक्यदुर्लभा।
देवानां दुर्लभा चण्डी रूद्रयामलसंमता।।१३।।

अप्रकाश्या महादेवी प्रिया रावणमर्दिनी।
मत्यस्यप्रिया मांसरता मत्स्यमांस बलिप्रिया।।१४।।

मदमत्ता महानित्या भूतप्रमथसंगता।
महाभागा महारामा धान्यदा धनरत्नदा।।१५।।

वस्त्रादा मणिराज्यादि सदाविषय वर्धिनी।
मुक्तिदा सर्वदा चण्डी महाविपद नाशिनी।।१६।।

रूद्रध्येया रूद्ररूपा रूद्राणी रूद्रवल्लभा।
रूद्रशक्ति रूद्ररूपा रूद्रमुख समविन्वता।।१७।।

शिवचण्डी महाचण्डी शिवप्रेत गणान्विता।
भैरवी परमाविधा महाविधा च षोडशी।।१८।।

सुंदरी परमपूज्या महात्रिपुरसुंदरी।
गुह्यकाली भद्रकाली महाकाल विमर्दिनी।।१९।।

कृष्णा तृष्णास्वरूपा सा जगन्मोहनकारणी।
अतिमन्त्रा महालज्जा सर्वमंगलदायनी।।२०।।

घोरतंत्री भीमरूपा भीमा देवी मनोहरा।
मंगला बगला सिद्धिदायिनी सर्वदाशिवा।।२१।।

स्मृतिरूपा कीर्तिरूपा योर्गीद्रैरपि सविता।
भयानका महादेवी भयदुःख विनाशिनी।।२२।।

चण्डिका शक्तिहस्ता च कुमारी सर्वकामदा।
वाराही च वराहास्या इन्द्राणी शक्रपूजिता।।२३।।

माहेश्वरी महेशस्य महेशगणभूषिता।
चामुण्डा नारसिंही च नृसिंहशत्रु विमर्दिनी।।२४।।

सर्वशत्रुप्रशमनी सर्वारोग्यप्रदायिनी।
इति सत्यं महादेवि सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।।२५।।

इति श्री रुद्रचण्डी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

16/08/2026

🌹नागपंचमी विशेष नागमंडल पूजन :🌹
----------श्रावण मास पंचमी के दिन नागपंचमी होती है .
इस दिन ये नागमंडल पूजन अवश्य करे इससे कालसर्पदोष हो या नागहत्या दोष हो इससे मुक्ती होती है और नाग मंडल देवताओं की कृपा होती है जिससे आर्थिक उन्नती होती है और शत्रू बाधा निवारण होता है हमारे पूर्वजो ने जो भी त्योहार विशिष्ट दिन के दिन रखे है उसके पिछे उनका गहरा चिंतन था .

नागपंचमी के दिन किये जाने वाले आध्यात्मिक साधना को प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसे आप उस दिन संपन्न करे।

अगर आप नागपंचमी के दिन राहु काल में
इसे कर सकते है तो और भी अच्छा।

और अगर राहु काल मे नही कर सकते है तो आपकी सुविधा अनुसार किसी भी समय करे .

सामान्य पूजन सामग्री
जमाकर रखे।
यह पूजन आप किसी भी शिवलिंग पर
या रुद्राक्ष पर कर सकते है।

यहां पर संक्षिप्त पूजन दे रहा हूँ ताकि नए साधक भी इसे आसानी से कर सके।

सबसे पहले आचमन करे
,
ॐ आत्मतत्वाय स्वाहा
ॐ विद्यातत्वाय स्वाहा
ॐ शिवतत्वाय स्वाहा

फिर आसन पूजन और दिशा बंधन करकै संकल्प करे।

आसन पूजा के लिए निम्न मन्त्र पढ़कर आसन पर पुष्प अर्पण करे।

" ॐ पृथ्वी त्वय धृता लोका देवी ,त्वं विष्णूनां धृता
त्वां च धारय मां देवी पवित्रं कुरु चासनम् "

