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 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #दसवाँ_अध्यायऋषि कहने लगे-हे सुन्दरी ! अब से तीसरा मास पुरुषोत्तम आयेगा, उसमें स्नान करने से मन...
26/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#दसवाँ_अध्याय

ऋषि कहने लगे-हे सुन्दरी ! अब से तीसरा मास पुरुषोत्तम आयेगा, उसमें स्नान करने से मनुष्य दोषों से छूट जात है। इसके तुल्य कार्तिकादि कोई भी मार नहीं है। सब मास तथा पक्ष और भी जे पर्व हैं पुरुषोत्तम मास की सोलहवं कला के बराबर भी नहीं है। बारह हजा वर्ष गंगा में स्नान करने से जो फल् मिलता है और सिंह के बृहस्पति में गोदावरी गंगा में स्नान करने से जो फल्ल मिलता है, वही फल कहीं भी पुरुषोत्तम् मास में एक बार स्नान करने से प्राप्त हो जाता है। यह श्रीकृष्ण का प्रिय मास है। इसमें स्नान, दान, जपादि करने से सब मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है इसलिये तुम भी पुरुषोत्तम मास की सेवा करो।

मुनिराज कन्या को ऐसे वचन कहकर चुप हो गये। श्रीकृष्ण कहने लगे- हे अर्जुन ! मुनि के वचन सुनकर, भावों से प्रेरित होकर वह मूढ़ बाला क्रोधित होकर बोली-हे ब्राह्मन् ! मुझको आपके वचन ठीक नहीं लगे। माघादि मास किस प्रकार थोड़ा फल देने वाले हैं और कार्तिकादि मास को कैसे कम कहते हो? क्या सेवा किया हुआ वैशाख मास इच्छित फल नहीं देता? यह तो मलमास सब कर्मों में निंदित है। हे मुने ! सूर्य संक्रांति से रहित मलमास को आप कैसे श्रेष्ठ कह सकते हैं? इस प्रकार क्रोध से कहे गये ब्राह्मण की पुत्री के वचनों को सुनकर, ऋषि का शरीर जलने लगा और क्रोध से नेत्र लाल हो गये। परन्तु फिर भी मित्र की कन्या को श्राप नहीं दिया और सोचने लगे कि कन्या मूर्ख हैं, अपने हित अहित को नहीं जानती पुरुषोत्तम का महात्म्य जो बड़े-बड़े ज्ञानी भी नहीं जानते तो कम बुद्धि वाले पुरुष और कन्यायें कैसे जान सकती हैं और यह बिना पिता की कन्या, दुःख रूपी अग्नि से सुलगती हुई, मेरे अत्यन्त उग्र श्राप को कैसे सहन कर सकेगी। ऐसे उत्पन्न हुए क्रोध को दूर करते हुए और स्वस्थ होकर व्याकुल कन्या से कहने लगे-तू दुःखी और नादान है, इसलिये तेरे पर मेरा कुछ भी कोप नहीं, जैसा तेरे निर्भाग्य मन में हो वैसा ही कर और भी जो कुछ होने वाला है सो सुन। मैं कहता हूँ, तूने जो पुरुषोत्तम मास का अनादर किया है, इसका फल इस जन्म या अगले जन्म में अवश्य होना चाहिए। क्योंकि तेरा पिता मेरा मित्र था इसलिये तुझको श्राप नहीं देता हूँ कि तू बालक है और अपने शुभ तथा अशुभ को नहीं पहचानती। तेरा कल्याण हो, मैं तो नारायण की सेवा में जाता हूँ।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि ऐसा कहकर वह महाक्रोधी तपस्वी मुनि झटपट चले गये और उसी क्षण वह कन्या पुरुषोत्तम के प्रभाव से कान्तिहीन हो गई और अपने मन में विचार करने लगी कि तत्काल फल देने वाले पार्वती पति श्री शंकर की आराधना करूँगी। ऐसा निश्चय करके अपने आश्रम में जाकर वह कठिन तप करने की इच्छा करने लगी। सूत जी कहने लगे-वह बाला प्रबल मुनि के वचनों को निंदित कर तथा बहुत फल वाले विष्णु और सावित्री पति ब्रह्मा को छोड़कर अपने वन आश्रम में केवल शंकर भगवान की सेवा करने लगी।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #नवाँ_अध्यायसूत जी कहने लगे कि इसके बाद नारद जी विस्मय युक्त हो मेधावी ऋषि की कन्या का वृतान्त ...
25/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#नवाँ_अध्याय

