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🕉️ श्रावण सोमवार व्रत कथा: भगवान शिव की कृपा पाने का पवित्र मार्ग 🙏🌿श्रावण मास हिंदू पंचांग का सबसे पवित्र महीना माना जा...
01/08/2025

🕉️ श्रावण सोमवार व्रत कथा: भगवान शिव की कृपा पाने का पवित्र मार्ग 🙏🌿

श्रावण मास हिंदू पंचांग का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। यह संपूर्ण महीना भगवान भोलेनाथ शिव शंकर को समर्पित होता है। खासकर श्रावण के सोमवार को शिवजी की विशेष पूजा का विधान है, और श्रावण सोमवार व्रत रखने से जीवन में सुख, शांति, विवाह में सफलता और इच्छाओं की पूर्ति होती है।
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📜 पौराणिक कथा का सार:

एक समय की बात है, एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में एक कन्या थी। उसने शिवजी की उपासना करते हुए श्रावण मास के सभी सोमवार व्रत रखे। पूरे मन, श्रद्धा और निष्ठा से उसने भगवान शिव की पूजा की और व्रतों का पालन किया।

श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर और पार्वती प्रकट हुए और उस कन्या को वरदान दिया कि उसका मनचाहा वर उसे प्राप्त होगा और उसका जीवन सुखमय रहेगा।
कुछ समय बाद वह कन्या एक समृद्ध और धर्मपरायण युवक से विवाह कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी।

इसीलिए कहा जाता है कि जो कन्या या स्त्री श्रद्धा और निष्ठा से श्रावण सोमवार का व्रत रखती है, उसे मनवांछित फल और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।

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🌿 श्रावण सोमवार व्रत विधि:

1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. शिवलिंग पर गंगा जल, बेलपत्र, दूध, दही, शहद, और जल से अभिषेक करें।

3. “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 108 बार जप करें।

4. दिनभर उपवास रखें — फलाहार कर सकते हैं।

5. शाम को शिव-पार्वती की आरती करें और व्रत कथा पढ़ें।

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🧘‍♀️ व्रत का महत्त्व:

मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली।

विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं।

अविवाहित कन्याएं योग्य वर प्राप्ति हेतु यह व्रत करती हैं।

मानसिक शांति, आरोग्य और आध्यात्मिक बल में वृद्धि होती है।

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📖 भक्ति और विज्ञान का संगम:

श्रावण मास वर्षा ऋतु का समय होता है जब जल शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। बेलपत्र, तुलसी, और गंगाजल आदि में प्राकृतिक रोगनाशक गुण होते हैं। शिव उपासना के माध्यम से तन और मन दोनों की शुद्धि होती है।

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💬 आपका अनुभव?

क्या आपने कभी श्रावण सोमवार का व्रत रखा है? आपको क्या अनुभूति हुई?
कमेंट करें और इस पोस्ट को शेयर करें ताकि शिवभक्तों तक शिव कृपा पहुँचे।

🔱 हर हर महादेव!
श्रावण मास और सोमवार व्रत की शुभकामनाएं। 🙏

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हिंदुआ सूरज  #महाराणा_प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी ....1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक...
30/07/2025

हिंदुआ सूरज #महाराणा_प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी ....

1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे । तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि- हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए ? तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना।
लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था |
“बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘ किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |
3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|
कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।

4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है, तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे, पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|
लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |

6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |

7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |

8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं | इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है| मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |

9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।
आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |

10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी, जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे । जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |

11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |

12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था । वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे ।
आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं, तो दूसरी तरफ भील |

13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है, जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |

14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|

15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।

16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी:
मित्रो, आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।

रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।

वो लिखता है की- जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी । एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।

आगे अल बदायुनी लिखता है की- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था ।

वो आगे लिखता है कि- उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

अब सुनिए एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति।

उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया ।
जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।

रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया।

पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो शहीद हो गया।

तब अकबर ने कहा था कि- जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया,
उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा.?

