नगर आर्य समाज गुलाबसागर जोधपुर Nagar Aryasamaj Gulabsagar Jodhpur

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नगर आर्य समाज गुलाबसागर जोधपुर Nagar Aryasamaj Gulabsagar Jodhpur नगर आर्य समाज गुलबसागर जोधपुर, जोधपुर

वैदिक धर्म संसार का एकमात्र धर्म है जो ईश्वरीय ज्ञान वेदों में निहित है! अन्य हो भी अपने को धर्म कहते हैं, वस्तुत: वे संप्रदाय है, और किसी समुदाय विशेष के हित में काम करते हुए दुराग्रह से दूसरों का विरोध करने को बाध्य है!
संसार का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है! इसी दिशा में नगर आर्य समाज भी सक्रिय है और आपको भी सादर आमंत्रित करता है! यदि आर्यसमाज से नहीं जुड़ेंगे तो कुछ भी हाथ नहीं आएगा!
संसार के श्रेष्ठ पुरुषों एक हो! आर्य समाज में स्वगत है!

15/08/2025
शारदीय नवसस्येष्टि पर आपको, आपके परिवार और ईष्ट मित्रों को हार्दिक शुभ कामनाएँ देते हुए  हम आप सबके उज्जवल भविष्य, सुख, ...
01/11/2024

शारदीय नवसस्येष्टि पर आपको, आपके परिवार और ईष्ट मित्रों को हार्दिक शुभ कामनाएँ देते हुए हम आप सबके उज्जवल भविष्य, सुख, समृद्धि, आरोग्य और धर्म-सिद्धि की कामना करते हैं! दीपावली का यह ज्योतिर्मय पर्व आपके जीवन को सदा आलोकित करता रहे, नवान्न की तरह आपके जीवन में ताजगी लाये, खुशियों के धमाकों से मुसीबतों की धज्जियाँ उड़ाता जाए! भाव दीपों में रिश्तों की बाती स्नेह-घृत से सिंचित करके सदा प्रज्ज्वलित रखने हेतु सभी सिद्ध-संकल्प होवें!
सत्य के सच्चे स्वीकर्त्ता, अटल विश्वासी, अनुपम उपासक, प्रचारक और आग्रही;
वेदों को निर्द्वंद्व ईश्वरीय और सत्यविद्या के आगार सिद्ध करनेवाले वेदोद्धारक;
सभी से दुराग्रह का त्याग करवा कर, सर्वतंत्र सिद्धांत: अर्थात् विश्व में अशांति वैमनस्य और हिंसा का कारण बने संप्रदायों का मैल हटा कर उनका एकीकरण कर सत्य वैदिकधर्म की पुनर्स्थापना के स्वप्नदृष्टा;
देशी और विदेशी मत-संप्रदायों के खंडनकर्त्ता;
विशेषकर विधवाओं सहित नारी जाति, अछूतों, गौ,
अनाथों, विद्याहीनों के उद्धारक;
अंधविश्वासों और कुरीतियों के प्रबल भंजनकर्त्ता ;
प्राचीन भारतीय गौरव के प्रकाशक;
विदेशी राज्य के विरोधकर्त्ता;
स्वाधीनता के मंत्रदाता;
स्वतंत्रता संग्राम के 85% शहीदों की प्रेरणा के स्रोत;
विवेक के विरले विग्रह,
क्या-क्या गिनाऊँ ??
सारी दुनिया को सत्य ज्ञान और विवेक का अनुपम अमृत पिलाने वाले महर्षि ने ,
चक्रवर्ती से दास बन गए भारत को,
सोने की चिड़िया से दीन बने भारत को,
विश्व गुरु से अनपढ़ बन चुके भारत को,
पुरुषार्थी से अकर्मण्य हो चुके भारत को,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण छोड़ अंधविश्वासों, भ्रम और
कुरीतियों को अपना चुके भारत को;
धर्म, धन, वेदविद्या, लाखों ललना, लाल खोकर स्वयं को भूल चुके भारतीयों को;
अपनी गौरवमयी प्राचीन पहचान का प्रकाश दिया; तार्किक व और विवेक दिया,
इस देश के लाल, ललना, ज्ञान, सम्पदा, प्रभुत्व और धर्म को ग्रस रहे विदेशी सम्प्रदायों को जिसने अपनी प्रखर किरणों से जलाया,
स्वयं को परमात्मा के दलाल (नबी, पैगम्बर, पुत्र, भक्त या संदेशवाहक के रूप में) ने सत्य की कसौटी नहीं बताई. बल्कि अपनी बात न मानने पर हत्या तक कर देने के आदेश तक दिए.
किन्तु महर्षि ने मानवमात्र के ज्ञानचक्षु खोलने के लिए पञ्च परीक्षा बताई:
पञ्च-परीक्षा:“परीक्षा पांच प्रकारसे होती है एक-जो -जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और वेदों से अनुकूल हो वह-वह सत्य और उससे विरुद्ध असत्य है। दूसरी-जो-जो सृष्टिक्रम से अनुकूल वह-वह सत्य और जो-जो सृष्टिक्रम से विरुद्ध है वह सब असत्य है। जैसे-कोई कहै ‘विना माता पिता के योग से लड़का उत्पन्न हुआ’ ऐसा कथन सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से सर्वथा असत्य है। तीसरी-‘आप्त’ अर्थात् जो धार्मिक विद्वान्, सत्यवादी, निष्कपटियों का संग उपदेश के अनुकूल है वह-वह ग्राह्य और जो-जो विरुद्ध वह-वह अग्राह्य है। चौथी-अपने आत्मा की पवित्रता विद्या के अनुकूल अर्थात् जैसा अपने को सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है वैसे ही सर्वत्र समझ लेना कि मैं भी किसी को दुःख वा सुख दूँगा तो वह भी अप्रसन्न और प्रसन्न होगा। और पांचवीं-आठों प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव....” क्यों बताई यह परीक्षा ?
सत्य के उपासक महर्षि दयानंद ने पञ्च परीक्षा दी क्योंकि वे सत्य के ग्रहण करने और असत्य के त्याग करने का आह्वान सबसे करते हैं।
महर्षि दयानंद सरस्वती सत्य के साथ झूठ के लेश मात्र संग को भी विषययुक्त षटरस व्यंजनों के समान त्याज्य मानते हैं।
महर्षि दयानंद सरस्वती अविद्या के नाश और विद्या की वृद्धि करने का आह्वान सबसे करते हैं। वे स्वयं आजीवन उपदेश, शास्त्रार्थ, पत्रव्यवहार, विज्ञापन, पुस्तक प्रकाशन और शास्त्रार्थ के द्वारा विद्या की वृद्धि ही करते रहे।
दया के सागर महर्षि दयानंद सरस्वती अविद्या के नाश का प्रयास करते रहे, जिसके कारण उन्हें १७ बार विष दिया गया, अनेकों बार तलवार, गालियाँ और पत्थरवर्षा का प्रयोग उन पर हुआ
और अंततः जोधपुर में विष देकर उनके प्राण सत्य, विद्या, धर्म और वेद के विरोधियों ने ले लिए।
महर्षि दयानंद सरस्वती का परमपिता परमेश्वर में अटल और अटूट विश्वास था। वे जानते थे मानते थे और प्रचारित भी करते थे कि परमपिता परमात्मा का कोई भी स्थानापन्न नहीं हो सकता इसीलिए रचयिता की जगह रचनाओं को पूजने वाले स्वयं नास्तिक लोग महर्षि दयानंद सरस्वती को नास्तिक कहते हैं
महर्षि दयानंद सरस्वती वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) को निर्द्वंद्व रूप से ईश्वरीय ज्ञान मानते थे और उनके ईश्वरीय ज्ञान होने के प्रमाण भी उन्होंने ऋग्वदादिभाष्यभूमिका और सत्यार्थप्रकाश में भी दिए हैं।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने "बाबा वाक्यम् प्रमाणम्" मानकर अंधानुकरण ना करते हुए, जो कुछ भी लिखा हुआ है उसे सत्य नहीं मान लिया। बल्कि तर्क, युक्ति, प्रमाण, बुद्धि विवेक आदि कसौटियों पर उन्हें खूब कसा और नीर क्षीर विवेक अपनाते हुए सत्य ग्रंथों को एक तरफ किया और .....
और असत्य ग्रंथों को एक तरफ किया; साथ ही मिलावटी ग्रंथों में मिलावट को भी इंगित किया!
भारत की इस महान् विभूति और विरले अद्भुत् स्वप्नदृष्टा के बलिदान दिवस पर आओ !!... हम भी संकल्प लें कि हम -
"दयानंद के वीर सैनिक बनेंगे!
दयानंद का काम पूरा करेंगे!!
उठाये ध्वजा धर्म की हम फिरेंगे!
उसी के लिए हम जियेंगे मरेंगे !!"