सूत जी कहने लगे कि इसके बाद नारद जी विस्मय युक्त हो मेधावी ऋषि की कन्या का वृतान्त पूछने लगे। नारद जी ने पूछा-हे प्रभो ! फिर उस ऋषि कन्या ने वन में क्या किया, क्या किसी ऋषि ने उसके साथ विवाह किया? नारायण कहने लगे-इस कन्या ने दुःख के साथ अपने पिता का स्मरण करते हुए वहाँ आश्रम में रहकर कुछ काल व्यतीत किया। भाग्यवश एक दिन उस वन में अपनी इच्छा से विचरण करते महाकोप वाले दुर्वासा मुनि आ गये। आश्रम में मुनि को आता हुआ देखकर शोक सागर में डूबी हुई उस कुमारी ने उठकर, धीरज धारण करके मुनि के चरणों में नमस्कार किया। नमस्कार करके मुनि को अपने आश्रम में लाई। अर्घ्य, पाद्य और वन के नाना प्रकार के फलों से आदर करके मुनि का पूजन किया। फिर मुनि कन्या आदर से कहने लगी-हे मुने ! आप को नमस्कार है। मुझ दुर्भागिनी के आश्रम में आपका कैसे आना हुआ? आपके आने से मेरे भाग्य का उदय हो गया। अथवा मेरे पिता के पुण्य प्रताप से मुझको समझाने के लिए आप आये हैं। आप जैसे महात्माओं के तीर्थरूपी पाँवों के रजकण को स्पर्श कर मेरा जन्म सफल हो गया जो आप जैसे महात्माओं का मुझको दर्शन हुआ।

इस प्रकार कहकर यह बाला उनके आगे चुपचाप होकर बैठ गई, तब दुर्वासा मुनि कुछ हँसकर बोले-धन्य धन्य हे ब्राह्मण पुत्री ! तुमने अपने पिता के कुल का उद्धार कर दिया है। कन्या बोली-हे मुनि ! आपके वचनों को सुनकर मेरा दुःख दूर हो गया। हे मुने ! आप कृपा कर ऐसा उपाय बतलावे जिससे मेरा दुःख दूर हो मैं दुःख शोक में अग्नि की ज्वाला में जल रही हूँ इसको शीघ्र बुझाओ। मेरे हर्ष उपजाने वाला और कोई नहीं दिखाई देता, मुझको धैर्य देने वाली न तो मेरी माता है, न पिता, न भाई। मैं दुःख पीड़ित किस प्रकार जीवन नेर्वाह करूँ ? जिस दिशा को देखती हूँ वहीं अन्धकार दिखाई देता है। अतः हे तपोनिधे ! मेरे दुःख को दूर करने का उपाय जल्दी करिये। ऐसा कहकर वह बाला उनके आगे बैठ गई। दुर्वासा मुनि उसके उपाय के वास्ते सोचने लगे। श्री नारायण कहने लगे-हे नारद ! इस प्रकार मुनि कन्या के वचनों को सुनकर मुनि दुर्वासा विचार कर, अत्यन्त कृपा करके इस बाला को देखकर कुछ हितकारक वचन बोले।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #आठवाँ_अध्यायसूत जी कहने लगे कि हे तपोधनो ! भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के वचन सुनकर नारद जी अत्य...
24/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#आठवाँ_अध्याय