इसलिए मित्रो हमेशा अपने भारतीय होने पे गर्व करो 👏💕💕

ॐ
ादेव 🙏
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आप सभी को परिवार सहित धनतेरस और दीपावली की की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।। मै भगवान से आपके स्वस्थ एवं सफल जीवन की...
23/10/2022

आप सभी को परिवार सहित धनतेरस और दीपावली की की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।। मै भगवान से आपके स्वस्थ एवं सफल जीवन की कामना करता हूँ।

माता लक्ष्मी सभी के जीवन में प्रेम-सद्भाव, सुख-समृद्धि और उन्नति का संचार करें, यही कामना है।

LET THE LIGHT OF GOOD KNOWLEDGE GROW IN ALL OUR MINDS.

WHEN THE SUN RISES THE DARKNESS VANISHES SIMILARLY DIWALI MEANS LET OUR MINDS BE LIT WITH LIGHT.

SRI KRISHNA SAYS

"NAHI GNANENA SADRUSHAM" IN GITA MEANS KNOWLEDGE IS NON COMPARABLE IT IS SUPREME

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DID YOU KNOW THIS BAIJNATH TEMPLE OF MP WAS BUILT BY A BRITISHER??The Britishers built many churches and cathedrals in I...
12/09/2022

DID YOU KNOW THIS BAIJNATH TEMPLE OF MP WAS BUILT BY A BRITISHER??

The Britishers built many churches and cathedrals in India. But in the 1880s, a Lord Shiva temple in Agar Malwa, Madhya Pradesh, was rebuilt by Lt Col Martin — the only temple ever made by an Englishman in India.

Col Martin was in the Afghan wars. He used to regularly write to his wife, informing her of conditions there. It was a long war, and gradually the colonel’s letters stopped. His wife started fearing the worst. She would spend time riding for hours to calm herself. One day she rode her horse, past the temple of Baijnath Mahadev. It was in a decrepit state. It was the time of arti, and the sound of conches and the chanting of mantras compelled her to stop. She went inside to see the worship of Lord Shiva taking place. The priests saw the grief on her face and asked her what was wrong. Mrs Martin narrated her sad story. Priest told her that Lord Shiva listens to sincere prayers of all devotees and advised to chant: “Om Namah Shivaya” for 11 days. She prayed to Lord Shiva for the colonel’s safe return, promising she would rebuild the temple if he came home safe. On the 10th day, a messenger arrived from Afghanistan with a letter from her husband.

It read, “I was regularly sending you letters from the battlefield but then suddenly the Pathans surrounded us. I thought there was no way of escape. Suddenly I saw an Indian yogi with long hair, wearing a tiger skin carrying a trident. He had an awe-inspiring personality and he started wielding his weapon against the Afghans who seemed to know who he was. They ran away from the field in fright. With his grace what was certain death our bad times turned into victory.” Tears of joy and gratitude welled up in Mrs Martin’s eyes as she read the letter. Her heart was overwhelmed. She fell at the feet of Lord Shiva’s.

After a few weeks Lt Col Martin returned and his wife told him her story. The couple became devotees of Lord Shiva. They donated Rs 15,000 to renovate the temple. This information is engraved on a slab kept in the Baijnath Mahadev Temple. They remained the lifetime devotee of Lord Shiva even after returning to Britain after Afghan War.

Har Har Mahadev 🚩🕉️🙏😊
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10/09/2022

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Q: Which books should we use for small children and teenagers to teach them about our sanatan culture as a parent?ANS: I...
08/09/2022

Q: Which books should we use for small children and teenagers to teach them about our sanatan culture as a parent?

ANS: It's a very common question that many of our people have asked me on this page.

I would like to share my personal experience here, especially to young parents and adults. I am sharing some pictures of must have books for your small children,teenagers and even for adults at home.
It's a real challenge to raise children as good Hindus or with good morals in today's fast paced world and with many distractions too. Especially those living outside India.

