MTY-V Mantra Tantra Yantra-Vigyan

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Power on : Gurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji
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गुरु की शिक्षा ही हमारा सबसे बड़ा बल है। Jai sadgurudev 🙏❤️
21/02/2026

गुरु की शिक्षा ही हमारा सबसे बड़ा बल है।
Jai sadgurudev 🙏❤️

07/02/2026

अपनी सारी चेतना को अपने सारे ज्ञान को और अपने पूरे जीवन के अनुभव को कण-कण को साक्षी भूत रख करके स्पष्ट कहता हूं... मैं आपसे बोहोत प्यार करता हूँ|

Humaare Pyaare Sadgurudev 🥹🥹🙏❤️❤️
Aisa prem, koi nahi kar skta..🤗❤️

🌹🍀तीन दिव्य शिविर: एक ही गुरु चेतना (जहाँ गुरु हैं, वहीं शिव हैं)🍀🌹गुरु सान्निध्य में महाशिवरात्रि साधना महोत्सव❤️❤️गुरु...
05/02/2026

🌹🍀तीन दिव्य शिविर: एक ही गुरु चेतना (जहाँ गुरु हैं, वहीं शिव हैं)🍀🌹

गुरु सान्निध्य में महाशिवरात्रि साधना महोत्सव❤️❤️

गुरु सान्निध्य में महाशिवरात्रि का संपन्न होना केवल एक पर्व का आयोजन नहीं, बल्कि साधक के जीवन में चेतना के जागरण का क्षण होता है। गुरु की कृपा और मार्गदर्शन में की गई साधना, शिव तत्व से साक्षात्कार कराती है। जब शिवरात्रि गुरु सान्निध्य में मनाई जाती है, तब उपासना केवल विधि नहीं रह जाती, वह अनुभूति बन जाती है: जहाँ साधक के भीतर शिव का प्रकाश उतरता है और जीवन के अंधकार का क्षय होता है।🙏❤️

Shivratri Shivir:

1: सद्गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली जी
📍 शिविर स्थल : ओंकारेश्वर

2: सद्गुरुदेव श्री कैलाश चंद्र श्रीमाली जी
📍 शिविर स्थल : काशी विश्वनाथ (वाराणसी)

3: सद्गुरुदेव श्री अरविंद श्रीमाली जी
📍 शिविर स्थल : एलोरा, छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र)

आप सभी का स्वागत है🙏❤️✨️✨️

गुरु वह प्रकाश हैं, जो जीवन के प्रत्येक अंधकार को दूर कर देते हैं।🥰🤗🙏❤️जय सदगुरूदेव 🙏❤️
04/02/2026

गुरु वह प्रकाश हैं, जो जीवन के प्रत्येक अंधकार को दूर कर देते हैं।🥰🤗🙏❤️
जय सदगुरूदेव 🙏❤️

01/02/2026

तुम्हारी चिंताओं का भार मेरे ऊपर है। मैं स्वयं तुम्हारी सारी चिंताओं को ओढ़ लूँगा।

🌹🍀भारतीय संस्कृति और अध्यात्म में 'गुरु' का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है☘️🌹

🍀गुरु आपकी चिंता अपने ऊपर ले लेते हैं.. वह गुरु-शिष्य परंपरा का सबसे गहरा और आत्मीय पहलू है।🍀

- निस्वार्थ संरक्षण और जिम्मेदारी.. सच्चा गुरु शिष्य की न केवल आध्यात्मिक, बल्कि भौतिक चिंताएं भी अपने ऊपर ले लेता है। वे शिष्य की आत्मिक प्रगति (Sadhana) के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं।

- कर्मों को काटना..जब कोई शिष्य पूरी तरह से गुरु के प्रति समर्पित (Surrender) हो जाता है, तो गुरु अपने दिव्य ज्ञान से शिष्य के नकारात्मक कर्मों और संचित संस्कारों को नष्ट कर देते हैं, जिससे शिष्य का जीवन सरल और सात्विक हो जाता है।

- दुखों और कष्टों का हरण: गुरु शिष्य की पीड़ा को अपने ऊपर ले लेते हैं, चाहे वह शारीरिक बीमारी हो या मानसिक तनाव, वे उसे एक माँ की तरह अपने आंचल में छिपा लेते हैं।

