Divya Sahayak

Divya Sahayak Logics behind simple Karma Kaand of Hindu Mythologies. All products are priced reasonably and made affordable.

Divya Sahayak- दिव्य सहायक-( Your Divine Help ) is a humble beginning of Educating People about Power and Greatness of our ancient Texts like Vedas and Upanishads. Products of Divya Shayak are all ABHIMANTRIT and sanctified by Mantras and Poojas thereby energised for desired Results.

ॐ नमह  शिवाये !जीवन में आपके अगर कोई भी  समस्या  आ रही है तो आपको  हर  रोज  शिव  अभीशेक  करना  शुरू  कर  देना  चाहिये |
20/02/2021

ॐ नमह शिवाये !
जीवन में आपके अगर कोई भी समस्या आ रही है तो आपको हर रोज शिव अभीशेक करना शुरू कर देना चाहिये |

 #जय श्री जगन्नाथ,......🌹🌹🌹🌹पुरी जगन्नाथ मंदिर के ऐसे अद्भुत रहस्य जिन्हें बडे से बड़ा वैज्ञानिक आज तक नहीं जान पाया। भा...
05/11/2020

#जय श्री जगन्नाथ,......🌹🌹🌹🌹
पुरी जगन्नाथ मंदिर के ऐसे अद्भुत रहस्य जिन्हें बडे से बड़ा वैज्ञानिक आज तक नहीं जान पाया।

भारत रहस्यों का खदान है। इस धरती पर ऐसे रहस्य हैं जिन्हें आज तक बडे़ से बड़ा वैज्ञानिक भी नहीं भेद पाया है। भारत के चार धाम मंदिरों में से एक है पुरी का जगन्नाथ मंदिर। यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर 12वीं शताब्दी में बनाया गया था। गंगा के पूर्व तट के साम्राज्य के साम्राट अनंतवरमन चॊड़गंगा देव ने इस मंदिर को बनवाया था। यहां की रथ यात्रा दुनिया भर में प्रसिद्ध है। महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है.। पुरी(उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते हैं। इस मंदिर में ऐसे अनगिनत रहस्य छुपे हैं जो विज्ञान के लिए सवाल खडा कर रहा है।

🌹🌹..मंदिर में लगा भगवा ध्वज:
इस ध्वज के रहस्य से सभी अनभिज्ञ हैं। यह द्वज हमॆशा हवा के विपरीत दिशा में ही लहराती है। यह अचंबित कर देने वाली विषय है कि हवा के विपरीत दिशा में एक ध्वज कैसे लहरा सकता है?

🌹🌹..1800 वर्ष पुरानी प्रथा:
1800 वर्षों से यहां एक प्रथा निरंतर चलती आ रही है, और वह यह है कि प्रति दिन मंदिर के पुजारी 45 मंज़िले इमारत को चड़कर ध्वज को बदलते हैं! मान्यता है कि अगर एक दिन भी इस ध्वज को बदला नहीं गया तो पूरे 18 वर्ष के लिए मंदिर को बंद रखना पड़ेगा।

🌹🌹..हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है। लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को CRPF की सेना चारो तरफ से घेर लेती है. उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता.

🌹🌹..ब्रह्म की स्थापना:
मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है. पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है. पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है. वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है. ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता. इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है.
ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...मगर ये क्या है ,कोई नही जानता... ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है. मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ???
कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथमे लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था. आंखों में पट्टी थी. हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए.

🌹🌹..सुदर्शन चक्र:
मंदिर के शीर्ष पर 20 फीट ऊंचा सुदर्शन चक्र है जिसका वजन एक टन है। रोचक बात यह है कि पूर्ण शहर के किसी भी कोने में खडे रह कर इस चक्र को देखा जा सकता है! इस चक्र को कुछ इस तरह से प्रतिष्ठापित किया है कि आप किसी भी कोने में खडे़ हो जाये लेकिन आपको यह अनुभूति होगा कि चक्र आप ही का सामना कर रहा है। इस चक्र से जुडे रहस्य को आज तक कॊई नहीं जान पाया कि दो हज़ार वर्ष पूर्व में इतने विशाल काय चक्र को कहां से और कैसे लाया गया तथा उसे मंदिर की चॊटी पर कैसे प्रतिषटापित किया गया।

🌹🌹..मंदिर की संरचना:
मंदिर की इंजीनियरिंग संरचना इतनी अनोखी है कि मुख्य गुंबद की छाया किसी भी समय में कहीं भी नहीं देखी जा सकती। आश्चर्य है कि ऐसे कैसे एक विशाल मंदिर कि छाया दिन के किसी भी समय में नहीं देखी जा सकती!