Puranic Encyclopedia is a great book and many are not aware of it. Our children ask us many questions which we can't answer sometimes. This is a must have in every Hindu house. It's so full of explanation, stories, knowledge etc.

Children can gain their neverending inquisitiveness about Sanatan Dharma from these treasures..

Any other tips, feel free to put up in the comment
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प्राचीन समय भारत मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी।चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़त...
08/09/2022

प्राचीन समय भारत मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी।
चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं।

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्री कृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे,

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे ।

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम आक्रमणकारियो का समय रहा और कुछ स्थानों पर उनका शासन भी चला।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये।

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया।

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान, ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जाति को छुआछुत व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं।

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*एक गाँव में एक बूढ़ी माई रहती थी । माई का आगे – पीछे कोई नहीं था इसलिए बूढ़ी माई बिचारी अकेली रहती थी । एक दिन उस गाँव मे...
05/09/2022

*एक गाँव में एक बूढ़ी माई रहती थी । माई का आगे – पीछे कोई नहीं था इसलिए बूढ़ी माई बिचारी अकेली रहती थी । एक दिन उस गाँव में एक संत आए । बूढ़ी माई ने महात्मा जी का बहुत ही प्रेम पूर्वक आदर सत्कार किया । जब महात्मा जी जाने लगे तो बूढ़ी माई ने कहा – “ महात्मा जी ! आप तो ईश्वर के परम भक्त है । कृपा करके मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिये जिससे मेरा अकेलापन दूर हो जाये । अकेले रह – रह करके उब चुकी हूँ ”*

*तब उन महात्मा ने मुस्कुराते हुए अपनी झोली में से बाल – गोपाल की एक मूर्ति निकाली और बुढ़िया माई को देते हुए कहा – “ माई ये लो आपका बालक है, इसका अपने बच्चे की तरह प्रेम पूर्वक लालन-पालन करती रहना।*

*बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।*

*एक दिन गाँव के कुछ शरारती बच्चों ने देखा कि माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है । नटखट बच्चो को माई से हंसी – मजाक करने की सूझीl*

*उन्होंने माई से कहा - "अरी मैय्या सुन ! आज गाँव में जंगल से एक भेड़िया घुस आया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है। और मारकर खा जाता है । तू अपने लाल का ख्याल रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये !*

*बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर पहरा लगाने के लिए बैठ गयी।*

*अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।*

*बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने की इच्छा हुई ।*

*भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर माई ड़र गई कि "कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरे लाल को उठाने !" माई ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई ।*

*तब श्यामसुंदर ने कहा – “मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!"*

*माई ने कहा - "क्या ? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से ।*

*ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले - "अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से प्रसन्न हूँ"*

*बुढ़िया माई ने कहा - "अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय" अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले - "तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।" इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।*

*भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान को प्रेम करो - निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया....*

*हमें अपने अन्दर बैठे ईश्वरीय अंश की काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी भेड़ियों से रक्षा करनी चाहिए ।*

*जब हम पूरी तरह से तन्मय होकर अपनी पवित्रता और शांति की रक्षा करते है तो एक न एक दिन ईश्वर हमें दर्शन जरुर देते हैl*
गुरू प्यारी साध संगत जी सभी सतसंगी भाई बहनों और दोस्तों को हाथ जोड़ कर प्यार भरी राधे राधे...

Jai Shree Krishna 🙏😊
Radhe Radhe 🙏🚩
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Doordarshan has launched a mega epic serial Swaraj: Bharat Ke Swatantrata Sangram Ki Samagra Gatha.It is a 75-episode hi...
27/08/2022

Doordarshan has launched a mega epic serial Swaraj: Bharat Ke Swatantrata Sangram Ki Samagra Gatha.

It is a 75-episode historical docu-drama dubbed in nine languages, aired on Doordarshan every Sunday from 9pm-10pm.