- कुम्हार की तरह गढ़ना: गुरु कुम्हार की तरह होते हैं जो घड़े (शिष्य) को अंदर से सहारा देते हैं और बाहर से ठोककर उसे सुंदर रूप देते हैं। वे शिष्य की कमियों को दूर कर उसे एक बेहतर इंसान बनाते हैं।

- मार्गदर्शक और रक्षक: जब शिष्य मार्ग से भटकने लगता है, तो गुरु ही उसे सही राह दिखाते हैं और विकट परिस्थितियों में भी ढाल बनकर उसकी रक्षा करते हैं।
हमारे पाप दोष हे हमारे आगे आते हैं जो हमे गुरु से मिलने को रोकते हैं और हम आजीवन अपने प्रारस्भ के कारण दुःख कष्ट पीड़ा हे भोगते..

31/01/2026

काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ और चुनौती🙏❤️
Sadgurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji 🙏🥰❤️

निखिलेश्वरनंद स्तवन 🙏🥰❤️श्लोक संख्या 1:महोस्त्वं रूपं च मपर विचिराक्षै गुरुवदैः श्रियै दीर्घकाय विधुरम विदारै नव निधि। अ...
26/01/2026

निखिलेश्वरनंद स्तवन 🙏🥰❤️
श्लोक संख्या 1:

महोस्त्वं रूपं च मपर विचिराक्षै गुरुवदैः श्रियै दीर्घकाय विधुरम विदारै नव निधि। अतस्वा प्रीचार्य अथ प्रहर रूपै सद गुणै गुरौ देंवं श्रेयं निखिल हृदयेश्च महपरौ ॥

मेरे परम आराध्य गुरुदेव ! आप जैसा युग-पुरूष पहली बार ही इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ है, जिसकी चरण-धूलि को पाने के लिए उच्चकोटि के योगीजन भी व्यग्र रहते हैं।

आप पृथ्वी पर प्रत्यक्ष देव हैं, जो चिन्त्य-अचिन्त्य, शुद्ध-बुद्ध, आत्म स्वरूप एवं पूर्णतादायक हैं, आप में और गणपति में बहुत साम्य है। वे गणपति अर्थात् गण समूह के अधिपति हैं और आप साधक अधिपति एवं शिष्याधिपति हैं। उनके पास तो मात्र 'ऋद्धि एवं सिद्धि' दो ही शक्तियां हैं, पर आपके पास तो दैविक शक्तियां असीमित हैं। उनका विस्तार सीमित हैं, पर आपका विचरण, विकास, विस्तार असीमित है। आप अपने जीवन में जिस प्रकार से गतिशील रहे हैं, जिस प्रकार से आपने जीवन में कार्य किया है, उसकी तो कोई तुलना ही नहीं है।

एक पर्वत श्रृंखला से दूसरी पर्वत श्रृंखला पर आपका गमन अबाध गति से रहा है, इस बात का मैं साक्षी हूं। जिस पहाड़ की चोटी पर आपके पांव पड़ जाते हैं, वह पहाड़ अपने आप में धन्य हो जाता है, वह चोटी अपने आप में पवित्र और दिव्य हो जाती है, क्योंकि मात्र एक स्थान से दूसरे स्थान ही नहीं, एक पर्वत से दूसरे पर्वत की चोटी ही नहीं, अपितु ब्रह्माण्ड का कोई ऐसा स्थान नहीं है जो आपके लिए दूर हो या जहाँ तक आपकी पहुंच नहीं हो तथा जो आपके श्री चरणों की धूलि से पवित्र नहीं हुआ हो।

आप अपने आप में सम्पूर्ण आदि विद्या के सिद्ध आचार्य हैं, इसीलिए आप समस्त ब्रह्माण्ड में निर्बाध गति से विचरण करने में सक्षम हैं। अतः ग्रन्थ लेखन से पूर्व सरस्वती, वाग्देवी और गणपति को तो मैं स्मरण करता ही हूँ, पर आप तो 'निखिलेश्वर' हैं देव स्वरूप हैं, ब्रह्माण्ड स्वरूप है, मैं आपको भक्तिभाव से प्रणाम करता हुआ सदैव अपने रोम-रोम से 'निखिलेश्वर' और 'गुरु' शब्द का उच्चारण करता हुआ, पूर्णत्व, आपकी भक्ति एवं सामीप्यता प्राप्त करने का अभीप्सित हैं।