🌹🌹..हवा की दिशा:
दुनिया के किसी भी भाग में हवा की दिशा दिन में सागर से भूमी की ऒर और रात के वक्त भूमी से सागर की ऒर प्रवहित होती है। लेकिन इस मंदिर के पास यह विपरीत दिशा में प्रवहित होती है, यानी दिन में भूमी से सागर की ऒर और रात में सागर से भूमी की ओर!

🌹🌹..सोने की झाड़ू:
आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है.।

🌹🌹..परिंदों का रहस्य:
मंदिर के ऊपर परिंदा भी पर नहीं मारता: यह सत्य है कि इस मंदिर के ऊपर परिंदा भी पर नहीं मारता। न इस मंदिर के ऊपर से हवाई जहाज़ गुजरता है। यह भी एक आश्चर्य है कि एक छॊटी सी पंछी तक मंदिर के ऊपर से गुज़र नहीं सकता।

🌹🌹..मंदिर का प्रसाद:
भगवान जगन्नाथ को देखने प्रतिदिन दो हज़ार से बीस हज़ार तक भक्त आते हैं। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ है कि मंदिर का प्रसाद खाली हुआ हो। चाहे जितनी संख्यां में भक्त आये लेकिन मंदिर का प्रसाद उतना ही रहता है और कभी कम नहीं होता। प्रसादम को बनाने का तरीखा भी अनोखा हैं। मिट्टि के सात बरतन को एक के ऊपर एक रखकर नीचे चूल्हा जलाया जाता है। पहले मटके का प्रसाद पहले पकता है और अंत के मटके का प्रसाद आखिर में।

🌹🌹..भगवान जगन्नाथ का प्रसाद:
भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।
ये सब बड़े आश्चर्य की बात हैं.।

🌹🌹..मंदिर का सिंहद्वार:
जगन्नाथ मंदिर के चार द्वार हैं जिनमें से सिंहद्वार से मंदिर के अंदर प्रवॆश किया जाता है। जब द्वार से अंदर की ऒर प्रवेश करते हैं तब समुंदर के लहरॊं की आवाज़ सुनाई नहीं देती लेकिन उसी द्वार से जब बाहर की ऒर आते हैं तब लहरों की आवाज़ सुनाई देती है। मंदिर के अंदर बाहर का एक भी शब्द सुनाई नहीं देता है।

🌹🌹..जगन्नाथ मंदिर वास्तुकला और विज्ञान का अनोखा संगम है या यह स्वयं भगवान जगन्नाथ की महिमा है यह कॊई नहीं जानता। भगवान की लीला वे ही जाने। उनकी महिमा अपरंपार है।

भगवान जगन्नाथ आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें,........🌹🌹🌹🌹🌹

,..🙏🙏..🌹🌹..जय श्री जगन्नाथ..🌹🌹..🙏🙏..,

.                            भक्त की रक्षा          एक गांव में कृष्णा बाई नाम की बुढ़िया रहती थी वह भगवान श्रीकृष्ण की ...
10/10/2020