दिशाबन्धन के लिए अपने चारो दिशाओं में थोड़े अक्षत फेके।

फिर गुरु और गणेश जी का स्मरण करे
और उनसे प्रार्थना करे की आपकी साधना सफल बना दे।

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:
गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम: "

इस श्लोक से ध्यान कर

ॐ गुं गुरुभ्यो नमः

इस मन्त्र से सदगुरु
का पंचोपचार पूजन करे।

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: !
गंधं समर्पयामि

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: !
पुष्पं समर्पयामि

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: !
धूपं समर्पयामि

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: !
दीपं समर्पयामि

ॐ गुं गुरुभ्यो नम: !
नैवेद्यं समर्पयामि

अब एक आचमनी जल लेकर उसमे चंदन या अष्टगंध मिलाकर अर्घ्य प्रदान करे

ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरु: प्रचोदयात्

अब गणेश जी का स्मरण करे

"वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटी समप्रभ
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा "

ॐ श्री गणेशाय नम:
गणेश जी के लिये गंध अक्षत पुष्प अर्पण करे

फिर सबसे पहले
मृत्युंजय शिव का ध्यान कर उनका आवाहन करे।

यह आप महामृत्युंजय
मन्त्र से कर सकते है।

" ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधीं पुष्टी वर्धनम
उर्वारिकमिव बंधनान मृर्त्योमुक्षीयमामृतात "

इस मन्त्र से या तंत्रोक्त महामृत्युंजय मन्त्र

" ॐ ह्रौं जूं सः ॐ "
इस मन्त्र से करे।

श्री महामृत्युंजय शिव
इह आगच्छ इह तिष्ठ।

त्वाम चरणे पंचोपचार
पूजनम समर्पयामि।

और गंध ,अक्षत,पुष्प अर्पण करे।

और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करे

फिर मनसा देवी का ध्यान करे और
मन्त्र से गंध अक्षत पुष्प अर्पण करे

ॐ मनसादेव्यै नमः

मनसा देवी आवाहयामि
मम पूजा स्थाने
स्थापयामि पूजयामि नमः

ॐ मनसा देव्यै नम:
पंचोपचार पूजनं समर्पयामि
गंध अक्षत पुष्प अर्पण करे

फिर राहु केतु का पूजन करे

राहु का ध्यान मन्त्र

अर्धकायम महावीर्यं
चन्द्रादित्य विमर्दनम्
सिंहिकागर्भ सम्भूतं
तं राहुं प्रणमाम्यहम्

ॐ रां राहवे नमः

राहु आवाहयामि मम पूजा स्थाने
स्थापयामि पूजयामि नमः

ॐ रां राहवे नम: पंचोपचार पूजनं समर्पयामि

राहु के लिये गंध अक्षत पुष्प धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे .

अब निम्न राहु पंचविंशति नामावली से पूजन करे .
एकेक नाम का उच्चारण करते हुये पुष्प अक्षत अर्पण करते जाये .

१) ॐ राहवे नम:
२) ॐ दानवमंत्री नम:
३) ॐ सिंहिकाचित्तनंदनाय नम:
४) ॐ अर्धकायाय नम:
५) ॐ सदाक्रोधये नम:
६) ॐ चंद्रादित्यविमर्दनाय नम:
७) ॐ रौद्राय नम:
८) ॐ रुद्रप्रियाय नम:
९) ॐ दैत्याय नम:
१०) ॐ स्वर्भानवे नम:
११) ॐ भानुभीतिदाय नम:
१२) ॐ ग्रहराजाय नम:
१३) ॐ सुधापायवे नम:
१४) ॐ राकातिथ्यभिलाषकाय नम:
१५) ॐ कालदृष्टये नम:
१६) ॐ कालरुपाय नम:
१७) ॐ श्रीकंठहृदयाश्रिताय नम:
१८) ॐ विधुंतुदाय नम:
१९) ॐ सैंहिकेयाय नम:
२०) ॐ घोररुपाय नम:
२१) ॐ महाबलाय नम:
२२) ॐ ग्रहपीडाकराय नम:
२३) ॐ दंष्ट्राय नम:
२४) ॐ रक्तनेत्राय नम:
२५) ॐ महोदराय नम:

