18/04/2025
प्रिय जैन समाज,
जय जिनेंद्र!
वर्तमान समय में देश में अल्पसंख्यक होना एक अभिशाप बनता जा रहा है। आज अल्पसंख्यक जैन समुदाय के मध्य भय, असुरक्षा और अनिश्चितता की जो भावना व्याप्त है, वो अत्यधिक चिंता का विषय है। जिसकी चर्चा, निंदा और आक्रोशपूर्ण प्रतिक्रिया संपूर्ण विश्व में हो रही है।
शांतिप्रिय जैन समाज पर अचानक बढ़ते जा रहे हमलों की कड़ी में :
- यदि मप्र के सिंगोली थाना क्षेत्र में एक मंदिर के प्रांगण में जैन मुनियों पर हुआ हिंसक हमला शारीरिक हमले की श्रेणी में आता है, तो
- जबलपुर में भाजपा नेता और उनके साथी के बीच लीक हुए टेलीफ़ोनिक ऑडियो में जैनियों के बारे में की गयी बेहद दुर्भावनापूर्ण-आपत्तिजनक टिप्पणियाँ एक वाचिक हमला रहा और
- मुंबई में जैन मंदिर के ध्वस्तीकरण और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों, जिनवाणी व अन्य पूजनीय ग्रंथों और शास्त्रों का निर्वासन और निरादर बेहद गंभीर और घोर निंदनीय कुकृत्य की श्रेणी में आएगा।
आख़िर ये क्यों होता है कि जहाँ-जहाँ भी भाजपा सरकारें हैं, वहाँ-वहाँ जैनियों के तीर्थस्थलों, मंदिरों, जिनालयों, चैत्यालयों, समाजसेवी संस्थानों और समाज के साथ ऐसी विद्वेषपूर्ण घटनाएँ हो रही हैं। एक ऐसा बहुत बड़ा वर्ग है, जो जैनियों की धार्मिक, सार्वजनिक, व्यापारिक-व्यावसायिक ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत संपत्तियों पर भी आँख गड़ाए बैठा है और जैनियों को अल्पसंख्यक ही मानकर उनसे उनका सब कुछ छीन लेना चाहता है :
- चाहे भाजपा शासित गुजरात में ‘श्री गिरनार जी’ के मंदिर पर क़ब्ज़े का प्रकरण हो या
- ‘श्री सम्मेद शिखर जी’ पर केंद्र की भाजपा सरकार का आपत्तिजनक हस्तक्षेप या फिर
- कुछ साल पहले भाजपा राज में ही उप्र के बागपत-बड़ौत के एक जैन कॉलेज की वो घटना जिसमें जैनियों की पूज्य ‘श्रुतिदेवी’ की प्रतिमा स्थापित करने का उग्र विरोध भाजपाई संगी-साथियों ने किया था या फिर
- मप्र के नीमच में एक बुजुर्ग जैन 65 वर्षीय ‘भंवरलाल जैन’ को भाजपा सत्ता समर्थित एक प्रभुत्वशाली व्यक्ति द्वारा थप्पड़ मार-मारकर मार डालने की वीभत्स घटना।
ये सब कुछ जैन समुदाय के उत्पीड़न के ही मामले हैं। ये तो वो घटनाएं हैं जो प्रकाश में आकर उजागर हो गयीं नहीं तो न जाने ऐसे कितने प्रकरण हैं, जहाँ जैन समाज को प्रताड़ित करने का काम वर्चस्ववादी ताकतें हमेशा करती रही हैं।
जैन समाज आज भाजपा से पूछ रहा है कि भाजपा की निगाह में हमारा महत्व क्या सिर्फ़ चंदा देने तक सीमित है, हमारे धर्म की और हमारी रक्षा कौन करेगा? जब हम दबाव डालते हैं तो हर बार बाद में माफ़ी माँगने का नाटक किया जाता है। मंदिर को दुबारा बनाने से मूर्तियों, पूजनीय पुस्तकों और जैन समाज-समुदाय का जो अपमान हुआ है, क्या वो वापस आएगा?
एक अनुकरणीय आदर्श आचार-सहिंता के रूप में जैन समाज का भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति, शिक्षा, सदाचार, समाजसेवा, जीवन मूल्यों पर आधारित ‘जियो और जीने दो’ का महान संदेश देने वाला सहनशीलता व क्षमाशीलता सिखानेवाला मानवीय व्यवहार व समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, प्रेम और अहिंसा का सह अस्तित्वकारी सिद्धांत और साथ ही अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में जो सर्वाधिक अनुपातिक असीम योगदान है, वो अतुलनीय है।