. भक्त की रक्षा

एक गांव में कृष्णा बाई नाम की बुढ़िया रहती थी वह भगवान श्रीकृष्ण की परमभक्त थी। वह एक झोपड़ी में रहती थी। कृष्णा बाई का वास्तविक नाम सुखिया था पर कृष्ण भक्ति के कारण इनका नाम गांव वालों ने कृष्णा बाई रख दिया।
घर घर में झाड़ू पोछा बर्तन और खाना बनाना ही इनका काम था। कृष्णा बाई रोज फूलों का माला बनाकर दोनों समय श्री कृष्ण जी को पहनाती थी और घण्टों कान्हा से बात करती थी। गांव के लोग यहीं सोचते थे कि बुढ़िया पागल है।
एक रात श्री कृष्ण जी ने अपनी भक्त कृष्णा बाई से यह कहा कि कल बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है तुम यह गांव छोड़ कर दूसरे गांव चली जाओ।
अब क्या था मालिक का आदेश था कृष्णा बाई ने अपना सामान इकट्ठा करना शुरू किया और गांव वालों को बताया कि कल सपने में कान्हा आए थे और कहे कि बहुत प्रलय होगा पास के गाव में चली जा।
लोग कहाँ उस बूढ़ी पागल का बात मानने वाले जो सुनता वहीं जोर जोर ठहाके लगाता। इतने में बाई ने एक बैलगाड़ी मंगाई और अपने कान्हा की मूर्ति ली और सामान की गठरी बांध कर गाड़ी में बैठ गई। और लोग उसकी मूर्खता पर हंसते रहे।
बाई जाने लगी बिल्कुल अपने गांव की सीमा पार कर अगले गांव में प्रवेश करने ही वाली थी कि उसे कृष्ण की आवाज आई - अरे पगली जा अपनी झोपड़ी में से वह सुई ले आ जिससे तू माला बनाकर मुझे पहनाती है। यह सुनकर बाई बेचैन हो गई तड़प गई कि मुझसे भारी भूल कैसे हो गई अब मैं कान्हा का माला कैसे बनाऊंगी?
उसने गाड़ी वाले को वहाँ रोका और बदहवास अपने झोपड़ी की तरफ भागी। गांव वाले उसके पागलपन को देखते और खूब मजाक उडाते।
बाई ने झोपड़ी में तिनकों में फंसे सुई को निकाला और फिर पागलो की तरह दौडते हुए गाड़ी के पास आई। गाड़ी वाले ने कहा कि माई तू क्यों परेशान हैं कुछ नही होना। बाई ने कहा अच्छा चल अब अपने गांव की सीमा पार कर। गाड़ी वाले ने ठीक ऐसे ही किया।
पर यह क्या? जैसे ही सीमा पार हुई पूरा गांव ही धरती में समा गया। सब कुछ जलमग्न हो गया। गाड़ी वाला भी अटूट कृष्ण भक्त था। येन केन प्रकरेण भगवान ने उसकी भी रक्षा करने में कोई विलम्ब नहीं किया।
प्रभु जब अपने भक्त की मात्र एक सुई तक की इतनी चिंता करते हैं तो वह भक्त की रक्षा के लिए कितना चिंतित होते होंगे। जब तक उस भक्त की एक सुई उस गांव में थी पूरा गांव बचा था। इसीलिए कहा जाता है कि:-

भरी बदरिया पाप की बरसन लगे अंगार।
संत न होते जगत में जल जाता संसार॥
----------:::×:::----------

30/09/2020

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Welcome Narayan and Maa Laxmi ! माँ लक्ष्मी और नारायण का स्वागत करे !पांच अचूक उपाए की यह इ-बुक जो आपकी ज़िन्दगी में आ रह...
25/09/2020

Welcome Narayan and Maa Laxmi ! माँ लक्ष्मी और नारायण का स्वागत करे !

पांच अचूक उपाए की यह इ-बुक जो आपकी ज़िन्दगी में आ रही पैसो की समस्याओ को ख़तम कर देगा , आपकी आय के स्रोत बढ़ने लगेंगे | नौकरी या व्यापार में सफलता मिलने लगेगी |
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वास्तविक पुण्य    किसी आश्रम में एक साधु रहता था। काफी सालों से वह इसी आश्रम में रह रहा था। अब वह  काफी वृद्ध हो चला  था...
21/09/2020

वास्तविक पुण्य

किसी आश्रम में एक साधु रहता था। काफी सालों से वह इसी आश्रम में रह रहा था। अब वह काफी वृद्ध हो चला था और मृत्यु को वह निकट महसूस कर रहा था , लेकिन संतुष्ट था कि 30 साल से उसने प्रभु का सिमरन किया है, उसके खाते में ढेर सारा पुण्य जमा है इसलिए उसे मोक्ष मिलना तो तय ही है।

एक दिन उसके ख्याल में एक स्त्री आयी। स्त्री ने साधु से कहा -
"अपने एक दिन के पुण्य मुझे दे दो और मेरे एक दिन के पाप तुम वरण कर लो।"
इतना कह कर स्त्री लोप हो गयी।
साधु बहुत बेचैन हुआ कि इतने बरस तो स्त्री ख्याल में ना आयी, अब जब अंत नजदीक है तो स्त्री ख्याल में आने लगी।
फिर उसने ख्याल झटक दिया और प्रभु सुमिरन में बैठ गया।
स्त्री फिर से ख्याल में आयी। फिर से उसने कहा कि
"एक दिन का पुण्य मुझे दे दो और मेरा एक दिन का पाप तुम वरण कर लो।"

