परमात्मा ज्योतिषी दर्शन बहुउद्देशीय आयुर्वेद अनुसंधान केंद्र

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09/05/2016

अपार धन की प्राप्ति हर मनुष्य की चाहत होती है। लेकिन यह धन आपको सिर्फ चाहने भर से नहीं मिलने वाला। उसके लिए आपको मां लक्ष्मी को प्रसन्न करना बहुत जरूरी है।
आइए कुछ आसान टिप्स अपना कर पाएं मां लक्ष्मी की कृपा ‍प्राप्ति और हो जाए धन-दौलत से समृद्ध…

लाल धागे में सातमुखी रुद्राक्ष गले में धारण करने से धन की प्राप्ति होती है।

सवा पांच किलो आटा एवं सवा किलो गुड़ लें। दोनों का मिश्रण कर रोटियां बना लें। गुरुवार के दिन सायंकाल गाय को खिलाएं। तीन गुरुवार तक यह कार्य करने से दरिद्रता समाप्त होती है।

ॐ श्री ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नमः। इस मंत्र की कमलगट्टे की माला से प्रतिदिन जप करने से ऋणमुक्ति होती है।
मां लक्ष्मी की प्रतिमा के सामने 11 दिनों तक अखंड ज्योत (तेल का दीपक) प्रज्ज्वलित करें। 11वें दिन 11 कन्या को भोजन कराकर एक सिक्का व मेहंदी दें।

अगर आप अपार धन-समृद्धि चाहते हैं, तो आपको पके हुए मिट्टी के घड़े को लाल रंग से रंगकर, उसके मुख पर नाड़ा यानी मौली बांधकर तथा उसमें जटायुक्त नारियल रखकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर देना चाहिए।

यदि कठोर मेहनत के बाद भी व्यापार ना बढ़े और धन आकर बार-बार खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें।

– किसी गुरु पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन सुबह-सुबह हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे ‘संकटनाशन गणेश स्तोत्र’ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूंग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रुपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिनी सूंड के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नई थैली बना कर बदलते रहें।

रूके हुए आर्थिक कार्यों की सिद्धि के लिए यह टोटका बहुत ही लाभदायक है

किसी भी गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई हो। उनकी आराधना करें। उनके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो इस लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। प्रतिदिन एक लौंग और एक सुपारी अलग से भी साथ में रखें। काम पर जाने से पहले लौंग चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें ‘जय गणेश काटो कलेश’।

किसी भी आर्थिक कार्य में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें-

सरसो के तेल में सिके गेहूं के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूए, सात मदार (आक) के फूल, सिंदूर, आटे से तैयार सरसो के तेल का दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात में किसी चौराहे पर रख कर कहें -‘हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूं कृपा करके मेरा पीछा ना करना।’ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।

09/05/2016

लग्न कुंडली से जानिए अपने ईष्ट देव
हम सब प्रतिदिन विभिन्न देवी -देवताओं का पूजन करते हैं। लगभग सभी सकाम पूजा ही करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हम हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए ही ईश्वर को मानते है। बहुत कम लोग होते हैं निष्काम पूजा करते हैं। बहुत सारे लोगों कि यह शिकायत होती है कि वो पूजा -व्रत आदि बहुत करते हैं फिर भी फल नहीं मिलता।
मैं यहाँ कहना चाहूंग कि हमें काम तो बिजली विभाग में होता है और चले जाते हैं जल-विभाग में ! जब हम गलत कार्यालय में जायेंगे तो काम कैसे होगा। इसी प्रकार हर कुंडली के अनुसार उसके अपने अनुकूल देवता होते हैं।
किसी भी कुंडली के लग्न /प्रथम भाव , पंचम भाव और नवम भाव में स्थित राशि के अनुसार इष्ट देव निर्धारित होते है और इनके अनुसार ही रत्न धारण किये जा सकते हैं।
मेष लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर प्रथम राशि मेष होती है तो वह मेष लग्न की कुंडली कही जायेगी। मेष लग्न में पांचवे भाव में सिंह राशि और नवम भाव में धनु राशि होती है।
मेष राशि का स्वामी मंगल , सिंह राशि का स्वामी है सूर्य और धनु राशि का स्वामी वृहस्पति है। इस कुंडली के लिए अनुकूल देव हनुमान जी , सूर्य देव और विष्णु भगवान है ।
मेष लग्न के लिए हनुमान जी की आराधना , मंगल के व्रत , सूर्य चालीसा , आदित्य - हृदय स्त्रोत , राम रक्षा स्त्रोत , रविवार का व्रत , वृहस्पति वार का व्रत , विष्णु पूजन करना चाहिए। मूंगा , माणिक्य और पुखराज रत्न अनुकूल रहेंगे।


