23/03/2020
कर्म सिद्धान्त बनाम शरणागति सिद्धान्त,सूक्ष्म चिंतन,सतत अनुकरणीय!!!!!!!!!!!!!!
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शरणागति की मूल धारणा क्या है?कालिय नाग की पत्नियों ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा कि”आपका अवतार तो दुष्टों को दंड देने के लिए ही हुआ है।इसलिए आपने हमारे पति को दंड देकर सर्वथा उपयुक्त कार्य ही किया।
”स्वयं भगवान ने कहा है--
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्यस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
धर्म क्या है?इसका वर्णन स्मृतियों में किया गया है।किन्तु प्रश्न यह है कि धर्म का ज्ञान होते हुए भी ब्यक्ति उसे जीवन में क्यों नहीं उतार पाता?अधर्म जानते हुए भीउसका परित्याग क्यों नहीं कर पाता?जैसा दुर्योधन ने कहा कि--
“जानामि धर्मं न च मे प्रबृत्तिः,जानाम्यधर्मं न च मे निबृतिः”
शास्त्रों में बड़े बिस्तार से नरक और उनमें दिए जाने वाले दंडों का वर्णन किया गया है। लोक में भी राजदंड का भय रहता है।इतना होते हुए भी बुराई की समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाता?यह एक जटिल प्रश्न है।शास्त्रों में विविध रूपों में इस के उत्तर दिए गये हैं।
पुनर्जन्म के माध्यम से भी इसी प्रश्न का उत्तर देने की चेष्टा की गयी है।यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब सर्वप्रथम सृष्टि का निर्माण हुआ होगा,तब उस समय बिबिध योनियों का प्राकट्य कर्म-सिद्धान्त से कैसे सुसंगत है?
इसलिए पूर्व-पूर्व जन्मों की खोज करते रहने पर यह प्रश्न श्रृंखला समाप्त नहीं होती है।इससे कुछ लोग भले संतुष्ट हो जायँ लेकिन बहुत लोगों को इससे समाधान नहीं मिल पाता। उनको लगता है कि यह उत्तर न देने की चेष्टा है।
कालियनाग ने विनम्रता भरी भाषा में जो प्रश्न प्रभु से किए,वे भी साधारण महत्त्व के नहीं हैं।वह श्रृष्टि के मूल में कर्म की धारणा को स्वीकार नहीं करता।उसका प्रश्न तोयह है कि सृष्टि के वास्तविक निर्माता तो आप ही हैं।बिबिध प्रकार की योनियों काजो निर्माण किया गया है,क्या उसमें कोई भी जीव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है?
यदि सर्प का निर्माण करते हुए आपने उसकी डाढ़ में विष भर दिया है,उसकी प्रकृति को तमोगुणी बना दिया है,तो क्या वह उससे हटकर कुछ करने के लिए स्वतंत्र है?और क्या किसी भी ब्यक्ति के लिए स्वयं के स्वभाव को परिवर्तित कर पाना संभव है?
