Nagnath Mahadev Temple - Jamjodhpur

Nagnath Mahadev Temple - Jamjodhpur Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Nagnath Mahadev Temple - Jamjodhpur, Hindu temple, "Nagnath Bhavan" Panchvati Nagar, Opp. Old College, Jamjodhpur.

महाविद्या स्त्रोतऊँ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी।नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि।।शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद ह...
03/02/2022

महाविद्या स्त्रोत
ऊँ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी।
नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि।।
शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे।
प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम्।।
जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम्।
करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्।।
हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम्।
गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकारभूषिताम्।।
हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम्।
सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम्।।
मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिंगशोभिताम्।
प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्।
उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम्।
नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम्।।
श्यामांगी श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम्।
प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्वार्थसाधिनीम्।।
विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम्।
आद्यामाद्यगुरोराद्यामाद्यनाथप्रपूजिताम्।।
श्री दुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मां सुरेश्वरीम्।
प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम्।।
त्रिपुरां सुन्दरीं बालामबलागणभूषिताम्।
शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम्।।
सुन्दरीं तारिणीं सर्वशिवागणविभूषिताम्।
नारायणीं विष्णुपूज्यां ब्रह्मविष्णुहरप्रियाम्।।
सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यां गुणवर्जिताम्।
सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्चितां सर्वसिद्धिदाम्।।
विद्यां सिद्धिप्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम्।
महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम्।।
प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम्।
रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजमर्दिनीम्।।
भैरवीं भुवनां देवीं लोलजिह्वां सुरेश्वरीम्।
चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम्।।
त्रिपुरेशीं विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम्।
अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशिनीम्।।
कमलां छिन्नभालांच मातंगी सुरसुन्दरीम्।
षोडशीं विजयां भीमां धूमांच वगलामुखीम्।।
सर्वसिद्धिप्रदां सर्वविद्यामन्त्रविशोधिनीम्।
प्रणमामि जगत्तारां सारांच मन्त्रसिद्धये।।
इत्येवंच वरारोहे, स्तोत्रं सिद्धिकरं परम्।
पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनि
ऐम् ह्रिम् श्रीम् मात्रे नम:।।
🙏🙏🙏🚩

दानव महिषासुर के वध से प्रसन्न और निर्भय हो गए त्रिदेवों सहित देवताओं ने प्रसन्न भगवती से ऐसे किसी अमोघ उपाय की याचना की...
25/02/2021

दानव महिषासुर के वध से प्रसन्न और निर्भय हो गए त्रिदेवों सहित देवताओं ने प्रसन्न भगवती से ऐसे किसी अमोघ उपाय की याचना की, जो सरल हो और कठिन से कठिन विपत्ति से छुड़ाने वाला हो।

'हे देवी! यदि वह उपाय गोपनीय हो तब भी कृपा कर हमें कहें। '

मां भगवती ने अपने ही बत्तीस नामों की माला के एक अद्भुत गोपनीय रहस्यमय किंतु चमत्कारी जप का उपदेश दिया जिसके करने से घोर से घोर विपत्ति, राज्यभय या दारुण विपत्ति से ग्रस्त मनुष्य भी भयमुक्त एवं सुखी हो जाता है। मां दुर्गा को अपने यह 32 नाम अति प्रिय हैं। इन्हें सुनकर वे पुलकित हो जाती हैं।

देहशुद्धि के बाद कुश या कम्बल के आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह करके घी के दीपक के सामने इन नामों की 5/ 11/ 21 माला नौ दिन करनी है और जगत माता से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की याचना करनी है।

मां दुर्गा के 32 नाम

ॐ दुर्गा,
दुर्गतिशमनी,
दुर्गाद्विनिवारिणी,
दुर्गमच्छेदनी,
दुर्गसाधिनी,
दुर्गनाशिनी,
दुर्गतोद्धारिणी,
दुर्गनिहन्त्री
दुर्गमापहा,
दुर्गमज्ञानदा,
दुर्गदैत्यलोकदवानला,
दुर्गमा,
दुर्गमालोका,
दुर्गमात्मस्वरुपिणी,
दुर्गमार्गप्रदा,
दुर्गम विद्या,
दुर्गमाश्रिता,
दुर्गमज्ञान संस्थाना,
दुर्गमध्यान भासिनी,
दुर्गमोहा, दुर्गमगा,
दुर्गमार्थस्वरुपिणी,
दुर्गमासुर संहंत्रि,
दुर्गमायुध धारिणी,
दुर्गमांगी,
दुर्गमता,
दुर्गम्या,
दुर्गमेश्वरी,
दुर्गभीमा,
दुर्गभामा,
दुर्गमो,
दुर्गोद्धारिणी।

''अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता।''''चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥'' हनुमानजी क...
23/02/2021

''अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता।''
''चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥''


हनुमानजी के लंका जाने के बारे में लोगों की भिन्न-भिन्न मान्यताएं हैं। कुछ मानते हैं कि वे तैरकर गए थे, कुछ के अनुसार वे उड़कर गए थे और कुछ के अनुसार वे छल्लांग लगाते हुए या एक टापू से दूसरे टापू पर कूदते हुए गए थे। हालांकि लोगों की मान्यताओं के बारे में हमें इतना ही कहना है कि ये उनकी मान्यताएं हैं।


* हनुमानजी, नारदमुनी और सनतकुमार ही ऐसे देवता थे जो अपनी शक्ति से आकाशमार्ग में विचरण करते थे। जबकि अन्न देवी या देवताओं के वाहन होते थे। हालांकि ऐसे भी कई ऋषि और मुनि थे जो अपनी ही शक्ति से आकाशमार्ग से आया-जाया करते थे। हनुमान सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। कहते हैं कि वे धरती पर एक कल्प तक सशरीर रहेंगे।

इस शक्ति से उड़ते थे हनुमानजी -

* हनुमानजी को योग की अष्ट सिद्धियां प्राप्त थी। इन आठ सिद्धियों के नाम है:- अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, इशीता, वशीकरण। उपरोक्त शक्ति में से लघिमा ऐसी शक्ति है जिसके माध्यम से उड़ा जा सकता है। हनुमानजी महिमा और लघिमा शक्ति के बल पर समुद्र पार कर गए थे।

* योग द्वारा प्रथम तीन माह तक लगातार ध्यान करते हुए शरीर और आकाश के संबंध में संयम करने से लघु अर्थात हलकी रुई जैसे पदार्थ की धारणा से आकाश में गमन करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। इस शक्ति को हासिल करने के लिए यम और नियम का पालन करना जरूरी है। साथ ही संयमित भोजन, वार्तालाप, विचार और भाव पर ध्यान देना अत्यंत जरूरी होता है।

* रामायण या रामचरित मानस में एक शब्द लिखा है लांघना। समुद्र को लांघना। लांघने का अर्थ तैरना, कूदना या छल्लांग लगाना नहीं है। लांघने का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने की क्रिया या वेग से पार करना। लांघना अर्थात लघिमा शक्ति का प्रतीक। हनुमान का समुद्र को लांघने का वर्णन वाल्मिकी रामायण और रामचरित मानस के सुंदरकांड में मिलता है।

* परामनोविज्ञान इस लघिमा शक्ति के संबंध में खोज करता रहा है। तिब्बत और हिमालय के कुछ भिक्षु या साधु पद्मासन लगा समाधि अवस्था में आकाश में कुछ ऊंचाई तक उठे हुए पाए गए हैं। आज भी ऐसे साधु, संत और भिक्षुओं को देखा जा सकता है। डिस्कवरी चैलन पर इस संबंध में एक डॉक्यूमेंट्री प्रसारित हुई थे जिसे यूट्यूब पर देखा जा सकता है।
समुद्र को लांघना :

* हनुमानजी ने अपनी उड़ान शक्ति का परिचय कई जगहों पर दिया उसमें से पांच प्रमुख घटनाएं हैं। पहली जब वे सूर्य को फल समझकर आकाश में उड़ चले थे। दूसरी जब वे लंका को पार करके गए और आए। तीसरी जब उन्होंने लंका दहन किया। चौथी जब वे संजीवनी बूटी को लाने के लिए द्रोणाचल पर्वत गए थे और पांचवीं जब वे राम और लक्ष्मण को अहिरावण से छुड़वाने के लिए पाताल लोक गए और आए थे।