सूत जी कहने लगे कि हे तपोधनो ! भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के वचन सुनकर नारद जी अत्यन्त प्रसन्न हुये, परन्तु फिर भी प्रश्न करने लगे। नारद जी कहने लगे-हे प्रभो ! लक्ष्मीपति जब बैकुण्ठ को चले गये फिर क्या हुआ वह सब कृपा करके मुझसे कहिये। हरि का वृत्तान्त सबके लिए हितकारक है। ऐसे प्रश्न से प्रसन्न होकर श्रीनारायण जगत को आनन्द देने वाले वचन- श्रीनारायण कहने लगे-हे नारद ! जब लक्ष्मीपति बैकुण्ठ चले गये तो अधिक मास को अपने धाम में अपने पास बुलाया। वहाँ बैकुण्ठ में बसकर अधिक मास अत्यन्त आनन्द करने लगा और भगवान के साथ क्रीड़ा करने लगा। श्रीकृष्ण ने मन से प्रसन्न होकर मल मास को बारह मासों में श्रेष्ठ कर दिया और सबका प्रिया बना दिया।

इस प्रकार भक्त वत्सल भगवान युधिष्ठिर और द्रौपदी को कृपा से देखते हुए अर्जुन से बोले हे राजसिंह ! दुःख में डूबे होने के कारण तुमने तपोवन में आये पुरुषोत्तम का आदर नहीं किया और वृन्दावनचन्द्र का प्रिय मास, आपके वन में रहने से, अनजाने से चला गया। भय से दुःखित मन वाले भीष्म, द्रोण भी नहीं जान पाये और भय के द्वेष से तुमने नहीं जाना, वेद व्यास जी से प्राप्त विद्या, आराधना में लगे रहे। भयंकर युद्ध शाली अर्जुन इन्द्रप्रस्थ गए और उसके दुःख से दुःखित आप लोगों में नहीं जाना। अतः अब क्या करना चाहिये? मनुष्य को प्रारब्ध भोग अवश्य भोगना पड़ता है। मनुष्य प्रारम्भ से ही सुख, दुःख भय और आनन्द को प्राप्त होता है। अतः सदा भाग्य पर ही भरोसा रखो।

हे महाराज ! अब आपके दुःख का दूसरा कारण कहता हूँ। इतिहास पूर्वक इस कथा को अच्छी तरह श्रवण करो। कृष्ण कहने लगे-यह द्रौपदी पूर्व जन्म में महाभाग्यशाली ब्राह्मण की पुत्री थी। कुछ काल व्यतीत होने पर बारह वर्ष की हो गई। अपने पिता की यह एक ही पुत्री थी और बड़ी चतुर, गुणवती और सुन्दरी होने का कारण यह पिता को अत्यन्त प्रिय थी। यह पड़ोसन सखियों, का सुख देखकर पुत्र, पौत्र की इच्छा करने लगी और विचारने लगी कि ऐसे मेरे भी अच्छे गुण और भाग्य वाले भर्त्ता और सुख देने वाले श्रेष्ठ पुत्र किस तरह उत्पन्न हों। परंतु प्रारब्ध ने तो पहले ही नाश कर दिया। क्या करूँ, क्या किसी मुनि के पास जाऊँ या किसी तीर्थ में जाकर वहाँ पर रहूँ? मेरा भाग्य कैसे सो गया है कि कोई भर्त्ता मेरी इच्छा नहीं करता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि मेरे भाग्य से मेरा पंडित पिता भी मूढ़ हो गया है। विवाहकाल प्राप्त होने पर भी मुझे अच्छे वर को नहीं सौंपता।