इस बार साधु ने स्त्री को पहचानने की कोशिश की लेकिन स्त्री का चेहरा बहुत धुंधला था, साधु से पहचाना नहीं गया! साधु अब चिंतित हो उठा कि एक दिन का पुण्य लेकर यह स्त्री क्या करेगी! हो ना हो ये स्त्री कष्ट में है! लेकिन गुरु जी ने कहा हुआ है कि आपके पुण्य ही आपकी असल पूंजी है, यह किसी को कभी मत दे बैठना। और इतनी मुश्किल से पुण्यो की कमाई होती है, यह भी दे बैठे तो मोक्ष तो गया। हो ना हो ये मुझे मोक्ष से हटाने की कोई साजिश है।

साधू ने अपने गुरु के आगे अपनी चिंता जाहिर की।
गुरु ने साधु को डांटा।
'मेरी शिक्षा का कोई असर नहीं तुझ पर? पुण्य किसी को नहीं देने होते। यही आपकी असली कमाई है।"

साधु ने गुरु जी को सत्य वचन कहा और फिर से प्रभु सुमिरन में बैठ गया।
स्त्री फिर ख्याल में आ गयी।
बोली - तुम्हारा गुरु अपूर्ण है, इसे ज्ञान ही नहीं है, तुम तो आसक्ति छोड़ने का दम भरते हो, बीवी-बच्चे, दीन-दुनिया छोड़ कर तुम इस अभिमान में हो कि तुमने आसक्ति छोड़ दी है। तुमने और तुम्हारे गुरु ने तो आसक्ति को और जोर से पकड़ लिया है। किसी जरूरतमंद की मदद तक का चरित्र नहीं रहा तुम्हारा तो।"

साधु बहुत परेशान हो गया! वह फिर से गुरु के पास गया। स्त्री की बात बताई। गुरु ने फिर साधु को डांटा, "गुरु पर संदेह करवा कर वह तुम्हे पाप में धकेल रही है। जरूर कोई बुरी आत्मा तुम्हारे पीछे पड़ गयी है।"

साधु अब कहाँ जाए! वह वापिस लौट आया और फिर से प्रभु सुमिरन में बैठ गया। स्त्री फिर ख्याल में आयी। उसने फिर कहा- "इतने साल तक अध्यात्म में रहकर तुम गुलाम भी बन गए हो। गुरु से आगे जाते। इतने साल के अध्ययन में तुम्हारा स्वतंत्र मत तक नहीं बन पाया। गुरु के सीमित ज्ञान में उलझ कर रह गए हो। मैं अब फिर कह रही हूँ, मुझे एक दिन का पुण्य दे दो और मेरा एक दिन का पाप वरण कर लो। मुझे किसी को मोक्ष दिलवाना है। यही प्रभु इच्छा है।"

साधु को अपनी अल्पज्ञता पर बहुत ग्लानि हुई। संत मत कहता है कि पुण्य किसी को मत दो और धर्म कहता है जरूरतमंद की मदद करो। यहां तो फंस गया। गुरु भी राह नही दे रहा कोई, लेकिन स्त्री मोक्ष किसको दिलवाना चाहती है।

साधु को एक युक्ति सूझी। जब कोई राह ना दिखे तो प्रभु से तार जोड़ो। प्रभु से राह जानो। प्रभु से ही पूछ लो कि उसकी रजा क्या है
उसने प्रभु से उपाय पूछा। आकाशवाणी हुई।

वाणी ने पूछा-, "पहले तो तुम ही बताओ कि तुम कौन से पुण्य पर इतरा रहे हो?"

साधु बोला,-"मैंने तीस साल प्रभू सुमिरन किया है। तीस साल मैं भिक्षा पर रहा हूँ। कुछ संचय नही किया। त्याग को ही जीवन माना है। पत्नी बच्चे तक सब त्याग दिया।"


वाणी ने कहा- "तुमने तीस बरस कोई उपयोगी काम नही किया। कोई रचनात्मक काम नही किया। दूसरों का कमाया और बनाया हुआ खाया। राम-राम, अल्लाह-अल्लाह, गॉड-गॉड जपने से पुण्य कैसे इकठा होते है मुझे तो नही पता। तुम डॉलर-डॉलर, रुपिया-रुपिया जपते रहो तो क्या तुम्हारा बैंक खाता भर जायेगा? तुम्हारे खाते में शून्य पुण्य है।"

साधु बहुत हैरान हुआ। बहुत सदमे में आ गया।लेकिन हिम्मत करके उसने प्रभु से पूछा कि "फिर वह स्त्री पुण्य क्यो मांग रही है।"

प्रभु ने कहा- "क्या तुम जानते हो वह स्त्री कौन है?"