Our beloved .. Sadgurudev Dr. Narayan Dutt Shrimali Ji ❤️

गुरु की एक मुस्कान शिष्य के लिए कितनी स्फूर्तिदायक होती है ! इसे वो ही शिष्य अनुभव करता है,जिसे इस अनमोल धरोहर की कीमत प...
25/01/2026

गुरु की एक मुस्कान शिष्य के लिए कितनी स्फूर्तिदायक होती है ! इसे वो ही शिष्य अनुभव करता है,जिसे इस अनमोल धरोहर की कीमत पता होती है.गुरु की एक मुस्कान शिष्य के जन्म जन्मांतर की थकान मिटाकर उसे परम शांति की अनुभूति करवाती है.शिष्य के लिए गुरु की मुस्कान जीवन संजीवनी का कार्य करती है.ऐसी एक मुस्कान पर गुरुनिष्ठ शिष्य अपना सर्वस्व समर्पण करने को तत्पर रहता है🤗❤️

गुरु एवं शिष्य में लेने तथा देने का क्रम लगातार चलता रहता है । गुरु आत्मदान करता है और शिष्य आत्म समर्पण । साधक की प्रगति की कुंजी यही है कि इन दोनों में यानी आत्मदान तथा आत्मसमर्पण में तालमेल बना रहे अगर एक में गड़बड़ी हुई तो गाड़ी रुक जाती है क्योंकि इन दोनों को साधना की गाड़ी के दो पहियों कि तरह ही कहा जाता सकता है ।यह तभी होता है जब गुरु प्रसन्न रहे और उसकी कृपा बनी रहे , इसलिये साधक को बड़ी सावधानी की जरूरत है कि कोई हम से ऐसा कार्य न हो जाय जो हमें गुरु कृपा से वंचित कर दे ।🌹💫

गुरु को प्रसन्न रखने के लिए तीन बातों पर ज़ोर दिया है :-
१- गुरु में पूर्ण श्रद्धा ।
२- गुरु की आज्ञा का पालन करने की यथाशक्ति कोशिश करना ।
३- सम्मुख बैठने पर उनकी तरफ लौ लगी रहे , कोई दूसरा ख्याल या सांसारिक इच्छा दिल में न आने पावे । अगर साधक यह तीनों बाते अमल में लाये तो गुरु को प्रसन्न भी कर सकता है और आत्म-समर्पण में भी मदद मिलती है क्योंकि ये तीनों कार्य एक तरह से आत्म-समर्पण के अग्रदूत की तरह हैं । बाहरी बातें जैसे बार-बार पैर छूना या साष्टांग दंडवत करना मौखिक रूप से समर्पण के शब्द बोलना या तरह-तरह के पदार्थ या रुपया – पैसा भेंट करने से गुरु को प्रसन्न नहीं किया जा सकता । वह तुम्हारे दिल को टटोलते हैं । साधक के अंतर का परिवर्तन ही गुरु को प्रसन्न कर सकता है , बाहरी बातें नहीं । 🙏🤗❤️🥰🥰

जीवन में हम बहुत सा भ्रम पैदा करते हैं। कहते हैं क्रोध, कहते हैं प्रेम, कहते हैं घृणा, मित्रता, शत्रुता लेकिन कुछ भी तो ...
24/01/2026

जीवन में हम बहुत सा भ्रम पैदा करते हैं। कहते हैं क्रोध, कहते हैं प्रेम, कहते हैं घृणा, मित्रता, शत्रुता लेकिन कुछ भी तो हमारा निर्णय नहीं है। कभी आपने ऐसा क्रोध किया है, जो आपने किया हो? कभी नहीं किया। जब क्रोध होता है तब आप होते ही नहीं। कभी आपने प्रेम किया है, जो आपने किया हो? अगर आप प्रेम कर सकते तब तो किसी को भी कर सकते थे, लेकिन किसी को कर पाते है और किसी को नहीं कर पाते। और किसी को भी कर सकते थे, लेकिन किसी को कर पाते हैं और किसी को नहीं कर पाते। और किसी को कर पाते है, तो नहीं चाहते तो भी करते हैं। और किसी को नहीं कर पाते हैं, तो चाहे तो भी नहीं कर पाते।