वृषभ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वितीय राशि वृषभ होती है तो वह वृषभ लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृषभ लग्न में पांचवे भाव में कन्या राशि और नवम भाव में मकर राशि होती है।
वृषभ राशि का स्वामी शुक्र , कन्या राशि का बुध और मकर राशि के स्वामी शनि देव है।
वृषभ लग्न वालों के लिए लक्ष्मी देवी , गणेश जी और दुर्गा देवी की आराधना उचित रहेगी। लक्ष्मी चालीसा , दुर्गा चालीसा और गणेश चालीसा का पाठ करना चाहिए।
इस लग्न के लिए हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है ।
मिथुन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर तृतीय राशि मिथुन होती है तो वह मिथुन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मिथुन लग्न में पांचवे भाव में तुला राशि और नवम भाव में कुम्भ राशि होती है।
मिथुन राशि का स्वामी बुध , तुला राशि का शुक्र और कुंभ राशि का स्वामी शनि देव हैं।
इस लग्न के लिए गणेश जी , लक्ष्मी देवी और काली माता अराध्य होगी। कुम्भ राशि के स्वामी शनि होने के कारण शनि देव को प्रसन्न और शांत रखने के उपाय किये जा सकते हैं।
इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा और नीलम अनुकूल रत्न हैं।
कर्क लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर चतुर्थ राशि कर्क होती है तो वह कर्क लग्न की कुंडली कही जायेगी। कर्क लग्न के पांचवे भाव में वृश्चिक राशि और नवम भाव में मीन राशि होती है।
कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा,वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल और मीन राशि के स्वामी वृहस्पति होते है। इस लग्न के लिए शिव जी , हनुमान जी और विष्णु जी अराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए मोती , मूंगा और पुखराज अनुकूल रत्न हैं।
सिंह लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर पंचम राशि सिंह होती है तो वह सिंह लग्न की कुंडली कही जायेगी। सिंह लग्न के पांचवे भाव में धनु राशि और नवम भाव में मेष राशि होती है।
सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव , धनु राशि के स्वामी वृहस्पति और मेष राशि के स्वामी मंगल होता है।
इस लग्न के लिए सूर्य देव , विष्णु जी और हनुमान जी आराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए माणिक्य , मूंगा और पुखराज रत्न अनुकूल होते हैं।
कन्या लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर षष्ठ राशि कन्या होती है तो वह कन्या लग्न की कुंडली कही जायेगी। इस लग्न के पांचवे भाव में मकर राशि और नवम भान में वृषभ राशि होती है।
कन्या राशि का स्वामी बुध , मकर राशि का स्वामी शनि और वृषभ राशि का स्वामी शुक्र होता है।
इस लग्न के लिए गणेश जी , दुर्गा देवी ,लक्ष्मी देवी आराध्य देव होते हैं और पन्ना, नीलम और हीरा अनुकूल रत्न होते हैं।
तुला लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर सप्तम राशि तुला हो तो वह तुला लग्न की कुंडली कही जायेगी। तुला लग्न में पांचवे भाव में कुम्भ राशि और नवम भाव में मिथुन राशि होती है। तुला राशि का स्वामी शुक्र , कुम्भ राशि का स्वामी शनि और मिथुन राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए लक्ष्मी देवी , काली देवी , दुर्गा देवी और गणेश जी आराध्य देव हैं और हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है।
वृश्चिक लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर अष्ठम राशि वृश्चिक हो तो वह वृश्चिक लग्न की कुंडली कही जायेगी। वृश्चिक लग्न में पांचवे भाव में मीन राशि और नवम भाव में कर्क राशि होती है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल , मीन राशि का स्वामी वृहस्पति और कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा होता है। इस लग्न के लिए हनुमान जी , विष्णु जी और शिव जी अराध्य देव होते है और मूंगा , पुखराज और मोती अनुकूल रत्न है।
धनु लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर नवम राशि धनु हो तो वह धनुलग्न की कुंडली कही जायेगी। धनु लग्न में पांचवे भाव में मेष राशि और नवम भाव में सिंह राशि होती है। धनु राशि का स्वामी वृहस्पति , मेष राशि का स्वामी मंगल और सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी ,हनुमान जी और सूर्य देव आराध्य देव हैं और पुखराज , मूंगा और माणिक्य अनुकूल रत्न है।
मकर लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर दशम राशि मकर हो तो वह मकर लग्न की कुंडली कही जायेगी। मकर लग्न में पांचवे भाव में वृषभ राशि और नवम भाव में कन्या राशि होती है। मकर राशि का स्वामी शनि , वृषभ राशि का स्वामी शुक्र और कन्या राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए शनि देव , हनुमान जी , दुर्गा देवी , लक्ष्मी देवी और गणेश जी आराध्य देव है और नीलम , हीरा और पन्ना अनुकूल रत्न है।
कुम्भ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर एकादश राशि कुम्भ हो तो वह कुम्भ लग्न की कुंडली कही जायेगी। कुम्भ लग्न में पांचवे भाव में मिथुन राशि और नवम भाव में तुला राशि होती है।कुम्भ राशि का स्वामी शनि , मिथुन राशि का स्वामी बुध और तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लगन के लिए शनि देव , काली देवी , गणेश जी , दुर्गा देवी और लक्ष्मी देवी आराध्य देव है और नीलम , पन्ना और हीरा अनुकूल रत्न है।
मीन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वादश राशि मीन हो तो वह मीन लग्न की कुंडली कही जायेगी। मीन लग्न में पांचवे भाव में कर्क राशि और नवम भाव में वृश्चिक राशि होती है। मीन राशि का स्वामी वृहस्पति , कर्क राशि का स्वामी चन्द्र और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है। इस लग्न के लिए विष्णु जी , शिव जी और हनुमान जी आराध्य देव है और पुखराज , मोती और मूंगा अनुकूल रत्न है।