साधु ने कहा, "नही जानता लेकिन जानना चाहता हूं।"

प्रभु ने कहा- "वह तुम्हारी पत्नी है। तुम जिसे पाप का संसार कह छोड़ आये थे। कुछ पता है वह क्या करती है?"

साधु की आंखे फटने लगी। उसने कहा, "नही प्रभु। उसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता!"

प्रभु ने कहा, "तो सुनो, जब तुम घर से चुपचाप निकल आये थे तब वह कई दिन तुम्हारे इन्तजार में रोई। फिर एक दिन संचय खत्म हो गया और बच्चों की भूख ने उसे तुम्हारे गम पोंछ डालने के लिए विवश कर दिया। उसने आंसू पोंछ दिए और नौकरी के लिए जगह-जगह घूमती भटकती रही। वह इतनी पढ़ी लिखी नही थी। तुम बहुत बीच राह उसे छोड़ गए थे । उसे काम मिल नही रहा था इसलिए उसने एक कुष्ठ आश्रम में नौकरी कर ली। वह हर रोज खुद को बीमारी से बचाती उन लोगो की सेवा करती रही जिन्हे लोग वहां त्याग जाते हैँ। वह खुद को आज भी पापिन कहती है कि इसीलिए उसका मर्द उसे छोड़ कर चला गया!"

प्रभु ने आगे कहा- "अब वह बेचैन है तुम्हे लेकर। उसे बहुत दिनों से आभास होंने लगा है कि उसका पति मरने वाला है। वह यही चाहती है कि उसके पति को मोक्ष मिले जिसके लिए वह घर से गया है। उसने बारंबार प्रभु को अर्जी लगाई है की प्रभु मुझ पापिन की जिंदगी काम आ जाये तो ले लो। उन्हें मोक्ष जरूर देना। मैंने कहा उसे कि अपना एक दिन उसे दे दो। कहती है मेरे खाते में पुण्य कहाँ, होते तो मैं एक पल ना लगाती। सारे पुण्य उन्हें दे देती। वह सुमिरन नहीं करती,वह भी समझती है कि सुमिरन से पुण्य मिलते हैं।"

"मैंने उसे नहीं बताया कि तुम्हारे पास अथाह पुण्य जमा हैं। पुण्य सुमिरन से नहीं आता। मैंने उसे कहा कि एक साधु है उस से एक दिन के पुण्य मांग लो, अपने एक दिन के पाप देकर। उसने सवाल किया कि ऐसा कौन होगा जो पाप लेकर पुण्य दे देगा। मैंने उसे आश्वस्त किया कि साधु लोग ऐसे ही होते हैं।"

"वह औरत अपने पुण्य तुम्हे दे रही थी और तुम ना जाने कौन से हिसाब किताब में पड़ गए। तुम तो साधु भी ठीक से नहीं बन पाए। तुमने कभी नहीं सोचा कि पत्नी और बच्चे कैसे होंगे। लेकिन पत्नी आज भी बेचैन है कि तुम लक्ष्य को प्राप्त होवो। तुम्हारी पत्नी को कुष्ठ रोग है, वह खुद मृत्यु शैया पर है लेकिन तुम्हारे लिए मोक्ष चाह रही है। तुम सिर्फ अपने मोक्ष के लिए तीस बरस से हिसाब किताब में पड़े हो।"

साधू के बदन पर पसीने की बूंदे बहने लगी, सांस तेज होने लगी,
उसने ऊँची आवाज में चीख लगाई
"यशोदा$$$$$$$$$$$$$!:"
साधु हड़बड़ा कर उठ बैठा, उसके माथे पर पसीना बह रहा था।
उसने बाहर झाँक कर देखा, सुबह होने को थी। उसने जल्दी से अपना झोला बाँधा और गुरु जी के सामने जा खड़ा हुआ।
गुरु जी ने पूछा "आज इतने जल्दी भिक्षा पर?"

साधु बोला- "घर जा रहा हूँ।"

गुरु जी बोले- "अब घर क्या करने जा रहे हो?"