जिंदगी की सारी भावनाएं किसी अज्ञात छोर से आती हैं जहां से जन्म आता है वहीं से। आप नाहक ही बीच में मालिक बन जाते हैं। और आपने क्या किया है? क्या है जो आपका किया हुआ है? भूख लगती है, नींद आती है, सुबह नींद टूट जाती है, सांझ फिर आंखे बंद होने लगती हैं। बचपन आता है, फिर कब चला जाता है? फिर कैसे चला जाता है? न पूछता, न विचार-विमर्श लेता, न हम कहें तो क्षणभर ठहरता। फिर जवानी चली आती है, फिर जवानी विदा हो जाती है। फिर बुढ़ापा आ जाता है। आप कहां है ?

नहीं, लेकिन आप कहे चले जाते हैं कि मैं जवान हूं, मैं बूढ़ा हूं। जैसे कि जवानी कुछ आप पर निर्भर हो। फिर जवानी के अपने-अपने फूल हैं। बुढ़ापे के अपने फूल हैं जो खिलते हैं। वैसे ही खिलते हैं जैसे वृक्षों पर फूल खिलते हैं। गुलाब का पौधा नहीं कह सकता कि मैं गुलाब के फूल खिलाता हूं। क्योंकि यह तभी कह सकता था जब चमेली के खिला सकता होता। लेकिन चमेली के तो खिला नहीं पाता। चंपा के तो खिला नहीं पाता। मधुकामिनी तो नहीं लगती उस पर। गुलाब ही लगता है। फिर नाहक ही अकड़ है। गुलाब लगता है। चमेली पर चमेली लगती है।

मैं को खड़े होने की जगह नहीं है। अगर जीवन को एक-एक कण-कण सोचेंगे, तो पायेंगे, मैं को खड़े होने की जगह नहीं है। लेकिन भ्रम पैदा हम क्यो कर लेते है? कैसे यह इलूजन पैदा होता है? यह डिसेप्शन, यह प्रवंचना आती कहां से है?

यह आती इसलिये है कि हमें पूरे वक्त ऐसा लगता है कि विकल्प हैं, आल्टरनेटिव हैं। जैसे आपने मुझे गाली दी, तो मेरे सामने दो विकल्प हैं कि चाहूं तो मैं गाली का जवाब दूं और चाहूं तो न दूं ऐसा मुझे लगता है, है नहीं। ऐसा मुझे लगता है कि चाहूं तो जवाब दूं और चाहूं तो जवाब न दूं। लेकिन क्या सच में ही विकल्प होते है? क्या जो आदमी गाली के उत्तर में गाली देता है, वह चाहता तो न देता ? आप कहेंगे कि चाहता तो नहीं दे सकता था।

लेकिन थोड़ा और गहरे जाना पड़ेगा। वह चाह भी आप में होती है कि आप ले आते हैं? गाली देने की चाह, यान देने की चाह, वह भी आपके वश में है? नहीं, जो बहुत गहरे खोजते हैं, वे कहते हैं कि कहीं तो हमें पता चलता है कि चीजें हमारे वश के बाहर हो जाती हैं। एक आदमी को ख्याल आता है कि गाली दूं, गाली देता है। एक आदमी को खयाल आता है, नहीं दू, नहीं देता है। लेकिन यह खयाल कि दूं या नहीं दूं, यह खयाल कहां से आता है? यह खयाल आपका है? यह वहीं से आता है, जहां से जन्म। यह वहीं से आता है, जहां से प्रेम। यह वहीं से आता हैं, जहां से प्राण। यह वहीं खो जाता है, जहां मौत। यह वहीं लीन हो जाता है, जहा जाती हुई श्वास। लेकिन धोखा देने की सुविधा हो जाती है कि मेरे हाथ में है। चाहता तो गाली न देता। लेकिन किसने कहा था कि आप दें?

