Shiv Kumar Joshi

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समुद्र मंथन की कथा एवं कारण〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️एक बार की बात है शिवजी के दर्शनों के लिए दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ ...
14/05/2022

समुद्र मंथन की कथा एवं कारण
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एक बार की बात है शिवजी के दर्शनों के लिए दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कैलाश जा रहे थे। मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। तब दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद देकर विष्णु भगवान का पारिजात पुष्प प्रदान किया। इन्द्रासन के गर्व में चूर इन्द्र ने उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। उस पुष्प का स्पर्श होते ही ऐरावत सहसा विष्णु भगवान के समान तेजस्वी हो गया। उसने इन्द्र का परित्याग कर दिया और उस दिव्य पुष्प को कुचलते हुए वन की ओर चला गया।

दुर्वाषा ऋषि का शाप
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इन्द्र द्वारा भगवान विष्णु के पुष्प का तिरस्कार होते देखकर दुर्वाषा ऋषि के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने देवराज इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। दुर्वासा मुनि के शाप के फलस्वरूप लक्ष्मी उसी क्षण स्वर्गलोक को छोड़कर अदृश्य हो गईं। लक्ष्मी के चले जाने से इन्द्र आदि देवता निर्बल और श्रीहीन हो गए। उनका वैभव लुप्त हो गया। इन्द्र को बलहीन जानकर दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवगण को पराजित करके स्वर्ग के राज्य पर अपनी परचम फहरा दिया। तब इन्द्र देवगुरु बृहस्पति और अन्य देवताओं के साथ ब्रह्माजी की सभा में उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजी बोले —‘‘देवेन्द्र ! भगवान विष्णु के भोगरूपी पुष्प का अपमान करने के कारण रुष्ट होकर भगवती लक्ष्मी तुम्हारे पास से चली गयी हैं। उन्हें पुनः प्रसन्न करने के लिए तुम भगवान नारायण की कृपा-दृष्टि प्राप्त करो। उनके आशीर्वाद से तुम्हें खोया वैभव पुनः मिल जाएगा।’’

शाप मुक्ति का उपाय
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इस प्रकार ब्रह्माजी ने इन्द्र को आस्वस्त किया और उन्हें लेकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। वहाँ परब्रह्म भगवान विष्णु भगवती लक्ष्मी के साथ विराजमान थे। देवगण भगवान विष्णु की स्तुति करते हुए बोले—‘‘भगवान् ! आपके श्रीचरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम। भगवान् ! हम सब जिस उद्देश्य से आपकी शरण में आए हैं, कृपा करके आप उसे पूरा कीजिए। दुर्वाषा ऋषि के शाप के कारण माता लक्ष्मी हमसे रूठ गई हैं और दैत्यों ने हमें पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है। अब हम आपकी शरण में हैं, हमारी रक्षा कीजिए।’’ भगवान विष्णु त्रिकालदर्शी हैं। वे पल भर में ही देवताओं के मन की बात जान गए। तब वे देवगण से बोले—‘‘देवगण ! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें, क्योंकि केवल यही तुम्हारे कल्याण का उपाय है। दैत्यों पर इस समय काल की विशेष कृपा है इसलिए जब तक तुम्हारे उत्कर्ष और दैत्यों के पतन का समय नहीं आता, तब तक तुम उनसे संधि कर लो। क्षीरसागर के गर्भ में अनेक दिव्य पदार्थों के साथ-साथ अमृत भी छिपा है। उसे पीने वाले के सामने मृत्यु भी पराजित हो जाती है। इसके लिए तुम्हें समुद्र मंथन करना होगा। यह कार्य अत्यंत दुष्कर है, अतः इस कार्य में दैत्यों से सहायता लो। कूटनीति भी यही कहती है कि आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को भी मित्र बना लेना चाहिए। तत्पश्चात् अमृत पीकर अमर हो जाओ। तब दुष्ट दैत्य भी तुम्हारा अहित नहीं कर सकेंगे। देवगण ! वे जो शर्त रखें, उसे स्वाकीर कर लें। यह बात याद रखें कि शांति से सभी कार्य बन जाते हैं, क्रोध करने से कुछ नहीं होता।’’ भगवान विष्णु के परामर्श के अनुसार इन्द्रादि देवगण दैत्यराज बलि के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें अमृत के बारे में बताकर समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया।

इसी समय मेघ के समान गम्भीर स्वर में आकाशवाणी हुई- 'देवताओ और दैत्यो! तुम क्षीर समुद्र का मन्थन करो। इस कार्य में तुम्हारे बल की वृद्धि होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मन्दराचल को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाओ, फिर देवता और दैत्य मिलकर मन्थन आरम्भ करो।' यह आकाशवाणी सुनकर सहस्त्रों दैत्य और देवता समुद्र-मन्थन के लिये उद्यत हो सुवर्ण के सदृश कान्तिमान् मन्दराचल के समीप गये। वह पर्वत सीधा, गोलाकार, बहुत मोटा और अत्यन्त प्रकाशमान था। अनेक प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्दन, पारिजात, नागकेशर, जायफल और चम्पा आदि भाँति-भाँति के वृक्षों से वह हरा-भरा दिखायी देता था।

मन्दराचल पर्वत
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उस महान् पर्वत को देखकर सम्पूर्ण देवताओं ने हाथ जोड़कर कहा- 'दूसरों का उपकार करने वाले महाशैल मन्दराचल ! हम सब देवता तुमसे कुछ निवेदन करने के लिये यहाँ आये हैं, उसे तुम सुनो।' उनके यों कहने पर मन्दराचल ने देहधारी पुरुष के रूप में प्रकट होकर कहा- 'देवगण! आप सब लोग मेरे पास किस कार्य से आये हैं, उसे बताइये।' तब इन्द्र ने मधुर वाणी में कहा- 'मन्दराचल! तुम हमारे साथ रहकर एक कार्य में सहायक बनो; हम समुद्र को मथकर उससे अमृत निकालना चाहते हैं, इस कार्य के लिये तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचल ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और देवकार्य की सिद्धि के लिये देवताओं, दैत्यों तथा विशेषत: इन्द्र से कहा- 'पुण्यात्मा देवराज! आपने अपने वज्र से मेरे दोनों पंख काट डाले हैं, फिर आप लोगों के कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ तक मैं चल कैसे सकता हूँ?' तब सम्पूर्ण देवताओं और दैत्यों ने उस अनुपम पर्वत को क्षीर समुद्र तक ले जाने की इच्छा से उखाड़ लिया; परंतु वे उसे धारण करने में समर्थ न हो सके। वह महान् पर्वत उसी समय देवताओं और दैत्यों के ऊपर गिर पड़ा। कई कुचले गये, कई मर गये, कई मूर्च्छित हो गये, कई एक-दूसरे को कोसने और चिल्लाने लगे तथा कुछ लोगों ने बड़े क्लेश का अनुभव किया। इस प्रकार उनका उद्यम और उत्साह भंग हो गया। वे देवता और दानव सचेत होने पर जगदीश्वर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे- 'शरणागतवत्सल महाविष्णो! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है।'