ऐसी स्थिति में किसी जीव को अपराधी मानकर उसे दंड देना कहाँ तक उचित है?यद्यपिआप दंड देने में या कृपा करने में स्वतंत्र हैं,किन्तु यह निर्णय तो आप ही पर निर्भर है कि जीव को उसके अपराध के लिए दंड क्यों देना चाहिए?कालिय नाग के इस प्रश्न का कोई उत्तर प्रभु के द्वारा नहीं दिया गया।
वस्तुतः इन विचारों/पद्धतियों का विभाजन करें,तो जहाँ कर्म सिद्धान्तवादी,जीव को कर्म करने में स्वतंत्र मानता हुआ सा प्रतीत होता है,वहाँ वेदान्तवादी की दृष्टि में कर्म और कर्म फल का प्रश्न ही सृष्टि के मिथ्यात्व के कारण ब्यर्थ है।भक्तों ने एक मध्यम मार्ग चुना है।
वे मानते हैं कि जीव अपनी त्रुटियों के कारण असद् कार्य करता है।किन्तु प्रभु उसे कर्म फल से मुक्ति देते हैं।कालियनाग ने शरणागति की जिस मूल धारणा की ओर संकेत किया, उसमें जीव कहीं से भी रंचमात्र कर्म करने में स्वतंत्र नहीं है।वह पूरी तरह से असंदिग्ध रूप में पराधीन(ईश्वराधीन) है।ईश्वर ही उससे जो कुछ करा रहा है,वह कर रहा है।और इसलिए वह दंड देने के लिए प्रस्तुत ईश्वर को उलाहना देता है।
रामचरितमानस के विविध प्रसंगों में यह बात दुहराई गयी है।बालिबध के पश्चात भगवान राम सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य देते हैं और साथ में यह आदेश भी देते हैं कि अंगद के साथ राज्य चलाते हुए वे जनकनंदिनी का पता लगाना ना भूलें--
“अंगद सहित करहु तुम्ह राजू।संतत हृदय धरेहु मम काजू।।”
किन्तु सुग्रीव राजसत्ता और भोगों में पूरी तरह डूब गये।श्रीसीताजी का पता लगाना तो दूर,कई महीनों तक प्रभु से मिलने नहीं आए।प्रभु घोषित करते हैं कि जिस बाण से बालि का बध किया था,उसी से कल सुग्रीव का बध करेंगे--
“जेहिं सायक मारा मैं बाली।तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।”
और लक्ष्मणजी से कहा कि उसका बध करने की आवश्यकता नहीं है,वह डरपोक है,उसे
डराकर मेरे पास ले आओ।लक्ष्मणजी,किष्किंधा की ओर प्रस्थान करते हैं।
सुग्रीव ने श्रीराम को प्रसन्न करने के लिए आंजनेय का आश्रय लिया।हनुमानजी की विनती से लक्ष्मणजी संतुष्ट होकर सुग्रीव को लेकर श्री रामभद्र के पास आते हैं।उस समय सुग्रीव ने प्रभु से जो वाक्य कहे,वे किसी न किसी रूप में कालियनाग के वाक्यों से मिलते जुलते ही हैं----
“अतिसय प्रबल देव तव माया।छूटइ राम करहु जौं दाया।।
विषय वस्य सुर नर मुनि स्वामी।मैं पाँवर पशु कपि अति कामी।।
नारि नयन सर जाहि न लागा।घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।
लोभ पास जेहि गर न बधाया।सो नर तुम्ह समान रघुराया।।
यह गुन साधन ते नहिं होई।तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।।
तब रघुपति बोले मुसुकाई।तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।”
बहिरंग दृष्टि से प्रसंग चाहे जितना सरल प्रतीत होता हो,पर इसमें जो सैद्धान्तिक प्रश्न किए गये हैं,वे अपने आप में अत्यंत गंभीर व विचारणीय हैं।एक दृष्टि वह है,जिसका संकेत गोस्वामीजी ने विनयपत्रिका में किया है।वे स्वयं अपनी तुलना सुग्रीव से करते हैं,जो कर्म-रूप बालि से संत्रस्त है--
“करम-कपीस बालि-बली,त्रास-त्रस्यो हौं।
चाहत अनाथ-नाथ!!तेरी बाँह बस्यो हौं।।
प्रारंभ में बालि, सुग्रीव के प्रति सदय था।किन्तु क्रुद्ध होने पर वह उसका सर्वस्व छीन लेता है।सुग्रीव उसके भय से सर्वत्र भागता फिरता है।