27/04/2016

भोजन और प्रसाद में इतना ही अंतर हे,की भोजन थाली भर भर कर लेते हें और छोड़ देते हैं...और प्रसाद जमीन पर भी गिर जाये उठा कर खा लेते हैं..

भोजन को हमेशा प्रसाद ही समझे तो कभी अन्न बर्बाद नही होगा....विन्र्म अनुरोध...की शादियों पार्टी होटलों में और कहीं अन्य जगाहों पर उतना ही भोजन लें जितना पर्याप्त हो..बर्बाद न करें......

अन्न व जल ही जीवन है इसका सही उपयोग करें ।
Astro sunil

27/04/2016

हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-

1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।

2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।

3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।

4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।

5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।

6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।

7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।

8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।

9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।

10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।

11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।

12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।

13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।

14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।

15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।

16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।

17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।

18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।

19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।

20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।

21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।

22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।

23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।

24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।

25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।

26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।

27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।

28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।

29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।

30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।

31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।

32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।

33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।

34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।

35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।

36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते है

27/04/2016

आज हम शनि देव की कुछ जानकारी दे रहे हे।अगर आपकी कुंडली में शनि देव दूसरे छठे आठवे बारहवें भाव में हो तो आपको शारारिक और मानसिक पीड़ा होती रहती हे।अगर शनि रेखा हाथ में शनि पर्वत से आगे निकल कर शनि उँगली को छु लेवे तो आपको शत्रु बार बार परेशान करेंगे।अगर शनि की महादशा अंतर्दशा चल रही हे तो या कोई भी शत्रु से परेशानी हो तो आप एक कासी की कटोरी में तेल डालकर काले तिल डालकर लोहे की कीले डालकर अपने सर पर 7 बार घुमाकर शनि मन्दिर में दान करें।जब भी शनि देव को आप तेल अर्पण करे तो उनके सामने खड़े नही हो तिरछे खड़े होकर ही तेल अर्पण करें।अगर आप शनि देव के सीधे हाथ पर खड़े होकर तेल अर्पण करे तो सभी शत्रु धीरे धीरे अपनी शत्रुता छोड़ने लग जाते हे।अगर आप शनि देव के उलटे हाथ पर खड़े होकर तेल अर्पण करते हे तो आपको अचानक धन प्रप्ति के योग बनते हे।आपको शनि देव की आँखों में नही देखना हे ।आप उनके चरण की और ही देखे तो जल्दी आपको आपके कार्य का फल मिलता हे।अगर आप शनि देव की सवारी को भी तेल अर्पण करते हे तो जिनकी भी आप सेवा करते हे मदद करते हे वे सभी आपकी मदद के लिए भी तैयार होते हे।

27/04/2016

क्या संकेत देता है तुलसी का मुरझाया पौधा?.........................

1. प्रकृति की खासियत
प्रकृति की अपनी एक अलग खासियत है। इसने अपनी हर एक रचना को बड़ी ही खूबी और विशिष्ट नेमत बख्शी है। इंसान तो वैसे भी प्रकृति की उम्दा रचनाओं में से एक है जो समझदारी और सूझबूझ से काम लेता है। इसके अलावा जानवरों की खूबी ये है कि वे आने वाले खतरे, मसलन भूकंप, सुनामी, पारलौकिक ताकतों आदि को पहले ही भांप सकने में सक्षम होते हैं। लेकिन बहुत ही कम लोग यह बात जानते हैं कि पौधों के भीतर भी ऐसी ही अलग विशेषता है, जिसे अगर समझ लिया जाए तो घर के सदस्यों पर आने वाले कष्टों को पहले ही टाला जा सकता है।

2. क्यों मुरझाता है तुलसी का पौधा
शायद कभी किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि चाहे तुलसी के पौधे पर कितना ही पानी क्यों ना डाला जाए, उसकी कितनी ही देखभाल क्यों ना की जाए, वह अचानक मुरझाने या सूखने क्यों लगता है?