समुद्र मन्थन
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उस समय देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये गरुड़ की पीठ पर बैठे हुए भगवान विष्णु सहसा वहाँ प्रकट हो गये। वे सबको अभय देने वाले हैं। उन्होंने देवताओं और दैत्यों की ओर दृष्टिपात करके खेल-खेल में ही उस महान् पर्वत को उठाकर गरुड़ की पीठ पर रख लिया। फिर वे देवताओं और दैत्यों को क्षीर-समुद्र के उत्तर-तट पर ले गये और पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल को समुद्र में डालकर तुरंत वहाँ से चल दिये। तदनन्तर सब देवता दैत्यों को साथ लेकर वासुकी नाग के समीप गये और उनसे भी अपनी प्रार्थना स्वीकार करायी। इस प्रकार मन्दराचल को मथानी और वासुकि-नाग को रस्सी बनाकर देवताओं और दैत्यों ने क्षीर-समुद्र का मन्थन आरम्भ किया। इतने में ही वह पर्वत समुद्र में डूबकर रसातल को जा पहुँचा। तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ने कच्छपरूप धारण करके तत्काल ही मन्दराचल को ऊपर उठा दिया। उस समय यह एक अद्भुत घटना हुई। फिर जब देवता और दैत्यों ने मथानी को घुमाना आरम्भ किया, तब वह पर्वत बिना गुरु के ज्ञान की भाँति कोई सुदृढ़ आधार न होने के कारण इधर-उधर डोलने लगा। यह देख परमात्मा भगवान् विष्णु स्वयं ही मन्दराचल के आधार बन गये और उन्होंने अपनी चारों भुजाओं से मथानी बने हुए उस पर्वत को भली-भाँति पकड़कर उसे सुखपूर्वक घुमाने योग्य बना दिया। तब अत्यन्त बलवान् देवता और दैत्य एकीभूत हो अधिक ज़ोर लगाकर क्षीर-समुद्र का मन्थन करने लगे।

विष्णुजी का कच्छप रूप
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कच्छप रूपधारी भगवान की पीठ जन्म से ही कठोर थी और उस पर घूमने वाला पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल भी वज्रसार की भाँति दृढ़ था। उन दोनों की रगड़ से समुद्र में बड़वानल प्रकट हो गया। साथ ही हलाहल विष उत्पन्न हुआ। उस विष को सबसे पहले नारद जी ने देखा। तब अमित तेजस्वी देवर्षि ने देवताओं को पुकार कर कहा- 'अदिति कुमारो! अब तुम समुद्र का मन्थन न करो। इस समय सम्पूर्ण उपद्रवों का नाश करने वाले भगवान शिव की प्रार्थना करो। वे परात्पर हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा योगी पुरुष भी उन्हीं का ध्यान करते हैं।'

देवता अपने स्वार्थसाधन में संलग्न हो समुद्र मंथन रहे थे। वे अपनी ही अभिलाषा में तन्मय होने के कारण नारद जी की बात नहीं सुन सके। केवल उद्यम का भरोसा करके वे क्षीर-सागर के मन्थन में संलग्न थे। अधिक मन्थन से जो हलाहल विष प्रकट हुआ, वह तीनों लोकों को भस्म कर देने वाला था। वह प्रौढ़ विष देवताओं का प्राण लेने के लिये उनके समीप आ पहुँचा और ऊपर–नीचे तथा सम्पूर्ण दिशाओं में फैल गया। समस्त प्राणियों को अपना ग्रास बनाने के लिये प्रकट हुए उस कालकूट विष को देखकर वे सब देवता और दैत्य हाथ में पकड़े हुए नागराज वासुकि को मन्दराचल पर्वत सहित वहीं छोड़ भाग खड़े हुए। उस समय उस लोकसंहारकारी कालकूट विष को भगवान शिव ने स्वयं अपना ग्रास बना लिया। उन्होंने उस विष को निर्मल (निर्दोष) कर दिया। इस प्रकार भगवान शंकर की बड़ी भारी कृपा होने से देवता, असुर, मनुष्य तथा सम्पूर्ण त्रिलोकी की उस समय कालकूट विष से रक्षा हुई।

चन्द्रदेव का प्राकट्य
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तदनन्तर भगवान विष्णु के समीप मन्दराचल को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर देवताओं ने पुन: समुद्र-मन्थन आरम्भ किया। तब समुद्र से देवकार्य की सिद्धि के लिये अमृतमयी कलाओं से परिपूर्ण चन्द्रदेव प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवता, असुर और दानवों ने भगवान चंद्रमा को प्रणाम किया और गर्गाचार्य जी से अपने-अपने चन्द्रबल की यथार्थ रूप से जिज्ञासा की। उस समय गर्गाचार्य जी ने देवताओं से कहा- 'इस समय तुम सब लोगों का बल ठीक है। तुम्हारे सभी उत्तम ग्रह केंन्द्र स्थान में (लग्न में, चतुर्थ स्थान में, सप्तम स्थान में और दशम स्थान में) हैं। चन्द्रमा से गुरु का योग हुआ है। बुध, सूर्य, शुक्र, शनि और मंगल भी चन्द्रमा से संयुक्त हुए हैं। इसलिये तुम्हारे कार्य की सिद्धि के निमित्त इस समय चन्द्रबल बहुत उत्तम है। यह गोमन्त नामक मुहूर्त है, जो विजय प्रदान करने वाला है।' महात्मा गर्गजी के इस प्रकार आश्र्वासन देने पर महाबली देवता गर्जना करते हुए बड़े वेग से समुद्र-मन्थन करने लगे।

चार दिव्य वृक्ष
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मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े ज़ोर की आवाज़ उठ रही थी। इस बार के मन्थन से देवकार्यों की सिद्धि के लिये साक्षात् सुरभि कामधेनु प्रकट हुईं। उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं। उस समय ऋषियों ने बड़े हर्ष में भरकर देवताओं और दैत्यों से कामधेनु के लिये याचना की और कहा- 'आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणों को कामधेनु सहित इन सम्पूर्ण गौओं का दान अवश्य करें।' ऋषियों के याचना करने पर देवताओं और दैत्यों ने भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञ कर्मों में भली-भाँति मन को लगाने वाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियों ने उन गौओं का दान स्वीकार किया। तत्पश्चात् सब लोग बड़े जोश में आकर क्षीरसागर को मथने लगे। तब समुद्र से कल्पवृक्ष, पारिजात, आम का वृक्ष और सन्तान- ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए।

