14/11/2025
भूदान प्रणेता आचार्य विनोबा भावे की 15 नवंबर को 43वीं पुण्यतिथि पर तीन दिवसीय मित्र मिलन में सामजिक कार्यकर्ताओं का समागम : अमित परमार
विनोबा की कोरापुट यात्रा को रेखांकित करता हुआ एक प्रकाशित आलेख आपसे साझा करते है
" विनोबा की करुणा नदी से खिली कोरापुट घाटी "...............................
पन्द्रह नवंबर को विनोबा भावे की 43वीं पुण्यतिथि है। सन् 1982 को इस दिन दीपावली थी और दीपावली की सुबह सत्तासी वर्ष की आयु में विनोबा वर्धा के पास अपने पवनार आश्रम में देह-मुक्त हुए। विनोबा जिन्होंने पूरी दुनिया में ' जय-जगत ' का मंत्र दिया। भूदान की भूमि- क्रांति की अलख जगायी। सर्वोदय, खादी प्रसार के प्रवर्तक बने। चंबल के दस्युओं का पहला आत्मसमर्पण कराया। ' गीता-प्रवचन ' जैसी उनकी कृति मनुष्य के कल्याण का सरल रास्ता बनी। विनोबा का जीवन ऐसे अनेक प्रयोगों से आलोकित रहा जैसेे कि पवनार में नारी शक्ति की अग्र-चेतना ब्रह्म- विद्या मंदिर की स्थापना।
जय-जगत के प्रसार के लिए शांति-सेना का गठन। अपनी अठारह साल की निरंतर भूदान पदयात्रा में वे करीब अस्सी हजार मील चले। पूरे भारत की चहुंदिशा में प्रदक्षिणा की।
इसी पदयात्रा के दरम्यान जब वे वर्ष 1955 में उड़ीसा पहुंचे तो पांच महीने तक उनके एक और प्रयोग ने मानवता का नव-अध्याय रचा। यह था पूर्व-दिशा के सागर तट किनारे कोरापुट के दुर्गम पर्वतों और जंगलों वाले आदिवासी क्षेत्र में करुणा की अनूठी क्रांति का उद्घोष। जहां भयंकर बाढ़ के बीच विनोबा अपने पदयात्री दल के साथ उफनते नदी-नाले पार करते हुए कोरापुट के सबसे ऊंचे और दुर्गम इलाकों में बसे आदिवासी गांवों तक पहुंचे और चार महीने कोरापुट घाटी में ही
रुके। बाढ़ में मलेरिया की महामारी से ग्रस्त इस इलाके में विनोबा गांव-गांव घूमते रहे।
सर्वोदयी कार्यकर्ताओं को पूरे देश भर से वहां बुला लिया और सबसे पहला काम मलेरिया के प्रकोप से आदिवासी गांवों को बचाने का किया। विनोबा के 23 पदयात्री वहां जाते ही मलेरिया की चपेट में आ गये लेकिन मलेरिया से मुकाबले की यह जंग कभी नहीं रुकी। इससे आदिवासियों का विनोबा पर विश्वास बढ़ा और इस कदर बढ़ता गया कि कुछ आदिवासी समूहों में विनोबा को अलौलिक लोक देवता मान लिया गया। इन उपमाओं से परे वे पूरे समर्पित भाव से कोरापट अंचल में सर्वोदय, ग्राम- स्वराज, स्वावलम्बन के नये सूर्योदय के लिए लगे रहे।
उड़ीसा जो अब ओड़िशा कहलाती है, लोक-संस्कृति में
इसे ' उत्कल भूमि ' कहते हैं। ' उत्कल -दर्शन ' यह शब्द जे़हन में आते ही कला, शिल्प, नैसर्गिक सौंदर्य के एक अनुपम प्रदेश की कल्पना संचारित होती है। उत्कल जहां जगन्नाथ पुरी
धर्म- संस्कृति के स्पंदन की दिव्य धरा है। यहां की रथयात्रा
श्रद्धा, उल्लास का अद्भुत संगम है। कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसा शिल्प-सौंदर्य देवताओं को भी मोहित करता है। शंकराचार्य ने यहीं अपनी पुरी पीठ स्थापित की। महेन्द्रगिरि, नीलगिरि से लेकर महानदी, वैतरणी के अंचल तक पुरा बौद्ध स्तूपों और जैन मंदिरों की भी अनूठी श्रृंखलाएं हैं। गीत-गोविंद रचने वाले जयदेव उड़िया संस्कृति के वैसे ही दिल में समाए हैं, जैसे कि यहां की ओड़िशा नृत्य शैली।