* कहते हैं कि सबसे पहले बाली पुत्र अंगद को समुद्र लांघकर लंका जाने के लिए कहा गया था लेकिन अंगद ने कहा कि मैं चला तो जाऊंगा लेकिन पुन: लौटने की मुझमें क्षमता नहीं है। मैं लौटने का वचन नहीं दे सकता। तब जामवंत के याद दिलाने पर हनुमानजी को अपनी उड़ने की शक्ति का भान हुआ तो वे एक जगह रुककर समुद्र को पार कर गए। इससे पहले उन्होंने अपना विराट रूप धारण कर महेन्द्र पर्वत पर अपने पैर रखकर उसे हिला दिया। पर्वत के हिलने से उसकी कई चट्टानें और वृक्ष उखड़कर नीचे गिरने लगे। तब हनुमान वायु की गति से उड़ने लगे। उनके उड़ने की अत्यंत वेग के कारण उनके साथ वृक्ष भी हवा में उड़ने लगे और बाद में वे वृक्ष एक-एक करके समुद्र में गिरने लगे।


* समुद्र पार करते समय रास्ते में उनका सामना सुरसा नाम की नागमाता से हुआ जिसने राक्षसी का रूप धारण कर रखा था। सुरसा ने हनुमानजी को रोका और उन्हें खा जाने को कहा। समझाने पर जब वह नहीं मानी, तब हनुमान ने कहा कि अच्‍छा ठीक है मुझे खा लो। जैसे ही सुरसा उन्हें निगलने के लिए मुंह फैलाने लगी हनुमानजी अपनी महिमा शक्ति के बल पर अपने शरीर को बढ़ाने लगे। जैसे-जैसे सुरसा अपना मुंह बढ़ाती जाती, वैसे-वैसे हनुमानजी भी शरीर बढ़ाते जाते। बाद में हनुमान ने अचानक ही अपना शरीर बहुत छोटा कर लिया और सुरसा के मुंह में प्रवेश करके तुरंत ही बाहर निकल आए। हनुमानजी की बुद्धिमानी से सुरसा ने प्रसन्न होकर उनको आशीर्वाद दिया तथा उनकी सफलता की कामना की।

* राक्षसी माया का वध : समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को पकड़ लेती थी। आकाश में जो जीव-जंतु उड़ा करते थे, वह जल में उनकी परछाईं देखकर अपनी माया से उनको निगल जाती थी। हनुमानजी ने उसका छल जानकर उसका वध कर दिया।

हनुमान शक्ति -

भगवान सूर्यदेव ने हनुमानजी को 9 तरह की विद्याओं का ज्ञान भी दिया था। धर्मराज यम ने उन्होंने अवध्य और निरोग होने का वरदान दिया, कुबेर ने युद्ध में कभी विषाद नहीं होगा ऐसा वरदान देकर उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र से हनुमान जी को निर्भय कर दिया था। भगवान शंकर ने भी उन्हें उनके शस्त्रों द्वारा अवध्य होने का वरदान दिया। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वरदान दिया कि मेरे बनाए हुए जितने भी शस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य रहेगा और चिंरजीवी होगा। देवराज इंद्र ने हनुमान जी को यह वरदान दिया कि यह बालक आज से मेरे वज्र द्वारा भी अवध्य रहेगा। जलदेवता वरुण ने यह वरदान दिया कि दस लाख वर्ष की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी। परमपिता ब्रह्मा ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह बालक दीर्घायु, महात्मा और सभी प्रकार के ब्रह्दण्डों से अवध्य होगा।

पुराणों के अनुसार हनुमान जी को कई देवी-देवताओं से विभिन्न प्रकार के वरदान और अस्त्र-शस्त्र प्राप्त थे। इन वरदानों और शस्त्रों के कारण हनुमान जी उद्धत भाव से घूमने लगे। यहां तक कि तपस्यारत मुनियों को भी शरारत कर तंग करने लगे। उनके पिता पवनदेव और माता केसरी के कहने के बावजूद भी हनुमान जी नहीं रूके। इसी दौरान एक शरारत के बाद अंगिरा और भृगुवंश के मुनियों ने कुपित होकर श्राप दिया कि वे अपने बल को भूल जाएं और उनको बल का आभास तब ही हो जब कोई उन्हें याद दिलाए।

निष्प्रमाणशरीर: सँल्लिलघ्डयिषुरर्णवम्।
बहुभ्यां पीडयामास चरणाभ्यां च पर्वतम्।। 11।।-वाल्मिकी रामायण सुंदरकांड