अब एक आचमनी जल मे चंदन मिलाकर
राहु को अर्घ्य प्रदान करे

ॐ शिरोरुपाय विद्महे अमृतेशाय
धीमहि तन्नो राहु: प्रचोदयात

अब हाथ जोडकर राहु से प्रार्थना करे
महाशिर्षो महावक्त्रो
महादंष्ट्रो महायश:
अतनुश्च उर्ध्वकेशश्च
पीडां दहतु मे तम:

अब राहु के बाद केतु ग्रह देवता का पूजन करे

केतु का आवाहन करे

केतु ध्यान मन्त्र :-

वंदे केतुं कृष्णवर्णं
कृष्णवस्त्रं विभूषणम
वामोरु न्यस्त तद्धस्तं
साभयेतर पाणिकम

पलाशपुष्प संकाशं
तारकाग्रह मस्तकम्
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं
तं केतुं प्रणमाम्यहम्

ॐ कें केतवे नमः

केतु आवाहयामि मम पूजा स्थान
स्थापयामि पूजयामि नमः

ॐ कें केतवे नम: पंचोपचार पूजनं समर्पयामि

केतु के लिये गंध अक्षत पुष्प धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे

अब केतु विंशति नामावली से पूजन करे .
एकेक नाम पढते हुये अक्षत पुष्प अर्पण करते जाये ..

१) ॐ केतवे नम:
२) ॐ कालाय नम:
३) ॐ कलयिताय नम:
४) ॐ धूम्रकेतवे नम:
५) ॐ विवर्णकाय नम:
६) ॐ लोककेतवे नम:
७) ॐ महाकेतवे नम:
८) ॐ सर्वकेतवे नम:
९) ॐ भयप्रदाय नम:
१०) ॐ रौद्राय नम:
११) ॐ रुद्रप्रियाय नम:
१२) ॐ रुद्राय नम:
१३) ॐ क्रूरकर्माय नम:
१४) ॐ सुगंधधृकाय नम:
१५) ॐ पलाशपुष्पसंकाशाय नम:
१६) ॐ चित्रयज्ञोपवीतधृकाय नम:
१७) ॐ तारागणाय नम:
१८) ॐ विमर्दिने नम:
१९) ॐ जैमिनेयाय नम:
२० ) ॐ ग्रहाधिपाय नम:

अब एक आचमनी जल मे चंदन मिलाकर
केतु के लिये अर्घ्य प्रदान करे

ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि
तन्नो केतु: प्रचोदयात

अब हाथ जोडकर केतु से प्रार्थना करे

अनेकरुपवर्णश्च शतशो
अथ सहस्त्रश:
उत्पातरुपी घोरश्च
पीडां दहतु मे शिखी:

एक आचमनी जल अर्पण करे

अनेन पूजनेन राहु केतु ग्रह देवतां प्रीयंतां न मम

अब सर्प नाग मंडल का पूजन करे

सर्वप्रथम आवाहन करे

एह्येहि नागेन्द्र धराधेश
सर्वामरैवदन्ति पादपद्म
नानाफणा मंडल राजमान
गृहाण पूजां भगवान नमस्ते

ॐ नमोस्तु सर्पेभ्यो
ये के च पृथिवी मनु
ये अंतरिक्षे ये दिवितेभ्य:
सर्पेभ्यो नम: .