3. क्या बताना चाहता है
आपको यकीन नहीं होगा लेकिन तुलसी का मुरझाया हुआ पौधा आपको यह बताने की कोशिश कर रहा होता है कि जल्द ही परिवार पर किसी विपत्ति का साया मंडरा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि अगर परिवार के किसी भी सदस्य पर कोई मुश्किल आने वाली है तो उसकी सबसे पहली नजर घर में मौजूद तुलसी के पौधे पर पड़ती है।

4. हिन्दू शास्त्र
शास्त्रों में यह बात भली प्रकार से उल्लिखित है कि अगर घर पर कोई संकट आने वाला है तो सबसे पहले उस घर से लक्ष्मी यानि तुलसी चली जाती है और वहां दरिद्रता का वास होने लगता है।

5. बुध ग्रह
जहां दरिद्रता, अशांति और कलह का वातावरण होता है वहां कभी भी लक्ष्मी का वास नहीं होता। ज्योतिष के अनुसार ऐसा बुध ग्रह की वजह से होता है क्योंकि बुध का रंग हरा होता है और वह पेड़-पौधों का भी कारक माना जाता है।

6. लाल किताब
ज्योतिष शास्त्र से संबंधित लाल किताब के अनुसार बुध को एक ऐसा ग्रह माना गया है जो अन्य ग्रहों के अच्छे-बुरे प्रभाव को व्यक्ति तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला है तो उसका असर बुध ग्रह से संबंधित वस्तुओं पर भी होगा और अगर कोई अच्छा फल मिलने वाला है तो उसका असर भी बुध ग्रह से जुड़ी चीजों पर दिखाई देगा।

7. अच्छा और बुरा प्रभाव
अच्छे प्रभाव में पेड़-पौधे फलने-फूलने लगते हैं और बुरे प्रभाव में मुरझाकर अपनी दुर्दशा बयां कर देते हैं।

8. विभिन्न प्रकार की तुलसी
शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधों का जिक्र मिलता है, जिनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से उल्लिखित हैं। इन सभी के गुण अलग-अलग और विशिष्ट हैं। तुलसी मानव शरीर में कान, वायु, कफ, ज्वर, खांसी और दिल की बीमारियों के लिए खासी उपयोगी है।

9. वास्तुशास्त्र में तुलसी
वास्तुशास्त्र में भी तुलसी को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वास्तु के अनुसार तुलसी को किसी भी प्रकार के दोष से मुक्त रखने के लिए उसे दक्षिण-पूर्व से लेकर उत्तर-पश्चिम, किसी भी स्थान तक लगा सकते हैं। अगर तुलसी के गमले को रसोई के पास रखा जाए तो किसी भी प्रकार की कलह से मुक्ति पाई जा सकती है। जिद्दी पुत्र का हठ दूर करने के लिए पूर्व दिशा में लगी खिड़की के सामने रखें।

10. संतान में सुधार
नियंत्रण या मर्यादा से बाहर निकल चुकी संतान को पूर्व दिशा से रखी गई तुलसी के तीन पत्तों को किसी ना किसी रूप में खिलाने पर वह आपकी आज्ञा का पालन करने लगती है।

11. कारोबार में वृद्धि
कारोबार की चिंता सताने लगी है, घर में आय के साधन कम होते जा रहे हैं तो दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखी तुलसी पर हर शुक्रवार कच्चा दूध और मिठाई का भोग लगाने के बाद उसे किसी सुहागिन स्त्री को दे दें। इससे व्यवसाय में सफलता मिलती है।

12. नौकरी पेशा
अगर आप नौकरी पेशा हैं और ऑफिस में आपका कोई सीनियर परेशान कर रहा है तो ऑफिस की खाली जमीन पर या किसी गमले में, सोमवार के दिन तुलसी के सोलह बीज किसी सफेद कपड़े में बांध कर ऑफिस जाते ही दबा दीजिए। इससे ऑफिस में आपका सम्मान बढ़ेगा।

13. शालिग्राम का अभिषेक
घर की महिलाएं रोजाना पंचामृत बनाकर शालिग्राम का अभिषेक करती हैं तो घर में कभी भी वास्तुदोष की हालत नहीं आएगी।