अर्थात : समुद्रको लांघने की इच्छा से उन्होंने अपने शरीर को बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणों से उस पर्वत को दबाया।। 11।।
स चचालाचलश्चाशु मुहूर्तं कपिपीडित:।
तरुणां पुष्पिताग्राणां सर्वं पुष्पमशातयत्।।12।।-वाल्मिकी रामायण सुंदरकांड
कपिवर हनुमानजी के द्वारा दबाए जाने पर तुरंत ही वह पर्वत कांप उठा और दो घड़ी डगमगाता रहा। उसके ऊपर जो वृक्ष उगे थे, उनकी डालियों के अग्रभाग फूलों से लदे हुए थे, किंतु उस पर्वत के हिलने से उनके वे सारे फूल झड़ गए।।12।।

Shiva is considered to be lord of Shmashana or Shmashana Adhipati, "inhabitant of the cremation ground. Shiva, whose bod...
10/10/2020

Shiva is considered to be lord of Shmashana or Shmashana Adhipati, "inhabitant of the cremation ground. Shiva, whose body is covered by the white ashes of the cremation ground in which he meditates is symbolic of death and regeneration. Digambara, clad in robe which symbolises his primal condition, his non attachment to the world. Adiyogi Sitting in cremation ground shows correct attitude of the yogi to life. Shamshana is the end of the physical phase of life, prerequisite for every new creation.

Shiva has long matted hair that's his spiritual life and his great powers, wearing a garland of snakes around his neck. Sometimes more snakes: one across his body like a sacred thread and two acting as bracelets around his muscular hands. The snakes symbolically represents his control over desire and sensuality. Sometimes in his ferocious aspects, he is shown wearing a garland of skulls. Shiva's destruction is not negative. It is a positive, nourishing and constructive destruction that builds and transforms life and energy for the welfare of the world and the beings that inhabit it.

Shiva destroys in order to renew and regenerate. He destroys our imperfections in order to ensure our spiritual progress. He destroys our illusions, desires and ignorance. He destroys our old memories, so that we can move on with the movement of time. He destroys our relationships, attachment, impurities, physical and mental wrong doings, the effects of bad karma, our passions and emotions and many things that stand between us and God as impediments to our progress and inner transformation. And in the end when we have made sufficient progress, when we are ready and prepared, and when we are willing without any inner conflict, he destroys death.!

51 शक्ति पीठो का विवरण (Details of 51 Shakti Peethas) :1. किरीट शक्तिपीठ  (Kirit Shakti Peeth) :किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम ब...
06/09/2020

51 शक्ति पीठो का विवरण (Details of 51 Shakti Peethas) :

1. किरीट शक्तिपीठ (Kirit Shakti Peeth) :
किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है। यहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।

(शक्ति का मतलब माता का वह रूप जिसकी पूजा की जाती है तथा भैरव का मतलब शिवजी का वह अवतार जो माता के इस रूप के स्वांगी है )

2. कात्यायनी शक्तिपीठ (Katyayani Shakti Peeth ) :
वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं तथा भैरव भूतेश है।

3. करवीर शक्तिपीठ (Karveer shakti Peeth) :
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।

4. श्री पर्वत शक्तिपीठ (Shri Parvat Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।

5. विशालाक्षी शक्तिपीठ (Vishalakshi Shakti Peeth) :
उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।

6. गोदावरी तट शक्तिपीठ (Godavari Coast Shakti Peeth) :
आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।

7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ (Suchindram shakti Peeth) :
तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।

8. पंच सागर शक्तिपीठ (Panchsagar Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।

9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ (Jwalamukhi Shakti Peeth) :
हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ (Bhairavparvat Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।

11. अट्टहास शक्तिपीठ ( Attahas Shakti Peeth) :
अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।

12. जनस्थान शक्तिपीठ (Janasthan Shakti Peeth) :
महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं।

13. कश्मीर शक्तिपीठ या अमरनाथ शक्तिपीठ (Kashmir Shakti Peeth or Amarnath Shakti Peeth) :
जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं।

14. नन्दीपुर शक्तिपीठ (Nandipur Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं।

15. श्री शैल शक्तिपीठ (Shri Shail Shakti Peeth ) :
आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है श्री शैल का शक्तिपीठ, जहां माता का ग्रीवा गिरा था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथव ईश्वरानन्द हैं।

16. नलहटी शक्तिपीठ (Nalhati Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहटी शक्तिपीठ, जहां माता का उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं।

17. मिथिला शक्तिपीठ (Mithila Shakti Peeth ) :
इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तारतर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर

18. रत्नावली शक्तिपीठ (Ratnavali Shakti Peeth) :
इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं।

19. अम्बाजी शक्तिपीठ (Ambaji Shakti Peeth) :
गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के शिखर पर देवी अम्बिका का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।

20. जालंध्र शक्तिपीठ (Jalandhar Shakti Peeth) :
पंजाब के जालंध्र में स्थित है माता का जालंध्र शक्तिपीठ जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।.