नहीं, आप कहेंगे, बुद्ध है, महावीर हैं, वे गाली नहीं देते।

क्या आप समझते है कि वे चाहें तो गाली दे सकते हैं? नहीं, जैसे आप गाली देने में बंधा हुआ अनुभव करते है, उससे कम बंधा हुआ बुद्ध और महावीर अनुभव नहीं करते हैं न गाली देने में। चाहे तो भी दे नहीं सकते। नहीं, वह चाह पैदा ही नहीं होती।

भाग्य की जो अद्भुत कल्पना है, उसके पीछे यह रहस्य था। नियति की, डेस्टिनी की जो अद्भुत धारणा है, उसके पीछे यह राज है। नियति और भाग्य का यह मतलब नहीं है कि आप कुछ न करें, बैठ जाएं। क्योंकि भाग्य तो कहता है, बैठ भी नहीं सकते तुम। वह बिठाए तो बैठ सकते हैं। भाग्य तो कहता है, कुछ न करें हम फिर, यह भी तुम नहीं कर सकते। वह न कराए तो नहीं करना आ जायेगा।

ध्यान रखें, भाग्यवादी जो लोग दिखाई पड़ते हैं उनमें एक भी भाग्यवादी नहीं है। वे कहते हैं, सब भाग्य कर रहा है, हम क्या करें। तो हम कुछ नहीं करते। हम कुछ नहीं करते, इतना भी खयाल शेष रह गया तो करने का भाव शेष है। पूर्ण नियति की धारणा यह है कि हम हैं ही नहीं करने का उपाय नहीं है। वही है- परमात्मा ही है।

और जब हम कर सकते हों, कर्ता न हो सकते हों, तो फिर ममत्व, मेरा क्या होगा? किसे हम कहें, मेरा है? बेटे को कहें? मेरा है? लगता है, क्योंकि मैंने जन्म दिया मालूम पड़ता है। ऐसा भ्रम होता है। हालांकि किसी ने कभी किस के बेटे को जन्म नहीं दिया। बेटे जन्मते है। आपसे रास्ता खोज लेते हैं।

एक मकान आप बना लेते हैं, तो कहते हैं, मेरा है। लेकिन देखते हैं, चिड़ियां भी घोंसला बना लेती हैं। इस जगत में छोटे से छोटा प्राणी भी रहने की जगह बनाता है। और ऐसी चिडियां भी हैं जो कभी किसी से सीखती नहीं। कुछ ऐसी चिड़िया हैं, जिनको जन्म देने के बाद, जिनके अंडा देने के बाद मां तो उड़ जाती हैं। अंड़ा जब फूटता है, तो चिड़िया सीधी बाहर निकल जाती है। उसे मां की शिक्षा नहीं मिल पाती, पिता का संरक्षण नहीं मिल पाता। कोई स्कूलिंग, कोई स्कूल में उसको भर्ती नहीं किया जाता। बड़े आश्चर्य की बात है, वह चिड़िया फिर वैसा ही घोंसला बनाती है जैसा उसकी मां ने बनाया था, और उसकी मां की मां ने बनाया था, और उसकी मां की मां ने बनाया था। और वह घोंसला साधारण नहीं होता, बहुत टेक्नीकल, बड़े तकनीक का, बड़ा आर्किटेक्चर का होता है। कि आदमी को भी बनाना पड़े सीखना पड़े, फिर भी पूरी कुशलता से बना ले तो कठिन है।

आदमी भी बनाता है। सभी बनाते हैं। मेरे कहने का कोई कारण नहीं है। किसी चीज में हम कहें मेरा है? क्योंकि धन इकट्ठा कर लेते हैं? संग्रह सारे प्राणी करते हैं। अनेक-अनेक रूपों में करते हैं। और ऐसा नहीं है कि आदमी उनमें सर्वाधिक कुशल है। ऐसा भी नहीं है। आदमी से भी ज्यादा कुशल संग्रह करने वाले प्राणी हैं।

संग्रह की वृत्ति निसर्गत है। इसलिये ईशावास्य का यह सूत्र कहता हैः सब परमात्मा का है। निसर्ग का कहें, नियति का कहें, प्रकृति का कहें, लेकिन ईशावास्य कहता है, परमात्मा का है। क्योंकि निसर्ग, नियति और प्रकृति मेकेनिकल शब्द हैं, यांत्रिक शब्द है। यह इतना विराट, यह इतना रहस्यपूर्ण, यांत्रिक नहीं हो सकता-जीवंत है, चेतन है।

