Shri Sidhnath Mandir, Bhounr, Jamui

Shri Sidhnath Mandir, Bhounr, Jamui सिद्ध नाथ मंदिर मे भगवान शिव माता पार्वती भगवान गणेश, कातिॅक तथा नवग्रह भगवान विराजमान हैं!

सिद्ध नाथ मंदिर- भौंड, जमुई मे स्थित है, इस मंदिर मे भगवान शिव माता पार्वती भगवान गणेश, कातिॅक तथा नवग्रह भगवान विराजमान हैं! इस मंदिर कि विशेषता है कि यदि आप सच्चे मन से पूजा अर्चना करते तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है! आपको आपके काम मे अवश्य सिद्धि मिलती है!

01/07/2025
23/03/2020

*कामयाबी कभी बड़ी नहीं होती,*
पाने वाले हमेशा बड़े होते है !
*दरार कभी बड़ी नहीं होती,*
भरने वाले हमेशा बड़े होते है !
*सम्बध कभी बड़े नहीं होते,*
निभाने वाले हमेशा बड़े होते है...!!!

‼ *आपका दिन शुभ हो* ‼🌹🌹🌹good morning 🌹🌹🌹

23/03/2020

भगवान कृष्ण के पिता वसुदेव की कथा!!!!!!!

वसुदेव मथुरा के राजा उग्रसेन के मंत्री,शूरसेन तथा मारिषा के पुत्र और श्रीकृष्ण के पिता थे। पाण्डवों की माता कुन्ती इनकी बहन थीं। इनका विवाह देवक अथवा आहुक की सात कन्याओं से हुआ था, जिनमें देवकी सर्वप्रमुख थीं। वसुदेव के नाम पर ही श्रीकृष्ण को 'वासुदेव' कहते हैं।

पूर्वकल्प में प्रजापति सुतपा तथा उनकी पत्नी पृश्नि ने बहुत दिनों तक तपस्या करके भगवान को संतुष्ट किया। जब भगवान ने उन्हें दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा, तब उन लोगों ने भगवान को ही अपने पुत्ररूप में पाने की इच्छा प्रकट की। प्रभु ने तीन बार उनसे ‘दिया, दिया, दिया’ कहा। उस कल्प में भगवान का अवतार माता पृश्नि से हुआ और वे ‘पृश्निगर्भ’ कहलाये। दूसरे कल्प में प्रजापति सुतपा हुए कश्यप जी और पृश्नि हुई देवमाता अदिति।

भगवान ने ‘वामन’ रूप से उनके यहाँ अवतार लिया। क्योंकि तीन बार भगवान ने ‘दिया, दिया, दिया’ कहा था, अतः तीसरी बार प्रजापति सुतपा यदुवंश में शूरसेन के पुत्र वसुदेव हुए। इनके जन्म के समय देवताओं की दुन्दुभियां स्वयं बज उठी थीं, इसलिये इनको लोग 'आनकदुन्दुभि' कहते थे। माता पृश्नि मथुरा नरेश उग्रसेन के भाई देवक की सबसे छोटी कन्या देवकी हुईं।

वसुदेव जी के कुल अट्ठारह विवाह हुए, जबकि कहीं-कहीं इनकी 12 पत्नियाँ कही जाती हैं। वसुदेव की पत्नियों के ज्ञात नाम इस प्रकार हैं- देवकी, रोहिणी, पौरवी, मदिरा, कौशल्या, रोचा, इला, धृतदेवा, शांतिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता और सहदेवा। वसुदेव ने अपनी इन सभी पत्नियों से संतानें प्राप्त की थीं। सभी संतानों का जन्म मथुरा में ही हुआ था। इनमें से अनेकों की आयु में कुछ दिनों का ही अंतर था। वसुदेव का भवन उनकी पत्नियों की संतानों से भर गया। उनके भाइयों की पत्नियों के भी कई पुत्र हुए।

दीर्घ काल तक पौत्रों का मुख देखने को तरसती रही थीं देवी मारिषा और फिर उनको पितामही का गौरव देने वाले बहुत अधिक एक साथ आ गए उनके पुत्रों के गृहों में। उनकी अभिलाषा भली प्रकार पूर्ण हो गई। देवक की छः कन्याएं तो वसुदेव जी को ब्याही जा रही थीं; जब देवकी का भी विवाह उनसे हो गया, तब उग्रसेन का ज्येष्ठ पुत्र कंस अपनी छोटी चचेरी बहिन के स्‍नेहवश स्वयं वसुदेव-देवकी के रथ का सारथि बनकर उन्हें घर पहुँचाने लगा। मार्ग में आकाशवाणी ने उससे कहा- "मूर्ख ! तू जिसे पहुँचाने जा रहा है, उसकी आठवीं सन्तान के हाथ से तेरी मृत्यु होगी।