कौस्तुभ मणि
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उन सबको एकत्र रखकर देवताओं ने पुन: बड़े वेग से समुद्र मन्थन आरम्भ किया। इस बार के मन्थन से रत्नों में सबसे उत्तम रत्न कौस्तुभ प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डल के समान परम कान्तिमान था। वह अपने प्रकाश से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहा था। देवताओं ने चिन्तामणि को आगे रखकर कौस्तुभ का दर्शन किया और उसे भगवान विष्णु की सेवा में भेंट कर दिया। तदनन्तर, चिन्तामणि को मध्य में रखकर देवताओं और दैत्यों ने पुन: समुद्र को मथना आरम्भ किया। वे सभी बल में बढ़े-चढ़े थे और बार-बार गर्जना कर रहे थे। अब की बार उसे मथे जाते हुए समुद्र से उच्चै:श्रवा नामक अश्र्व प्रकट हुआ। वह समस्त अश्र्वजाति में एक अद्भुत रत्न था। उसके बाद गज जाति में रत्न भूत ऐरावत प्रकट हुआ। उसके साथ श्वेतवर्ण के चौसठ हाथी और थे। ऐरावत के चार दाँत बाहर निकले हुए थे और मस्तिष्क से मद की धारा बह रही थी। इन सबको भी मध्य में स्थापित करके वे सब पुन: समुद्र मथने लगे। उस समय उस समुद्र से मदिरा, भाँग, काकड़ासिंगी, लहसुन, गाजर, अत्यधिक उन्मादकारक धतूर तथा पुष्कर आदि बहुत-सी वस्तुएँ प्रकट हुईं। इन सबको भी समुद्र के किनारे एक स्थान पर रख दिया गया। तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ देवता और दानव पुन: पहले की ही भाँति समुद्र-मन्थन करने लगे। अब की बार समुद्र से सम्पूर्ण भुवनों की एकमात्र अधीश्वरी दिव्यरूपा देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं, जिन्हें ब्रह्मवेत्ता पुरुष आन्वीक्षिकी (वेदान्त-विद्या) कहते हैं। इन्हीं को दूसरे लोग 'मूल-विद्या' कहकर पुकारते हैं।

देवी महालक्ष्मी
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कुछ सामर्थ्यशाली महात्मा इन्हीं को वाणी और ब्रह्मविद्या भी कहते हैं। कोई-कोई इन्हीं को ऋद्धि, सिद्धि, आज्ञा और आशा नाम देते हैं। कोई योगी पुरुष इन्हीं को 'वैष्णवी' कहते हैं। सदा उद्यम में लगे रहने वाले माया के अनुयायी इन्हीं को 'माया' के रूप में जानते हैं। जो अनेक प्रकार के सिद्धान्तों को जानने वाले तथा ज्ञानशक्ति से सम्पन्न हैं, वे इन्हीं को भगवान की 'योगमाया' कहते हैं। देवताओं ने देखा देवी महालक्ष्मी का रूप परम सुन्दर है। उनके मनोहर मुख पर स्वाभाविक प्रसन्नता विराजमान है। हार और नूपुरों से उनके श्रीअंगो की बड़ी शोभा हो रही है। मस्तिष्क पर छत्र तना हुआ है, दोनों ओर से चँवर डुल रहे हैं; जैसे माता अपने पुत्रों की ओर स्नेह और दुलार भरी दृष्टि से देखती है, उसी प्रकार सती महालक्ष्मी ने देवता, दानव, सिद्ध, चारण और नाग आदि सम्पूर्ण प्राणियों की ओर दृष्टिपात किया। माता महालक्ष्मी की कृपा-दृष्टि पाकर सम्पूर्ण देवता उसी समय श्रीसम्पन्न हो गये। वे तत्काल राज्याधिकारी के शुभ लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देने लगे।

लक्ष्मी द्वारा नारायण का वरण
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तदनन्तर देवी लक्ष्मी ने भगवान मुकुन्द की ओर देखा। उनके श्रीअंग तमाल के समान श्यामवर्ण थे। कपोल और नासिका बड़ी सुन्दर थी। वे परम मनोहर दिव्य शरीर से प्रकाशित हो रहे थे। उनके वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था। भगवान एक हाथ में कौमोद की गदा शोभा पा रही थी। भगवान् नारायण की उस दिव्य शोभा को देखते ही लक्ष्मी जी आश्चर्यचकित हो उठीं और हाथ में वनमाला ले सहसा हाथी से उतर पड़ीं। वह माला श्रीजी ने अपने ही हाथों बनायी थीं, उसके ऊपर भ्रमर मंडरा रहे थे। देवी ने वह सुन्दर वनमाला परमपुरुष भगवान विष्णु के कण्ठ में पहना दी और स्वयं उनके वाम भाग में जाकर खड़ी हो गयीं। उस शोभाशाली दम्पति का वहाँ दर्शन करके सम्पूर्ण देवता, दैत्य, सिद्ध, अप्सराएँ, किन्नर तथा चारणगण परम आनन्द को प्राप्त हुए।

धन्वन्तरि और अमृत
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लक्ष्मी द्वारा विष्णु वरण के बाद समुद्र मंथन से कन्या के रूप में वारुणी प्रकट हई जिसे दैत्यों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात् एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।" धन्वन्तरि के हाथ से अमृत को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे दैत्यों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये उनका आपस में लड़ना देखते रहे।

मोहिनी रूप धारण
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देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु तत्काल मोहिनी रूप धारण कर आपस में लड़ते दैत्यों के पास जा पहुँचे। उस विश्वमोहिनी रूप को देखकर दैत्य तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने लगे। जब दैत्यों ने उस नवयौवना सुन्दरी को अपनी ओर आते हुये देखा तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त होकर एकटक देखने लगे। वे दैत्य बोले, "हे सुन्दरी! तुम कौन हो? लगता है कि हमारे झगड़े को देखकर उसका निबटारा करने के लिये ही हम पर कृपा कटाक्ष कर रही हो। आओ शुभगे! तुम्हारा स्वागत है। हमें अपने सुन्दर कर कमलों से यह अमृतपान कराओ।" इस पर विश्वमोहिनी रूपी विष्णु ने कहा, "हे देवताओं और दानवों! आप दोनों ही महर्षि कश्यप जी के पुत्र होने के कारण भाई-भाई हो फिर भी परस्पर लड़ते हो। मैं तो स्वेच्छाचारिणी स्त्री हूँ। बुद्धिमान लोग ऐसी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते, फिर तुम लोग कैसे मुझ पर विश्वास कर रहे हो? अच्छा यही है कि स्वयं सब मिल कर अमृतपान कर लो।"

देवताओं को अमृतपान
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विश्वमोहिनी के ऐसे नीति कुशल वचन सुन कर उन कामान्ध दैत्यों, दानवों और असुरों को उस पर और भी विश्वास हो गया। वे बोले, "सुन्दरी! हम तुम पर पूर्ण विश्वास है। तुम जिस प्रकार बाँटोगी हम उसी प्रकार अमृतपान कर लेंगे। तुम ये घट ले लो और हम सभी में अमृत वितरण करो।" विश्वमोहिनी ने अमृत घट लेकर देवताओं और दैत्यों को अलग-अलग पंक्तियो में बैठने के लिये कहा। उसके बाद दैत्यों को अपने कटाक्ष से मदहोश करते हुये देवताओं को अमृतपान कराने लगे। दैत्य उनके कटाक्ष से ऐसे मदहोश हुये कि अमृत पीना ही भूल गये।

