Shri Vidya Ashram

Shri Vidya Ashram ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

आज हमारा हिन्दू धर्म एक ऐसा धर्म बन गया है जहा हिन्दू एक दुसरे का ही गला काटने में आगे रह रहे हैं, पहले कुछ पाखंडियों और नेताओ जो किसी न किसी धर्म विशेष के पालनहार बने फिर रहे थे उनकी बातो में आकार बँटे और कमोबेश आज वो स्थिति और भी भयावह हो चुकी है जो घृणा का बिज कल बोया गया था आज उस बिज ने एक विकराल पेंड का रूप ले लिया है.....पूरा हिन्दू समाज इतना बिखर गया है की उसको बटोरना बहुत ही मुश्किल हो र

हा है या अगर व्यावहारिक शब्दों में बोलें तो खाई इतनी बड़ी हो गई की कोई मिटटी इसको भर नहीं पा रही है या कहे तो भर ही नहीं पायेगी अगर हम नहीं जागे तो.....अब एक बहुत ही बिकट सवाल उठता है की आखिर हिंदुवो को ही क्यों तोडा गया टुकडो में....किसको लाभ मिलने वाला था इस कृत्या से या किसको लाभ मिला.....क्युकी कुछ लोग जो यहाँ तक की मुस्लिम भी थे वो पंडित लगा कर आए और दिखावा पंडित वाद का किया पर हाँ काम कुछ नहीं किया पर उस बात को समझा कौन......कोई भी नहीं , ये समझना जरुरी हो गयी भारतीय संस्क्रति , सनातन धर्म , भारतीय जनता उसकी मर्यादा के लिए कोन खतरनाक है और कोन दोषी है ..

Shivratri ki Hardik shubhkamnayein
15/02/2026

Shivratri ki Hardik shubhkamnayein

हम जल्द ही आपकी सेवा में उपस्थित होंगे
12/02/2026

हम जल्द ही आपकी सेवा में उपस्थित होंगे

28/01/2026

कृपया ये विडिओ अधिक से अधिक शेयर कीजिए ओर इन राजनेताओ तक ये विडिओ पहुचाए वर्ण व्यवस्था क्यों आवश्यक है ओर जाती ओर वर्ण क्यों बनाए गए थे हमारी सनातन व्यवस्था , ये एक प्रकर्ति ओर समाज मैं संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था है , आज सवर्ण के सब अधिकार छीन कर ये लोग प्रकर्ति ओर समाज का विनाश कर रहे हैं ॥

01/01/2026
24/09/2025

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

22/09/2025

Jai Maa

14/05/2025

राधे राधे बोल ।।

 # # गीता में कर्मयोगगीता में कर्मयोग, जीवन जीने का एक ऐसा मार्ग है जो कर्म के प्रति समर्पण और फल की आसक्ति से मुक्ति पर...
19/04/2025

# # गीता में कर्मयोग

गीता में कर्मयोग, जीवन जीने का एक ऐसा मार्ग है जो कर्म के प्रति समर्पण और फल की आसक्ति से मुक्ति पर बल देता है। यह योग हमें सिखाता है कि हम अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करें, कर्म के परिणाम की चिंता किए बिना। यह योग हमें सांसारिक बंधनों से मुक्त होने और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।

**कर्मयोग के मुख्य सिद्धांत:**

* **निष्काम कर्म:** कर्मयोग का मूल सिद्धांत निष्काम कर्म है। इसका अर्थ है कर्म करना केवल कर्तव्य समझकर, फल की इच्छा के बिना। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कर्म करना हमारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। फल ईश्वर के हाथ में है।
* **कर्मबंधन से मुक्ति:** फल की आसक्ति ही हमें कर्मबंधन में बांधती है। निष्काम कर्म से हम इस बंधन से मुक्त हो सकते हैं और मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।
* **समर्पण भाव:** कर्मयोग में समर्पण भाव का विशेष महत्व है। सभी कर्म ईश्वर को समर्पित करके करने से अहंकार कम होता है और मन शांत रहता है।
* **स्थितप्रज्ञता:** कर्मयोगी सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समभाव से रहता है। वह परिस्थितियों से विचलित नहीं होता और अपने कर्मपथ पर अडिग रहता है।
* **कर्तव्य पालन:** कर्मयोग हमें अपने धर्म का पालन करने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारा कर्तव्य ही हमारी पूजा है।