" इतना सुनते ही कंस ने तलवार खींच ली और वह देवकी को मारने के लिये उद्यत हो गया। वसुदेव जी ने उसे बहुत समझाया। "शरीर तो नश्वर है। मृत्यु एक-न-एक दिन होगी ही। मनुष्य को कोई ऐसा काम इस दो क्षण के जीवन के लिये नहीं करना चाहिये कि मरने पर लोग उसकी निंदा करें। जो प्राणियों को मोहवश कष्ट देता है, मरने पर यम के दूत घोर नरक में डालकर युगों तक उसे भयंकर पीड़ा देते हैं।"

कंस के ऊपर ऐसी बातों का कोई प्रभाव पड़ता न देखकर अन्त में वसुदेव जी ने कहा- "तुम्हें इस देवकी से तो कोई भय है नहीं। तुमको मात्र इसकी संतानों से भय है। मैं वचन देता हूँ कि इसकी सन्तानों को जन्म लेते ही मैं तुम्हारे पास पहुँचा दिया करूंगा।" कंस जानता था कि वसुदेव इतने धर्मात्मा हैं, इतने सत्यनिष्ठ हैं कि वे अपनी बात टाल नहीं सकते। उसने देवकी को मारने का प्रयत्न छोड़ दिया और देवकी तथा वसुदेव को आजीवन कारावास में डाल दिया।

समय आने पर देवकी के पुत्र हुआ। वसुदेव जैसे संत, सत्पुरुष के लिये कोई भी त्याग दुष्कर नहीं। अपने प्राणप्रिय पुत्र को वे जन्मते ही कंस के पास उठा ले गये। पहले तो कंस ने उनकी सत्यनिष्ठा देखकर बालक को लौटा दिया; पर पीछे से नारद ने जब उसे उल्टा-सीधा समझा दिया, तब उस बालक को उसने मार डाला। देवकी के पुत्र उत्पन्न होते ही कंस उसे मार डालता था। छः पुत्र उसने इसी प्रकार मार दिये। सातवें गर्भ में बलराम थे। योगमाया ने उन्हें देवकी के गर्भ से संकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया।

इसी से बलराम का एक नाम संकर्षण भी हुआ। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र ही प्रकट हुए। भगवान के आदेश से वसुदेव रात्रि में ही उन्हें गोकुल नन्द के यहाँ पहुँचा आये और वहाँ से यशोदा की नवजात बालिका ले आये। कंस जब उस बालिका को मारने चला तो वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गयी। अष्टभुजा देवी के रूप में प्रकट होकर उसने कंस से कहा- "तेरा वध करने वाला शत्रु कहीं प्रकट हो गया है।" कंस ने यह सुनकर वसुदेव-देवकी को कारागार से छोड़ दिया।

दुरात्मा कंस जान गया कि उसे मारने वाला नन्दगृह में ही आया है। उसके जो असुर ब्रज में गये, वे सभी श्रीकृष्ण के हाथों सद्गति पा गये। जब नारद से पता लगा की कृष्ण-बलराम तो वसुदेव जी के ही पुत्र हैं, तब तो कंस बहुत रुष्ट हुआ। उसने हथकड़ी-बेड़ी से वसुदेव-देवकी को जकड़कर पुनः बंदीगृह में डाल दिया। अन्ततः श्रीकृष्णचन्द्र मथुरा आये। कंस को उन्होंने मारकर मुक्त कर दिया। पिता-माता की बेडि़यां काटकर जब राम-श्याम उनके पदों में प्रमाण करने लगे, वसुदेव जी आश्चर्य से खडे़ रह गये।

वे जानते थे कि श्रीकृष्णचन्द्र साक्षात परमात्मा हैं। परन्तु लीलामय श्यामसुन्दर ने माता-पिता से क्षमा मांगी, मीठी बातें कीं और उनमें वात्सल्य-भाव जाग्रत कर दिया। वासुदेव की महिमा, उनके सौभाग्य का कोई अनुमान भी कैसे कर सकता है। जगन्नाथ बलराम-श्याम उन्हें पिता कहकर सदा आदर देते थे। नित्य प्रातःकाल उनके पास जाकर उनको प्रमाण करते थे। उनकी सब प्रकार की सेवा करते थे।

कुरुक्षेत्र में सूर्य-ग्रहण के समय वसुदेव ने ऋषियों से कर्म के द्वारा संसार से मुक्त होने का मार्ग पूछा। ऋषियों ने उनसे यज्ञानुष्ठान कराया। वहाँ ऋषियों ने उनसे कहा था- "श्रीकृष्ण ही साक्षात् ब्रह्म हैं।" द्वारका में वसुदेव जी ने उस श्यामसुन्दर से यही बात कही, तब उन मयूर मुकुटधारी ने पिता को तत्त्वज्ञान का उपेदश किया।