पति के दुःख की पीड़ा तथा कुमारी में स्वामी का सुख, जैसा मेरी सखियाँ जानती हैं मैं नहीं जानती। ऐसे आकुल तथा व्याकुल वाले मनोरथ की चिन्ता से मेरी भाग्यवती माता पहले ही मर गई। शोक और मोह की तरंगों से पीड़ित कन्या का पिता मेधावी ऋषिराज भी पृथ्वी में विचरने लगा, पर कन्यादान के निमित्त जोड़ी का वर ढूँढने पर नहीं मिलने से अपने, मनोरथ में निराश हो गया। पुत्री के और उसके अपने दुर्भाग्य से उसको दारुण तीव्र ज्वर हो गया तब वह ऋषिराज, सब शरीर में अति शूल होने के कारण व्याकुल हो गया और श्वास पर श्वास से युक्त होकर, लौटता गिरता, घर आकर पृथ्वी पर गिर पड़ा जैसे मदिरापान करने से मूर्छा को प्राप्त हो जाता है और अपनी पुत्री का स्मरण किया जब तक पुत्री भय से व्याकुल होकर अपने पिता के पास आई, तब तक वह मरने के सदृश हो गया।

दैवयोग से अकस्मात् कांपता हुआ और कन्यादान के प्रसंग से उठे हुए महोत्सव से रहित वौर पूर्वकाल के लिए गृहस्थी धर्मों से रहित होकर संसार की वासना को छोड़कर, हरि में मन को लगाता वह मेधावी ऋषिराज श्री हरिपुरुषोत्तम को स्मरण करने लगा। हे श्रीकृष्ण ! हे गोविन्द ! हे हरे ! हे मुरारे ! हे राधेश ! हे दामोदर ! हे दीनानाथ ! हे हृषिकेशवर ! आपको नमस्कार करता हूँ आप मेरी इस संसार रूपी समुद्र से रक्षा करिये।

इस प्रकार मुनि के वचन सुनकर बहुत जल्दी भगवान के पार्षद्, मरे हुए मुनि के जीवात्मा को लेकर भगवान के बैकुण्ठ धाम को चले गये और वह पुत्री पिता का मरण सुनकर हाय-हायकर रोती और पिता के देह को गोदी में लेकर विलाप करने लगी। अत्यन्त दुःखित होकर दारुण विलाप करती हुई मानो उसका पिता जीवित हो अत्यन्त व्याकुल होकर कहने लगी हाय पिता ! हाय पिता ! मुझको किसके सहारे छोड़कर विष्णु लोक में चले गये। हे तात ! अब मैं बिना पिता के किसके पास रहूँगी, न मेरे भाई है, न कोई कुटुम्बी, मेरी तपस्विनी माता भी नहीं है, जो मेरे भोजन तथा वस्त्रों की चिन्ता करती। अब इस दशा में मैं भी मर जाऊँगी। जीने से अब क्या काम है?

उसे इस प्रकार बारम्बार रोते और विलाप करते हुए सुनकर उस वन के रहने वाले ब्राह्मण सोचने लगे कि अत्यन्त करुणा भरे स्वर से इस तपोवन में कौन रोता है? फिर तपस्वी मेधावी ऋषि की पुत्री का रोना निश्चय करके वहाँ पहुँचे और वहाँ पुत्री की गोद में मरे हुए मुनि को देखकर वन में रहने वाले मुनि ऋषि की लाश को लेकर श्मशान घाट में ले जाकर अंत्येष्ट विधि से चारों तरफ काष्ठ लगाकर जला दिया और कन्या को समझाकर सब अपने-अपने घरों को चले गये और कन्या ने धैर्य धारण कर, यथा शक्ति खर्च करके, अपने पिता और्ध्वदैहिक क्रिया की।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #सातवाँ_अध्यायसूत जी कहने लगे-हे ऋषियों ! जब विष्णु भगवान मलमास का अपार दुःख कहकर चुपचाप आसन पर...
23/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#सातवाँ_अध्याय