समस्त सर्प मंडल नाग मंडल देवता आवाहयामि
मम पूजन स्थाने स्थापयामि पूजयामि नम:

उनके पूजन हेतु
पंचोपचार पूजन अर्पण करे
गंध अक्षत पुष्प धूप दीप नैवेद्य अर्पण करे

अब मुख्य नौ नागों का आवाहन कर
गंध अक्षत पुष्प से पूजन करे

अनंतं वासुकिं शेषं
पद्मनाभं च कंबलं
शंखपालं धृतराष्ट्रं
तक्षकं कालियं तथा
एतानि नवनामानि
नागानां च महात्मनम
सायंकाले पठेनित्यं
प्रात:काले विशेषत:
तस्मै विषभयं नास्ति
सर्वत्र विजयी भवेत

अनंतादि नवनाग देवता आवाहयामि मम पूजा स्थाने स्थापयामि पूजयामि नम:

१. अनंत :-

अनन्तं विप्रवर्गं च
तथा कुंकुमवर्णकम्
सहस्रफण सयुंक्तम्
तं देवं प्रणमाम्यहम्

ॐ अनन्ताय नमः
अनंत नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

२. शेष :-

विप्रवर्गं श्वेतवर्ण
सहस्त्रफण संयुक्तम्
आवाहयाम्यहं देवं
शेष वै विश्वरूपिणम्

ॐ शेषाय नमः
शेष नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

३. वासुकि :-

क्षत्रियवर्गं पीतवर्णं फनैसप्तशतैर्युतम्
युक्तमुत्तुगकायं च
वासुकिं प्रणमाम्यहम्

ॐ वासुक्यै नमः
वासुकि नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

४. तक्षक :-

वैश्यवर्गं नीलवर्णं
फनै पञ्चशतैर्युतम्
युक्तमुत्तुगकायं च
तक्षकं प्रणमाम्यहम्

ॐ तक्षकाय नमः
तक्षक नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

५. कर्कोटक :-

शूद्रवर्ण श्वेतवर्णं
शतत्रयफनैयुतम्
युक्तमुत्तुगकायं च
कर्कोटकं प्रणमाम्यहम्

ॐ कर्कोटकाय नमः
कर्कोटक नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

६. शंखपाल :-

शंखपालं क्षत्रियं च
पीतं सप्तशतै:फनै :
युक्तमुत्तुगकायं च
शिरसा प्रणमाम्यहम्

ॐ शंखपालाय नमः
शंखपाल नाग देवता आवाहयामि पूजयामि नमः

७.नील :-

वैश्यवर्गं नीलवर्णं
फनै: पञ्चशतैर्युतम्
युक्तमुत्तुगकायं च
तं नीलं प्रणमाम्यहम्

ॐ नीलाय नमः
नील नाग देवता आवाहयामि पूजयामि नमः

८.कम्बलक :-

कम्बलं शूद्रवर्गं च शतत्रयफनैर्युतम्
आवाहयामि नागेशं
प्रणमामि पुनः पुनः

ॐ कम्बलाय नमः
कंबलक नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

९. महापद्म :-

वैश्यवर्गं नीलवर्णं
पञ्चशतैर्युतम्
युक्तमुत्तुगकायं च
तं महापद्मं नमाम्यहम

ॐ महापद्माय नमः
महापद्म नागदेवता आवाहयामि पूजयामि नमः

नवनाग देवता आवाहयामि पूजयामि नमः

ॐ नव नागेभ्यो नम:

इन प्रमुख नवनाग देवता हेतु गंध अक्षत पुष्प अर्पण करे

अब 12 नागिनी देवता का आवाहन कर गंध अक्षत पुष्प से पूजन करे

१. ॐ जरत्कार्यै नमः
२. ॐ जगदगौर्यै नमः
३. ॐ मनसादेव्यै नमः
४. ॐ सिद्धयोगिन्यै नमः
५. ॐ वैष्णव्यै नमः
६. ॐ नागभागिन्यै नमः
७. ॐ शैव्यै नमः
८. ॐ नागेश्वर्यै नमः
९. ॐ जरत्कारुप्रियायै नमः
१०. ॐ आस्तिकमातायै नमः
११. ॐ विषहरायै नमः
१२. ॐ महाज्ञानयुतायै नमः