सम्राट अशोक ने यहीं की कलिंग भूमि पर दया नदी के किनारे दया एवं करुणा का पाठ सीखा। यहां बुद्ध जैसे चले उन्हीं की तरह गांधी भी उड़ीसा के गांवों में पैदल चले। उत्कल के दरिद्रजन की दारुण स्थिति ने गांधीजी को व्याकुल कर दिया।
समुद्र की तूफानी लहरें, चक्रवात
इस भूमि की एक ओर कहानी कहती हैं। यहां के गांवों को गांधीजी ने इन तूफ़ानों से जूझते देखा और सन् 1921 में गांधीजी ने कहा -
" उत्कल मुुझे बार-बार याद आता है। मैं उसे भूला नहीं सकता। वहां जो दृश्य मैंने देखे वे तिलमिला देने वाले हैं। उस भूमि से गरीबी भगाओ। हर घर को चरखे का संंदेश दो। उत्कल को समूचे भारत के लिए खद्दर का भंडार बना दो। भूखे नर-नारियों को अन्न दो...." गांधीजी को उत्कल की धरा पर उगने वाले विपुल कपास में यहां खादी और गरीबी उन्नमूलन की संभावनाएं दिखीं।
आजादी के बाद जब विनोबा सन् 1951 में अपनी नई अहिंसक क्रांति भूमिका में आये और भूदान पदयात्रा पर निकले। सन् 55 में 26 जनवरी के दिन उन्होंने बंगाल की धरा से उत्कल की भूमि पर अपना पहला कदम रखा। उन्होंने इस भूमि की वंदना करते हुए कहा " इसी वीर-भूमि पर चक्रवर्ती अशोक का परिवर्तन ' धर्म अशोक ' में हुआ था। " उत्कल में विनोबा ने वैतरणी पार कर मानपुर में क़दम रखा और उन्हें 26 फरवरी को उड़ीसा के पहले ग्रामदान के दर्शन हुए। सर्वोदय की सफलता के लिए विनोबा नेे जगन्नाथ पुरी में सौम्य से सौम्यतम सत्याग्रह की ओर बढ़ने का संदेश दिया। प्रेम और
करुणा की धारा को बहाते हुए
वे 29 मई को कोरापुट जिले आवाड़ी गांव पहुंचे।
' हृदय जोड़ने वाला बाबा ' पुस्तक में विनोबा की सहयोगी वीण वैरागी जो भूदान पदयात्रा में साथ थीं, उन्होंने लिखा है -
" कोरापुट जिला यानी घना जंगल। वर्षा भी खूब। मलेरिया के लिए प्रसिद्ध। बाघ का राज्य।
अकेले जाना यानी बाघ के मुंह में जाना। "
वैरागी ने कोरापुट के संस्मरणों का उल्लेख करते हुए लिखा है ...." साथ रहे दाल, चावल, मिट्टी का तेल समाप्त होने में है।
फलफलिया नदी पार होकर जाना है। नदी में बाढ़ आयी है...तीन नदी पार करने के बाद गांव दिखाई दिया। "
कोरापुट जिले की भौगोलिक, सामाजिक स्थिति का विस्तार से वर्णन विनोबा के अनुयायी मनमोहन चौधरी ने अपनी पुस्तक ' भूमि -क्रांति की महानदी ' में किया है। जिसके अनुसार कोरापुट तब भारत के सबसे पिछड़े, उपेक्षित जिलों में से था। यह मानचित्र पर था, परंतु इसके इतिहास से लोग अनभिज्ञ थे। यह जिला 9875 वर्गमील में फैला था, लेकिन आबादी मात्र साढ़े बारह लाख थी। इसमें 83 प्रतिशत आबादी