**कर्मयोग के लाभ:**

* **मानसिक शांति:** निष्काम कर्म से मन शांत और स्थिर रहता है। चिंता और तनाव से मुक्ति मिलती है।
* **आत्म-विकास:** कर्मयोग आत्म-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। यह हमें अपनी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें विकसित करने में मदद करता है।
* **मोक्ष प्राप्ति:** गीता के अनुसार, कर्मयोग मोक्ष प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है।

**कर्मयोग का अभ्यास:**

कर्मयोग का अभ्यास अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे कार्यों से शुरू किया जा सकता है। हर काम को कर्तव्य समझकर, फल की चिंता किए बिना करना ही कर्मयोग का पहला कदम है। ध्यान, योग और सत्संग भी कर्मयोग के अभ्यास में सहायक होते हैं।

**निष्कर्ष:**

गीता में वर्णित कर्मयोग जीवन जीने की एक व्यावहारिक और प्रभावी पद्धति है। यह हमें कर्म के महत्व को समझाते हुए, फल की आसक्ति से मुक्त होने और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। इस योग को अपनाकर हम एक संतुलित, सार्थक और आनंदमय जीवन जी सकते हैं।

 # # तत्व ज्ञान: एक संक्षिप्त परिचयतत्व ज्ञान, जिसे तत्वमीमांसा या आंटोलॉजी भी कहा जाता है, दर्शनशास्त्र की एक शाखा है ज...
19/04/2025

# # तत्व ज्ञान: एक संक्षिप्त परिचय

तत्व ज्ञान, जिसे तत्वमीमांसा या आंटोलॉजी भी कहा जाता है, दर्शनशास्त्र की एक शाखा है जो अस्तित्व की प्रकृति, वास्तविकता की संरचना, और अस्तित्व के विभिन्न प्रकारों के बीच संबंधों का अध्ययन करती है। यह उन मूलभूत श्रेणियों और अवधारणाओं की पड़ताल करता है जो हमें दुनिया को समझने और उसका वर्णन करने में मदद करती हैं, जैसे कि वस्तुएँ, गुण, संबंध, घटनाएँ, समय, स्थान, और कारणता।

**तत्व ज्ञान के कुछ प्रमुख प्रश्न:**

* क्या वास्तविक है? क्या केवल भौतिक वस्तुएँ वास्तविक हैं, या अमूर्त अवधारणाएँ जैसे संख्याएँ और विचार भी वास्तविक हैं?
* अस्तित्व के विभिन्न प्रकार क्या हैं? क्या केवल एक प्रकार का अस्तित्व है, या कई प्रकार हैं?
* वस्तुओं, गुणों, और संबंधों के बीच क्या संबंध है? क्या गुण वस्तुओं से स्वतंत्र रूप से मौजूद हो सकते हैं?
* परिवर्तन की प्रकृति क्या है? क्या वस्तुएँ समय के साथ अपनी पहचान बनाए रखती हैं, या वे पूरी तरह से नई वस्तुओं में बदल जाती हैं?
* समय और स्थान की प्रकृति क्या है? क्या वे स्वतंत्र संस्थाएँ हैं, या वे वस्तुओं और घटनाओं से जुड़ी हुई हैं?
* कारणता की प्रकृति क्या है? एक घटना दूसरे घटना का कारण कैसे बनती है?