अब कालिया नाग का आवाहन कर
पूजन गंध अक्षत पुष्प से करे

कालियो नाम नागसौ
विषरूपों भयंकर:
नारायणेन संपृष्टौ दोषो
क्षेमकरो भव्

ॐ कालिया सर्पाय नमः
कालिया सर्प आवाहयामि पूजयामि नमः

अब जल में कुंकुम अष्टगंध ,इत्र पुष्प मिलाकर
सभी सर्प मंडल नाग मंडल देवताओं को
नाग गायत्री मन्त्र से अर्घ्य दे

ॐ नवकुल नागाय विद्महे विषदन्ताय
धीमहि तन्नो:सर्प प्रचोदयात

अब हाथ जोड़कर प्रार्थना करे और निम्न मन्त्र पढ़े

अनंतपद्म पत्राद्यं
फणाननेकतोज्वलं
दिव्याम्बरंधरं देवं
रत्नकुण्डल मंडितं !!1 !!

नानारत्नपरिक्षिप्तं
मुकुटं द्युतिरंजितं
फणमणि सहस्त्रोदये
रसंख्यै पन्नगोत्तमे !!2 !!

नानाकन्या सहस्रेण
समन्तात्परिवारितम्
दिव्याभरणम् दिप्तांगं
दिव्यचन्दन चर्चितम् !!3 !!

कालाग्निमिव दुर्धर्ष
तेजसादित्य सन्निभम्
ब्रम्हांडाधार भूतं त्वां
यमुनातीर वासीनम !!4 !!

भजेहं शान्त्यैत्र
पूजये कार्यसाधकम्
आगच्छ कालसर्पाख्य
दोषं मम निवारय: !!5 !!

इसके बाद पुष्प अर्पण कर क्षमाप्रार्थना करे।

और ॐ नम: शिवाय मन्त्र को ११ बार जाप करे

हाथ जोडकर नीचे दिये हुये स्तोत्र का पाठ करे

श्री मनसा देवी नाम स्तोत्रम

जरत्कारु जगदगौरी
मनसा सिद्धयोगिनी
वैष्णवी नागभगिनी
शैवी नागेश्वरी तथा !!

जरत्कारुप्रिया आस्तिकमाता
विषहरीति च महाज्ञानयुता
चैव सा देवी विश्वपुजिता !!

द्वादशैतानि नामानि
पूजाकाले च य: पठेत !
तस्य नागभयं नास्ति
तस्य वंशोदभवस्य च !!

नागभीते च शयने
नागग्रस्ते च मंदिरे
नागक्षते महादुर्गे
नागवेष्टित विग्रहे !!

इदं स्तोत्रं पठित्वा
तु मुच्यते नात्रसंशय:
नित्यं पठेद य: तं
दृष्ट्वा नागवर्ग: पलायते !!

नागौधं भूषणं कृत्वा
स भवेत नागवाहना :
नागासनो नागतल्पो
महासिद्धो भवेन्नर: !!

फिर हाथ जोडकर नीचे दिये हुये
सर्प स्तोत्र का पाठ करे

ब्रम्हलोके च ये सर्पा:
शेषनागपुरोगमा: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!१!!

विष्णुलोके च ये सर्पा:
वासुकि: प्रमुखादय: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!2!!

काद्रवेयाश्च ये सर्पा:
मातृभक्ति परायणा: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!3!!

इंद्रलोके च ये सर्पा:
तक्षको प्रमुखादय: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!4!!

सत्यलोके च ये सर्पा:
वासुकिना च रक्षिता: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!5!!

मलये चैव ये सर्पा:
कर्कोट: प्रमुखादय: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!6!!

समुद्रतीरे च ये सर्पा:
ये सर्पा: जलवासिन : !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!7!!

रसातले च ये सर्पा:
अनंतादि महाबला : !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!8!!

सर्पसत्रे तु ये सर्पा:
आस्तिकेन च रक्षिता : !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!9!!