14. शारीरिक फायदे
ज्योतिष के अलावा शारीरिक तौर पर भी तुलसी के बड़े फायदे देखे गए हैं। सुबह के समय खाली पेट ग्रहण करने से डायबिटीज, रक्त की परेशानी, वात, पित्त आदि जैसे रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है। प्रतिदिन अगर तुलसी के सामने कुछ समय के लिए बैठा जाए तो अस्थमा आदि जैसे श्वास के रोगों से जल्दी छुटकारा मिलता है।

15. वैद्य का दर्जा
शास्त्रों में तुलसी को एक वैद्य का दर्जा भी दिया गया है, जिसका घर में रहना अत्यंत लाभकारी है। मनुष्य को अपने जीवन के प्रत्येक चरण में तुलसी की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही आधुनिक रसायन शास्त्र भी यह बात स्वीकारता है कि तुलसी का सेवन, इसका स्पर्श, दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध होता है।

शिवपुराण के अनुसार, जानिए भगवान शिव को कौन-सा फूलचढ़ाने से क्या फल मिलता है 1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का ...
26/04/2016

शिवपुराण के अनुसार, जानिए भगवान शिव को कौन-सा फूल
चढ़ाने से क्या फल मिलता है
1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर
मोक्ष की प्राप्ति होती है।
2. चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।
3. अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान
विष्णु को प्रिय होता है।
4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।
5. बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।
6. जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर में कभी
अन्न की कमी नहीं होती।
7. कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से नए वस्त्र
मिलते हैं।
8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि
होती है।
9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान
करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।
10. लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है।
11. दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

आपका भाग्य बदल देंगे यह सरल उपाय ----पक्षियों को दाना खिलाने से ग्रह होते हैं शांत======================================...
26/04/2016

आपका भाग्य बदल देंगे यह सरल उपाय ----पक्षियों को दाना खिलाने से ग्रह होते हैं शांत
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हमारे ऋषि-मुनि, संत-महात्मा सही गह गए हैं कि पशु-पक्षियों को दाना-पानी खिलाने से मनुष्य के ज‍ीवन में आने वाली कई परेशानियों से छुटकारा बड़ी ही आसानी से मिल जाता है। एक ओर जहां हम प्रभु की भक्ति के कृपा पात्र बनते हैं वहीं हमें अच्छे स्वास्थ्य के साथ ही पुण्य-लाभ भी प्राप्त होता है।

अगर आपके मन में भी दिनभर बेचैनी-सी रहती है। आपके काम ठीक समय पर पूरे नहीं हो रहे हैं। पारिवारिक क्लेश नियमित रूप से चलता रहता है। स्वास्थ्य ठीक नहीं है आदि.... तो ‍निश्चित ही आपको पक्षियों को दाना खिलाने से आनंद की प्राप्ति होगी और आपके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।

चींटी, चिड़ियों, गिलहरियां, कबूतर, तोता, कौआ और अन्य पक्षियों के झुंड और गाय, कुत्तों को नियमित दाना-पानी देने से आपको मानसिक शांति प्राप्त होगी। अत: पशु-पक्षियों को दाना-पानी देने से ग्रहों के अनिष्ट फल से छुटकारा मिलता है।
* कुंडली में यदि राहु-केतु की महादशा हो तो पशु-पक्षियों को बाजरा डालना चाहिए।

* पशु-पक्षियों को ज्वार खिलाने से शुक्र ग्रह की पीड़ा दूर होती है।

* गेहूं खिलाने से सूर्य की पीड़ा दूर होती है।

* चावल से मानसिक परेशानियां दूर होकर मानसिक शांति मिलती है।

* मूंग की दाल से बुध ग्रह से होने वाली परेशानियों से निजात पाई जा सकती है।
* चने की दाल से गुरु की कृपा प्राप्त होती है।

* कौओं और कुत्तों को ग्रास देने से शनि, राहु और केतु प्रसन्न होते हैं।

* गिलहरियों को बाजरा, बिस्किट, रोटी खिलाने से जीवन में आने वाली हर कठिनाई से आसानी मुक्ति मिल जाती है।

* चींटियों के लिए 100 ग्राम शक्कर या बेसन के लड्डू, पंजीरी खिलाने से आपके स्वास्थ्य में लाभ तो होगा ही, आपको मानसिक शांति का अहसास भी होगा।

आप सब को यह जानकर बहुत खुशी होगी हमारी संस्थान परमात्मा ज्योतिषीय दर्शन आयुर्वेद अनुसंधान केंद्र आयुर्वेद एवं ज्योतिषीय ...
26/04/2016

आप सब को यह जानकर बहुत खुशी होगी हमारी संस्थान परमात्मा ज्योतिषीय दर्शन आयुर्वेद अनुसंधान केंद्र आयुर्वेद एवं ज्योतिषीय के माध्यम से सेवा प्रदान की जाती है इस संस्थान का उद्देश्य सिर्फ सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाना है