साधु बोला- "धर्म सीखने"

धर्म वह नहीं है कि मंदिरों की घंटी बजाएं घंटों पूजा करें । मस्जिदों में जाकर नमाज पढ़ें गिरजाघरों में जाकर प्रार्थना करें गुरु ग्रंथ साहब का पाठ करें धर्म तो वह है किसी भूखे को खाना खिलाएं किसी अंधे को सड़क पार कराएं किसी जरूरतमंद की सहायता करें किसी बीमार असहाय का इलाज कराएं किसी छात्र की पढ़ने में सहायता करें यही असली धर्म है यही असली पुण्य है पूजा-पाठ दिखावा करने से आपके पुण्य नहीं बढ़ेंगे वास्तविक किसी की सच्ची मदद करेंगे तभी आपके वास्तविक पुण्य का खाता बढ़ेगा।
विवेक अग्रवाल मिंटू भैया

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19/09/2020

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19/09/2020

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Kamal Gatte की माला वास्तव में देवी लक्ष्मी की ओर समर्पित है,
As this Divya rosary represents Maa Laxmi, wearer of this rosary definitely attracts Wealth and Success.

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19/09/2020

एक और कथा .

अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा महल में झाड़ू लगा रही थी तो द्रौपदी उसके समीप गई उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोली, "पुत्री! भविष्य में कभी तुम पर दु:ख, पीड़ा या घोर से घोर विपत्ति भी आए तो कभी अपने किसी नाते-रिश्तेदार की शरण में मत जाना! सीधे भगवान की शरण में जाना।"

उत्तरा हैरान होते हुए माता द्रौपदी को निहारते हुए बोली - आप ऐसा क्यों कह रही हैं माता?"

द्रौपदी बोली - "क्योंकि यह बात मेरे ऊपर भी बीत चुकी है! जब मेरे पांचों पति कौरवों के साथ जुआ खेल रहे थे तो अपना सर्वस्व हारने के बाद मुझे भी दांव पर लगाकर हार गए फिर कौरव पुत्रों ने भरी सभा में मेरा बहुत अपमान किया। मैंने सहायता के लिए अपने पतियों को पुकारा मगर वो सभी अपना सिर नीचे झुकाए बैठे थे। पितामह भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र सभी को मदद के लिए पुकारती रही मगर किसी ने भी मेरी ओर नहीं देखा। वह सभी आंखें झुकाए आंसू बहाते रहे फिर मैने भगवान श्रीद्वारिकाधीश को पुकारा - हे प्रभु! अब आपके सिवाय मेरा कोई भी नहीं है। भगवान तुरंत आए और मेरी रक्षा की इसलिए बेटी जीवन में जब भी संकट आये आप भी उन्हें ही पुकारना।"

जब द्रौपदी पर ऐसी विपत्ति आ रही थी तो द्वारिका में श्रीकृष्ण बहुत विचलित हो रहे थे क्योंकि उनकी सबसे प्रिय भक्त पर संकट आन पड़ा था।

रूकमणि ने उनसे दु:खी होने का कारण पूछा तो श्रीकृष्ण ने कहा - "मेरी सबसे बड़ी भक्त को भरी सभा में नग्न किया जा रहा है।"

रूकमणि बोली - "आप जाएं और उसकी मदद करें।"

श्रीकृष्ण बोले - "जब तक द्रोपदी मुझे पुकारेगी नहीं मैं कैसे जा सकता हूं? एक बार वो मुझे पुकार ले तो मैं तुरंत उसके पास जाकर उसकी रक्षा करूंगा। तुम्हें याद होगा जब पाण्डवों ने राजसूय यज्ञ करवाया तो शिशुपाल का वध करने के लिए मैंने अपनी उंगली पर चक्र धारण किया तो उससे मेरी उंगली कट गई। उस समय मेरी सभी 16 हजार 108 पत्नियां वहीं थीं। कोई वैद्य को बुलाने भागी तो कोई औषधि लेने चली गई मगर उस समय मेरी इस भक्त ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उसे मेरी उंगली पर बांध दिया। आज उसी का ऋण मुझे चुकाना है लेकिन जब तक वो मुझे पुकारेगी नहीं मैं नहीं जाऊंगा।"

अत: द्रौपदी ने जैसे ही भगवान कृष्ण को पुकारा प्रभु तुरंत ही दौड़े चले गये।

हमारे जीवन में भी कई संकट आते रहते हैं‌‌। प्रभु-स्मरण, उनके प्रति किया "सत्कर्म" हमारी सहायता के लिए भगवान को विवश कर देता है और तुरन्त संकट टल जाता है।

🙏🙏जय श्री कृष्ण 🙏🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹



🌷जय श्री राधे राधे।🌷🙏

18/09/2020

Bahut he shaandar Katha..Jarur Padhiye !
जरूर पढे !

सुंदरकांड की इस प्रसंग को अवश्य पढ़ें।👇

"मैं न होता तो क्या होता”

अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। वे सोचने लगे। यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मै न होता तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा।

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...
*मै न होता तो क्या होता*🙏

!! जय श्री राम !!