धर्मलोके च ये सर्पा:
वैतरण्यां समाश्रिता : !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!10!!

पर्वताणां च ये सर्पा:
दरिसंधिषु संस्थिता: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!11!!

खांडवस्य तथा दाहे
स्वर्ग ये च समाश्रिता: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!12!!

पृथिव्यां चैव ये सर्पा:
ये च साकेत वासिन: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!13!!

सर्वग्रामेषु ये सर्पा:
वसंति सर्वे स्वछंदा: !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!१४!!

ग्रामे वा यदिवारण्ये
ये सर्पा: प्रचरंति च !
नमोस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य:
सुप्रीता: मम सर्वदा !!१५ !!

एक आचमनी जल ले और छोडे

मंत्रहीनं क्रियाहीनं
भक्तिहीनं सुरेश्वर
यत्पुजितं मया देवी
परिपूर्णम तदस्तु मे !!

अनेन ध्यानावाहनादि उपचारै: पूजनेन
अमृतरक्षिणि च मनसादेवी सहिता:
अनंतादि नवनागा: प्रीयंताम न मम

एक आचमनी जल पात्र मे अर्पण करे

ॐ गच्छ गच्छ नागदेवता
गच्छ गच्छ सर्पदेवता
नागलोकादि पीठं
गच्छन्तु मनसादेवी सह !!

पुष्पअक्षत अर्पण करे और एक आचमनी जल अर्पण करे

शिवकंठभूषणाय नागदेवता शिवशोभिताय मम समस्त सर्पदोष , समस्त पाप दोष , ग्रहबाधा दोष शांताय श्री सदाशिवार्पणमस्तु !!

अनेन नागपंचमी पर्व अवसरे श्री अनंतादि
नवकुल नागदेवता प्रीत्यर्थे समस्त सर्प दोष परिहारार्थे नागमंडल पूजनम पुर्णतरां कुरु ..

नाग अष्टोत्तर शत नामावली ..

एकेक नाम को पढकर पुष्प अक्षत या एक आचमनी जल अर्पण करते जाये ..

नमस्करोमि देवेश नागेंद्र हरभूषण
अभिष्टदायिने तुभ्यं अहिराज नमो नम:

नाग मंडल देवताभ्यो नम :
आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि नम:

नागमंडल देवताभ्यो नम: पंचोपचार पूजनं समर्पयामि ..

अब नीचे दिये हुये 108 नामोको पढते हुये पुष्प अक्षत अर्पण करते जाये .