यही तो कर्म की स्थिति है।कर्म जब अनुकूल होता है,तो सब कुछ दे देता है और प्रतिकूल होने पर सब कुछ छीन लेने में भी देर नहीं करता।
भय से संत्रस्त,सुग्रीव जहाँ जाता है,बालि उसके पीछे पड़ जाता है।यह भी जीवन का सहज सत्य है।भले ही ब्यक्ति किसी देश में क्यों न चला जाय,प्रारब्ध तो उसका पीछा करता ही है।इस कर्मत्रास से मुक्त करने वाला कोई भी ब्यक्ति उसे दिखाई नहीं देता।
बालि के संदर्भ में तो यह प्रसिद्ध है कि उसने रावण को परास्त कर उसे छः महीने तक अपनी बगल में दबाये रखा।इसका भी तात्पर्य यही है कि सबको परास्त करने की क्षमता वाला रावण भी कर्म के समक्ष पराजित हो जाता है।ऐसे शक्तिशाली कर्म(प्रारब्ध) से मुक्ति तो एकमात्र प्रभु की कृपा ही दिला सकती है।
सुग्रीव,आंजनेय के रूप में संत के माध्यम से प्रभु का सख्य पाने में सक्षम होते हैं। बालि का बध तो केवल प्रभु के द्वारा ही होता है।किन्तु उसके अंतराल में आने वाली यह गाथा सांकेतिक अर्थों वाली है।
जब बालि पर प्रहार करने के बाद प्रभु उसके समक्ष आकर खड़े हो जाते हैं,तब वह रामभद्र से यही प्रश्न करता है कि--
“धर्म हेतु अवतरेउ गोसाईं।मारेहु मोहिं ब्याध की नाईं।।”
मानो कर्म का मापदंड कठोर है कि वह मनुष्य के रूप में ईश्वर के कार्य में भी त्रुटि निकाल लेता है।तब भला कोई ब्यक्ति यह दावा कैसे कर सकता है कि उसके कर्म में कोई दोष नहीं होगा?
किन्तु प्रभु का उत्तर और भी ब्यंग्यात्मक था।प्रभु ने बालि के आचरण की ओर इंगित करते हुए उससे पूछा कि-”क्या तुमने अपने आचरण पर दृष्टि डाली?अनुज-बधू का अपहरण कर तुमने उसे अपनी पत्नी बना डाला।तो क्या तुम्हारा यह आचरण धर्म- संगत था?”
“अनुजबधू भगिनी सुतनारी।सुनु सठ कन्या सम ये चारी।।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई।ताहि बधे कछु पाप न होई।।”
प्रभु का अभिप्राय यह था कि “जब तुम स्वयं स्वीकार करते हो कि मेरे अवतार का उद्देश्य धर्म की रक्षा है,तो तुम्हारे धर्म के विपरीत आचरण के लिए तुम्हें दंड देकर तो मैं अपने अवतार का उद्देश्य ही पूरा कर रहा हूँ।”
बन्धुगण!!एकाग्रता से देखें-ईश्वर को कर्म की सीमाओं से मुक्त माना गया है। वह सर्वतंत्र स्वतंत्र है। किन्तु जब वह ब्यक्ति के रूप में कोई क्रिया-कलाप करता है,तो उसके कार्यों को किस कसौटी पर कसा जाये?
यही कर्म सिद्धान्त की जटिलता है।अभी कुछ दिनों पहले विद्वान अनुज श्री राजनाथ तिवारीजी ने प्रभु श्रीराम द्वारा श्रीसीताजी के परित्याग का प्रश्न उठाया था।उसमें भी कुछ ऐसी ही अनुभूति हमें हुयी थी।इसका तात्पर्य यह भी है कि स्वयं को कर्मफलदाता मानने वाला ईश्वर भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसमें कोई त्रुटि होगी ही नहीं।
इसका एक अनोखा दृष्टांत “मांडब्य ऋषि” के प्रसंग में प्राप्त होता है।इन्हीं मांडब्य ऋषि के श्राप से धर्मराज को दासीपुत्र विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था।कथा इस प्रकार है।
राजा ने निरपराधी मांडब्य ऋषि को नुकीले शूल पर बैठा कर दंडित करने का आदेश दिया और उन्हें उस शूल पर बैठने के लिए बाध्य किया गया।