21. रामागरि शक्तिपीठ (Ramgiri Shakti Peeth) :
इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्राकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहा की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं।

22. वैद्यनाथ शक्तिपीठ (Vaidhnath Shakti Peeth) :
झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।

23. वक्त्रोश्वर शक्तिपीठ (Varkreshwar Shakti Peeth) :
माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं।

24. कण्यकाश्रम कन्याकुमारी शक्तिपीठ (Kanyakumari Shakti Peeth) :
तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ीद्ध के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता का पीठ मतान्तर से उध्र्वदन्त गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं।

25. बहुला शक्तिपीठ (Bahula Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं।

26. उज्जयिनी शक्तिपीठ (Ujjaini Shakti Peeth) :
मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ। जहां माता का कुहनी गिरा था। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं।

27. मणिवेदिका शक्तिपीठ (Manivedika Shakti Peeth) :
राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं।

28. प्रयाग शक्तिपीठ (Prayag Shakti peeth) :
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं तथा भैरव भव है।

29. विरजाक्षेत्रा, उत्कल शक्तिपीठ (Utakal Shakti Peeth) :
उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरा था। यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।

30. कांची शक्तिपीठ (Kanchi Shakti Peeth) :
तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं।

31. कालमाध्व शक्तिपीठ (Kalmadhav Shakti Peeth) :
इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।

32. शोण शक्तिपीठ (Shondesh Shakti Peeth) :
मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है।
यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।

33. कामाख्या शक्तिपीठ (Kamakhya Shakti peeth) :
कामगिरि असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का योनि गिरा था। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं।

34. जयन्ती शक्तिपीठ (Jayanti Shakti Peeth) :
जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयन्तिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता का वाम जंघा गिरा था। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं।

35. मगध् शक्तिपीठ (Magadh Shakti Peeth) :
बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं।

36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ (Trishota Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं।

37. त्रिपुरी सुन्दरी शक्तित्रिपुरी पीठ (Tripura Sundari Shakti Peeth) :
त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुरे सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं।

38 . विभाष शक्तिपीठ (Vibhasha Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं।

39. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ (Kurukshetra Shakti Peeth) :
हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ के नाम से भी जाना जाता है। यहां माता के दहिने चरण (गुल्पफद्ध) गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं।

40. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ (Ughadha Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था। यहां की शक्ति जुगाड़या और भैरव क्षीर खंडक है।

41. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ (Virat Nagar Shakti Peeth) :
राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहाँ सती के 'दायें पाँव की उँगलियाँ' गिरी थीं।। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं।

42. कालीघाट शक्तिपीठ (Kalighat Shakti Peeth) :
पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाएं पांव की अंगूठा छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं।

43. मानस शक्तिपीठ (Manasa Shakti Peeth) :
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव अमर हैं।

44. लंका शक्तिपीठ (Lanka Shakti Peeth) :
श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे।

45. गण्डकी शक्तिपीठ (Gandaki Shakti Peeth) :
नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती के दक्षिणगण्ड(कपोल) गिरा था। यहां शक्ति `गण्डकी´ तथा भैरव `चक्रपाणि´ हैं।

46. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ (Guhyeshwari Shakti Peeth) :
नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहां की शक्ति `महामाया´ और भैरव `कपाल´ हैं।

47. हिंगलाज शक्तिपीठ (Hinglaj Shakti Peeth) :
पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र (सर का ऊपरी भाग) गिरा था। यहां की शक्ति कोट्टरी और भैरव भीमलोचन है।

48. सुगंध शक्तिपीठ (Sugandha Shakti Peeth) :
बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता का नासिका गिरा था। यहां की देवी सुनन्दा है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।

49. करतोयाघाट शक्तिपीठ (Kartoyatat Shakti Peeth) :
बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।

50. चट्टल शक्तिपीठ (Chatal Shakti Peeth) :
बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां की शक्ति भवानी तथा भेरव चन्द्रशेखर हैं।

51. यशोर शक्तिपीठ (Yashor Shakti Peeth) :
बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का यशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता का बायीं हथेली गिरा था। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।

जय माता दी !

