08/01/2017
निराशा से आशा की और
जो चला गया उसे भूल जा
दोस्तों,
मृत्यु एक ऐसा अटल सत्य हैं, जो हर किसी के साथ आना हैं । फिर भी हम इससे भयभीत रहते हैं । कब, किस पल,कंहा,आ जाए ये सिर्फ ईश्वर ही जानता हैं । यदि हम मृत्यु को जीत ले तो शायद प्रकृति की सारी दिनचर्या गड़बड़ हो जायगी ।
हर पतझड़ के बाद सावन जरूर आता हैं, यदि एक जाता हैं तो एक जरूर आता हैं ये नियम अनवरत काल से चला आ रहा हैं । फिर जाने वाले का गम क्यों करते हैं हम ?
दोस्तों, ये सत्य हैं की जो हमारा आज था वो चला गया । पर उसका भी कंही ना कंही सृजन हुआ होगा। एक बीज पेड़ से गिरता हैं, फिर उग जाता हैं । फिर दोष किसे दे । मेरे एक मित्र के परिवार मै दुर्घटना हुई परिवार के कुछ सदस्यों की मौत हुई ।परिवार के कुछ सदस्य भगवान को कोसने लगे । क्या उचित हैं ये सब ? यदि भगवान सबको ही जीवित रखे तो क्या उसकी सत्ता चल पायेगी ? विचार करे? हमारे लिए हमारा परिवार और परिवार के हर सदस्य सर्वोपरि हैं, हम उनसे प्यार करते हैं । जब कोई एक भी बिछुड़ता हैं तो दुःख होता हैं, लेकिन क्या उसका गम हम जिंदगी भर पालते रहे ,उचित नही होगा ।
हँस कर जीना यही दस्तूर है ज़िंदगी का,
एक यही किस्सा मशहूर है ज़िंदगी का,
बीते हुए पल कभी लौटकर नहीं आते,
बस यही एक कसूर है ज़िंदगी का ?
दोस्तों, एक छोटी सी कहानी से जिंदगी की हकीकत समझ आ जायगी की जो चला गया उसे भूल जाओ, वो जन्हा हैं उसे खुश रहने दो, हां अगर कुछ करना चाहते हो तो बार बार रोओ मत , उसके अधूरे सपने को पूरा करो ।
भूत के बीज जब वर्तमान में बोये जाते हैं तो उनके वृक्ष भविष्य को भी ढँक देते हैं. . इसीलिये, यदि वो बीज कड़वे फल के हों तो उन्हें बोने से भी बचना चाहिये और संजोने से भी.मतलब जो पुरानी यादे हैं उन्हें दिमाग से हटा दीजिये । नया बीज सामने हैं ।
एक पिता अपनी चार वर्षीय बेटी कशिश से बहुत प्रेम करता था। ऑफिस से लौटते वक़्त वह रोज़ उसके लिए तरह-तरह के खिलौने और खाने-पीने की चीजें लाता था। बेटी भी अपने पिता से बहुत लगाव रखती थी और हमेशा अपनी तोतली आवाज़ में पापा-पापा कह कर पुकारा करती थी।
दिन अच्छे बीत रहे थे की अचानक एक दिन कशीश को बहुत तेज बुखार हुआ, सभी घबरा गए , वे दौड़े भागे डॉक्टर के पास गए , पर वहां ले जाते-ले जाते कशिश की मृत्यु हो गयी।
परिवार पे तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा और पिता की हालत तो मृत व्यक्ति के समान हो गयी। कशिश के जाने के हफ़्तों बाद भी वे ना किसी से बोलते ना बात करते…बस रोते ही रहते। यहाँ तक की उन्होंने ऑफिस जाना भी छोड़ दिया और घर से निकलना भी बंद कर दिया।
आस-पड़ोस के लोगों और नाते-रिश्तेदारों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर वे किसी की ना सुनते , उनके मुख से बस एक ही शब्द निकलता मेरी बेटी कशिश !
एक दिन ऐसे ही कशिश के बारे में सोचते-सोचते उनकी आँख लग गयी और उन्हें एक स्वप्न आया।
उन्होंने देखा कि स्वर्ग में सैकड़ों बच्चियां परी बन कर घूम रही हैं, सभी सफ़ेद पोशाकें पहने हुए हैं और हाथ में मोमबत्ती ले कर चल रही हैं। तभी उन्हें कशिश भी दिखाई दी।
उसे देखते ही पिता बोले , ” कशिश , मेरी प्यारी बच्ची , सभी परियों की मोमबत्तियां जल रही हैं, पर तुम्हारी बुझी क्यों हैं , तुम इसे जला क्यों नहीं लेती ?”
कशिश बोली, ” पापा, मैं तो बार-बार मोमबत्ती जलाती हूँ , पर आप इतना रोते हो कि आपके आंसुओं से मेरी मोमबत्ती बुझ जाती है….”
ये सुनते ही पिता की नींद टूट गयी। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया , वे समझ गए की उनके इस तरह दुखी रहने से उनकी बेटी भी खुश नहीं रह सकती , और वह पुनः सामान्य जीवन की तरफ बढ़ने लगे।
मित्रों, किसी करीबी के जाने का ग़म शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता। पर कहीं ना कहीं हमें अपने आप को मजबूत करना होता है और अपनी जिम्मेदारियों को निभाना होता है। और शायद ऐसा करना ही मरने वाले की आत्मा को शांति देता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो हमसे प्रेम करते हैं वे हमे खुश ही देखना चाहते हैं , अपने जाने के बाद भी…!और अगर आप भी उनको खुश देखना चाहते हो तो आज के वर्तमान मै खुश रहकर अपनी और परिवार की साथ ही जो चला गया उसकी बची हुई सारी जिम्मेदारी को खुश होकर पूरा करो, शायद उसकी आत्मा पास रहकर प्रसन्न नही हुई हो, पर दूर रहकर ज्यादा खुश हो जायगी ।
दोस्तों, आज का लेख पढ़कर आपको भी संकल्प लेना चाहिये कि किसी की आत्मा को कैसे खुश कर सकते है इसका प्रयास करना चाहिये।
आप भी अपने अजीज की याद में भक्तिमय आयोजन रामकथा ,भागवतकथा,शिवपुराण,देवीभागवत,मायरा और भजन संध्या करवाकर खुशमय माहौल बनाये।
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