सूत जी कहने लगे-हे ऋषियों ! जब विष्णु भगवान मलमास का अपार दुःख कहकर चुपचाप आसन पर बैठ गये, तो श्रीकृष्ण ने विष्णु को जो गुप्त वचन कहे, वह मैं तुमसे कहता हूँ। श्री पुरुषोत्तम बोले-हे विष्णु ! आपने बहुत अच्छा किया जो मलमास का हाथ पकड़कर यहाँ पर ले आये। इससे लोक में महान् कीर्ति पाओगे। जिसको तुमने स्वीकार किया उसको मैंने भी स्वीकार कर लिया। इसको मैं अपने समान ही करूँगा। गुण, कीर्ति, ऐश्वर्य पराक्रम, भक्तों को वरदान, मेरे समान सभी गुण इसमें होंगे। जैसे मैं लोक में प्रसिद्ध हूँ, वैसे ही यह भी पुरुषोत्तम नाम से विख्यात होगा। जो गुण मुझमें है वही मैंने इसको दिये। हे जनार्दन तुम्हारी प्रसन्नता के लिये मैंने अपने सभी गुण इसको दे दिये यह पुरुषोत्तम के नाम से जगत् में विख्यात होगा और मेरे समान होकर सब मासों का स्वामी होगा। अब यह जगत का पूज्य, जगत के नमस्कार करने योग्य होकर पूजनीय होगा और पूजने वालों का दुःख, दरिद्रता का नाश करेगा। सब मास इच्छा वाले हैं, मैंने इसको इच्छा रहित किया। मनुष्यों को मोक्ष देने वाला, अपने बराबर मैंने इसको किया। जो कोई इच्छा रहित या इच्छा वाला इसको पूजेगा वह अपने किये कर्मों को भस्म करके, निःसंशय मुझको प्राप्त होगा।

हे गरूड़ध्वज ! महाभाग्यशाली यती, ब्रह्मचारी महात्मा निराहारी भी मेरे परम स्थान को प्राप्त नहीं होते हैं। परन्तु पुरुषोत्तम के भक्त मास भर में जन्म मृत्यु से रहित हो बिना परिश्रम के ही हरि के पद को पा सकते हैं। सब साधनों में श्रेष्ठ सब काम तथा अर्थ को देने वाला यह पुरुषोत्तम मास स्वाध्याय योग्य है। जैसे हल से बोये हुए बीज करोड़ों गुना बढ़ते हैं वैसे ही पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य कोटि गुना बढ़ता है। कोई चतुर्मास के व्रत, व्रतों द्वारा, स्वर्ग में जाकर वहाँ के भोगों को भोगकर फिर इस पृथ्वी में आते हैं, किन्तु जो पुरुषोत्तम का आदर से विधिपूर्वक सेवन करता है, वह अपने कुल का उद्धार करके मुझको ही प्राप्त होगा।

जो महा अज्ञानी मनुष्य इस मास में जप दानादि नहीं करते और अच्छे कर्म नहीं करते, देव तीर्थ तथा ब्राह्मण से वैर करते हैं। वे दुष्ट भाग्य पर जीने वाले हैं। उनको खरगोश के सींग के समान स्वप्न में भी सुख नहीं होगा। जब मूढ़ मनुष्य मेरे प्रिय मल मास का तिरस्कार ... करेंगे, और जो धर्म का आचरण नहीं करेंगे, वे सदैव नरक के गामी होंगे। जो पुरुषोत्तम के निमित तीन-तीन वर्ष में धर्म का आचरण नहीं करते वह कुम्भी पाकादि नरकों में पड़ते हैं। जो अज्ञानी पुरुष, स्त्री, पुत्र, पौत्र आदि के बन्धन में फँसा रहता है। वह अज्ञानी दुःख रूपी दावानल में पड़ा रहता है। जिसका अज्ञान से मेरा प्रिय, अत्यन्त पुन्यदान पुरुषोत्तम मास बीत गया, उनको कैसे सुख प्राप्त हो सकता है? श्रेष्ठ भाग्य वाली जो स्त्रियाँ पुत्र सुख सौभाग्य के लिये पुरुषोत्तम मास में स्नान, दान तथा पूजन करेंगी, उनको मैं सौभाग्य, सम्पत्ति, सुख पुत्र दूँगा और जो मेरे इस मास को ऐसे ही व्यतीत कर देंगी उनको मेरे प्रतिकूल और स्वामी से सुख नहीं होगा। भाई पुत्र तथा धन का सुख तो उनको स्वप्न में भी प्राप्त नहीं होगा।