विज्ञान भी यही कहता है कि सब प्रकृति कर रही है। लेकिन जब हम कहते है विज्ञान की भाषा में कि सब प्रकृति कर रही है, तो हम दीन तो हो जाते हैं, हीन तो हो जाते हैं, यंत्रवत हो जाते हैं। लेकिन जब ईशावास्य कहता है, सब परमात्मा कर रहा है, तो एक तरफ हमारा अहंकार भी छिन जाता है, लेकिन दूसरी तरफ हम परमात्मा हो जाते हैं। वहीं महत्त्वपूर्ण है। वहीं समझ लेने जैसा है।

इसलिये विज्ञान जितना विकसित होता जाता है..... विज्ञान का भी जोर यही है कि आदमी यह भ्रम छोड़ दे कि मैं कर रहा हूं, सब हो रहा है। लेकिन उसका जोर इस बात पर है कि सब मेकेनिकल हो रहा है, सब यंत्रवत हो रहा है। मशीन की तरह सब होता है। सारा जगत यंत्रवत चल रहा है। अगर सब यंत्रवत हो रहा है, तो आदमी दीन तो हो जाता है, उसका गौरव, जो अहंकार से मिलता था, बड़ा क्षुद्र था। छोटे से मिट्टी के तेल में जलते हुए दीये की तरह था। वह तो बुझ जाता है। गहन अंधकार छा जाता है-सूरज कहीं से वापस नहीं लौटता।

धर्म और विज्ञान के मूल आयाम में यही भेद है। विज्ञान भी उन्हीं बातों को कह रहा है जिन्हें धर्म कहता है। उसकी एम्फेसिस मेकेनिकल है, उसका जोर यंत्र पर है। धर्म भी वही कह रहा है, लेकिन उसका जोर चेतना पर, प्रज्ञा पर, जीवंत पर है। और वह जोर कीमती है। अगर पश्चिम का विज्ञान सफल हो गया, तो अंततः आदमी मशीन हो जायेगा। अगर पूरब का धर्म जीत गया, तो अंततः मनुष्य परमात्मा हो जाता है। दोनों अहंकार छीन लेते हैं। लेकिन एक से अहंकार छिनता है तो आदमी नीचे गिरता है।

आर्शीवाद के साथ
सदगुरूदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी ( Kailash Chandra Shrimali )
PMYV Jan, 2026

22/01/2026

जहाँ भी आप तकलीफ में हैं.. वहां मैं आपके बीच में खड़ा हूँ..
Sadgurudev नारायण दत्त श्रीमाली जी🙏❤️

हिमालय का रहस्यमई अदृश्य आश्रम.... सिद्धाश्रम**************************************************************************स...
20/01/2026

हिमालय का रहस्यमई अदृश्य आश्रम.... सिद्धाश्रम
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सिद्धाश्रम
संसार का सुविख्यात अद्वितीय साधना-तीर्थ तांत्रिकों, मांत्रिकों, योगियों, यतियों और सन्यासियों का दिव्यतम साकार स्वप्न “सिद्धाश्रम”, जिसमें प्रवेश पाने के लिए मनुष्य तो क्या देवता भी लालायित रहते हैं, हजारों वर्ष के आयु प्राप्त योगी जहाँ साधनारत हैं! सिद्धाश्रम एक दिव्या-भूखंड हैं, जो आध्यात्मिक पुनीत मनोरम स्थली हैं! मानसरोवर और हिमालय से उत्तर दिशा की और प्रकृति के गोद में स्थित वह दिव्य आश्रम – जिसकी ब्रह्मा जी के आदेश से विश्वकर्मा ने अपने हाथों से रचना की, विष्णु ने इसकी भूमि, प्रकृति और वायुमंडल को सजीव-सप्राण-सचेतना युक्त बनाया तथा भगवन शंकर की कृपा से यह अजर-अमर हैं! आज भी वहां महाभारत कालीन भगवान श्री कृष्ण, भीष्म, द्रौण आदि व्यक्तित्व विचरण करते हुए दिखाई दे जाते हैं!