इसके पश्चात देवर्षि नारद ने वसुदेव को अध्यात्मज्ञान तथा भक्ति का तत्त्व बताया। तब प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्णचन्द्र ने लीला संवरण कर ली और दारुक से यह संवाद प्राप्त हुआ, तब वसुदेव भी शंखोद्धार-तीर्थ से प्रभास गये और वहाँ उन्होंने भी श्रीकृष्ण का अनुगमन किया।

'भागवत' तथा अन्य पुराणों के अनुसार वसुदेव कृष्ण के वास्तविक पिता, देवकी के पति और कंस के बहनोई थे। जिस प्रकार यशोदा की तुलना में देवकी का चरित्र भक्त कवियों को आकर्षित नहीं कर सका, उसी प्रकार नन्द की तुलना में वसुदेव का चरित्र भी गौण ही रहा। कृष्ण जन्म पर कंस के वध के भय से आक्रान्त वसुदेव की चिन्ता, सोच और कार्यशीलता से उनके पुत्र-स्नेह की सूचना मिलती है। यद्यपि उन्हें कृष्ण अलौकिक व्यक्तित्व का ज्ञान है फिर भी उनकी पितृसुलभ व्याकुलता स्वाभाविक ही है।

मथुरा में पुनर्मिलन के पूर्व ही वसुदेव को स्वप्न में उसका आभास मिल जाता है। वे अपनी दुखी पत्नी देवकी से इस शुभ अवसर की आशा में प्रसन्न रहने के लिए कहते हैं।

वसुदेव का चरित्र भागवत-भाषाकारों के अतिरिक्त सूरदास के समसामायिक एवं परवर्ती प्राय: सभी कवियों की दृष्टि में उपेक्षित ही रहा। आधुनिक युग में केवल 'कृष्णायन' के अन्तर्गत उसे परम्परागत रूप में ही स्थान मिल सका।

23/03/2020

जब सती के भयंकर रूप से डर कर भागना पड़ा भगवान शिव को!!!!!!!!!!

देवी सती दक्ष प्रजापति की पुत्री थी और भगवान शिव की पहली पत्नी। देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में कूदकर अपने प्राणों का त्याग कर दिया था, ये बातें तो सभी जानते हैं लेकिन देवी पुराण में इस प्रसंग के बारे में और भी रोचक बातें बताई गई हैं।

देवी पुराण के अनुसार जब सती के पिता दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें अपनी पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को निमंत्रित नहीं किया। यज्ञ के बारे में जान कर सती बिना निमंत्रण ही पिता के यज्ञ में जाने की जिद करने लगी।

तब भगवान महादेव ने सती से कहा कि- किसी भी शुभ कार्य में बिना बुलाए जाना और मृत्यु- ये दोनों ही एक समान है। मेरा अपमान करने की इच्छा से ही तुम्हारे पिता ये महायज्ञ कर रहे हैं। यदि ससुराल में अपमान होता है तो वहां जाना मृत्यु से भी बढ़कर होता है।

देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव की ये बात सुनकर देवी सती बोलीं- महादेव। आप वहां जाएं या नहीं। लेकिन मैं वहां अवश्य जाऊंगी। पिता के घर में महायज्ञ के महोत्सव का समाचार सुनकर कोई कन्या धैर्य रखकर अपने घर में कैसे रह सकती है।

देवी सती के ऐसा कहने पर शिवजी ने कहा- मेरे रोकने पर भी तुम मेरी बात नहीं सुन रही हो। दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं गलत कार्य कर दूसरे पर दोष लगाता है। अब मैंने जान लिया है कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो। अत: अपनी रूचि के अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो।

जब महादेव ने यह बात कही तो सती क्षणभर के लिए सोचने लगीं कि इन शंकर ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की थी और अब ये मेरा अपमान कर रहे हैं, इसलिए अब मैं इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूं। यह सोचकर देवी सती ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया।

क्रोध से फड़कते हुए ओठों वाली तथा कालाग्नि के समान नेत्रों वाली उन भगवती सती को देखकर महादेव ने अपने नेत्र बंद कर लिए। भयानक दाढ़ों से युक्त मुखवाली भगवती ने अचानक उस समय अट्टाहस किया, जिसे सुनकर महादेव भयभीत हो गए। बड़ी कठिनाई से आंखों को खोलकर उन्होंने भगवती के इस भयानक रूप को देखा।

देवी भगवती के इस भयंकर रूप को देखकर भगवान शिव भय के मारे इधर-उधर भागने लगे। शिव को दौड़ते हुए देखकर देवी सती ने कहा-डरो मत-डरो मत। इस शब्द को सुनकर शिव अत्यधिक डर के मारे वहां एक क्षण भी नहीं रूके और बहुत तेजी से भागने लगे।

इस प्रकार अपने स्वामी को भयभीत देख देवी भगवती अपने दस श्रेष्ठ रूप धारण कर सभी दिशाओं में स्थित हो गईं। महादेव जिस ओर भी भागते उस दिशा में वे भयंकर रूप वाली भगवती को ही देखते थे। तब भगवान शिव ने अपनी आंखें बंद कर ली और वहीं ठहर गए।