अतः सब मनुष्यों को मेरे इस मास में स्नान पूजा, जपादि करना चाहिए। विशेष करके अपने शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए। जिसने भक्ति और श्रद्धा से पुरुषोत्तम मास में मेरी पूजा की वह धन तथा पुत्र का सुख भोगकर अन्त में मेरे गौलोक में वास करेगा। मेरी आज्ञा से सभी मनुष्य मलमास को पूजेंगे। मैंने सब मासों में उत्तम इसको किया है इसलिये हे रमापते ! तुम चिंता छोड़ कर पुरुषोत्तम मास को लेकर बैकुण्ठ को जाओ।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #छठा_अध्यायनारद बोले - हे पाप रहित ! विष्णु भगवान ने गौलोक में जाकर क्या किया सो कृपा करके मुझस...
22/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#छठा_अध्याय

नारद बोले - हे पाप रहित ! विष्णु भगवान ने गौलोक में जाकर क्या किया सो कृपा करके मुझसे कहिए। श्री नारायण कहने लगे - हे नारद ! श्री विष्णु भगवान जब अधिक मास सहित गौलोक में गये तो वहाँ क्या हुआ सो मैं तुमको सुनाता हूँ। गौलोक में मणियों के खम्भों से सुशोभित भगवद्धाम जिसमें मनोहर ज्योति स्थान दावानल के समान विष्णु भगवान ने दूर से ही देखा। उस तेज से नेत्र मुंद गये। फिर अधिक मास को भगवान पीछे करके कुछ थोड़े से नेत्र खोलकर धीरे-धीरे आगे बढ़े।

जब उस स्थान के पास पहुँचे तो अधिक मास सहित विष्णु बड़े प्रसन्न हुए। द्वारपाल ने इनको नमस्कार किया। रत्नों के सिंहासन पर गोपियों के बीच में बैठे हुए श्रीकृष्ण को रमानाथ श्री विष्णु जी ने नमस्कार किया। फिर विष्णु ने काँपते हुए मलमास को श्री कृष्ण के चरणों में डाल दिया तब श्री कृष्ण भगवान कहने लगे कि यह कौन है, और इस गौलोक में किस लिए रोता है। क्या इसका दुःख कोई नहीं दूर कर सकता? श्री नारायण कहने लगे कि हे नारद ! गौलोक नाथ के वचनों को सुनकर नारायण भगवान ने आसन से उठकर आदि से अन्त तक मलमास का सब वृतान्त सुनाया। इस प्रकार दुःख रूपी जला हुआ यह मरने को तैयार हुआ। तब दूसरे दयालु पुरुषों से प्रेरित किया गया यह मेरे पास आया। हे ऋषिकेश ! मेरी शरण में आकर दुःख जाल से घिरा हुआ, बारम्बार रोता हुआ और काँपता हुआ यह सब कहने लगा। इसके महादुःख को आपके बिना कोई निवारण नहीं कर सकता। इसीलिये इस स्वामी रहित को हाथ पकड़ कर आपके पास लाया हूँ।

इस प्रकार श्री विष्णु भगवान कह कर हाथ जोड़कर श्री कृष्ण भगवान के आगे खड़े हो गये। इतनी कथा सूत शौनकादि ऋषि कहने लगे हे सूत जी ! विष्णु और श्रीकृष्ण का सम्वाद सब लोगों के लिये उपकार करने वाला है, गौलोकवासी श्रीकृष्ण ने क्या कहा और क्या किया उसको विस्तार पूर्वक कहिये।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #पाँचवां_अध्यायनारद जी श्री नारायण से कहने लगे- हे महाभाग ! चरणों में पड़े हुए अधिकमास को भगवान...
21/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#पाँचवां_अध्याय