आदिवासियों की थी। कोरापुट जिले में प्रति वर्गमील सिर्फ़ 126 लोग रहते थे। उत्कल की कुल 45 आदिवासी जनजातियों में बीस कोरापुट जिले में रहती थी। कंघ जनजाति इसमें सबसे बड़ी संख्या में थी। सन् 1955 में कोरापुट जिले में 1.60 लाख कंघ रहते थे। कोरापुट की चौदह लाख एकड़ आबाद भूमि में से केवल तीस हजार एकड़ पर सिंचाई होती थी। यहां के 49 लाख एकड़ में घने जंगल और ऊंचे पहाड़ फैले थे। पहाड़ों पर से बारिश में सैंकड़ों नदी, नाले पूरे वेग से नीचे की ओर बहते। मिट्टी का कटाव करते हुए उफनती नदियों में मिल बंगाल की खाड़ी में मिल जाते। गांव, खेत, रास्ते के निशां ही नहीं रहते। आदिवासी ऊंचे पहाड़ों पर तीन-तीन घरों की बस्ती भी बनाकर रहते। इस तरह कोरापुट जिले के पहाड़ों, जंगलों में पौने छह हजार गांव बसे हुए थे। जहां घर बांस, घास-फूस के होते। यह आदिवासी अंचल मुंडा जनजाति संस्कृति की झलक देते। लेकिन इनकी अपनी कोई लिपि नहीं थी। कई तरह की प्राचीन बोलियां ये लोग बोलते। आदिवासी अपनी आदिम संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए बाहरी दुनिया से दूरी रखते। लेकिन स्थानीय जमींदार इनका घोर शोषण करते। जमीन पर जमींदारों का कब्ज़ा होता जो घने जंगलों से बाहर बसे गांवों में रहते लेकिन धान, कपास, हल्दी, मक्का हरेक फसल पर स्वामित्व उनका ही रहता। आदिवासी सिर्फ़ बेगार करते। उनके पास न शिक्षा थी, न चिकित्सा लेकिन फिर भी इनके भीतर लोक-संस्कृति की एक अद्भुत चेतना थी। ये गाते-बजाते, नाचते, उत्सव मनाते और इनके नृत्य और संगीत यंत्र भी अनूठे होते।
विनोबा ने देखा कि दो -तीन हजार फुट की ऊंचाई पर रहने वाले ये आदिवासी गाय तो रखते हैं, लेकिन गाय का दूध नहीं पीते। इनके बच्चे भूख से बिलखते हैं लेकिन गाय के दूध का उपयोग नहीं करने से ये लोग दही, छाछ, घी के गुणों से भी वंचित हैं। साथ ही ये इलाज के लिए तंत्र, मंत्र पर ज्यादा भरोसा करते हैं। मलेरिया की महामारी से इन लोगों को बचाने का विनोबा ने यहां आकर जिम्मा लिया। यहीं से शुरु हुई उनकी करुणा की अनूठी यात्रा जिसने कोरापुट को कुछ ही महिनों में बदल दिया।
विनोबा ने पूरे देश से 180 सर्वोदयी स्वयंसेवक छांट कर कोरापुट बुलाए। इनमें से हरेक को सुदूर गांवों में भेजा गया।
जो वहीं रहे। इनमें वैद्यों का दल भी शामिल था। जिन्होंने
मलेरिया की औषधि दी। पहाड़ों की जड़ी-बूटियों से यह औषधियां निर्मित की गयीं और कई स्थानीय युवाओं को यह काम सिखाया गया। एलोपैथी डॉक्टर भी बुलाए गये।
विनोबा ने इंजीनियरिंग छात्रों को बुलाया। गुजरात के सूरत से 18 इंजीनियरिंग छात्र आये। कुछ रिटायर बड़े इंजीनियर बंगाल से आ गये और अपने साथ योग्य कारीगर लेकर आये। सबने मिलकर कोरापुट में आादिवासियों को पक्की ईंटे बनाना सिखाया। इनके गांवों में इन्हीं ईंटों से पक्के ' गांधी घर ' बने। जिसमें स्वयंसेवकों नेे स्कूल और अस्पताल दोनों चलाए। छह हजार चरखे और छह सौ करघे मंगाये गये। जिन्हें मुफ़्त बांट कर आदिवासियों को सूत कातने का प्रशिक्षण दिया गया। विनोबा ने बिहार और उड़ीसा के दूसरे हिस्सों से एक हजार बैलों की जोड़ी मंगाकर आदिवासियों को खेतों में बैल जोतकर खेेती करना सिखाया। इसके लिए अनेक सर्वोदयी किसान कोरापुट जिले में विनोबा ने भेजे। सबसे मुश्किल काम था आदिवासियों को गाय का दूध पीने के लिए तैयार करना, गाय से खेत जुतवाने से रोकना और लड़कियों को स्कूल भेजने के साथ उन्हें चरखा सिखाना। लेकिन यह भी हो गया। एक हजार शहद की पेटियां, 100 तेलघानी और पांच सौ हल भी बांटे गये। इस तरह यहां ग्रामोघोग के बीज ने जड़ें पकड़ी।