जब भगवान शिव ने अपनी आंखें खोली तो उन्होंने अपने सामने भगवती काली को देखा। तब उन्होंने कहा- श्यामवर्ण वाली आप कौन हैं और मेरी प्राणप्रिया सती कहां चली गईं। तब देवी काली बोली- क्या अपने सामने स्थित मुझ सती को आप नहीं देख रहे हैं। ये जो अलग-अलग दिशाओं में स्थित हैं ये मेरे ही रूप हैं। इनके नाम काली, तारा, लोकेशी, कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुंदरी, बगलामुखी, धूमावती और मातंगी हैं।

देवी सती के ये वचन सुनकर शिवजी बोले- मैं आपको पूर्णा तथा पराप्रकृति के रूप में जान गया हूं। अत: अज्ञानवश आपको न जानते हुए मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा करें। ऐसा कहने पर देवी सती का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने महादेव से कहा कि- यदि मेरे पिता दक्ष के यज्ञ में आपका अपमान हुआ तो मैं उस यज्ञ को पूर्ण नहीं होने दूंगी। ऐसा कहकर देवी सती अपने पिता के यज्ञ में चली गईं।

23/03/2020

श्रीकृष्ण अपने पैर का अंगूठा क्यों पीते थे ?

श्रीकृष्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा हैं । यह सारा संसार उन्हीं की आनन्दमयी लीलाओं का विलास है । श्रीकृष्ण की लीलाओं में हमें उनके ऐश्वर्य के साथ-साथ माधुर्य के भी दर्शन होते हैं । ब्रज की लीलाओं में तो श्रीकृष्ण संसार के साथ बिलकुल बँधे-बँधे से दिखायी पड़ते हैं । उन्हीं लीलाओं में से एक लीला है बालकृष्ण द्वारा अपने पैर का अंगूठे पीने की लीला ।

श्रीकृष्णावतार की यह बाललीला देखने, सुनने अथवा पढ़ने में तो छोटी-सी तथा सामान्य लगती है किन्तु इसे कोई हृदयंगम कर ले और कृष्ण के रूप में मन लग जाय तो उसका तो बेड़ा पार होकर ही रहेगा क्योंकि ‘नन्हे श्याम की नन्ही लीला, भाव बड़ा गम्भीर रसीला ।’

श्रीकृष्ण की पैर का अंगूठा पीने की लीला का भाव
भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्येक कार्य को संतों ने लीला माना है जो उन्होंने किसी उद्देश्य से किया । जानते हैं संतों की दृष्टि में क्या है श्रीकृष्ण के पैर का अंगूठा पीने की लीला का भाव ?

संतों का मानना है कि बालकृष्ण अपने पैर के अंगूठे को पीने के पहले यह सोचते हैं कि क्यों ब्रह्मा, शिव, देव, ऋषि, मुनि आदि इन चरणों की वंदना करते रहते हैं और इन चरणों का ध्यान करने मात्र से उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ? कैसे इन चरण-कमलों के स्पर्श मात्र से गौतमऋषि की पत्नी अहिल्या पत्थर की शिला से सुन्दर स्त्री बन गई ?

कैसे इन चरण-कमलों से निकली गंगा का जल (गंगाजी विष्णुजी के पैर के अँगूठे से निकली हैं अत: उन्हें विष्णुपदी भी कहते हैं) दिन-रात लोगों के पापों को धोता रहता है ? क्यों ये चरण-कमल सदैव प्रेम-रस में डूबी गोपांगनाओं के वक्ष:स्थल में बसे रहते हैं ? क्यों ये चरण-कमल शिवजी के धन हैं । मेरे ये चरण-कमल भूदेवी और श्रीदेवी के हृदय-मंदिर में हमेशा क्यों विराजित हैं ।

जे पद-पदुम सदा शिव के धन,सिंधु-सुता उर ते नहिं टारे।
जे पद-पदुम परसि जलपावन,सुरसरि-दरस कटत अघ भारे।।
जे पद-पदुम परसि रिषि-पत्नी,बलि-मृग-ब्याध पतित बहु तारे।
जे पद-पदुम तात-रिस-आछत,मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारि।।

भक्तगण मुझसे कहते हैं कि—

हे कृष्ण ! तुम्हारे चरणारविन्द प्रणतजनों की कामना पूरी करने वाले हैं, लक्ष्मीजी के द्वारा सदा सेवित हैं, पृथ्वी के आभूषण हैं, विपत्तिकाल में ध्यान करने से कल्याण करने वाले हैं ।

भक्तों और संतों के हृदय में बसकर मेरे चरण-कमल सदैव उनको सुख प्रदान क्यों करते हैं ? बड़े-बड़े ऋषि मुनि अमृतरस को छोड़कर मेरे चरणकमलों के रस का ही पान क्यों करते हैं । क्या यह अमृतरस से भी ज्22यादा स्वादिष्ट है ?