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https://swarajyamag.com/culture/swaraj-on-dd-renarrativising-indian-freedom-through-unsung-heroes-from-across-the-country

शक्ती मां तारा और बामा खेपा ( पागल ) की  कथा¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का...
27/08/2022

शक्ती मां तारा और बामा खेपा ( पागल ) की कथा
¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤
पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ । बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया । माता भी गरीब थी । इसलिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई । उन्हें मामा के पास भेज दिया गया । मामा तारापीठ के पास के गांव में रहते थे । जैसा कि आमतौर पर अनाथ बच्चों के साथ होता है । दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं हुआ ।
धीरे धीरे वामाचरण की रुचि बाबाओं की तरफ होने लगी । गांव के मशान में आने वाले बाबाओं की संगत में रहते रहते बामाचरण में भी देवी के प्रति रुझान बढ़ने लगा । अब वह तारा माई को बड़ी मां कहते और अपनी मां को छोटी मा ।

बामा चरण कभी श्मशान में जलती चिता के पास जाकर बैठ जाता कभी यूं ही हवा में बातें करता रहता । ऐसे ही वह युवावस्था तक पहुंच गया । उसकी हरकतों की वजह से उसका नाम बामाचरण से वामा खेपा पड़ चुका था । खेपा का मतलब होता है पागल । यानी गांव वाले उसको आधा पागल समझते थे । उसके नाम के साथ उन्होंने पागल उपनाम जोड़ दिया था । वे यह नहीं जानते थे कि वस्तुत: कितनी उच्च कोटि का महामानव उनके साथ है ।

वह भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी । मंगलवार का दिन था । भगवती तारा की सिद्धि का परम सिद्ध मुहूर्त । रात का समय था । बामाखेपा जलती हुई चिता के बगल में श्मशान में बैठा हुआ था तभी !

नीले आकाश से ज्योति फूट पड़ी और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया।

उसी प्रकाश में वामाचरण को माँ तारा के दर्शन हुए। ।
कमर में बाघ की खाल पहने हुए !

एक हाथ में कैंची लिए ।

एक हाथ में खोपड़ी लिए ।

एक हाथ में नीले कमल का पुष्प लिए ।

एक हाथ में खड्ग लिए हुए।

महावर लगे सुंदर पैरो में पायल पहने हुए ।

खुले हुए कमर तक बिखरे केश से युक्त ,

परम ब्रह्मांड की स्वामिनी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ।

नील वर्णी , मंद मंद मुसकाती माँ तारा, वामाखेपा के सामने खड़ी थी…….

वामाखेपा उस भव्य और सुंदर देवी को देखकर खुशी से भर गए। माता ने उसके सर पर हाथ फेरा और बामाखेपा वही समाधिस्थ हो गए ।

3 दिन और 3 रात उसी समाधि की अवस्था में वे श्मशान में रहे । 3 दिन के बाद उन्हें होश आया और होश आते ही वह मां मां चिल्लाते हुए इधर उधर दौडने लगे । अब गांव वालों को पूरा यकीन हो गया कि बामा पूरा पागल हो गया है । बामा की यह स्थिति महीने भर रही ....

कुछ दिन बाद वहां की रानी जी को सपने में भगवती तारा ने दर्शन दिए और निर्देश दिया कि मसान के पास मेरे लिए मंदिर का निर्माण करो और बामा को पुजारी बनाओ । अगले दिन से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया । कुछ ही दिनों में मंदिर बनकर तैयार हो गया और बामा को मंदिर का पुजारी बना दिया गया । बामा बेहद खुश हो गए क्योंकि उनकी बड़ी मां अब उनके साथ थी…...