यदि दांपत्य जीवन में उथल पुथल है तो बीवी से शादी करो, मान जाएंगे ‘रूठे शुक्र’========================================कुण...
26/04/2016

यदि दांपत्य जीवन में उथल पुथल है तो बीवी से शादी करो, मान जाएंगे ‘रूठे शुक्र’========================================
कुण्डली में शुक्र की स्थिति दांपत्य जीवन को सुख और दुख दोनों से ही भर सकती है। जीवनसाथी का घर कहे जाने वाले कुण्डली के सातवें घर का स्वामी शुक्र को माना गया है।

इस ग्रह की कुछ ग्रहों से गहरी मित्रता है तो कुछ से गहरी शत्रुता। सूर्य, चंद्र , मंगल , गुरु और राहु से शुक्र की नहीं बनती।

2, 3, 4, 7 एवं 12 वें खाने में शुक्र श्रेष्ठ होता है जबकि 1, 6, 9 वें खाने में मंदा। मीन राशि में यह उच्च होता है और कन्या में नीच, मिथुन राशि में यह योग कारक होता है।

सप्तम भाव में यह जिस ग्रह के साथ संबंध बनाता है उस पर अपना डालता है।

पुरुष की कुण्डली में यह पत्नी और स्त्री की कुण्डली में पति की स्थिति को दर्शाता है।

शरीर में जननांग, वीर्य, नेत्र पर शुक्र का प्रभाव रहता है। यह वासना, मैथुन, सुख, ऐश्वर्य, गायन एवं नृत्य का भी अधिपति है। शुक्र वैवाहिक सुख सहित सम्बन्ध विच्छेद का भी कारक है। शुक्र प्रभावित व्यक्ति आशिक मिजाज होता है और सुन्दरता एवं कला प्रेमी होता है

जिस पुरुष की कुण्डली में शुक्र शुभ और उच्च का होता है वह श्रृंगार प्रिय होता है। इन्हें स्त्रियों का साथ पसंद होता है।

पर जब इस ग्रह की स्थिति अशुभ होती है तो यह चारित्रिक दोष एवं पीड़ा दायक होती है।

सातवें खाने में शुक्र, शनि एवं सूर्य की युति होने पर सूर्य मंदा होता है एवं शुक्र भी अशुभ हो जाता है। इस स्थिति में यह संबधों पर बुरा प्रभाव डालता है।

शुक्र अशुभ होने पर व्यक्ति में चारित्रिक दोष होता है.मंदा शुक्र पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन में अशांति और कलह पैदा करता है।

उपाय भी हैं
पत्नी का सम्मान , शुक्रवार का व्रत, मन और हृदय पर काबू रखने के उपाय शुक्र की शुभता को साध सकते हैं।

सात प्रकार के अनाज और चरी का दान करने से भी फायदा होता है। चतुर्थ भाव में शुक्र मंदा होने पर पत्नी से ही दो बार शादी करनी चाहिए। इस उपाय से रूठे शुक्र को मनाया जा सकता है।

यदि अपने  दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना हो तो  करें यह अचूक उपाय---गौशाला में जाकर दूर कर सकते हैं अपनी  कुंडली के दोष ...
26/04/2016

यदि अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना हो तो करें यह अचूक उपाय---गौशाला में जाकर दूर कर सकते हैं अपनी कुंडली के दोष
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कभी-कभी न चाहते हुए भी जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। भाग्य बिल्कुल भी साथ नहीं देता साथ ही दुर्भाग्य निरन्तर पीछा करता रहता है। दुर्भाग्य से बचने के लिए या दुर्भाग्य नाश के लिए करें यहाँ बताए गये उपाय करें। इन्हें पूर्ण आस्था के साथ करने से दुर्भाग्य का नाश होकर सौभाग्य में वृद्धि होती है। बस आप इन उपायों को करते रहें
अगर आपकी कुंडली में काल सर्प दोष , पितृ दोष , मंगल दोष ,ऋण दोष आदि है तो आप गौ शाला में जाये और गाय की सेवा करे तो शत प्रतिशत आप के यह दोष कट जायेंगे में आपको दावे के साथ कहत हूँ !
सभी शास्त्रों में गाय को पूजनीय और पवित्र माना गया है। ऐसा माना जाता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवी-देवता विद्यमान होते हैं। अत: जब भी गाय दिखाई दे तो उसकी पीठ पर हाथ फेरना चाहिए। गाय को सहलाने से वह प्रसन्न होती है और हमारे इस प्रसन्नता से हमारे कई दोष दूर होते हैं। साथ ही इससे हमारी कई असाध्य बीमारियां भी दूर हो जाती हैं। ऐसा कम से कम 12 माह तक करके देखना चाहिए।
गाय का ज्योतिषीय महत्वः-
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1. नवग्रहों की शांति के संदर्भ में गाय की विशेष भूमिका होती है कहा तो यह भी जाता है कि गोदान से ही सभी अरिष्ट कट जाते हैं। शनि की दशा, अंतरदशा, और साढेसाती के समय काली गाय का दान मनुष्य को कष्ट मुक्त कर देता है।