विहाय पीयूषरसं मुनीश्वरा,
ममांघ्रिराजीवरसं पिबन्ति किम्।
इति स्वपादाम्बुजपानकौतुकी,
स गोपबाल: श्रियमातनोतु व:।।

अपने चरणों की इसी बात की परीक्षा करने के लिये बालकृष्ण अपने पैर के अंगूठे को पीने की लीला किया करते थे ।

23/03/2020

कर्म सिद्धान्त बनाम शरणागति सिद्धान्त,सूक्ष्म चिंतन,सतत अनुकरणीय!!!!!!!!!!!!!!
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शरणागति की मूल धारणा क्या है?कालिय नाग की पत्नियों ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा कि”आपका अवतार तो दुष्टों को दंड देने के लिए ही हुआ है।इसलिए आपने हमारे पति को दंड देकर सर्वथा उपयुक्त कार्य ही किया।

”स्वयं भगवान ने कहा है--
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्यस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

धर्म क्या है?इसका वर्णन स्मृतियों में किया गया है।किन्तु प्रश्न यह है कि धर्म का ज्ञान होते हुए भी ब्यक्ति उसे जीवन में क्यों नहीं उतार पाता?अधर्म जानते हुए भीउसका परित्याग क्यों नहीं कर पाता?जैसा दुर्योधन ने कहा कि--
“जानामि धर्मं न च मे प्रबृत्तिः,जानाम्यधर्मं न च मे निबृतिः”

शास्त्रों में बड़े बिस्तार से नरक और उनमें दिए जाने वाले दंडों का वर्णन किया गया है। लोक में भी राजदंड का भय रहता है।इतना होते हुए भी बुराई की समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाता?यह एक जटिल प्रश्न है।शास्त्रों में विविध रूपों में इस के उत्तर दिए गये हैं।

पुनर्जन्म के माध्यम से भी इसी प्रश्न का उत्तर देने की चेष्टा की गयी है।यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब सर्वप्रथम सृष्टि का निर्माण हुआ होगा,तब उस समय बिबिध योनियों का प्राकट्य कर्म-सिद्धान्त से कैसे सुसंगत है?

इसलिए पूर्व-पूर्व जन्मों की खोज करते रहने पर यह प्रश्न श्रृंखला समाप्त नहीं होती है।इससे कुछ लोग भले संतुष्ट हो जायँ लेकिन बहुत लोगों को इससे समाधान नहीं मिल पाता। उनको लगता है कि यह उत्तर न देने की चेष्टा है।

कालियनाग ने विनम्रता भरी भाषा में जो प्रश्न प्रभु से किए,वे भी साधारण महत्त्व के नहीं हैं।वह श्रृष्टि के मूल में कर्म की धारणा को स्वीकार नहीं करता।उसका प्रश्न तोयह है कि सृष्टि के वास्तविक निर्माता तो आप ही हैं।बिबिध प्रकार की योनियों काजो निर्माण किया गया है,क्या उसमें कोई भी जीव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है?

यदि सर्प का निर्माण करते हुए आपने उसकी डाढ़ में विष भर दिया है,उसकी प्रकृति को तमोगुणी बना दिया है,तो क्या वह उससे हटकर कुछ करने के लिए स्वतंत्र है?और क्या किसी भी ब्यक्ति के लिए स्वयं के स्वभाव को परिवर्तित कर पाना संभव है?

ऐसी स्थिति में किसी जीव को अपराधी मानकर उसे दंड देना कहाँ तक उचित है?यद्यपिआप दंड देने में या कृपा करने में स्वतंत्र हैं,किन्तु यह निर्णय तो आप ही पर निर्भर है कि जीव को उसके अपराध के लिए दंड क्यों देना चाहिए?कालिय नाग के इस प्रश्न का कोई उत्तर प्रभु के द्वारा नहीं दिया गया।

वस्तुतः इन विचारों/पद्धतियों का विभाजन करें,तो जहाँ कर्म सिद्धान्तवादी,जीव को कर्म करने में स्वतंत्र मानता हुआ सा प्रतीत होता है,वहाँ वेदान्तवादी की दृष्टि में कर्म और कर्म फल का प्रश्न ही सृष्टि के मिथ्यात्व के कारण ब्यर्थ है।भक्तों ने एक मध्यम मार्ग चुना है।

वे मानते हैं कि जीव अपनी त्रुटियों के कारण असद् कार्य करता है।किन्तु प्रभु उसे कर्म फल से मुक्ति देते हैं।कालियनाग ने शरणागति की जिस मूल धारणा की ओर संकेत किया, उसमें जीव कहीं से भी रंचमात्र कर्म करने में स्वतंत्र नहीं है।वह पूरी तरह से असंदिग्ध रूप में पराधीन(ईश्वराधीन) है।ईश्वर ही उससे जो कुछ करा रहा है,वह कर रहा है।और इसलिए वह दंड देने के लिए प्रस्तुत ईश्वर को उलाहना देता है।