राहु और केतु
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भगवान की इस चाल को राहु नामक दैत्य समझ गया। वह देवता का रूप बना कर देवताओं में जाकर बैठ गया और प्राप्त अमृत को मुख में डाल लिया। जब अमृत उसके कण्ठ में पहुँच गया तब चन्द्रमा तथा सूर्य ने पुकार कर कहा कि ये राहु दैत्य है। यह सुनकर भगवान विष्णु ने तत्काल अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर गर्दन से अलग कर दिया। अमृत के प्रभाव से उसके सिर और धड़ राहु और केतु नाम के दो ग्रह बन कर अन्तरिक्ष में स्थापित हो गये। वे ही बैर भाव के कारण सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण कराते हैं।

देवासुर संग्राम
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इस तरह देवताओं को अमृत पिलाकर भगवान विष्णु वहाँ से लोप हो गये। उनके लोप होते ही दैत्यों की मदहोशी समाप्त हो गई। वे अत्यन्त क्रोधित हो देवताओं पर प्रहार करने लगे। भयंकर देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया जिसमें देवराज इन्द्र ने दैत्यराज बलि को परास्त कर अपना इन्द्रलोक वापस ले लिया।

चौदह (14) रत्नों की प्राप्ति
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समुद्र मंथन की मिथकीय घटना के बाद जो चौदह (14) रत्नों की प्राप्ति हुई उससे संबंधित निम्नलिखित पंक्तियाँ स्मरणीय हैं:-

श्री, मणि, रम्भा, वारुणी, अमिय, शंख, गजराजधेनु, धनुष, शशि, कल्पतरु, धन्वन्तरि, विष, वाज।

1👉 हलाहल (विष)
👉 कामधेनु
👉 उच्चे: श्रवा (अश्व)
👉 ऐरावत हाथी
👉 कौस्तुभ मणि
👉 कल्पद्रुम
👉 रंभा
👉 लक्ष्मी
👉 वारुणी (मदिरा)
👉 चन्द्रमा
👉 पारिजात वृक्ष
👉 पांचजन्य शंख
👉 धन्वन्तरि (वैद्य)
👉 अमृत
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माली पने से श्रीगांर
08/01/2022

माली पने से श्रीगांर

17/07/2019

#लंकाधीश_रावण_कि_मांग
(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग जरुर पढें)
बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी महर्षि कम्बन की 'इरामावतारम्'मे यह कथा है।
रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..।
जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं--

खर दूसन मो सम बलवंता ।
तिनहि को मरहि बिनु भगवंता।।

रावण के पास जामवंत जी को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..।
जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

रावण ने सविनय कहा– "आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।"

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है।
" मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।"

प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया

"क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?"

"बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है. I"

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –" आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।"

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

" .यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। "

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य।
यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया। स्वस्थ कण्ठ से "सौभाग्यवती भव" कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे ।

" आदेश मिलने पर आना" कहकर सीता को उन्होंने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे ।

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

" दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! "

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया ।

सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा

" यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।"

श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

" अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?"

" कोई उपाय आचार्य ?"


" आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।"

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया। श्री रामादेश के परिपालन में. विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।

" अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान ..."

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।
गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा - लिंग विग्रह ?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

आचार्य ने आदेश दे दिया - " विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।"


जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया ।

यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।.

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..

श्रीराम ने पूछा - "आपकी दक्षिणा ?"

पुनः एक बार सभी को चौंकाया। ... आचार्य के शब्दों ने।

" घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है ..."

" लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।"

"आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे ....." आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।


"ऐसा ही होगा आचार्य।" यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी--

“रघुकुल रीति सदा चली आई ।
प्राण जाई पर वचन न जाई ।”

यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।


रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ?

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )

🙏🏼जय श्री राम 🙏🏼
इस प्रसंग को पढ़ने का सादर आभार.!!

11/02/2019

श्रीमाली ब्राह्मण
भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास में श्रीमाली ब्राहम्णों का विशेष स्थान है। प्रमुख रूप से ये लोग राजस्थान, गुजरात व मध्य प्रदेश में पायें जाते है, किन्तु आजीविका की दृष्टि से वर्तमान में सम्पूर्ण भारत तथा विश्व के अनेक भागों में फैले हुये हैं। हिन्दू समाज में वर्णव्यवस्था के विकास पर दृष्टिपात किया जाय तो वैदिक काल में चतुवर्ण व्यवस्था के अन्र्तगत ब्राहम्ण वर्ग से ही इनका संबंध रहा है। जिस समय ब्राहम्ण वर्ग में से जन्मजात रूढ़ जातीय जीवन का विकास हुआ तब ब्रहम्र्षि देश में निवास करने वाले ब्राहम्णों से निकले दस प्रकार के ब्राहम्ण इस भूमण्डल में प्रसिद्ध हुये – पंचगौड़ एवं पंचद्रविड़। विन्ध्याचल के उत्तर में निवास करने वाले सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड, उत्कल, औदीच्य एवं मैथिल पंचगौड कहलाए तथा विन्ध्याचल के दक्षिण में निवास करने वाले कर्नाटक, तैलंग, द्रविड, गुर्जर व महाराष्ट्र पंचद्रविड़ कहलाये। उत्तरी गुजरात में बसने (गुजरात भी द्रविड देश में शुमार है) से श्रीमाली ब्राहम्ण पूर्व में द्रविड़ ब्राहम्ण कहलाए तथा पंच द्रविड़ों में गुजराती (गुर्जर) पुकारे जाते थे। कालान्तर में जब विभिन्न कारणों (वर्ण संकरता, वंश अनुवांशिकता, प्रदेश इत्यादि) से जातियाँ उपजातियों में बँटी तो स्थान विशेष के कारण (कश्मीर के रहने वाले कश्मीरी ब्राहम्ण , कन्नौज के कान्यकुब्ज, गौड देश के गौड ब्राहम्ण इत्यादि) श्रीमाल प्रदेश (भीनमाल-जालौर) में रहने वाले ब्राहम्ण श्रीमाली ब्राहम्ण के नाम से जाने जाने लगे। ब्राहम्ण शब्द का अर्थ ही वेदों के उस भाग से है जिसमें कर्मकाण्ड समझाया गया है। श्रीमाली ब्राहम्ण इसी विशिष्टता का प्रतिनिधित्व करते हुये वेदाध्यायी, कर्मकाण्डी तथा शुद्ध उच्चारण के लिये समस्त ब्राहम्णों में प्रसिद्ध हैं।

