जय माता दी -श्री माता वैष्णो देवी -SMVD Katra

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जय माता दी -श्री माता वैष्णो देवी -SMVD Katra जय माता दी

जय माता वैष्णो देवी 🙏
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जय माता वैष्णो देवी 🙏

जय माता दी
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22/01/2023

. जय माता दी 🙏 गुप्त नवरात्रि🙏

हिन्दू धर्म में नवरात्रि के पर्व का विशेष महत्व होता है। पूरे साल में चार नवरात्र मनाए जाते हैं। अधिकांश लोग साल के दो नवरात्रियों के बारे में ही जानते हैं। ये चैत्र और शारदीय नवरात्र कहलाते हैं। लेकिन इन दो नवरात्रों के अलावा भी दो नवरात्र और होते हैं। जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है। यह गुप्त नवरात्र माघ और आषाढ़ मास में आते हैं। माघ महीने यानि जनवरी-फरवरी में पड़ने के कारण इन नवरात्र को माघी नवरात्र भी कहा जाता है।
हिन्दू कलेंडर के अनुसार माघ महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर नवमी तिथि तक माघ गुप्त नवरात्र मनाए जाते हैं। ये नवरात्रि भी नॉर्मल नवरात्रियों की तरह नौ दिन ही मनाई जाती हैं। गुप्त नवरात्रियों में माँ भगवती की पूजा की जाती है। गुप्त नवरात्रियों का महत्व चैत्र और शारदीय नवरात्रियों से भी ज्यादा होता है। क्योंकि गुप्त नवरात्रियों में माँ दुर्गा शीघ्र प्रसन्न होती हैं। गुप्त नवरात्र को खासतौर से तंत्र-मंत्र और सिद्धि-साधना आदि के लिए बहुत ही खास माना जाता है। इस दौरान व्यक्ति ध्यान-साधना करके दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति कर सकता है। इस समय की गई साधना शीघ्र फलदायी होती है।
इस नवरात्र को करने में साधक को पूर्ण संयम और शुद्धता के साथ माँ भगवती की आराधना करनी चाहिए। गुप्त नवरात्रि की पूजा के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ-साथ दस महाविद्यियाओं की भी पूजा का विशेष महत्व है। ये दस महाविद्याएं माँ काली, तारा देवी, त्रिपुर सुन्दरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगुलामुखी, मातंगी और कमला देवी हैं। क्योंकि इस दौरान माँ की आराधना गुप्त रूप से की जाती है, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है।
सांसारिक लोग इस नवरात्रि को भी ठीक उसी तरह मनाएं जिस तरह आप लोग चैत्र और शारदीय नवरात्रियों को मनाते हैं। गुप्त नवरात्रों के नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा करें। माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा नवरात्र के भिन्न-भिन्न दिन की जाती है।

कलश स्थापना मुहूर्त:
09:55 AM से 11:13 AM
अभिजीत मुहूर्त:
12:12 PM से 12:54 PM

"जय माता दी 🙏

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मां शैलपुत्री की क्यों होती है प्रथम पूजा -
मां दुर्गा के नौ रुपों में पहला रुप है शैलपुत्री का । नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना के साथ देवी के इसी रुप की पूजा की जाती है । मां का यह रुप सौम्य और भक्तों को प्रसन्नता देने वाला है । ऐसी मान्यता है कि देवी पार्वती पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थी । दक्ष के यज्ञ कुंड में जलकर देवी सती ने जब अपने प्राण त्याग दिए तब महादेव से पुनः मिलन के लिए उन्होंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रुप में जन्म लिया । पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये हेमवती और उमा नाम से जानी जाती हैं । पर्वत को शैल भी कहा जाता है इसलिए माता का प्रथम रुप शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है । मान्यता है कि देवी पार्वती ने अपने पूर्वजन्म के पति भगवान शिव को पुनः पाने के लिए वर्षों कठोर तप किया । इनके तप से प्रसन्न होकर महादेव ने पार्वती को पत्नी रुप में स्वीकार कर लिया । विवाह के पश्चात देवी पार्वती अपने पति भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं । इसके बाद मां पार्वती हर साल नवरात्र के नौ दिनों में पृथ्वी पर माता-पिता से मिलने अपने मायके आने लगीं । संपूर्ण पृथ्वी माता को मायका माना जाता है । नवरात्र के पहले दिन पर्वतराज अपनी पुत्री का स्वागत करके उनकी पूजा करते थे इसलिए नवरात्र के पहले दिन मां के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है । भगवती का वाहन बैल है । इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है । साथ ही इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है । दुर्गम स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की स्थापना इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके ।

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