**तत्व ज्ञान के विभिन्न दृष्टिकोण:**

* **भौतिकवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि केवल भौतिक पदार्थ ही वास्तविक है।
* **आदर्शवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि वास्तविकता मूल रूप से मानसिक या आध्यात्मिक है।
* **द्वैतवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि वास्तविकता दो मूलभूत प्रकार के पदार्थों से बनी है, जैसे कि मन और पदार्थ।
* **बहुलवाद:** यह दृष्टिकोण मानता है कि वास्तविकता कई मूलभूत प्रकार के पदार्थों से बनी है।

**तत्व ज्ञान का महत्व:**

तत्व ज्ञान का अध्ययन हमें दुनिया के बारे में हमारे मूलभूत मान्यताओं को समझने और उनका मूल्यांकन करने में मदद करता है। यह हमें अधिक स्पष्ट और सुसंगत तरीके से सोचने और तर्क करने में भी मदद करता है। इसके अलावा, तत्व ज्ञान का अन्य विषयों पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जैसे कि विज्ञान, धर्म, नैतिकता, और राजनीति।

**आगे की पड़ताल:**

तत्व ज्ञान एक जटिल और बहुआयामी विषय है। अधिक जानकारी के लिए, आप निम्नलिखित विषयों का अध्ययन कर सकते हैं:

* प्लेटो का आदर्शवाद
* अरस्तू का पदार्थवाद
* देकार्त का द्वैतवाद
* कांट की आलोचनात्मक दर्शन
* हाइडेगर की अस्तित्ववादी आंटोलॉजी

यह एक संक्षिप्त परिचय मात्र है। आपको अपनी रूचि के अनुसार और गहराई से इस विषय का अध्ययन करना चाहिए।

 # # 36 तत्त्व: शैव दर्शन का आधारशैव दर्शन, विशेष रूप से कश्मीरी शैव दर्शन, 36 तत्त्वों पर आधारित एक गहन दार्शनिक प्रणाल...
18/04/2025

# # 36 तत्त्व: शैव दर्शन का आधार

शैव दर्शन, विशेष रूप से कश्मीरी शैव दर्शन, 36 तत्त्वों पर आधारित एक गहन दार्शनिक प्रणाली है। ये तत्त्व सृष्टि की उत्पत्ति, विकास और प्रलय की व्याख्या करते हैं। इन्हें पाँच समूहों में विभाजित किया जा सकता है:

**1. शुद्ध तत्त्व (शिव तत्त्व):**

* **शिव:** परम चेतना, शुद्ध चैतन्य, आनंद स्वरूप। यह सृष्टि का आधार और अंतिम लक्ष्य है।
* **शक्ति:** शिव की क्रिया शक्ति, जो सृष्टि, पालन और संहार का कार्य करती है।
* **सदाशिव:** शिव और शक्ति का मिलन, परम आनंद की अनुभूति।
* **ईश्वर:** सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान, सृष्टि का नियंता।
* **शुद्ध विद्या:** ईश्वर का ज्ञान, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

**2. विद्या तत्त्व (पंच कञ्चुक):**

ये पाँच आवरण हैं जो आत्मा को परम चेतना से अलग करते हैं:

* **कला:** सीमितता का आवरण।
* **विद्या:** अज्ञान का आवरण।
* **राग:** आसक्ति का आवरण।
* **काल:** समय का आवरण।
* **नियम:** नियति का आवरण।

**3. मंत्र तत्त्व (पंच मंत्र):**

ये पाँच मंत्र आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होते हैं:

* **ईशान:** क्रिया शक्ति का मंत्र।
* **तत्पुरुष:** ज्ञान शक्ति का मंत्र।
* **अघोर:** इच्छा शक्ति का मंत्र।
* **वामदेव:** क्रिया शक्ति का मंत्र।
* **सद्योजात:** आनंद शक्ति का मंत्र।

**4. प्रकृति तत्त्व (प्रकृति और विकृतियाँ):**

* **प्रकृति:** जड़ पदार्थ का मूल तत्व, जिसमें सत्व, रजस और तमस तीन गुण होते हैं।
* **महत:** बुद्धि, निर्णय लेने की क्षमता।
* **अहंकार:** अहं भाव, व्यक्तिगत पहचान।
* **पंच तन्मात्राएँ:** शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के सूक्ष्म तत्व।
* **पंच महाभूत:** आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।

**5. पुरुष तत्त्व (आत्मा):**

यह चेतन तत्व है, जो प्रकृति से बंधा हुआ संसार में भटकता रहता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए इसे प्रकृति के बंधन से मुक्त होना आवश्यक है।