सिद्धाश्रम अध्यात्म जीवन का वह अंतिम आश्रय स्थल हैं, जिसकी उपमा संसार में हो ही नहीं सकती! देवलोक और इन्द्रलोक बभी इसके सामने तुच्छ हैं! यहाँ भौतिकता का बिलकुल ही अस्तित्व नहीं हैं! सिद्धाश्रम पूर्णतः आध्यात्मिक एवं पारलौकिक भावनाओं और चिन्तनो से सम्बंधित हैं! यह जीवन का सौभाग्य होता हैं, यदि सशरीर ही व्यक्ति वहां पहुँच पाए!

सिद्धाश्रम शब्द ही अपने-आप में जीवन की श्रेष्ठता और दिव्यता हैं, वहां पहुचना ही मानव देह की सार्थकता हैं! जब व्यक्ति सामान्य मानव जीवन से उठकर साधक बनता हैं, साधक से योगी और योगी से परमहंस बनता हैं, उसके बाद ही सिद्धाश्रम प्रवेश की सम्भावना बनती हैं, जिसके कण-कण में अद्भुत दिव्यता का वास हैं, जिसके वातावरण में एक ओजस्वी प्रवाह हैं, जिसकी वायु में कस्तूरी से भी बढ़कर मदहोशी हैं, जिसके जल में अमृत जैसी शीतलता हैं तथा जिसके हिमखंडों में चांदी-सी आभा निखरती प्रतीत होती हैं!

आज भी जहाँ ब्रह्मा उपस्थित होकर चारों वेदों का उच्चारण करते हैं! जहाँ विष्णु सशरीर उपस्थित हैं! जहाँ भगवन शंकर भी विचरण करते दिखाई देते हैं! जहाँ उच्चकोटि के देवता भी आने के लिए तरसते हैं! जहाँ गन्धर्व अपनी उच्च कलाओं के साथ दिखाई देते हैं! जहाँ मुनि, साधू, सन्यासी एवं योगी अपने अत्यंत तेजस्वी रूप में विचरण करते हुए दिखाई देते हैं! जहाँ पशु-पक्षी भी हर क्षण अपनी विविध क्रीडाओं से उमंग एवं मस्ती का बोध कराते हैं!

सिद्धाश्रम में गंधर्वों के मधुरिम संगीत पर अप्सराओं के थिरकते कदम, सिद्धयोग झील में उठती-टूटती तरंगों की कलकल करती ध्वनि, पक्षियों का कलरव तथा भंवरों के गुंजन..... सभी में गुरु-वंदना का ही बोध होता रहता हैं!

“पूज्यपाद स्वामी सच्चिदानंद जी” सिद्धाश्रम के संस्थापक एवं संचालक हैं, जिनके दर्शन मात्र से ही देवता धन्य हो जाते हैं, जिनके चरणों में ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र स्वयं उपस्थित होकर आराधना करते हैं, रम्भा, उर्वशी, और मेनका नृत्य करके अपने सौभाग्य की श्रेयता को प्राप्त करती हैं! जिनका रोम-रोम तपस्यामय हैं! जिनके दर्शन मात्र से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं!

सिद्धाश्रम में मृत्यु का भय नहीं हैं, क्योंकि यमराज उस सिद्धाश्रम में प्रवेश नहीं कर पते! जहाँ वृद्धता व्याप्त नहीं हो सकती, जहाँ का कण-कण यौवनवान और स्फूर्तिवान बना रहता हैं! जहाँ के जीवन में हलचल हैं, आवेग हैं, मस्ती हैं, तरंग हैं! जहाँ उच्चकोटि क्र ऋषि अपने शिष्यों को ज्ञान के सूक्ष्म सूत्र समझा रहे होते हैं! कहीं पर साधना संपन्न हो रही हैं, कहीं पर मन्त्रों के मनन-चिंतन हो रहे हैं! कहीं पर यज्ञ का सुगन्धित धूम्र चारो और बिखरा हुआ हैं! जहाँ श्रेष्ठतम पर्णकुटीर बनी हुयी हैं, उनमें ऋषि, मुनि और तापस-गण निवास करते है......................