श्रीमाली ब्राहम्णों के इतिहास की जानकारी का सर्वोत्तम उपलब्ध प्रमाण श्रीमालपुराण है जिसे श्रीमाल माहात्म्य भी कहते हैं, इसके लेखक के अनुसार यह स्कन्ध पुराण का ही एक भाग है। यद्यपि तथ्यों एवं कालक्रम की दृष्टि से इसमें गंभीर ऐतिहासिक भूलें है, फिर भी उपलबध प्रमाणों में यह सर्वोत्तम है जो इस जाति के इतिहास का एकमात्र विस्तृत स्रोत है। इसके अलावा श्रीमाल प्रदेश में रचे हुये फुटकर जैन साहित्य, शिलालेखों, भाटबहियों, किवदन्तियों तथा परम्परागत रीति-रिवाजों से भी इस जाति के ऐतिहासिक विकास का पता चलता है।
श्रीमाल पुराण विक्रम की तेरहवीं सदी के पूर्वाद्ध की रचना प्रतीत होती है। यह पचहत्तर अध्याय व सैकड़ों श्लोको में संस्कृत भाषा में रचित है। श्रीमाल पुराण में श्रीमाल नगर एवं श्रीमाली ब्राहम्णों के संबंध में कथानक निम्न प्रकार से है:
भृगु ऋषि के यहाँ एक बहुत सुन्दर कन्या का जन्म आसोज कृष्णा अष्टमी को हुआ। उसका नाम श्री (लक्ष्मी) रखा गया। उस कन्या का विवाह क्षीरसागर (बंगाल की खाड़ी) से भृगु के यहां आकर विष्णु भगवान ने किया। गरूड़ पर सवार होकर श्री के साथ विष्णु भगवान (प्रतीकात्मक) त्रयंबक सरोवर आये। उस कन्या ने सरावेर में स्नान किया जिससे उसका मानवीय जड़त्व मिटा और दिव्य देवत्व प्राप्त हुआ। तब श्री की इच्छा हुई की मैं यहां एक नगर बसाऊँ। इस प्रकार श्री के विवाह के अवसर पर श्रीमाल नगर की नींव पड़ी और तभी से श्रीमाली ब्राहम्ण जाति का उद्भव हुआ।
लक्ष्मी (श्री) की भावना के अनुसार यह बसने वाला नगर ब्राहम्णों को दान में देना था। अतः विष्णु ने अपने दूतों को ब्राहम्णों को लेने के लिये नाना प्रदेशों में तुरन्त भेजा और उनके निमंत्रण पर विभिन्न स्थानों से जो ब्राहम्ण आये उनकी कुल संख्या पचार हजार थी जिसमें सैधवारण्यवासी पांच हजार ब्राहम्ण भी थे। एक दान का अधिक व्यक्तियों को संकल्प नहीं हो सकता, इस सिद्धांत के अनुसार एक ऐसा व्यक्ति इसके लिये तय करना आवश्यक था जो ज्ञानी, विद्वान, श्रेष्ठतम् एवं अध्र्य वंदन करने योग्य हो। विष्णु, श्री तथा ब्राहम्णों ने इसके लिये महर्षि गौतम, जो आंगिरसी ब्राहम्ण थे और काशी से आये थे, को ही उत्तम समझा ; किन्तु सैधवारण्यवासी ब्राहम्णों ने इसका विरोध किया और गौतम की आलोचना की। इस पर आंगिरसी ब्राहम्णों (जो उज्जैन क्षेत्र से आये थे) ने सैधवारण्यवासी ब्राहम्णों पर कोप करते हुये शाप दिया की तुम लोग वेद से विमुख होओगे। शाप लगने से सैधवारण्यवासी सिन्धु सौवीर से आये हुये ब्राहम्ण पुनः अपने क्षेत्र में चले गये। विष्णु व लक्ष्मी ने महर्षि गौतम को अध्र्य वंदन करवाकर, संकल्प कर उस पुण्य क्षेत्र को दान में दे दिया, जिसे गौतम ने उपस्थित ब्राहम्णों में वितरित कर दिया था। श्री के बसाए हुये नगर में ब्राहम्ण बस गये, तभी से यह नगर श्रीमाल नगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके साथ ही यहां बसे ब्राहम्ण श्रीमाली ब्राहम्ण कहलाने लगे तथा अपनी सख्यां के आधार पर इनकी पहचान ‘‘पैतालीस हजार की न्यात’’ से हो गयी। यद्यपि कालान्तर में यह संख्या परिवर्तित होती गयी, किन्तु अपनी परम्परागत पहचान के बतौर समस्त श्रीमाली ब्राहम्ण आज भी अपने को 45 हजार की न्यात से संबोधित करने में गौरव अनुभव करते हैं।

लक्ष्मी का पाटन गमन:-
श्रीमाल पुराण के अनुसार बाद में ईष्र्यावश श्रीमाली ब्राहम्णों ने गौतम ऋषि पर गौवध का आरोप लगाकर उन्हे पंक्ति (न्यात) से बाहर कर दिया और नगर छोड़ने को विवश कर दिया। इस पर गौतम ने अपनी पत्नी अहिल्या के साथ श्रीमाल नगर को त्याग दिया और महावीर के पास जा कर जैन धर्म की दीक्षा ले ली। गौतम ने एक वर्ष तक सरस्वती की आराधना कर वरदान मांगा की मेरे बनाये हुये आगम जनता में चले। इसके पश्चात् गौतम पुनः श्रीमाल नगर में आये और वहां जैन धर्म का प्रचार किया। इस समय श्रीमाली ब्राहम्णों ने गौतम के समक्ष अपनी भूल स्वीकार की। लक्ष्मी जी ने भी समझाया किन्तु गौतम नहीं माने और जैन बने रहे। 92 वर्ष की आयु में गौतम का स्वर्गवास हो गया। इसी घटना के कारण लक्ष्मी श्रीमाली ब्राहम्णों पर कोपायमान हुई और उसने पाटन जाने का संकल्प किया। संभवतः यहां लक्ष्मी गमन के दो पृथक सन्दर्भों को मिलाया गया है। प्रथम बार गौतम के स्वर्गवास के पश्चात् ‘‘श्री’’ (भृगु ऋषि की कन्या तथा ऐश्वर्य की देवी की प्रतीक) का कोपायमान होकर जाना और दूसरी बात ‘‘श्री’’ (भगवती लक्ष्मी की प्रतिमा) का वि. सं. 1203 में पाटन जाना। जाती हुई लक्ष्मी ने ब्राहम्णों की आजीविका के लिये दो घर जैन वैश्य के बीच एक घर ब्राहम्ण का रहेगा ऐसा तय किया। साथ ही श्रीमाल नगर के विघटन की भी भविष्यवाणी की। श्रीमाल पुराण में लक्ष्मी के पाटन जाने की तिथी वि. सं. 1213 वैसाख शुक्ला 8 दी हुई है। इस घटना से संबंधित कथानक के अनुसार श्रीमाल नगर के ही श्रीमाली ब्राहम्ण देवरिख को नौ वर्ष के लिये नौ लाख में लक्ष्मी पूजन का ठेका दिया गया था। एक अवसर पर जब श्रीमाल नगर के समस्त श्रीमाली ब्राहम्ण हरियाजानी के हेले (न्यात बुलावा) पर पाटन नगर में गये हुये थे तब देवरिख व उसके साथियों ने नौं लाख सिक्कों में लक्ष्मी की प्रतिमा सुनन्द नामक वणिक को बेच दी। लक्ष्मी जी की यह प्रतिमा चैदह रत्नों से जडि़त स्वर्णसिंहासन से युक्त, आभूषण एवं स्वर्ण वस्त्रों से युक्त होने से चैवन लाख रूपयों के मूल्य की सम्पत्ति से युक्त थी। जब सुनन्द बैलों के रथ में लक्ष्मी प्रतिमा को पाटन ले जाने लगा तो उस समय जल भर कर आती हुई श्रीमाली ब्राहम्ण महिलाओं ने रथ के सामने आकर उसे रोकने का विफल प्रयास किया। इस प्रतिमा को पाटन में त्रिपोलिया के पास लक्ष्मी सेरी के मंदिर में स्थापित किया गया। जो आज भी दृष्टव्य है।

