26/05/2026
#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य
#दसवाँ_अध्याय
ऋषि कहने लगे-हे सुन्दरी ! अब से तीसरा मास पुरुषोत्तम आयेगा, उसमें स्नान करने से मनुष्य दोषों से छूट जात है। इसके तुल्य कार्तिकादि कोई भी मार नहीं है। सब मास तथा पक्ष और भी जे पर्व हैं पुरुषोत्तम मास की सोलहवं कला के बराबर भी नहीं है। बारह हजा वर्ष गंगा में स्नान करने से जो फल् मिलता है और सिंह के बृहस्पति में गोदावरी गंगा में स्नान करने से जो फल्ल मिलता है, वही फल कहीं भी पुरुषोत्तम् मास में एक बार स्नान करने से प्राप्त हो जाता है। यह श्रीकृष्ण का प्रिय मास है। इसमें स्नान, दान, जपादि करने से सब मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है इसलिये तुम भी पुरुषोत्तम मास की सेवा करो।
मुनिराज कन्या को ऐसे वचन कहकर चुप हो गये। श्रीकृष्ण कहने लगे- हे अर्जुन ! मुनि के वचन सुनकर, भावों से प्रेरित होकर वह मूढ़ बाला क्रोधित होकर बोली-हे ब्राह्मन् ! मुझको आपके वचन ठीक नहीं लगे। माघादि मास किस प्रकार थोड़ा फल देने वाले हैं और कार्तिकादि मास को कैसे कम कहते हो? क्या सेवा किया हुआ वैशाख मास इच्छित फल नहीं देता? यह तो मलमास सब कर्मों में निंदित है। हे मुने ! सूर्य संक्रांति से रहित मलमास को आप कैसे श्रेष्ठ कह सकते हैं? इस प्रकार क्रोध से कहे गये ब्राह्मण की पुत्री के वचनों को सुनकर, ऋषि का शरीर जलने लगा और क्रोध से नेत्र लाल हो गये। परन्तु फिर भी मित्र की कन्या को श्राप नहीं दिया और सोचने लगे कि कन्या मूर्ख हैं, अपने हित अहित को नहीं जानती पुरुषोत्तम का महात्म्य जो बड़े-बड़े ज्ञानी भी नहीं जानते तो कम बुद्धि वाले पुरुष और कन्यायें कैसे जान सकती हैं और यह बिना पिता की कन्या, दुःख रूपी अग्नि से सुलगती हुई, मेरे अत्यन्त उग्र श्राप को कैसे सहन कर सकेगी। ऐसे उत्पन्न हुए क्रोध को दूर करते हुए और स्वस्थ होकर व्याकुल कन्या से कहने लगे-तू दुःखी और नादान है, इसलिये तेरे पर मेरा कुछ भी कोप नहीं, जैसा तेरे निर्भाग्य मन में हो वैसा ही कर और भी जो कुछ होने वाला है सो सुन। मैं कहता हूँ, तूने जो पुरुषोत्तम मास का अनादर किया है, इसका फल इस जन्म या अगले जन्म में अवश्य होना चाहिए। क्योंकि तेरा पिता मेरा मित्र था इसलिये तुझको श्राप नहीं देता हूँ कि तू बालक है और अपने शुभ तथा अशुभ को नहीं पहचानती। तेरा कल्याण हो, मैं तो नारायण की सेवा में जाता हूँ।
श्रीकृष्ण कहने लगे कि ऐसा कहकर वह महाक्रोधी तपस्वी मुनि झटपट चले गये और उसी क्षण वह कन्या पुरुषोत्तम के प्रभाव से कान्तिहीन हो गई और अपने मन में विचार करने लगी कि तत्काल फल देने वाले पार्वती पति श्री शंकर की आराधना करूँगी। ऐसा निश्चय करके अपने आश्रम में जाकर वह कठिन तप करने की इच्छा करने लगी। सूत जी कहने लगे-वह बाला प्रबल मुनि के वचनों को निंदित कर तथा बहुत फल वाले विष्णु और सावित्री पति ब्रह्मा को छोड़कर अपने वन आश्रम में केवल शंकर भगवान की सेवा करने लगी।