सिद्ध आश्रम के संचालक
परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज
(सदगुरुदेव डॉक्टर नारायण दत्त श्रीमाली जी)

गुरू मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता ह...
16/01/2026

गुरू मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।

किसी भी प्रकार की विद्या हो अथवा ज्ञान हो, उसे किसी दक्ष गुरु से ही सीखना चाहिए। जप, तप, यज्ञ, दान आदि में भी गुरु का दिशा निर्देशन जरूरी है कि इनकी विधि क्या है? अविधिपूर्वक किए गए सभी शुभ कर्म भी व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं जिनका कोई उचित फल नहीं मिलता। स्वयं की अहंकार की दृष्टि से किए गए सभी उत्तम माने जाने वाले कर्म भी मनुष्य के पतन का कारण बन जाते हैं। भौतिकवाद में भी गुरू की आवश्यकता होती है।

सबसे बड़ा तीर्थ तो गुरुदेव ही हैं जिनकी कृपा से फल अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। गुरुदेव का निवास स्थान शिष्य के लिए तीर्थ स्थल है। उनका चरणामृत ही गंगा जल है। वह मोक्ष प्रदान करने वाला है। गुरु से इन सबका फल अनायास ही मिल जाता है।

मनुष्य का अज्ञान यही है कि उसने भौतिक जगत को ही परम सत्य मान लिया है और उसके मूल कारण चेतन को भुला दिया है जबकि सृष्टि की समस्त क्रियाओं का मूल चेतन शक्ति ही है। चेतन मूल तत्व को न मान कर जड़ शक्ति को ही सब कुछ मान लेनाअज्ञानता है। इस अज्ञान का नाश कर परमात्मा का ज्ञान कराने वाले गुरू ही होते हैं।

किसी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रथम आवश्यकता समर्पण की होती है। समर्पण भाव से ही गुरु का प्रसाद शिष्य को मिलता है। शिष्य को अपना सर्वस्व श्री गुरु देव के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए।

गुरु ज्ञान गुरु से भी अधिक महत्वपूर्ण है। प्राय: शिष्य गुरु को मानते हैं पर उनके संदेशों को नहीं मानते। इसी कारण उनके जीवन में और समाज में अशांति बनी रहती है।

गुरु के वचनों पर शंका करना शिष्यत्व पर कलंक है। जिस दिन शिष्य ने गुरु को मानना शुरू किया उसी दिन से उसका उत्थान शुरू शुरू हो जाता है और जिस दिन से शिष्य ने गुरु के प्रति शंका करनी शुरू की, उसी दिन से शिष्य का पतन शुरू हो जाता है।

सद्गुरु एक ऐसी शक्ति है जो शिष्य की सभी प्रकार के ताप-शाप से रक्षा करती है। शरणा गत शिष्य के दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों को दूर करने का दायित्व गुरु का होता है।

आनन्द अनुभूति का विषय है। बाहर की वस्तुएँ सुख दे सकती हैं किन्तु इससे मानसिक शांति नहीं मिल सकती। शांति के लिए गुरु चरणों में आत्म समर्पण परम आवश्यक है। सदैव गुरुदेव का ध्यान करने से जीव नारायण स्वरूप हो जाता है। वह कहीं भी रहता हो, फिर भी मुक्त ही है। ब्रह्म निराकार है। इसलिए उसका ध्यान करना कठिन है।

ऐसी स्थिति में सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करते रहना चाहिए। गुरुदेव नारायण स्वरूप हैं। इसलिए गुरु का नित्य ध्यान करते रहने से जीव नारायणमय हो जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु रूप में शिष्य अर्जुन को यही संदेश दिया था –

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्याि माम शुच: ।।

अर्थात् सभी साधनों को छोड़कर केवल नारायण स्वरूप गुरु की शरणगत हो जाना चाहिए। वे उसके सभी पापों का नाश कर देंगे। शोक नहीं करना चाहिए।

जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ जाती हैं, वे परम गुरु हैं। जिनकी रग-रग में ब्रह्म का तेज व्याप्त है, जिनका मुख मण्डल तेजोमय हो चुका है, उनके मुख मण्डल से ऐसी आभा निकलती है कि जो भी उनके समीप जाता है वह उस तेज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उस गुरु के शरीर से निकलती वे अदृश्य किरणें समीपवर्ती मनुष्यों को ही नहीं अपितु पशु पक्षियों को भी आनन्दित एवं मोहित कर देती है।

उनके दर्शन मात्र से ही मन में बड़ी प्रसनन्ता व शांति का अनुभव होता है।

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