रामचरितमानस के विविध प्रसंगों में यह बात दुहराई गयी है।बालिबध के पश्चात भगवान राम सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य देते हैं और साथ में यह आदेश भी देते हैं कि अंगद के साथ राज्य चलाते हुए वे जनकनंदिनी का पता लगाना ना भूलें--
“अंगद सहित करहु तुम्ह राजू।संतत हृदय धरेहु मम काजू।।”

किन्तु सुग्रीव राजसत्ता और भोगों में पूरी तरह डूब गये।श्रीसीताजी का पता लगाना तो दूर,कई महीनों तक प्रभु से मिलने नहीं आए।प्रभु घोषित करते हैं कि जिस बाण से बालि का बध किया था,उसी से कल सुग्रीव का बध करेंगे--
“जेहिं सायक मारा मैं बाली।तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।”

और लक्ष्मणजी से कहा कि उसका बध करने की आवश्यकता नहीं है,वह डरपोक है,उसे
डराकर मेरे पास ले आओ।लक्ष्मणजी,किष्किंधा की ओर प्रस्थान करते हैं।

सुग्रीव ने श्रीराम को प्रसन्न करने के लिए आंजनेय का आश्रय लिया।हनुमानजी की विनती से लक्ष्मणजी संतुष्ट होकर सुग्रीव को लेकर श्री रामभद्र के पास आते हैं।उस समय सुग्रीव ने प्रभु से जो वाक्य कहे,वे किसी न किसी रूप में कालियनाग के वाक्यों से मिलते जुलते ही हैं----

“अतिसय प्रबल देव तव माया।छूटइ राम करहु जौं दाया।।
विषय वस्य सुर नर मुनि स्वामी।मैं पाँवर पशु कपि अति कामी।।
नारि नयन सर जाहि न लागा।घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।
लोभ पास जेहि गर न बधाया।सो नर तुम्ह समान रघुराया।।
यह गुन साधन ते नहिं होई।तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।।
तब रघुपति बोले मुसुकाई।तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।”

बहिरंग दृष्टि से प्रसंग चाहे जितना सरल प्रतीत होता हो,पर इसमें जो सैद्धान्तिक प्रश्न किए गये हैं,वे अपने आप में अत्यंत गंभीर व विचारणीय हैं।एक दृष्टि वह है,जिसका संकेत गोस्वामीजी ने विनयपत्रिका में किया है।वे स्वयं अपनी तुलना सुग्रीव से करते हैं,जो कर्म-रूप बालि से संत्रस्त है--
“करम-कपीस बालि-बली,त्रास-त्रस्यो हौं।
चाहत अनाथ-नाथ!!तेरी बाँह बस्यो हौं।।
प्रारंभ में बालि, सुग्रीव के प्रति सदय था।किन्तु क्रुद्ध होने पर वह उसका सर्वस्व छीन लेता है।सुग्रीव उसके भय से सर्वत्र भागता फिरता है।

यही तो कर्म की स्थिति है।कर्म जब अनुकूल होता है,तो सब कुछ दे देता है और प्रतिकूल होने पर सब कुछ छीन लेने में भी देर नहीं करता।

भय से संत्रस्त,सुग्रीव जहाँ जाता है,बालि उसके पीछे पड़ जाता है।यह भी जीवन का सहज सत्य है।भले ही ब्यक्ति किसी देश में क्यों न चला जाय,प्रारब्ध तो उसका पीछा करता ही है।इस कर्मत्रास से मुक्त करने वाला कोई भी ब्यक्ति उसे दिखाई नहीं देता।

बालि के संदर्भ में तो यह प्रसिद्ध है कि उसने रावण को परास्त कर उसे छः महीने तक अपनी बगल में दबाये रखा।इसका भी तात्पर्य यही है कि सबको परास्त करने की क्षमता वाला रावण भी कर्म के समक्ष पराजित हो जाता है।ऐसे शक्तिशाली कर्म(प्रारब्ध) से मुक्ति तो एकमात्र प्रभु की कृपा ही दिला सकती है।

सुग्रीव,आंजनेय के रूप में संत के माध्यम से प्रभु का सख्य पाने में सक्षम होते हैं। बालि का बध तो केवल प्रभु के द्वारा ही होता है।किन्तु उसके अंतराल में आने वाली यह गाथा सांकेतिक अर्थों वाली है।

जब बालि पर प्रहार करने के बाद प्रभु उसके समक्ष आकर खड़े हो जाते हैं,तब वह रामभद्र से यही प्रश्न करता है कि--
“धर्म हेतु अवतरेउ गोसाईं।मारेहु मोहिं ब्याध की नाईं।।”

मानो कर्म का मापदंड कठोर है कि वह मनुष्य के रूप में ईश्वर के कार्य में भी त्रुटि निकाल लेता है।तब भला कोई ब्यक्ति यह दावा कैसे कर सकता है कि उसके कर्म में कोई दोष नहीं होगा?