रानी के द्वारा बनाया मंदिर अर्थात मोटे चढ़ावे की संभावना । अब ऐसे मंदिर में एक आधे पागल को पुजारी बनाना बहुत से पण्डों को रास नहीं आया । वे बामाखेपा को निपटाने का मार्ग खोजते रहते थे । बामाखेपा की हरकतें अजीब अजीब हुआ करती थी । कई बार वह दिन भर पूजा करता । कई बार 2-2, 3-3 दिन तक पूजा ही नहीं करता । कभी देवी को माला पहनाता कभी खुद पहन लेता । इनमें से कोई भी प्रक्रम पंडों के हिसाब से शास्त्रीय पूजन विधि से मैच नहीं खाता था । यह बात उनको खटक रही थी ।

फिर एक दिन ऐसा हुआ कि प्रसाद बना और प्रसाद बनने के बाद जब मंदिर में पहुंचा तो देवी को भोग लगाने से पहले वामा चरण के मन में विचार आया, कि इसे चक्कर देख लो यह माता के खाने के लायक है भी कि नहीं । बस फिर क्या था । उन्होंने प्रसाद की थाली में हाथ डाला और चखने के लिए अपने मुंह में डाल लिया । चखने के बाद जब सही लगा तो बाकी प्रसाद उन्होंने माई को अर्पित कर दिया ।

इतना बड़ा अवसर पंडित कहाँ छोड़ते । उन्होंने बवाल मचा दिया कि, देवी के प्रसाद को बामा ने खा लिया है । उसे जूठा कर दिया है । झूठा प्रसाद देवी को चढ़ा दिया है । अब देवी रुष्ट हो जाएगी, उसका प्रकोप सारे गांव को झेलना पड़ेगा । उसके बाद भीड़तंत्र का बोलबाला हुआ और गांव वालों ने मिलकर पंडों के साथ बामाचरण की कस कर पिटाई कर दी । उसे श्मशान में ले जाकर फेंक दिया ।
मंदिर पर पण्डों का कब्जा हो गया । उन्होंने शुद्धीकरण और तमाम प्रक्रियाएं की । उस दिन पूजन पण्डों के अनुसार संपन्न हुआ ।

उधर बामाखेपा को होश आया तो वह माई पर गुस्सा हो गया - मैंने गलत क्या किया जो तूने मुझे पिटवा दिया । तुझे देने से पहले खाना स्वादिष्ट है या नहीं देख रहा था । इसमें मेरी गलती क्या थी ? मैं तो तुम्हें स्वादिष्ट भोग लगाने का प्रयास कर रहा था और चाहता था कि तुझे अच्छे स्वाद का प्रसाद ही मिले । अगर स्वाद गड़बड़ होता तो उसे फेककर दूसरा बनवाता । लेकिन तूने बेवजह मुझे पिटवाया जा मैं अब तेरे पास नही आऊंगा ।

मसान घाट पर बैठकर बामाचरण ने मां को सारी बातें सुना दी और वहां से उठकर चला गया जंगल की ओर । जंगल में जाकर एक गुफा में बैठ गया । यह स्थिति बिलकुल वैसे ही थी जैसे अपनी मां से रूठ कर बच्चे किसी कोने में जाकर छुप जाते हैं । बामाचरण और तारा माई के बीच में मां और बेटे जैसा रिश्ता था । यह रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था जैसे एक अबोध शिशु और उसकी मां की बीच में होता है ।

अपने शिशु की व्यथा तारा माई को सहन नहीं हुई । उसी रात रानी के स्वप्न में माई प्रकट हुई ।

क्रोधित माई ने रानी को फटकार लगाई - तेरे पण्डों ने मेरे पुत्र को बुरी तरह से मारा है । मैं तेरा मंदिर छोड़ कर जा रही हूं । अब तुझे और तेरे राज्य को मेरा प्रकोप सहना पड़ेगा, अगर उससे बचना चाहती है तो कल के कल मेरे पुत्र को वापस लाकर मंदिर में पूजा का भार सौंप, वरना प्रतिफल भुगतने के लिए तैयार रह ।

एक तो तारा माई का रूप ऐसे ही भयानक है । क्रोधित अवस्था में तो सीधी सरल माता भी काली से कम नहीं दिखाई देती । क्रोधित माई का स्वरूप व्याख्या से परे था ।

रानी हड़बड़ा कर पलंग पर उठ बैठी । रानी के लिए रात बिताना भी मुश्किल हो गया । उसने सारी रात जागकर बिताई ।