महर्षि गौतम:-
महर्षि गौतम कौन थे ? इनके संबंध में अनेक भ्रान्तियां है। वस्तुतः ये वे गौतम हैं जो जैन साहित्य में गौतम गणधर नाम से प्रसिद्ध है। ये महान् विद्वान आचार सिद्धांतों के सर्वोपरि रचयिता, यज्ञों में आचार्य पद को सुशोभित करने वाले तथा हिंसक यज्ञों के महान् विरोधी थे। यहां तक कि इनके आचार को मानने वाले श्रीमाली ब्राह्मण आज भी यज्ञों व संस्कारों में नारियल होमते हैं तथा प्रायश्चित हेतु 108 ब्राह्मणों को भोजन करवाना अनिवार्य समझते हैं। जबकि भारत में अन्य ब्राह्मणादि वर्णों में ऐसी औपचारिकता अनिवार्य नहीं है। यहीं नहीं सुपारी होमने पर 25 ब्राह्मण, फल होमने पर 11 ब्राह्मण तथा पुष्प होमने पर तीन ब्राह्मण भोजन करवाने का विधान है। शालिग्रामशिला पहले त्राटक सिद्धि करने हेतु थी, उसे सर्वप्रथम विष्णु स्वरूप की उपासना में इन्होंने ही स्थान दिया। इसके पहले ये उपासना में रही हो ऐसा वर्णन नहीं मिलता। श्रीयंत्र (चक्र) से लक्ष्मी सूक्त का सम्बन्ध ऋग्वेद की ऋचाओं से जोड़कर उपासना में सर्वप्रथम स्थान इन्होंने ही रखा। तुलसी के पौधे के गुणों की खोजकर विष्णु स्वरूप शालिग्रामशिला के लिए पुष्प की जगह इसके मंजरिए इन्होंने ही रखे। तुलसी पत्ता व शालिग्राम शिला का जल, जो विष का शमन करने वाला एवं मानव को सात्त्विक गुणों की ओर अग्रसर करने वाला है, के नित्य पान करने का विधान बनाया। इन्होंने 48 संस्कार रखे ; किन्तु नहीं निभने से वे 16 तक सीमित हो गए। इनके चलाए कई नियम आज भी प्रचलित हैं जैसे बारात का विवाह के एक दिन पहले आना, गौरी पूजन विवाह के समय ही करना इत्यादि। इनके द्वारा रचित स्मृति का नाम कोकिल स्मृति है जो अन्य स्मृतिकारों से विशिष्ठ भिन्नता लिए हुए है ; किन्तु कोकिल स्मृति अप्राप्यं है, यद्यपि श्रीमाल पुराणकार ने इस ग्रन्थ का होना लिखा है। कुछ विद्वानों के अनुसार कोकिल स्मृति की रचना क्रमबद्ध नहीं हुई, जैसे कोकिल अण्डे देकर दूसरों के द्वारा पालन करवाती है वैसे ही इसके फुटकर श्लोक व सूत्र अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं। जिन जिन ग्रन्थों में गौतमाचार प्रतिपादित किया गया है वे सब सिद्धांत इन्हीं महर्षि गौतम के हैं। आज भी हमारे अधिकतर कार्य कोकिल स्मृति के आधार पर ही सम्पन्न होते हैं।

भृगु ऋषि
भृगु ऋषि व उनकी कन्या ‘श्री’ कौन थी ? यह भी स्पष्ट नहीं है। श्रीमाली ब्राह्मणों में भृगु गोत्र नहीं है। यह केवल वत्सस् गोत्र में एक प्रवर जरूर है। लक्ष्मी का विवाह भगवान् विष्णु के साथ करवाया है किन्तु महावीरकालीन गौतम के समय में ऐसा होना असम्भव लगता है। श्रीमाल नगर से उत्पन्न अन्य जातियों की किंवदन्तियों से पता चलता है कि भृगु ऋषि बड़े तपस्वी थे और उनका असली नाम श्रृंगतुंग था, यह नाम श्रीमाल पुराण में भी कहीं कहीं उल्लिखित है। इनके घर कन्या (श्री) का जन्म हुआ, अत्यन्त सुन्दर एवं दिव्य स्वरूपा होने से उसके शरीर में देवी लक्ष्मी का अहसास होना माना जाता था, उसकी अस्पष्ट वाणी देववाणी मानी जाती थी। श्री की अत्यन्त दानशीलता से प्रतीत होता है कि भृगु ऋषि राजर्षिं थे। श्री का विवाह किसके साथ हुआ यह् विवादास्पद है। कुछ के अनुसार यह विवाह वैदिक धर्मं में दीक्षित किसी राजा के साथ हुआ था। एक अन्य मत के अनुसार श्री का विवाह शालिग्राम के साथ किया गया था, हो सकता है कि यह घटना सही हो क्योंकि आज भी कई जगह ऐसा रिवाज है कि किन्ही कारणों से कन्या का प्रतीकात्मक विवाह भगवान् विष्णु के साथ संपन्न करवाया जाता है।