किन्तु प्रभु का उत्तर और भी ब्यंग्यात्मक था।प्रभु ने बालि के आचरण की ओर इंगित करते हुए उससे पूछा कि-”क्या तुमने अपने आचरण पर दृष्टि डाली?अनुज-बधू का अपहरण कर तुमने उसे अपनी पत्नी बना डाला।तो क्या तुम्हारा यह आचरण धर्म- संगत था?”
“अनुजबधू भगिनी सुतनारी।सुनु सठ कन्या सम ये चारी।।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई।ताहि बधे कछु पाप न होई।।”

प्रभु का अभिप्राय यह था कि “जब तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि मेरे अवतार का उद्देश्य धर्म की रक्षा है,तो तुम्हारे धर्म के विपरीत आचरण के लिए तुम्हें दंड देकर तो मैं अपने अवतार का उद्देश्य ही पूरा कर रहा हूँ।”

बन्धुगण!!एकाग्रता से देखें-ईश्वर को कर्म की सीमाओं से मुक्त माना गया है। वह सर्वतंत्र स्वतंत्र है। किन्तु जब वह ब्यक्ति के रूप में कोई क्रिया-कलाप करता है,तो उसके कार्यों को किस कसौटी पर कसा जाये?

यही कर्म सिद्धान्त की जटिलता है।अभी कुछ दिनों पहले विद्वान अनुज श्री राजनाथ तिवारीजी ने प्रभु श्रीराम द्वारा श्रीसीताजी के परित्याग का प्रश्न उठाया था।उसमें भी कुछ ऐसी ही अनुभूति हमें हुयी थी।इसका तात्पर्य यह भी है कि स्वयं को कर्मफलदाता मानने वाला ईश्वर भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसमें कोई त्रुटि होगी ही नहीं।

इसका एक अनोखा दृष्टांत “मांडब्य ऋषि” के प्रसंग में प्राप्त होता है।इन्हीं मांडब्य ऋषि के श्राप से धर्मराज को दासीपुत्र विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था।कथा इस प्रकार है।

राजा ने निरपराधी मांडब्य ऋषि को नुकीले शूल पर बैठा कर दंडित करने का आदेश दिया और उन्हें उस शूल पर बैठने के लिए बाध्य किया गया।

क्रुद्ध ऋषि मांडब्य ने धर्मराज का आह्वान कर उनसे यह प्रश्न किया कि”मुझे निर्दोष होते हुए भी यह दंड क्यों भोगना पड़ रहा है?उस समय धर्मराज ने उत्तर देते हुए बताया कि, “बाल्यावस्था में आपने खेल-खेल में एक नुकीले काँटे से किसी कीड़े को बींध दिया था,यह दंड आपके उसी कर्म का परिणाम है।”मांडब्य ने धर्मराज को फटकारते हुए कहा कि,“एक अबोध बालक को उसके कर्म का परिणाम देना क्या न्यायसंगत है?तुम स्वयं ही धर्मज्ञान शून्य हो,अतः मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि दासीपुत्र के रूप में तुम्हें मृत्युलोक में जन्म लेना होगा और अपने अविचार का परिणाम भोगने के पश्चात ही तुम पुनः अपने रूप में प्रतिष्ठित हो सकोगे।

इस कथा का निष्कर्ष विद्वज्जन!!बहुत गंभीर और समझने योग्य है कि धर्म के द्वारा भी धर्म की ब्याख्या में त्रुटि हो सकती है।और यदि कर्मफल अनिवार्य है,तो वह भी दंड का पात्र बन सकता है।कर्मसिद्धान्त से जुड़ी जिन समस्याओं का वर्णन शास्त्रों में किया गया है,वे इतना आतंकित करने वाली हैं कि ब्यक्ति यह कल्पना नहीं कर सकता कि कर्म-दोषरहित भी कोई हो सकता है?इसे अनिवार्य रूप से स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कर्मचक्र से मुक्त हो पाना कभी किसी ब्यक्ति के लिए संभव नहीं है।कर्मफल की यही जटिलता ब्यक्ति को भगवत्भक्ति की ओर अभिमुख करती है।

अंततोगत्वा बालि को भी दया का ही आश्रय लेना पड़ा।जब वह अपने कर्मों का समर्थन नहीं कर सका,तब वह प्रभु के समक्ष विनम्र होकर स्वीकार करता है कि”मेरी चतुराई नहीं चली।पर मैंने सुना है कि आपके समक्ष आते ही जीव के समस्त पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। तो क्या आपके सन्मुख होते हुए भी मैं अब भी पापी ही बना हुआ हूँ?

“सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।”

बाली की नम्र वाणी सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसके मस्तक पर अपने करकमलों की स्थापना कर दी।इसका तात्पर्य यह है कि कर्मसिद्धान्त की चाहे जितनी दुहाई दी जाए,किन्तु न्याय और धर्म की दुहाई देने वाला ब्यक्ति भी अंततः,स्वयं अपने लिए दया ही चाहता है।

शरणागति का सिद्धान्त इसी धारणा पर आधारित है।गहराई से बिचार करने पर ब्यक्ति को यह स्पष्ट प्रतीत होने लगता है कि वस्तुतः ब्यक्ति की अपनी कोई भूमिका ही नहीं है।

इसी बात की उलाहना,भक्तों ने प्रभु को तरह-तरह से दिया।

विनयपत्रिका में गोस्वामीजी भी प्रभु से यह प्रश्न करते हुए दिखाई देते हैं कि,”कौन ब्यक्ति दुखी होना चाहता है?यह जानते हुए भी कि विषय-उपभोग का अंतिम परिणाम दुखद है,क्योंकि ब्यक्ति उसका परित्याग नहीं कर पाता है?वे प्रभु से मीठी चुटकी लेते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके पीछे आपकी ही प्रेरणा होती है?--
“दोष-निलय यह विषय सोकप्रद कहत संत श्रुति टेरे।
जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सो,हरि तुम्हरेहि प्रेरे।।(वि.प.-187/3)

दूसरे प्रसंग में भी वे प्रभु को स्नेह- भरा उपालंभ देते हैं कि”प्रभु!! सत्य तो यह है कि चोर और पहरेदार दोनों ही आपके हाथ के यंत्र हैं।

इसलिए दुर्गुणों के संबंध में भी मैं दूसरे से क्या कहूँ?--
“समाचार साथ के अनाथ-नाथ कासो कहौं।
नाथही के हाथ सब चोरऊ पहरू।।”
अगले इसी भाव के निष्कर्षात्मक-प्रवाह में श्रीमद्भावत्गीता में अर्जुन के माध्यम से सृष्टिके इसी द्वंद्वात्मक-विरोधाभाष के संबंध में प्रभु श्रीकृष्ण का समाधान देखें।

प्रिय मित्र दिवाकर मिश्रा की वाल से साभार

आज बस इतना ही--
नमन सबहिं।

23/03/2020

जय रघुनन्दन जय सियाराम ! हे दुखभंजन तुम्हे प्रणाम !!

तुम मेरे सेव्य हो और मैं तुम्हारा सेवक हूं--बस, हम दोनों में यही एक सम्बन्ध अनन्तकाल-पर्यन्त अक्षुण्ण बना रहे। पूरी कर देने को कहो तो दास की एक अभिलाषा और है। वह यह है-

अहं हरे तवपादैकमूल
दासानुदासो भवितास्मि भूयः।
मनः स्मरेताऽसुपतेर्गुणानां
गृणीत वाक्‌ कर्मकरोतु कायः॥

अर्थात्‌, हे भगवन्‌ ! मैं बार बार तुम्हारे चरणारविन्दों के सेवकों का ही दास होऊँ । हे प्राणेश्‍वर! मेरा मन तुम्हारे गुणोंका स्मरण करता रहे। मेरी वाणी तुम्हारा कीर्तन किया करे। और, मेरा शरीर सदा तुम्हारी सेवामें लगा रहे।

किसी भी योनिमें जन्म लूं, ‘त्वदीय’ ही कहा जाऊं, मुझे अपना कहीं और परिचय न देना पड़े। सेवक को इससे अधिक और क्या चाहिये। अन्तमें यही विनय है, नाथ!

अर्थ न धर्म न काम-रुचि, गति न चहौं निर्बान।
जन्म जन्म रति राम-पद, यह बरदान न आन॥
परमानन्द कृपायतन, मन परिपूरन काम।
प्रेम-भगति अनपायनी, देहु हमहिँ श्रीराम॥

------ -तुलसी

क्यों नहीं कह देते, कि ‘एवमस्तु !’

( श्रीवियोगी-हरिजी )
….००४. ०५.मार्गशीर्ष कृष्ण ११सं०१९८६.कल्याण ( पृ० ७५५ )

13/04/2017

. """" *लक्ष्मी*""""
अगर
मेहनत से मिलती, तो *मजदूरों*
के पास क्यों नही..?
बुद्धि से मिलती तो,
*चालाक और चतुरों*
के पास क्यों नही..?
ताकत से मिलती तो,
*पहलवानों*
के पास क्यों नही...
*लक्ष्मी सिर्फ "पुण्य" से मिलती है और पुण्य केवल "धर्म" "कर्म" "निःस्वार्थ सेवा"से ही मिलता है*

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