१) ॐ अनंताय नम:
२) ॐ वासुदेवाख्याय नम:
३) ॐ तक्षकाय नम:
४) ॐ विश्वतोमुखाय नम:
५) ॐ कर्कोटकाय नम:
६) ॐ महापद्माय नम:
७) ॐ पद्माय नम:
८) ॐ शंखाय नम:
९) ॐ शिवप्रियाय नम:
१०) ॐ धृतराष्ट्राय नम:
११) ॐ शंखपालाय नम:
१२) ॐ गुलिकाय नम:
१३) ॐ इष्टदायिने नम:
१४) ॐ नागराजाय नम:
१५) ॐ पुराणाय नम:
१६) ॐ पुरुषाय नम:
१७) ॐ अनघाय नम:
१८) ॐ विश्वरुपाय नम:
१९) ॐ महीधारिणे नम:
२०) ॐ कामदायिने नम:
२१) ॐ सुरार्चिताय नम:
२२) ॐ कुंदप्रभाय नम:
२३) ॐ बहुशिरसे नम:
२४) ॐ दक्षाय नम:
२५) ॐ दामोदराय नम:
२६) ॐ अक्षराय नम:
२७) ॐ गणाधिपाय नम:
२८) ॐ महासेनाय नम:
२९) ॐ पुण्यमूर्तये नम:
३०) ॐ गणप्रियाय नम:
३१) ॐ वरप्रदाय नम:
३२) ॐ वायुभक्षाय नम:
३३) ॐ विश्वधारिणे नम:
३४) ॐ विहंगमाय नम:
३५) ॐ पुत्रप्रदाय नम:
३६) ॐ पुण्यरुपाय नम:
३७) ॐ पन्नगेशाय नम:
३८) ॐ बिलेशयाय नम:
३९) ॐ परमेष्ठिने नम:
४०) ॐ पशुपतये नम:
४१) ॐ पवनाशिने नम:
४२) ॐ बलप्रदाय नम:
४३) ॐ दामोदराय नम:
४४) ॐ दैत्यहंत्रे नम:
४५) ॐ दयारुपाय नम:
४६ ) ॐ धनप्रदाय नम:
४७) ॐ मतिदायिने नम:
४८) ॐ महामायिने नम:
४९) ॐ मधुवैरिणे नम:
५०) ॐ महोरगाय नम:
५१) ॐ भुजगेशाय नम:
५२) ॐ भूमरुपाय नम:
५३) ॐ भीमकायाय नम:
५४) ॐ भयापहृते नम:
५५) ॐ शुक्लरुपाय नम:
५६) ॐ शुद्धदेहाय नम:
५७) ॐ शोकहारिणे नम:
५८) ॐ शुभप्रदाय नम:
५९) ॐ संतानदायिने नम:
६०) ॐ सर्पेशाय नम:
६१) ॐ सर्वदायिने नम:
६२) ॐ सरीसृपाय नम:
६३) ॐ लक्ष्मीकराय नम:
६४) ॐ लाभदायिंने नम:
६५) ॐ ललिताय नम:
६६) ॐ लक्ष्मणाकृतये नम:
६७) ॐ दयाराशये नम:
६८) ॐ दाशराथये नम:
६९) ॐ दैत्यहंत्रे नम:
७०) ॐ दमाश्रयाय नम:
७१) ॐ रम्यप्रियाय नम:
७२) ॐ रामभक्ताय नम:
७३) ॐ रणधीराय नम:
७४) ॐ रतिप्रदाय नम:
७५) ॐ सौमित्रये नम:
७६) ॐ सोमसंकाशाय नम:
७७) ॐ सर्पराजाय नम:
७८) ॐ सतांप्रियाय नम:
७९) ॐ कर्बुराय नम:
८०) ॐ काम्यफलदाय नम:
८१) ॐ किरीटिने नम:
८२) ॐ किन्नरार्चिताय नम:
८३) ॐ पातालवासिने नम:
८४) ॐ परमाय नम:
८५) ॐ फणामंडलमंडिताय नम:
८६) ॐ बाहुलेयाय नम:
८७) ॐ भक्तनिधये नम:
८८) ॐ भूमिधारिणे नम:
८९) ॐ भवप्रियाय नम:
९०) ॐ नारायणाय नम:
९१) ॐ कंबलाय नम:
९२) ॐ नानारुपाय नम:
९३) ॐ नतप्रियाय नम:
९४) ॐ काकोदराय नम:
९५) ॐ काम्यरुपाय नम:
९६) ॐ कल्याणाय नम:
९७) ॐ कामितार्थदाय नम:
९८) ॐ हतासुराय नम:
९९) ॐ हल्यहीनाय नम:
१००) ॐ हर्षदनाय नम:
१०१) ॐ हरभूषणाय नम:
१०२) ॐ जगदादये नम:
१०३) ॐ जराहीनाय नम:
१०४) ॐ जातिशून्याय नम:
१०५) ॐ जगन्मयाय नम:
१०६)ॐ वंध्यात्वदोषशमनाय नम:
१०७) ॐ वरपुत्रफलप्रदाय नम:
१०८) ॐ वासुकिये नम:

अब एक आचमनी जल अर्पण कऱे
अनेन अष्टोत्तर शत नामावली द्वारा पूजनेन नागमंडल देवता प्रीयंतां मम ..
ॐ नम: शिवाय.. ॐ नम: शिवाय .. ॐ नम: शिवाय ..

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