श्रीमाल नगर: उत्कर्ष एवं विघटन:-
श्रीमाल पुराण के अनुसार श्री के द्वारा बसाए जाने के कारण यह नगर श्रीमाल नगर कहलाया। माल का एक अर्थ है क्षेत्र ।
जहां श्रीमाल नगर की स्थापना हुई वहाँ आसपास भीलों की बस्ती अधिक होने से पूर्व में इसे भील-माल एवं बाद में भीनमाल के नाम से जाना जाता
था। श्रीमाल पुराण के अनुसार लक्ष्मी के विवाह के अवसर पर ही श्रीमाल नगर की नींव पड़ी। पुराण लेखक के महीना, पक्ष, नक्षत्र व तिथि दी है,
किन्तु संवत् नहीं लिखा। जैन साहित्य तथा अन्य स्रोतों के आधार पर कतिपय विद्वानों ने विक्रम संवत् के 479 वर्ष पूर्व (युधिष्ठिर संवत् 2565)
माघ शुक्ला 11 भृगशिरा नक्षत्र की विजय वेला में श्रीमाल नगर का स्थापना काल निश्चित किया है।
श्रीमाल पुराण के अनुसार यहां गौतम मुनि का आश्रम था, जिनकी प्रेरणा से आसपास का सम्पूर्ण क्षेत्र तपः स्वाध्याय निरत ऋषि मुनियों के वेदमन्त्रों
के घोष से गंुंजरित रहता था। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य नयनरम्य था। त्रयम्बक सरोवर की पवित्रता चमत्कारी थी। इस सुन्दर एवं पवित्र भूमि को
देखकर ही श्री के मन में यहां बसने की इच्छा प्रबल हुई थी। नगर की स्थापना के समय ही लक्ष्मी की मूर्ति स्वरूप श्रीचक्र यहां स्थापित किया गया।
अपने स्थापना काल से ही श्रीमाल नगर को कई उतार चढ़ाव देखने पड़े। श्री (लक्ष्मी) की कृपा एवं दानशीलता से यह नगर शीघ्र ही समृद्धि एवं वैभव
से परिपूर्ण हो गया था, किन्तु गौतम मुनि के स्वर्गवास एवं लक्ष्मी के कोपायमान हो जाने से श्रीमाल नगर के विघटन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई।
सम्भवतः इसी समय सैंधवारण्यवासी (सिन्ध सौवीर के निवासी) ब्राह्मणों ने जो नगर की स्थापना के समय ही रूठकर पुनः अपने प्रदेश सिन्ध में चले
गए थे, अन्य लुटेरी जातियों के साथ मिलकर बदला लेने हेतु श्रीमाल नगर पर आक्रमण कर दिया था। सम्भवतः इस आक्रमण का नेतृत्व किसी
महिला ने किया था क्योंकि गीतों एवं किंवदन्तियों में सारिका नामक राक्षसी के उपद्रवों का वर्णन इस सन्दर्भ में आता है। इन उपद्रवों से पीडि़त
नगरजन, जिनमें श्रीमाली ब्राह्मण भी थे, आबू पर्वत, संुधा पहाड आदि सुरक्षित स्थानों में चले गए। श्रीमाल नगर से यह प्रयाण नगर बसने के लगभग
एक शताब्दी बाद का माना जाता है। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पश्चात् श्रीपुंज राजा के आश्वासन पर इनमें से अधिकांश लोग श्रीमाल नगर लौटे फलस्वरूप
यह नगर पुनः समृद्धि की ओर अग्रसर हुआ। इसके बाद के गौरव युग में यहां के श्रीमाली ब्राह्मणों ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी विद्वता एवं विशिष्टता की
छाप छोड़ी और प्राचीन शुद्ध आर्य संस्कृति की अक्षुणयता बनाए रखने में अपना अमूल्य योगदान किया। खगोल एवं ज्योतिष शास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान
ब्रह्मगुप्त इसी श्रीमाल नगर के अनमोल रत्न थे जिनका जन्म वि. सं. 656 माना जाता है। यद्यपि कतिपय विद्वान इन्हें श्रीमाली ब्राह्मण मानते हैं, किन्तु
ठोस प्रमाणों के अभाव में यह मान्यता अभी सन्देहास्पद है। इन्होंने चापवंशीय (चावडा) राजा व्याघ्रमुख के राज्यकाल में, वि. सं. 685 में, अपने
प्रसिद्ध गन्थों ब्रह्मस्फुटसिद्धांत एवं खण्डखाद्य की रचना की थी। भीनमाल निवासी होने से ही ये ‘भिल्लमालकाचार्य’ के नाम से ही प्रसिद्ध हुए थे।
वि.सं. 800 के लगभग इसी नगर में श्रीमाली ब्राह्मण श्रीदत्त के घर में महाकवि माघ का जन्म हुआ था। माघ मास की पूर्णिमा के दिन जन्म होने से
इनका नाम माघ रखा गया था। इनके पिता दानवीर एवं सब के आश्रयदाता थे। अतः लोग इनके पिता को सर्वाश्रय के नाम से ही पुकारते थे। इनके
पितामय संप्रभवदेव भीनमाल के राजा वर्मलात के राजपुरोहित थे। अपनी एक ही अमर कृति ‘शिशुपालवध’ द्वारा माघ ने संस्कत के साहित्याकाश में
जो उच्च कीर्ति अर्जित की, उसे निम्न श्लोक से भलीभांति समझा जा सकता है-

उपमा कालिदासस्य, भारवे अर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं, माघे सन्ति त्रयो गुणाः।।



यद्यपि माघ सम्पन्न थे, किन्तु अपनी दानशीलता के कारण इनका अन्तिम समय निर्धनता में ही व्यतीत हुआ था। वि.सं. 870 के लगभग तीर्थाटन को जाते हुए मालवदेश में इनका स्वर्गवास हो गया था।
वि. स.ं 1992 में भीनमाल के प्रतिहार राजा नागभट्ट ने पुष्कर में एक बड़ा पशु यज्ञ किया था तथा पुष्कर की खुदाई भी करवाई थी। पहले तो श्रीमाली ब्राह्मणों ने इस यज्ञ में भाग लेने से मना कर दिया था। किन्तु बाद में अपने ही स्वजातीय हरिऋकजी के आग्रह पर भीनमाल के श्रीमाल ब्राह्मणों ने इस यज्ञ में भाग लिया। यहीं पर सैंधवारण्यवासी ब्राह्मणों (जिन्हें श्रीमाल ब्राह्मणों के शाप से वेद यज्ञादि कार्यो में अरूचि हो गई थी ) का शाप विमोचन यज्ञ भी सम्पन्न हुआ और श्रीमाली ब्राह्मणों से उनका पुर्नंमिलन हुआ। कुछ विद्वानों के अनुसार तभी से ये सैंधवारण्यवासी पुष्करणा ब्राह्मण कहलाए।
श्रीमाल नगर का द्वितीय विघटन मुस्लिम आक्रमण के फलस्वरूप वि. सं. 1203 में हुआ था। मन्दिरों के विध्वंस एवं लूटपाट के कारण श्रीमाली ब्राह्मणों सहित यहां के निवासी एक बार पुनः नगर छोड़ने को विवश हुए। श्रीमाल पुराण में लक्ष्मी के पाटन जाने की तिथि भी वि.सं. 1203 दी हुई थी। इन दोनों घटनाओं में एक तारतम्य दृष्टिगोचर होता है। मुस्लिम आक्रामकों से अपनी सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी संख्या में श्रीमाली ब्राह्मण गुजरात में निष्क्रमण कर गए जहां के चैलुक्य राजा उस समय तक मुसलमानों के विस्द्ध अजेय थे। जाते हुए वे अपनी आद्य कुलदेवी लक्ष्मी की प्रतिमा को भी सुरक्षार्थ पाटन ले गए होंगे। राजस्थान के पश्चात् गुजरात में श्रीमाली ब्राह्मणों की सर्वाधिक संख्या इसी निष्क्रमण की घटना का प्रमाण है। वि. सं. 1296 के लगभग जोधपुर के राठौड़ वंश के पूर्वज राव सिंहा ने यवनों से श्रीमाल नगर का पुनः उद्धार कर ब्राह्मणों को पुनः यहां आमंत्रित किया। इसी समय (वि. सं. 1300 के लगभग) नगर में प्राचीनकाल से स्थित लक्ष्मीजी के दोनों मंदिरों का जीर्णोद्धार भी किया गया। एक मन्दिर नगर के दक्षिण में धोराढाल में स्थित है और दूसरा बाजार के मध्य, जिसमें 31 मई 1985 को बड़े धूमधाम से प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव सत्पन्न किया गया था। सिंहा के वंशजों ने जब मारवाड़ में राठौड़ राज्य की स्थापना की तो उनकी दान, धर्म, विद्या एवं विद्वानों के संरक्षण की प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अधिकतर श्रीमाली ब्राह्मण मारवाड़ के विभिन्न स्थानों में जाकर बस गए थे। ऐसी मान्यता है कि श्रीमाल नगर की स्थापना के समय से लक्ष्मी की उपासना के लिए जो श्रीयंत्र रखा गया था वह इसी यवन आक्रमण में टूटा था। श्रीमाल नगर के पुनरूद्धार के साथ ही यह लक्ष्मी प्रतिमा जब पुनस्र्थापित हुई तो वहां के राजा से शालिग्राम शिला के साथ लक्ष्मी की प्रतिमा को उठाकर प्रज्वलित होमाग्नि की चार परिक्रमाएँ दिलवाई गई। इसी समय यह घोषणा करवाई गई कि भगवती लक्ष्मी की आज्ञानुसार सम्पूर्ण राज्य में विवाह के समय पर कन्या को उठाकर प्रज्जवलित अग्नि की चार प्रदक्षिणा करें। यह प्रथा श्रीमाली ब्राह्मणों में आज भी लक्ष्मी फेरे के नाम से प्रचलित है। श्रीमाली ब्राह्मणों के घरों में उपासना हेतु चक्र सहित शालिग्राम शिला रहती थी तथा उसके साथ श्रीचक्र रहता था। यह प्रसिद्ध लोकोक्ति अब तक चली आ रही है कि ‘शालिग्राम’ जनेऊ तथा चक्र के बिना नहीं रह सकते। घर में तुलसी का पौधा रखने एवं शालिग्राम पर तुलसीपत्र चढ़ाने की प्रथा इसी सन्दर्भ में विकसित हुई थी।