शुभकामनाओं सहित:
सपरिवार कमल किशोर आर्य।
जोधपुर (राजस्थान)
स्वार्थी और अज्ञानी ही महर्षि दयानंद
व आर्यसमाज का विरोधी हो सकता है.
महर्षि प्रणीत सत्यार्थप्रकाश, संस्कारविधि व ऋग्वेददादिभाष्यभूमिका तो अवश्य पढ़ें !!

27/09/2024
सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए ।किंतु सत्य की पहचान नहीं होने से मनुष्य सत्य को जानन...
25/04/2023

सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए ।
किंतु सत्य की पहचान नहीं होने से मनुष्य सत्य को जानने मैं असमर्थ रहता है ।
महर्षि दयानंद सरस्वती के अलावा किसी भी महापुरुष ने सत्य की कसौटी नहीं दी है।
महर्षि दयानंद ने सत्य को कसौटी पर कसने के लिए एक नहीं पांच कसौटियाँ दी है । सत्यार्थ प्रकाश में पढें।
यह समाचार उदाहरण है सत्य की पहचान नहीं कर सकने वाले मनुष्यों के मस्तिष्क को कुंद कर उनको भेड़े बना कर अपने पीछे कर लेने का।
परिणाम चाहे कुछ भी हो।
इसी जड़ता ने पड़कर स्वयं स्त्री अपनी स्वतंत्रता का विरोध करती है। तीन तलाक और पर्दा प्रथा का समर्थन करती है। दहेज से पीड़ित सास बहू से दहेज मांगती है। दशहरे पर भी और ईद पर भी निरीह मूक प्राणियों की निर्दयतापूर्वक हत्या के विरोध को अपनी भावना नाम दिए हुए भ्रम को ठेस पहुंचाना बताते हैं।
ऐसे ही लोग जहां प्रचार करते हैं वहां कहते हैं कि अपना धर्म छोड़ दो, हमारा मत स्वीकार कर लो! हमारा खुदा या गॉड या भगवान तुम्हारे सारे दुख, दर्द और अभाव को हर लेगा। किंतु उसके बाद बड़ी बेशर्मी से आरक्षण की मांग करते हैं।

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Jodhpur
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