क्रुद्ध ऋषि मांडब्य ने धर्मराज का आह्वान कर उनसे यह प्रश्न किया कि”मुझे निर्दोष होते हुए भी यह दंड क्यों भोगना पड़ रहा है?उस समय धर्मराज ने उत्तर देते हुए बताया कि, “बाल्यावस्था में आपने खेल-खेल में एक नुकीले काँटे से किसी कीड़े को बींध दिया था,यह दंड आपके उसी कर्म का परिणाम है।”मांडब्य ने धर्मराज को फटकारते हुए कहा कि,“एक अबोध बालक को उसके कर्म का परिणाम देना क्या न्यायसंगत है?तुम स्वयं ही धर्मज्ञान शून्य हो,अतः मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि दासीपुत्र के रूप में तुम्हें मृत्युलोक में जन्म लेना होगा और अपने अविचार का परिणाम भोगने के पश्चात ही तुम पुनः अपने रूप में प्रतिष्ठित हो सकोगे।
इस कथा का निष्कर्ष विद्वज्जन!!बहुत गंभीर और समझने योग्य है कि धर्म के द्वारा भी धर्म की ब्याख्या में त्रुटि हो सकती है।और यदि कर्मफल अनिवार्य है,तो वह भी दंड का पात्र बन सकता है।कर्मसिद्धान्त से जुड़ी जिन समस्याओं का वर्णन शास्त्रों में किया गया है,वे इतना आतंकित करने वाली हैं कि ब्यक्ति यह कल्पना नहीं कर सकता कि कर्म-दोषरहित भी कोई हो सकता है?इसे अनिवार्य रूप से स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कर्मचक्र से मुक्त हो पाना कभी किसी ब्यक्ति के लिए संभव नहीं है।कर्मफल की यही जटिलता ब्यक्ति को भगवत्भक्ति की ओर अभिमुख करती है।
अंततोगत्वा बालि को भी दया का ही आश्रय लेना पड़ा।जब वह अपने कर्मों का समर्थन नहीं कर सका,तब वह प्रभु के समक्ष विनम्र होकर स्वीकार करता है कि”मेरी चतुराई नहीं चली।पर मैंने सुना है कि आपके समक्ष आते ही जीव के समस्त पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। तो क्या आपके सन्मुख होते हुए भी मैं अब भी पापी ही बना हुआ हूँ?
“सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।”
बाली की नम्र वाणी सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसके मस्तक पर अपने करकमलों की स्थापना कर दी।इसका तात्पर्य यह है कि कर्मसिद्धान्त की चाहे जितनी दुहाई दी जाए,किन्तु न्याय और धर्म की दुहाई देने वाला ब्यक्ति भी अंततः,स्वयं अपने लिए दया ही चाहता है।
शरणागति का सिद्धान्त इसी धारणा पर आधारित है।गहराई से बिचार करने पर ब्यक्ति को यह स्पष्ट प्रतीत होने लगता है कि वस्तुतः ब्यक्ति की अपनी कोई भूमिका ही नहीं है।
इसी बात की उलाहना,भक्तों ने प्रभु को तरह-तरह से दिया।
विनयपत्रिका में गोस्वामीजी भी प्रभु से यह प्रश्न करते हुए दिखाई देते हैं कि,”कौन ब्यक्ति दुखी होना चाहता है?यह जानते हुए भी कि विषय-उपभोग का अंतिम परिणाम दुखद है,क्योंकि ब्यक्ति उसका परित्याग नहीं कर पाता है?वे प्रभु से मीठी चुटकी लेते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके पीछे आपकी ही प्रेरणा होती है?--
“दोष-निलय यह विषय सोकप्रद कहत संत श्रुति टेरे।
जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सो,हरि तुम्हरेहि प्रेरे।।(वि.प.-187/3)
दूसरे प्रसंग में भी वे प्रभु को स्नेह- भरा उपालंभ देते हैं कि”प्रभु!! सत्य तो यह है कि चोर और पहरेदार दोनों ही आपके हाथ के यंत्र हैं।
इसलिए दुर्गुणों के संबंध में भी मैं दूसरे से क्या कहूँ?--
“समाचार साथ के अनाथ-नाथ कासो कहौं।
नाथही के हाथ सब चोरऊ पहरू।।”
अगले इसी भाव के निष्कर्षात्मक-प्रवाह में श्रीमद्भावत्गीता में अर्जुन के माध्यम से सृष्टिके इसी द्वंद्वात्मक-विरोधाभाष के संबंध में प्रभु श्रीकृष्ण का समाधान देखें।
प्रिय मित्र दिवाकर मिश्रा की वाल से साभार
आज बस इतना ही--
नमन सबहिं।