गोत्र व आमना :-
श्रीमाल पुराण के अनुसारी श्रीमाली ब्राह्मणों में 14 गोत्र एवं 84 अवंटक है (देखें गोत्र अवटंक तालिका) । अवंटकों को लेकर कुछ अस्पष्टता है क्योंकि भाटों की बहियों में इनकी संख्या 126 से लेकर 162 तक देखी जा सकती है। ऋषि विशेष की सन्तान एवं शिष्यवर्ग जो उस ऋषि के नाम से चलते थे, गोत्र कहलाते थे। प्रवरकत्र्ता वे ऋषि हैं जिन्होंने गोत्रों का संचालन किया था। पूर्वकाल में जिस व्यक्ति विशेष ने कुछ महत्त्व के कार्य किए, उसकी स्मृति में उसके वंशजों को विशेष नाम से पुकारा जाने लगा उसे अवंटक कहा जाने लगा। प्रचलित भाषा में इनका नाम अटक, खाँप या नख है। पहले सिर्फ गोत्रों से पहचान होती थी और जिस व्यक्ति ने जितने वेदों का अध्ययन किया होता उसकी व उसके वंशजों की पहचान उतने ही वेदों के द्वारा होने लगी जैसे द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी । विक्रम की सातवीं-आठवीं सदी से अवंटक शुरू हुए। फिर जो व्यक्ति जहाँ जाकर बसा उस गाँव, व्यक्ति व उसके कार्य के नाम से ही वंश जाना जाने लगा, उसे ही अवंटक माना गया। कालक्रमानुसार कुछ प्राचीन अवटंक लुप्त होते गए और नए प्रक्षिप्त अवंटक जुड़ गए जैसे चाँदाजी की सन्तान दवे चाँदावत और पुर गाँव के व्यास ‘व्यास पुरेचा’।
आमनाओं का अर्थ ओलखाण (पहचान) से है। श्रीमाली ब्राह्मणों में चार आमना हैं- मारवाड़ी, मेवाड़ी, ऋषि तथा देव आमना। ऐसी मान्यता है कि वर्तमान में इन आमनाओं का प्रचलन विक्रम की सोलहवीं शताब्दी में मेड़ता शहर के दवे जीवन के घर पर हुए (हेला) जाति सम्मेलन से हुआ था। यहाँ कुछ रिवाजों को लेकर झमेला पड़ा और आपस में तनाव बढ़े। यहाँ तक कि आपस में कन्याओं के लेन देन पर भी अंकुश लगा। इस हेले (न्याय पंचायत) में जो मारवाड़ से आए वे मारवाड़ी आमना, जो मेवाड़ से आए वे मेवाड़ी आमना, जो विवादग्रस्त मुद्दों पर समझाने का प्रयत्न करते रहे वे देव आमना और जो विवाद से तटस्थ रहे वे ऋषि आमना से पहचाने जाने लगे।
श्रीमाल नगर के द्वितीय विघटन के बाद श्रीमाली ब्राह्मणों का सात सौ घरों का एक समूह मेवाड़ के राणा मोकल (राणा कुम्भा का पिता) के काल में (वि.सं. 1478 से 1490) कुम्भलगढ़ में जाकर बस गया। यहीं से बाद में कुछ श्रीमाल ब्राह्मण गौडवाड़ एवं मारवाड़ में जाकर बसे। इन दिनों मेवाड़ में प्रचलित कन्या विक्रम प्रथा को रोकने का बीड़ा त्रिवाडी दशोत्तर पंुजाजी ने उठाया। कुम्भलगढ़ के व्यास डिबलिया मेहरखजी की पत्नी ललिता की वर्षी पर इकट्ठे श्रीमाली ब्राह्मणों ने कन्या विक्रम बन्द करने का प्रस्ताव किया। प्रस्तावक पुंजाजी सहित चार व्यक्ति जो समर्थन में थे। उनमें से एक संशय में रहा। इसलिए वे साढ़े तीन पुड तथा संशय वाला आधा पुड कहलाया और जो नौ व्यक्ति इस प्रस्ताव के विरोध में थे वे नौ पुडी कहलाए। पुड की तरह ही कुछ अन्य घटनाओं को लेकर श्रीमाली ब्राह्मणों में दशा-बिसा इत्यादि छोटे-छोटे घटक बनते गए जो जातीय एकरूपता में बाधक सिद्ध हुए। नवीन घटकों के उदय एवं उनकी रूढ तथा संकीर्ण मनोवृत्ति के परिप्रेक्ष्य मेें इस जातीय समुदाय की पहचान ‘श्रीमाली’ शब्द के व्यापक बोध में ही सुरक्षित बनी हुई है।

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