अगले दिन अपने सेवकों को दौड़ाया और मामले का पता लगाने के लिए कहा । जैसे ही पूरी जानकारी प्राप्त हुई रानी अपने लाव लश्कर के साथ मंदिर पहुंच गई । सारे पण्डों को कसकर फटकार लगाई और मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया । अपने सेवकों को आदेश दिया कि जैसे भी हो बामाखेपा को पकड़कर लाओ ।

अब सारे सेवक चारों तरफ बामाखेपा की खोज में लग गए । एक सेवक को गुफा में बैठा हुआ बामाखेपा मिल गया । बड़ी मनोव्वल के बाद भी वह नहीं माना सेवक ने जाकर रानी को बात बताई । अंततः रानी खुद गुफा तक पहुंची ।

बामा ने उनपर भी अपना गुस्सा उतारा - आप के कहने पर मैं पूजा कर रहा था और मुझे देखो इन लोगों ने कितना मारा !

उनकी बाल सुलभ सहजता को देखकर रानी का नारी हृदय भी ममत्व से भर गया । उनकी समझ में आ गया कि तारा माई का मातृत्व इस बामाखेपा के प्रति क्यों है ।

उन्होंने फरमान जारी कर दिया - इस मंदिर का पुजारी बामाखेपा है । उसकी जैसी मर्जी हो जैसी विधि वह करना चाहे उस प्रकार से पूजा करने के लिए वह स्वतंत्र है । कोई भी उसके मार्ग में आएगा तो दंड का भागी होगा । यह मंदिर बामाखेपा का है और तारा माई भी बामाखेपा की है । वह जिस विधान को सही समझे, उस विधान से पूजा करेगा और वही विधान यहां पर सही माना जाएगा ।

बामाखेपा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई । मां और बेटे का मिलन हो चुका था । मंदिर व्यवस्था फिर से बामाखेपा के हिसाब से चलने लगी ।

ऐसा माना जाता है कि तारा माई खुद बामाखेपा के हाथ से प्रसाद ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत ढंग से बामाखेपा तारा माई के पूजन करते जिसका कोई नियम नहीं था । कभी सुबह 4 बजे पूजा चल रही है तो कभी दोपहर 12 बजे तक पूजा प्रारंभ नहीं होती । क़भी रात भर पूजा चल रही है तो कभी पूरे दिन भर मंदिर की ओर बामाखेपा के दर्शन ही नहीं होते थे । उनकी पूजन विधि लोगों को पसंद नहीं थी ,लेकिन उनके पास कोई उपाय नहीं था , क्योंकि रानी का फरमान था । बामाखेपा अपनी मस्ती में जीते थे और लोग उन्हें नीचा दिखाने का रास्ता खोजते ।

एक दिन बामाखेपा की मां का निधन हो गया । नदी में बाढ़ थी । नदी के उस पार गांव था ।बामा जिद पर अड़ गए छोटी मां का दाह संस्कार बड़ी मां के पास वाले श्मशान में किया जाएगा । गांव वाले बाढ़ वाली नदी को पार करने में जान का खतरा है यह जानते थे , लेकिन बामा को समझाना किसी के बस की बात नहीं ।

नाव वाले से बाबा ने देह को नदी के पार पहुंचाने की बात की । नाव वाले ने साफ इंकार कर दिया । बाबा ने नाव देने के लिए कहा । नाव वाला हाथ जोड़कर बोला - बाबा यही मेरे जीवन का सहारा है अगर बाढ़ में यह बह गया तो मैं घर कैसे चलाउँगा ?