Shiv Tandav Strotram : Lyrics and the meaningजटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलेगलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ ।डमड्डम...
15/09/2020

Shiv Tandav Strotram : Lyrics and the meaning

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥1॥

अर्थ – जिन्होंने जटारुपी अटवी (वन) से निकलती हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गए गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डम डम शब्दों से मण्डित प्रचंड तांडव नृत्य किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें।

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनी ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥2॥

अर्थ – जिनका मस्तक जटारुपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंगों से सुशोभित हो रहा है, ललाट की अग्नि धक् धक् जल रही है, सिर पर चन्द्रमा विराजमान हैं, उन भगवान शिव में मेरा निरंतर अनुराग हो।

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

अर्थ – गिरिराज किशोरी पार्वती के शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनंदित हो रहा है।

जिनकी निरंतर कृपादृष्टि से कठिन से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगंबर तत्व में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

अर्थ – जिनकी जटाओं में रहने वाले सर्पों के फणों की मणियों का फैलता हुआ प्रभापुंज दिशा रुपी स्त्रियों के मुख पर कुंकुम का लेप कर रहा है।


मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का वस्त्र धारण करने से स्निग्ध वर्ण हुए उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत आनंद करे।

सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥5॥

अर्थ – जिनकी चरण पादुकाएं इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम करने से उनके मस्तक पर विराजमान फूलों के कुसुम से धूसरित हो रही हैं।

नागराज के हार से बंधी हुई जटा वाले वे भगवान चंद्रशेखर मुझे चिरस्थाई संपत्ति देनेवाले हों।

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्‌ ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥6॥

अर्थ – जिन्होंने ललाट वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, जिनको इन्द्र नमस्कार किया करते हैं।

सुधाकर (चन्द्रमा) की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह उन्नत विशाल ललाट वाला जटिल मस्तक हमें संपत्ति प्रदान करने वाला हो।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥

अर्थ – जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धक् धक् जलती हुई प्रचंड अग्नि में कामदेव को भस्म कर दिया था।

गिरिराज किशोरी के स्तनों पर पत्रभंग रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान त्रिलोचन में मेरा मन लगा रहे।

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥8॥

अर्थ – जिनके कंठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुए अंधकार के समान कालिमा अंकित है।

जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसार भार को धारण करने वाले चन्द्रमा के समान मनोहर कांतिवाले भगवान गंगाधर मेरी संपत्ति का विस्तार करें।

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्‌ ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥9॥

अर्थ – जिनका कंठ खिले हुए नील कमल समूह की श्याम प्रभा का अनुकरण करने वाली है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, भव (संसार), दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्‌ ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥10॥

अर्थ – जो अभिमान रहित पार्वती जी के कलारूप कदम्ब मंजरी के मकरंद स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी के पान करने वाले भँवरे हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥11॥

अर्थ – जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए साँपों के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है।

धीमे धीमे बजते हुए मृदंग के गंभीर मंगल स्वर के साथ जिनका प्रचंड तांडव हो रहा है , उन भगवान शंकर की जय हो।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्त्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥12॥

अर्थ – पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिटटी के ढेले में, मित्र या शत्रु पक्ष में, तिनका या कमल के समान आँखों वाली युवती में, प्रजा और पृथ्वी के राजाओं में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ?

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्‌ ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

अर्थ – सुन्दर ललाट वाले भगवान चन्द्रशेखर में मन को एकाग्र करके अपने कुविचारों को त्यागकर गंगा जी के तटवर्ती वन के भीतर रहता हुआ सिर पर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आँखों से शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊंगा ?

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्‌ ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ॥14 ॥

अर्थ – जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही भगवान शंकर की भक्ति प्राप्त कर लेता है।

वह विरुद्ध गति को प्राप्त नहीं करता क्योंकि शिव जी का ध्यान चिंतन मोह का नाश करने वाला है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥15 ॥

अर्थ – सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो इस शिव तांडव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।

|| शिव तांडव स्तोत्र समाप्त ||

अनोखी दवाई💊काफी समय से दादी की तबियत खराब थी . घर पर ही दो नर्स उनकी देखभाल करतीं थीं . डाक्टरों ने भी अपने हाथ उठा दिए ...
14/09/2020

अनोखी दवाई💊

काफी समय से दादी की तबियत खराब थी . घर पर ही दो नर्स उनकी देखभाल करतीं थीं . डाक्टरों ने भी अपने हाथ उठा दिए थे और कहा था कि जो भी सेवा करनी है कर लीजिये . दवाइयां अपना काम नहीं कर रहीं हैं .