Krishna loved His cows and calves more than we can imagine. Krishna’s cows are benefited by serving and being served. Kr...
26/08/2020

Krishna loved His cows and calves more than we can imagine. Krishna’s cows are benefited by serving and being served. Krishna actually served the cows Himself with love and care! His whole youth He was personally caring for the calves and later for the cows. He was always more concerned about the well-being of His calves and cows than of His own well-being even on this level that He refused to wear Shoes while going in the forest, because His calves had NO SHOES. He told mother Yashoda that only if she made for all the thousands of calves shoes, He also would wear shoes. Otherwise He would walk barefoot. So much He was concerned about them.

So what to speak of us? How much we should be concerned? We aspiring to be the servants of the Lord and some of us treat the calves and cows as if they are just Nonsense. We only think of our desire for drinking milk and eating cheese.

If we will continue thinking like that there will be so much suffering in all the cow barns all over the world and Krishnas cows will be so unhappy.

So please consider your desire and protect Krishnas calves and cows. He will be very grateful for all your efforts!!

जानिए भगवान गणेश के बारे में कुछ रोचक और अनोखी बातें। भगवान गणपति प्रथम पूज्य और संकटहर्ता माने जाते हैं। हर शुभ कार्य स...
23/08/2020

जानिए भगवान गणेश के बारे में कुछ रोचक और अनोखी बातें। भगवान गणपति प्रथम पूज्य और संकटहर्ता माने जाते हैं। हर शुभ कार्य से पूर्व गणेशजी की वंदना इसलिए की जाती है ताकि वह मंगलमय हो और आनंदपूर्वक संपन्न हो। गणेशजी के बारे में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

इनमें उनके बारे में विभिन्न रोचक बातें भी हैं जिनके संबंध में लोगों को प्रायः अधिक जानकारी नहीं होती। आप भी जानिए भगवान गणेश के बारे में ऐसी ही कुछ रोचक और अनोखी बातें।

1- क्या आप जानते हैं, गणेशजी के शरीर का रंग कैसा है? शिवपुराण के अनुसार गणेशजी के शरीर का वर्ण लाल तथा हरा है। लाल रंग शक्ति का और हरा रंग समृद्धि का प्रतीक है। इसका मतलब है, जहां गणेशजी हैं वहां शक्ति और समृद्धि, दोनों का वास है।

2- माता पार्वती ने पुत्र की प्राप्ति के लिए पुण्यक नामक उपवास किया था। कहा जाता है जब गणेशजी को समस्त देवता आशीर्वाद दे रहे थे तब शनिदेव अपना सिर झुकाए खड़े थे। तब मां पार्वती ने शनि से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि उनकी दृष्टि गणेशजी के लिए शुभ नहीं होगी।

परंतु मां पार्वती के कहने पर उन्होंने गणेशजी को देखा और उनका अहित हुआ। कुछ दिनों बाद शिवजी ने उनका सिर काट दिया था।

3- गणेशजी के दो विवाह हुए हैं। उनकी पत्नियों के नाम सिद्धि और बुद्धि हैं। गणेशजी के दो पुत्र भी हैं। उनके नाम क्षेत्र तथा लाभ हैं।

4- गणपति भगवान शिव के पुत्र हैं लेकिन शिव ने भी उनकी पूजा की थी। एक बार शिवजी त्रिपुर नामक राक्षस का वध करने जा रहे थे। उन्होंने विजय प्राप्ति के लिए गणेशजी का पूजन किया, तब उन्हें युद्ध में विजय की प्राप्ति हुई।

5- मां पार्वती ने गणेशजी की रचना की थी लेकिन इसका सुझाव उन्हें उनकी दो सखियों जया और विजया ने दिया था। उन्होंने मां पार्वती को सलाह दी कि वे भी शिवजी की तरह एक ऐसे गण का निर्माण करें जो उनका आज्ञाकारी हो। तब पार्वती ने गणेशजी की रचना की।

6- गणेशजी को एकदंत भी कहा जाता है। इसके पीछे भी एक रोचक कथा है। माना जाता है कि एक बार परशुरामजी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के दर्शन करने गए। उस समय शिवजी ध्यान कर रहे थे इसलिए गणेशजी ने परशुरामजी को अंदर नहीं जाने दिया।