नारद जी श्री नारायण से कहने लगे- हे महाभाग ! चरणों में पड़े हुए अधिकमास को भगवान ने क्या कहा? भगवान बोले- हे निष्पाप नारद ! जो हरि ने कहा सो मैं तुमसे कहता हूँ। सुनो हे मुनि श्रेष्ठ ! कृष्ण भगवान के नेत्रों से संकेत पाकर गरूड मूर्छित हुए मलमास को अपने पंखों से हवा करने लगे। तब मलमास उठकर बोला-हे नाथ! मुझको यह अच्छा नहीं लगता ! हे जगत् पते ! मुझ शरणागत को क्यों त्यागते हो, रक्षा करो।

इस प्रकार कांपते हुए बारम्बार कहते हुए मलमास से भगवान कहने लगे-हे वत्स ! हे पुरुषोत्तम ! मुझसे तेरा दुःख नहीं देखा जाता है। तू सोच मत कर, उन योगियों के भी दुर्लभ ऐसे गोलोक में मेरे साथ चल, जहाँ गोपी गणी के बीच में बैठे हुए दो भुजा वाले, मुरली हाथ में लिये, नवीन मेघ के समान श्याम रङ्ग कमल सद्दश नयन वाले ऐसे ईश्वर श्री कृष्ण भगवान रहते हैं। श्री कृष्ण भगवान गौलोक में तेरे दुःख को दूर करेंगे। चलो वहाँ पर चलते हैं।

श्री नायारण कहने लगे कि इतना कह हरि भगवान मल मास का हाथ पकड़कर गौलोक को ले गये।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य #चौथा_अध्यायअधिक मास कहने लगा-हे नाथ! हे कृपानिधे ! मलमास मेरा नाम है। मैं बलवानों से तिरस्कृत ...
20/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#चौथा_अध्याय

अधिक मास कहने लगा-हे नाथ! हे कृपानिधे ! मलमास मेरा नाम है। मैं बलवानों से तिरस्कृत होकर यहाँ आया हूँ। फिर आप मेरी रक्षा क्यों नहीं करते? मुझको उन लोगों ने शुभ कर्म वर्जित अनाथ और सदैव घृणा की दृष्टि से देखा। अब आपकी दयालुता कहाँ गई? कठोरता क्यों हुई?

इस प्रकार भगवान से कहकर मलिन मुख मलमास श्रीकृष्ण के आगे आँसू बहाता हुआ बैठ गया। तब द्रवीभूत हरि आगे बैठे दीन बदन मलमास से कहने लगे हे तात ! तुम अत्यन्त दुखों में डूबे हो, सो ऐसा भारी दुःख तुम्हारे मन में क्या है। तुम किसी प्रकार का सोच मत करो। मैं तुझे दुःख में डूबे हुए का उद्धार करूँगा। मेरी शरण में आकर तुम सोच करने योग्य नहीं हो।

ऐसे भगवान के वाक्य सुनकर मलमास दुःखी होकर मधुसूदन भगवान से बोला हे भगवान ! आपको सब कुछ ज्ञात है। आपके बिना इस संसार में कुछ भी नहीं होता। हे भगवान मेरे दुर्भाग्य की पीड़ा क्या आप नहीं जानते? तो भी हे नाथ दुःख रूपी फांस में फँसा हुआ जैसा दुःख किसी को न हुआ, न देखा, सो आपसे कहता हूँ। क्षण, लव, मुहूर्त, पक्ष मास और दिन रात्रि अपने स्वामी की आज्ञा से सदा भय रहित होकर आनन्द करते हैं। परंतु न मेरा कोई नाम है, न मेरा धर्म न कोई मुझको आश्रय देने वाला है। इसी से सब देवताओं ने मेरा निरादर किया है और शुभ कर्मों में यह मलमास वर्जित है ऐसा सभी अन्ध परम्परा से कहते हैं, इसलिए मैं मरना चाहता हूँ, जीना नहीं चाहता।

हे नारद जी ! मैं मरूँगा, मैं मरूँगा, मैं मरूँगा, इस प्रकार बारम्बार कह कर मलमास शांत हो गया।