**36 तत्त्वों का महत्व:**

ये 36 तत्त्व संसार की रचना और उसके कार्य करने के तरीके को समझने में मदद करते हैं। ये आत्मा की यात्रा को परम चेतना तक पहुँचने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं। इन तत्त्वों का ज्ञान आध्यात्मिक साधना और मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक माना जाता है।

**सारांश:**

36 तत्त्व शैव दर्शन का मूल आधार हैं, जो सृष्टि के रहस्यों को उजागर करते हैं और आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। इन तत्त्वों का अध्ययन और चिंतन आध्यात्मिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

 # # काल सर्प दोष शांति पूजाकाल सर्प दोष, ज्योतिष शास्त्र में वर्णित एक महत्वपूर्ण दोष है, जिसके बारे में माना जाता है क...
18/04/2025

# # काल सर्प दोष शांति पूजा

काल सर्प दोष, ज्योतिष शास्त्र में वर्णित एक महत्वपूर्ण दोष है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह व्यक्ति के जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। इस दोष के निवारण हेतु काल सर्प दोष शांति पूजा का विधान है।

**काल सर्प दोष के लक्षण:**

* बार-बार स्वप्नदोष होना
* मानसिक अशांति और चिंता
* व्यापार में हानि
* संतान प्राप्ति में देरी या समस्या
* शिक्षा में बाधा
* अकारण भय और चिड़चिड़ापन
* विवाह में देरी या वैवाहिक जीवन में कलह
* स्वास्थ्य समस्याएं

**काल सर्प दोष शांति पूजा विधि:**

काल सर्प दोष शांति पूजा एक विस्तृत प्रक्रिया है जिसे किसी योग्य और अनुभवी पंडित द्वारा करवाना चाहिए। पूजा के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:

1. **संंकल्प:** पूजा का शुभारंभ संकल्प के साथ होता है, जिसमें पूजा का उद्देश्य, पूजाकर्ता का नाम, गोत्र आदि का उच्चारण किया जाता है।
2. **गणेश पूजन:** सभी शुभ कार्यों की शुरुआत गणेश पूजन से होती है।
3. **नवग्रह पूजन:** नौ ग्रहों की पूजा की जाती है।
4. **काल सर्प यंत्र स्थापना:** काल सर्प यंत्र की स्थापना और पूजा की जाती है।
5. **रुद्राभिषेक:** शिव का रुद्राभिषेक किया जाता है, जिसमें दूध, दही, घी, शहद, शक्कर आदि का प्रयोग होता है।
6. **नाग देवता पूजन:** नाग देवता की पूजा की जाती है और उन्हें दूध, फूल, धूप आदि अर्पित किए जाते हैं।
7. **मंत्र जाप:** काल सर्प दोष निवारण मंत्रों का जाप किया जाता है।
8. **हवन:** हवन कुंड में आहुतियां दी जाती हैं।
9. **दान:** ब्राह्मणों को दान दिया जाता है, जिसमें कपड़े, अनाज, धन आदि शामिल हो सकते हैं।
10. **आरती और प्रसाद:** अंत में आरती की जाती है और प्रसाद वितरित किया जाता है।

**पूजा के लिए आवश्यक सामग्री:**

पूजा के लिए आवश्यक सामग्री में शामिल हो सकते हैं:

* काल सर्प यंत्र
* नाग देवता की मूर्ति या चित्र
* शिवलिंग
* पूजा की थाली, दीपक, धूप, अगरबत्ती, फूल, फल, मिठाई, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, चंदन, रोली, अक्षत आदि।

**पूजा का महत्व:**

काल सर्प दोष शांति पूजा से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है। यह पूजा व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

**ध्यान रखें:**

यह जानकारी केवल सामान्य ज्ञान के लिए है। काल सर्प दोष शांति पूजा एक जटिल प्रक्रिया है, जिसे किसी योग्य और अनुभवी पंडित के मार्गदर्शन में ही करवाना चाहिए। पूजा की विधि और सामग्री क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार भिन्न हो सकती है। पंडित जी से परामर्श करके ही पूजा की विधि और सामग्री का निर्धारण करें।

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