30/10/2013
"गुरु जम्भेश्वर जी द्वारा सैंसे जी का अभिमान खंडन " कथा पूरा वृत्तांत :
एक समय समराथल पर विराजमान सतगुरु गुरु जम्भेश्वर जी ने नाथूसर गाँव एंव पांचू बीच में झींझाला धोरा पर जाने की इच्छा प्रगट की। उसी समय साथरियों भक्तों ने भी साथ ही चलने की प्रार्थना की। श्रीदेव जी ने सभी को साथ में चलने की आज्ञा प्रदान की। उसी समय सभी ने ही अपने ऊँठ और घोड़े आदि जोते और नाथूसर की तरफ चल पड़े। जब श्रीदेव जी अपनी भक्त-मण्डली सहित झींझाला धोरे पर आ गये और चारों तरफ के लोगों ने जब इसके बारे में सुना तो आसपास के गाँवों के दर्शनार्थी एकत्रित होकर आने लगे। सभी लोग जाति-पाति के भेद-भाव को छोड़कर अपूर्व श्रृद्धा-भाव एंव विश्वास से आ रहे थे। आते ही सर्वप्रथम श्री गुरु जम्भेश्वर जी के चरणों में प्रणाम करते और कुछ लोग अति-भावुक होकर अपने सुख-दुःख की बात श्रीदेव जी करते। अपनी-अपनी अभिलाषा लेकर अपार जन-समूह श्रीदेव जी के पास आ रहा था। इसी प्रकार नाथूसर गाँव वासी भी "सैंसे जी" के साथ हर्ष-ख़ुशी के साथ झींझाला धोरे पर पहुंचे।
सैंसे ने सर्वप्रथम श्री गुरु जम्भेश्वर जी के पास आकर कहा कि- हे देव ! यदि आपकी आज्ञा हो तो हम लोग जमात सहित आपके चरणों में प्रणाम करें और आपके प्रताप से पार(मुक्ति) पहुँच जाएँ। तब देव जी कहा कि- हे सैंसा ! आप लोग तैरने की योग्यता तो अवश्य ही रखते हैं, पर आप लोग अब तक तैरना नहीं जानते हैं। मैं तुम्हे तैरना सिखाने के लिए ही तो आया हूँ। इसी प्रकार अन्य बहुत से नर- नारियों ने भी अपनी भेंट श्रीदेव जी के चरणों में रखी। और पुरे दिन श्रीहरिदेव जी ने मुक्ति-जुक्ति का मार्ग बतलाया। इस प्रकार संध्या होने को आई। गाँवों की आगन्तुक जमात ने वापिस अपने घरों में जाने की आज्ञा मांगी। नाथूसर के सैंसे ने भी आगे बढ़कर हाथ जोड़े और कहने लगा कि- हे देव ! आपने बड़ी कृपा की जो हमारे जंगल में पधारे। हे गुरुदेव ! आप लोग अपनी मण्डली सहित अन्नपान करें और हम लोग वापिस अपने घर को जाएँ। अब रात्रि होने वाली है, हमें घर जाने की आज्ञा दीजिये। और कहने लगा कि- हे गुरुदेव ! आपने पूरी जमात को कुछ न कुछ सीख अवश्य ही दी है, मेरे लिए कुछ भी नहीं कहा। क्या मैं इस योग्य नहीं हूँ जो आपके वचनों का पालन कर सकूँ? श्री गुरु जम्भेश्वर जी ने सैंसे का भाव देखकर कहा कि- हे सैंसा !
" भाव भलै सूं दीजौ भीख, साम्य कह संसा आ सीख।"
भाव भक्ति से भूखे को भोजन देना यही तुम्हारे लिए शिक्षा है। सैंसे के मन में यह सीख जंची नहीं। सैंसा कुछ सोचने लग गया। न ही तो वो हाँ ही कह सका और न ही ना कह सका। साथरियों ने कहा कि- हे सैंसा ! जैसा सतगुरु जी कहते हैं वह ठीक ही कहते हैं, उनकी बात को स्वीकार करके पालन करे। श्रीदेव जी ने साथरियों से कहा कि- सैंसे ने मेरी बात सुनी तो अवश्य ही है पर इसको स्वीकार नहीं कर पा रहा है। यह भक्त तो अच्छा है किन्तु अंहकारी है थोड़ा। सैंसा कहने लगा कि- हे देव ! मैंने तो दान देते हुए सम्पूर्ण पापों को नष्ट(नाश) कर दिया है। मैं तो भाई-बन्धु, न्यात- जमात सब को एकत्रित करके इन्हें भोजन करवाता हूँ। हे देव ! मैं तो घर पर आये हुए अतिथि साधु-सन्तो को अच्छी प्रकार से भिक्षा देता हूँ। घर पर आये हुए अतिथि को ना तो मैं कभी कहता ही नहीं हूँ। आप भी मेरे घर को देखें। मेरे घर को सारा संसार जानता है। केवल आप ही नहीं जानते इसीलिए शायद आपने ऐसी बातें कही है। श्रीदेव जी ने सैंसे भक्त तथा उनकी मण्डली को जाने की आज्ञा प्रदान की और सैंसे के चले जाने के पश्चात साथरियों से कहा कि- हे भक्तों ! सैंसे का भण्डारा, अतिथि सेवा अवश्य ही देखूंगा जिसके बारे में सैंसा कहता है कि मैंने अब तक देखा ही नहीं है।
तब श्रीदेव जी ने अन्य ही रूप धारण कर लिया। दूसरा ही रूप, दूसरी ही बोली, दूसरी ही वेशभूषा। " सरसा सीस बधारया केशा " सिर के बाल बढ़ा लिए, श्री हरी ने पतरी-चिम्पी अपने हाथ में ले ली और इस प्रकार एक अलग ही रूप में ढल गए। अब भला भगवान की भक्ति के बिना कौन पहचान सकता है श्रीहरी देव को? अन्य किसी भक्त को अपने साथ में नहीं लिया। अकेले ही सैंसे के घर जाकर अलख जगाई। सम्पूर्ण संसार जिनके आगे भिक्षुक बनकर माँगता है वह जगत के पालनहार श्रीहरी आज सैंसे के घर भिक्षा के लिए पहुँच गए। भगवान की अहैतु की कृपा होती है तभी भगवान उनके अज्ञान जड़ित गर्व का भंजन करते हैं। सैंसा तो घर पहुंचा ही था, संध्या वेला(सांझ समय) थी। गुरु नियम का पालन करे हुए संध्या करने को बैठा ही था। जगत-पालनहार श्री हरी ने सैंसे के घर पर अलख जगाते हुए कहा- ""सत विष्णु की बाड़ी "" हे देवी ! विष्णु के नाम की भिक्षा दो आपकी बाड़ी हरी-भरी रहेगी। सैंसा अंदर संध्या कर रहा था। अंदर आवाज सुनी और कहने लग