 #पुरुषोत्तम_मास_महातम्य  #तीसरा_अध्यायहे नारद जी ! जो कुछ भगवान् कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से कहा वही मैं तुमसे कहता हूँ।...
19/05/2026

#पुरुषोत्तम_मास_महातम्य

#तीसरा_अध्याय

हे नारद जी ! जो कुछ भगवान् कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से कहा वही मैं तुमसे कहता हूँ। एक समय धर्मराज युधिष्ठिर जुए में दुर्योधन से सब कुछ हार गए तो द्रौपदी को बालों से पकड़कर दुष्ट दुःशासन ने खींचा और वस्त्र भी पकड़कर खींचे तो कृष्ण भगवान ने रक्षा की। उसके पश्चात् युधिष्ठिरादि राज्य को छोड़कर काम्यक वन को चले गए। वहाँ पर वन में युधिष्ठिर द्रौपदी आदि बाल बिखेरे वन में रहने वाले हाथियों की तरह वन के फलों को खाकर अति दुःख को प्राप्त हुए।

एक समय देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण भगवान उनको दुःखी जानकर, काम्यक वन को गए। उस समय युधिष्ठिरादि श्री कृष्ण भगवान को देखकर ऐसे प्रसन्न हुए मानो देह में प्राण आ गये हों। वे बड़े प्रेम से मिले और हरि के चरण कमलों में नमस्कार किया। द्रौपदी ने भी प्रणाम किया। राजा युधिष्ठिर को दुःखी देखकर और ऐसे ही द्रौपदी को दुःखी देखकर श्रीकृष्ण भगवान भी अत्यन्त दुःखी हुए।

जब विश्वात्मा, भक्तवत्सल, भगवान ने दुर्योधन को भस्म करने के लिए क्रोध किया तो मानो करोड़ों काल कराल के समान मुख से प्रलयकाल की अग्नि उठी हो और दाँतों को पीसते हुए मानो त्रिलोक को भस्म कर देंगे तब अर्जुन भय से काँप उठे।

युधिष्ठिर और द्रौपदी तथा दूसरे उपस्थित जन हाथ जोड़कर भगवान को प्रसन्न करने के लिए स्तुति करने लगे। तब श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन के इस प्रकार स्तुति वचन सुनकर शीतल हो गये, फिर प्रेम से व्याकुल होकर युधिष्ठिरादि, श्रीभगवान को बारम्बार नमस्कार करने लगे।

श्रीनारायण कहने लगे कि हे नारद जी! इस प्रकार प्रेम से मग्न हो सिर झुकाकर, हाथ जोड़ बारम्बार भगवान कृष्ण को नमस्कार कर, अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से जो प्रश्न किया वह मैं तुमसे कहता हूँ। हरि भगवान यह सब सुनकर पाँडवों के हितकारक वचन कहने लगे। कृष्ण कहने लगे हे अर्जुन ! मेरे वचनों को सुनो और आपने जो अपूर्व प्रश्न किया है, इस समय मैं इसका उत्तर देने को समर्थ नहीं। यह गुप्त प्रश्न ऋषियों को भी कठिन है तो भी हे अर्जुन ! मैं तुम्हारी मित्रता और भक्ति से प्रसन्न होकर अत्यन्त कठिन उत्तर को क्रम से कहता हूँ सुनो।

हे अर्जुन ! एक समय में संयोगवश अधिक मास आया। उसको सब असहाय निन्दक, अपूज्य मलमास और नवि की संक्रान्ति से वर्जित ऐसा कहते हैं। मल (गन्दा) मास होने से स्पर्श करने योग्य नहीं है, सब कर्मों में निन्दित है।

इस प्रकार लोगों के वचन सुनकर, वह मलमास कान्तिहीन, निरुद्योगी दुःखों से युक्त मेरे पास आया और बैकुण्ठ में जहाँ पर मैं निवास करता था, स्वर्ण के सिंहासन पर बैठे हुए देखकर, मुझको दण्डवत् प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ नेत्रों से आँसू बहाता हुआ इस प्रकार कहने लगा।

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