2. मंगल के अरिष्ट होने पर लाल वर्ण की गाय की सेवा और निर्धन ब्राम्हण को गोदान मंगल के प्रभाव को क्षीण करता है।

3. बुध ग्रह की अशुभता निवारण हेतु गौवों को हरा चारा खिलाने से बुध की अशुभता नष्ट होती है।

4. गाय की सेवा, पूजा, आराधना, आदि से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को सुखमय होने का वरदान भी देती हैं।

5. गाय की सेवा मानसिक शांति प्रदान करती है।

हिन्दू धर्म में गाय को देवी माँ का दर्ज़ा दिया जाता है ऐसी मान्यता है की गाय मे ३३ करोड़ देवी देवताओं का निवास है। इसलिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को गाय की सेवा करनी चाहिए। गाय सेवा करने वाला व्यक्ति पुण्य का भागीदार बनता है। एक मात्र गऊ सेवा करने से ही मन, वाणी, कर्म और शरीर की पवित्रता संभव है। और तो और गऊ सेवा से व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कुल की रक्षा कर सकता है, सम्पूर्ण सृष्टि की सुरक्षा केवल गौमाता की रक्षा से ही संभव है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने समय एवं सामर्थ्य के अनुसार गऊओ की सेवा करनी चाहिए। इससे जहां व्यक्ति एवं समाज निरोगी होगा वहीं मानसिक रूप से भी संतुष्ट भी बनेगा।
गाय के पूरे शरीर को ही पवित्र माना गया है लेकिन गाय का मूत्र सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। वैसे भी गौ माता अपने भारत देश की सांस्कृतिक और आर्थिक बुनियाद है। भारत में जितने भी अवतार हुए हैं उन सबने गऊ सेवा की है और अपने प्रिय ठाकुर जी के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। उन्होंने तो गौऒ की विशेष रूप से सेवा की है। ठाकुर जी तो गौ माता को कामधेनु की संज्ञा देते है। गौ रक्षा का वास्तविक अर्थ है समस्त सृष्टि की रक्षा करना। गौ माता पूरे विश्व की सेवा करती है। केवल जिंदा रहने तक ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी वह हमारे काम में आती है।

अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो उसका श्रेय सिर्फ गौ माता को ही जाता है। अगर एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डाला जाए तो उससे एक टन ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। और तो और हम सबने सुन रखा है की हवन मैं आहुतिय देने से देव्ताओ को उनका भोग मिलता है, पैर कैसे कभी भोग मिलता है उनको भोग तब मिलता है जब हम लोग हवन मैं गौघृत को डाले तब सभी ९ ग्रहों को उनका भोग प्राप्त होता है अन्य किसी से नहीं भोग मिलता। गौघृत से आहुति देने से सूर्य की किरणों को ऊर्जा मिलती है। वातावरण शुद्ध होता है, यही ऊर्जा जब वरुण देव को मिलती है तो देश मैं वर्षा होती है। जब समय से वर्षा हो तो उससे ही अन्न, धान ,पेड़-पौधों आदि को जीवन प्राप्त होता है।
जैसे हम सबने सुन रखा है की गौ माता के अंडर ३३ करोड़ देवी देव्ताऊ का निवास होता है तो जब हम लोग उसके गोबर से भूमि का लेप करते है तो उसके अंडर ३३ करोड़ देवी देव्ताऊ की उर्जा आ जाती है और वो पूजास्थल आध्यात्मिक उर्जा का सर्वोच्च स्थल बन जाता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो गो माता का हम सबके जीवन में बहुत महत्व है। गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। जिस किसी को अपने शरीर के अंडर उर्जा का स्थायित्व चाहिए वो गौ माता का दूध पीना प्रारंभ केर दे। मेरी प्रिय ठाकुर जी से यही प्राथना है की हर व्यक्ति के घर में गौ माता का पालन हो । सब लोगों को गोसेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हो । जो परिवार या व्यक्ति गौ माता का पालन या सेवा नहीं कर सकते समयाभाव के कारण वे नित्य प्रति गोमाता का दर्शन अव्य्श्य करें ।