उसने घर में बच्चों को होस्टल से बुला लिया . काम के कारण दोनों मियां बीबी काम पर चले जाते . दोनों बच्चे बार-बार अपनी दादी को देखने जाते . दादी ने आँखें खोलीं तो बच्चे दादी से लिपट गए .

'दादी ! पापा कहते हैं कि आप बहुत अच्छा खाना बनाती हैं . हमें होस्टल का खाना अच्छा नहीं लगता . क्या आप हमारे लिए खाना बनाओगी ?'

नर्स ने बच्चों को डांटा और बाहर जाने को कहा . अचानक से दादी उठी और नर्स पर बरस पड़ीं .

'आप जाओ यहाँ से . मेरे बच्चों को डांटने का हक़ किसने दिया है ? खबरदार अगर बच्चों को डांटने की कोशिश की !'

'कमाल करती हो आप . आपके लिए ही तो हम बच्चों को मना किया . बार-बार आता है तुमको देखने और डिस्टर्ब करता है . आराम भी नहीं करने देता .'

'अरे! इनको देखकर मेरी आँखों और दिल को कितना आराम मिलता है तू क्या जाने ! ऐसा कर मुझे जरा नहाना है . मुझे बाथरूम तक ले चल .'

नर्स हैरान थी .

कल तक तो दवाई काम नहीं कर रहीं थी और आज ये चेंज .

सब समझ के बाहर था जैसे . नहाने के बाद दादी ने नर्स को खाना बनाने में मदद को कहा . पहले तो मना किया फिर कुछ सोचकर वह मदद करने लगी .

खाना बनने पर बच्चों को बुलाया और रसोई में ही खाने को कहा .

'दादी ! हम जमीन पर बैठकर खायेंगे आप के हाथ से, मम्मी तो टेबल पर खाना देती है और खिलाती भी नहीं कभी .'

दादी के चेहरे पर ख़ुशी थी . वह बच्चों के पास बैठकर उन्हें खिलाने लगी .

बच्चों ने भी दादी के मुंह में निबाले दिए . दादी की आँखों से आंसू बहने लगे .

'दादी ! तुम रो क्यों रही हो ? दर्द हो रहा है क्या ? मैं आपके पैर दबा दूं .'

'अरे! नहीं, ये तो बस तेरे बाप को याद कर आ गए आंसू, वो भी ऐसे ही खाता था मेरे हाथ से .

*पर अब कामयाबी का भूत ऐसा चढ़ा है कि खाना खाने का भी वक्त नहीं है उसके पास और न ही माँ से मिलने का समय*

'दादी ! तुम ठीक हो जाओ, हम दोनों आपके ही हाथ से खाना खायेंगे .'

'और पढने कौन जाएगा ? तेरी माँ रहने देगी क्या तुमको ? '

'दादी ! अब हम नहीं जायेंगे यहीं रहकर पढेंगे .' दादी ने बच्चों को सीने से लगा लिया .

*नर्स ने इस इलाज को कभी पढ़ा ही नहीं था जीवन में .*

*अनोखी दवाई थी अपनों का साथ हिल मिल कर रहने की.*

दादी ने नर्स को कहा:- आज के डॉक्टर और नर्स क्या जाने की भारत के लोग 100 साल तक निरोगी कैसे रहते थे।
छोटा सा गांव सुविधा कोई नहीं
हर घर में गाय
खेत के काम
कुंए से पानी लाना
मसाले कूटना, अनाज दलना
दही बिलोना मक्खन निकालना

एक घर में कम से कम 20 से 25 लोगों का खाना बनाना कपड़े धोना, कोई मिक्सी नहीं , नाही वॉशिंग मशीन या कुकर
फिर भी जीवन में कोई रोग नहीं
मरते दिन तक चश्मे नहीं और दांत भी सलामत।।
*ये सभी केवल परिवार का प्यार मिलने से होता था।*
नर्स तो यह सुनकर हैरान रह गई और दादी दूसरे दिन ठीक हो गई।
आईये बने हम भी दवा ऐसे ही किसी रोगी की😪😪😪🙏🏻
मैसेज को पसंद तो बहुत लोग करेंगें पर... अमल शायद ही कोई करे यदि किसी एक ने भी अमल किया तो मैसेज करना सार्थक हो गया! 🙏🏻🙏🏻

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602 Sanskriti Towers
Jodhpur
342001

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