विनोबा ने स्वयं घूम-घूम कर जाना कि मूसलाधार बारिश का पानी किस तरह मिट्टी का कटाव करके समुद्र की ओर पहाड़ के ऊपर से नीचे बहता है। पीने के पानी के लिए आदिवासी दो से तीन मील पैदल जाते हैं। विनोबा ने इंजीनियरिंग छात्रों और कारीगरों से छोटे-छोटे पक्के तालाब बनाने को कहा। आदिवासियों को भी यह निर्माण कार्य सिखाया गया। इससे पहाड़ों में बहुत-से जलभंडार तैयार हुए। मिट्टी का कटाव रुका
तो खेत बचे और वहां कई तरह की फसल उगाने की शुरुआत हुई। कोरापुट के पहाड़ों में पक्की सड़क गांवों के रास्ते पर बनने के काम शुरु हुए। सरकार यह सब पहले ही करना चाहती थी लेकिन आदिवासियों तक उसकी कोई पहुंच नहीं थी। जमींदार और व्यापारी सरकारी कारिन्दों को गुमराह कर भगा देते। उन्हें जंगल का भयावह रूप दिखाते। विनोबा ने आगे आकर, वहां रुक कर यह दूरियां खत्म की। आदिवासियों में नया विश्वास जगाया। सरकार ने एक कुएं के लिए दो हजार और तालाब के लिए एक हजार रुपये के हिसाब से मदद प्रदान की। विनोबा के आग्रह पर कोरापुट में एक वर्ष में करीब आठ सौ ग्रामदान हुए जबकि बालेश्वर में 162 और गजाम में पचास।
बंगाल से विद्वानों को बुलाकर आदिवासियों की बोलियों में से व्याकरण बनाने का काम शुरु हुआ। बंगाली और उड़िया विद्वानों का जब आदिवासियों से संवाद बना तो मालूम चला कि आदिवासी लोक-संस्कृति में कितनी चेतना और सौंदर्य छिपा है।
विनोबा ने यह तमाम कार्य सिर्फ़ चार महीने में कर दिखाये। अन्ना सहस्त्रबुद्धे, गोपबंधु चौधरी, विश्वनाथ पटनायक जैसे सर्वोदयी तपस्वियों ने कोरापुट जिले में ही रहकर इस कार्य को आगे बढ़ाया। कोरापुट की यह चेतना गंजाम, मयूरभंज जैसे पड़ोस के आदिवासी बाहुल्य जिलों में भी फैली। आगामी वर्षों में बंगाल के भवन निर्माण, बांध निर्माण और सड़क निर्माण के कामों में कोरापुट जिले के परिश्रमी श्रमिकों की मांग बहुत बढ़ गयी। बंगाल के ठेकेदारों ने इनकी श्रम-शक्ति को पहचाना।
जिसकी पहली अलख विनोबा ने जगायी थी। खादी का काम भी कोरापुट में छाने लगा। विशेषकर यहां के बुनकरों और चर्मकारों का माल वर्धा तक सीधे पहुंचने लगा। यहां की महिलाओं के बनाये बांस के सामान पूरे देश में पसंद किये जाने लगे। विनोबा के प्रयासों से कोरापुट घाटी में सहकारी खेती और सहकारी बाज़ार का जन्म हुआ।
भूदान प्रणेता विनोबा ने ' सबै भूमि गोपाल की ' इस दर्शन पर
समाज के वंचित वर्ग को प्रेमपूर्वक स्वेच्छा से भूमि दिलाने का जो स्वप्न देखा था। इस मार्ग पर कोरापुट जैसे अनूठे अध्याय भी जुड़े। जिसने हजारों साल से उपेक्षित आदिवासियों की जिंदगी में नया बदलाव किया।
उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा। कोरापुट के प्रसंंग की चर्चा बहुत अल्प हुई है। इसलिए विनोबा की पुण्यतिथि पर इस अनकही दास्तां का उल्लेख सर्वोदय के स्वप्न को व्यक्त करने का एक सुंदर उदाहरण है।