मान्यता है गाय माता अपने बच्चे को दूध पिलाती दिख जाए तो उनका दर्शन बहुत शुभ प्रभाव देता है। गाय माता का दूध ही नहीं बल्कि गोबर और गोमूत्र भी बहुत पवित्र है। जरा सोचें वह स्वयं कितनी पवित्र होगी। उनके शरीर का स्पर्श करने वाली हवा भी पवित्र होती है। जहां गाय बैठती है, वहां की भूमि पवित्र होती है । गाय के चरणों की धूली भी पवित्र होती है। क्या आप जानते हैं गो सेवा करने के क्या-क्या लाभ हैं-

1. भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है।
2. जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है।
3. संतोष मिलता है।
4. धन में वृद्धि होती है।
5. पुण्य की प्राप्ति होती है।
6. संतान की प्राप्ति होती है।
7. दु:ख दर्द दूर होते हैं।
8. ताप-संताप दूर होते हैं।
9. हृदय प्रफुलिलत होता है।
10. मन को शान्ति मिलती है।
11. स्वास्थ्य लाभ होता है।
12. तृप्ति का अनुभव होता है।
13. मनुष्य जनम सफल होता है।
14. परिवार को सुख मिलता है।
15. ग्रह-नक्षत्र अनुकूल हो जाते हैं।
16. अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।
17. गाय सुखी होती है।
18. ईश्वर व संतों की प्रसन्नता प्राप्त होती है।
19. गाय की हत्या रुकती है।
20. राष्ट्र सच्ची प्रगति करता है।
भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही गोधन को मुख्य धन मानते थे, और सभी प्रकार से गौ रक्षा और गौ सेवा, गौ पालन भी करते थे। शास्त्रों, वेदों, आर्ष ग्रथों में गौरक्षा, गौ महिमा, गौपालन आदि के प्रसंग भी अधिकाधिक मिलते हैं। रामायण, महाभारत, भगवतगीता में भी गाय का किसी न किसी रूप में उल्लेख मिलता है। गाय का जहाँ धार्मिक आध्यात्मिक महत्व है वहीं कभी प्राचीन काल में भारतवर्ष में गोधन एक परिवार, समाज के महत्वपूर्ण धनों में से एक है। आज के दौर में गायों को पालने और खिलाने पिलाने की परंपरा में लगातार कमी आ रही है। कभी हमारा देश पशुपालन में अग्रणी रहा है। देशवासियों की काफी जरूरतों को यही गौधन ही पूरा किया करता था। गाय से बछड़ा, बछड़ा से बैल, बैल से खेती की जरूरतें पूरी होती हैं। कृषि के लिए गाय का गोबर आज भी वरदान माना गया है। फिर भी गौ पालन, गौ संरक्षण आदि महत्वपूर्ण क्यों नहीं है? यह एक विचारणीय प्रश्न है।ं।

गाय का आध्यात्मिक महत्वः-
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गाय का विश्व स्तर पर आध्यात्मिक महत्व है, ''गावो विश्वस्य मातरः''। नवग्रहों सूर्य, चंद्रमा, मंगल, राहु, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, केतु के साथ साथ वरूण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी हुई प्रत्येक आहुति गाय के घी से देने की परंपरा है, जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है। यही विशेष ऊर्जा वर्षा का कारण बनती है, और वर्षा से ही अन्न, पेड़-पौधों आदि को जीवन प्राप्त होता है। हिंदू धर्म में जितने धार्मिक कार्य, धार्मिक संस्कार होते हैं जैसे नामकरण, गर्भाधान, जन्म आदि सभी में गाय का दूध, गोबर, घी, आदि का ही प्रयोग किया जाता है जहां विवाह संस्कार आदि होते हैं वहां भी गोबर के लेप से शुद्धिकरण की क्रिया करते हैं। विवाह के समय गोदान का भी बहुत महत्व माना गया है। जनना शौच और मरणाशौच मिटाने के लिए भी गाय का गोबर और गौमूत्र का प्रयोग किया जाता है। इसकी धार्मिक वजह यह भी है कि गाय के गोबर में लक्ष्मी जी का और गोमूत्र में गंगा जी का निवास है।
वैतरणी पार करने के लिए गोदान की प्रथा आज भी हमारे समाज में मौजूद है, श्राद्ध कर्म में भी गाय के दूध की खीर का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसी खीर से पितरों की ज्यादा से ज्यादा तृप्ति होती है। पितर, देवता, मनुष्य आदि सभी को शारीरिक बल गाय के दूध और घी से ही मिलता है। गाय के शारीरिक अंगों में सभी देवताओं का निवास माना जाता है। गाय की छाया भी बेहद शुभ प्रद मानी गयी है। गाय के दर्शन मात्र से ही यात्रा की सफलता स्वतः सिद्ध हो जाती है। दूध पिलाती गाय का दर्शन तो बेहद शुभ माना जाता है।

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342006

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