बामा के चेहरे में रहस्यमई मुस्कान बिखर गई । जैसे उन्होंने कोई निर्णय ले लिया हो । उन्होंने अपनी माता के शव को उठाया और खुद नदी पर चलते हुए इस पार पहुंच गए । गांव वाले आंखें फाड़े उस दृश्य को देखते रह गए । बामा की इच्छा के अनुसार ही उन्होंने माई के मंदिर के पास वाले श्मशान में अपनी मां का दाह संस्कार संपन्न किया ।

मृत्यु भोज के लिए आसपास के सारे गांव में जितने लोग हैं, सभी को निमंत्रित करने के लिए बामाखेपा ने अपने घर के लोगों और आसपास के लोगों को कहा । सब इसे बामाखेपा का पागलपन समझकर शांत रहें । जिसके पास दो वक्त की रोटी का पता नहीं वह आसपास के 20 गांव को खाना कैसे खिलाएंगा यह उनके लिए कल्पना से भी परे की बात थी ।

जब कोई भी निमंत्रण देने जाने को तैयार नहीं हुआ तो बामाखेपा अकेले निकल पड़े । उन्होंने आसपास के 20 गांवों में हर किसी को मृत्यु भोज के लिए आमंत्रित कर लिया । सारे गांव वाले यह देखने के लिए तारापीठ पहुंचने लगे कि देखा जाए यह पगला किस प्रकार से इतने सारे लोगों को मृत्यु भोज कराता है ।

गांव वालों की आंखें उस समय फटी की फटी रह गई जब सुबह से बैल गाड़ियों में भर-भर कर अनाज सब्जी आदि तारापीठ की तरफ आने लगी । बैल गाड़ियों का पूरा एक काफिला मंदिर के पास पहुंच गया । अनाज और सब्जियों का ढेर लग गया । जो लोग आए थे उन्होंने खाना बनाना भी प्रारंभ कर दिया । दोपहर होते-होते सुस्वादु भोजन की गंध से पूरा इलाका महक रहा था ।

प्रकृति भी अपना परीक्षण कब छोड़ती है, आसमान में बादल छाने लगे । प्रकृति ने भी उग्र रूप धारण कर लिया । बिजली कड़कने लगी । हवाएं चलने लगी और जोरदार बारिश के आसार नजर आने लगे । बामाखेपा अपनी जगह से उठे और जिस जगह पर श्राद्ध भोज होना था , उस पूरे जगह को बांस के डंडे से एक घेरा बनाकर घेर दिया ।

घनघोर बारिश चालू हो गई लेकिन घेरे के अंदर एक बूंद पानी भी नहीं गिरी । गांव वाले देख सकते थे कि वे जहां बैठकर भोजन कर रहे हैं वह पूरा हिस्सा सूखा हुआ है, और उस घेरे के बाहर पानी की मोटी मोटी बूंदें बरस रही है । जमीन से जल धाराएं बह रही हैं । वह पूरा इलाका जिसमें भोज का आयोजन था ,पूरी तरह से सूखा हुआ था । 20 गांव से आए हुए सभी लोगों ने छक कर भोजन किया । हर कोई तृप्त हो गया ।

अब बारी थी वापस अपने अपने गांव जाने की । घनघोर बारिश को देखते हुए वापस जाने के लिए दिक्कत आएगी यह सोचकर सभी चिंतित थे ।

बामाखेपा ने माई के सामने अपना अनुरोध पेश किया और कुछ ही क्षणों में आसमान पूरी तरह से साफ हो गया और धूप खिल गई । सारे लोग बड़ी सहजता से अपने अपने गांव तक पहुंच गए ।

इस घटना के बाद बामाखेपा की अलौकिकता के बारे में लोगों को पता लगा । धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बामाखेपा की तारा पीठ में बढ़ने लगी । कोई बीमार आता तो बामाखेपा उस पर हाथ फेर देते तो वह स्वस्थ हो जाता है । निसंतानों को संतान की प्राप्ति हो जाती और सभी आगंतुकों की इच्छा और मनोकामना तारापीठ में पूरी होने लगी ।

बामाखेपा कभी भी बिना चखे माई को भोजन नहीं कराते थे । माई स्वयं अपने हाथ से उनको भोजन खिलाती थी और उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत महामानव बामाखेपा अपने अंत समय में माई की प्रतिमा में लीन हो गए ।

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