इस बात से क्रोधित परशुराम ने अपने फरसे का वार गणेशजी पर कर दिया। चूंकि वह फरसा शिवजी ने ही परशुराम को दिया था, इसलिए गणेशजी चाहते थे कि उसका वार खाली न जाए और उन्होंने वह वार अपने दांत पर झेल लिया।

7- गणेशजी महान लेखक भी हैं। उन्होंने महाभारत का लेखन किया था। इस ग्रंथ के रचयिता तो वेदव्यास हैं लेकिन लिखने का दायित्व गणेशजी ने वहन किया। लेखन के लिए गणेशजी की शर्त थी कि उनकी लेखनी बीच में नहीं रुकनी चाहिए।

इसके लिए वेदव्यास ने उनसे कहा कि वे हर श्लोक को समझने के बाद ही लिखें। श्लोक का अर्थ समझने में गणेशजी को कुछ समय लगता था और उसी दौरान वेदव्यासजी आवश्यक कार्य पूर्ण कर लेते थे।

Happy is the son whose faith in his mother remains unchallenged. The unexplainable relationship that exists between a mo...
22/08/2020

Happy is the son whose faith in his mother remains unchallenged. The unexplainable relationship that exists between a mother and a child goes back far in time. Even the gods took refuge under the wings of their mothers’ love when their powers refused to work wonders for them. There are enough legends associated with Lord Ganesh and Maa Parvati. The very basis of Ganapati’s existence came from the fact that he was formed by the mother goddess herself. Legend has it that once when Maa Parvati wanted to take bath and there was no attendant to be on guard for her, she created an idol from the turmeric paste which she had made to cleanse her body while bathing. Then she infused life into it, hence Ganesha was born.

There are innumerable instances proving how Gajanan loved his parents,especially his mother. Moment he lost his head and stood still, it was Maa who compelled Mahadev to put life back into her piece of heart that very moment. Then an elephant’s head was fixed on Bappa’s body. Lord’s love for his mother was so much so, that he didn’t mind being called the ‘elephant lord’ after that time, something which even Mahadev found tender and pure.

There is another famous tale of a competition between Ganesh and brother Kartikeya, to win the fruit of knowledge. This also depicts how Ganapati put his parents ahead of everything.

Shiva and Parvati decided to give the fruit to either of their sons. But the condition was to circle the world thrice and the winner takes the fruit. Kartikeya flew the world on his peacock. But what Bappa did, made him the most-loved son forever. Ganesha took three rounds of Shiva and Parvati, who for him were his world. Ganapati, at every given point, has set examples for humans to learn from. He earned a place for himself amidst the gods; he became the one who gets worshipped even before the Trinity is invoked. What Ganesha did for mother, is probably an act of courage and valour, setting an example for the generations to come and learn from. Letting go of your head for the honour of your mother, is a feat that we rarely hear today. The love that Ganesha has for his mother is unmatched in today’s time.

Om Shri Ganeshaya Namah ~ Jai Shankar Parvati ~ Jai Uma Maheshvara!!

भगवान विष्णु के श्रीमुख से सुने कौन है उन्हें सबसे अधिक प्रिय!!!!!!!एक बार की बात है भगवान नारायण वैकुण्ठलोक में सोये हु...
28/11/2019

भगवान विष्णु के श्रीमुख से सुने कौन है उन्हें सबसे अधिक प्रिय!!!!!!!

एक बार की बात है भगवान नारायण वैकुण्ठलोक में सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्न में देखा कि करोड़ों चन्द्रमाओं की कांतिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनंदित होकर उनके सामने नृत्य कर रहे हैं। उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष से गद्‍गद्‍ हो उठे और अचानक उठकर बैठ गए, और कुछ देर मग्न हो गए। उन्हें इस प्रकार बैठे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगीं, भगवन! आपके इस प्रकार अचानक निद्रा से जापने का क्या कारण है?''

भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रशन का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले, ``देवी, मैंने अभी स्वप्न में भगवान शंकर के दर्शन किए। उनकी छवि ऐसी आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। मुझे एेसा लग रहा है कि, भोलेनाथ ने मुझे स्मरण किया है। चलो, कैलाश में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करते हैं।''

ऐसा विचार कर दोनों कैलाश की ओर चल दिए। भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश मार्ग के आधे दूर गए कि देखते हैं भगवान शंकर स्वयं पार्वती माता के साथ उनकी ओर चले आ रहे हैं। अब भगवान के आनंद का तो ठिकाना ही नहीं रहा। पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले।

ऐसा लगा, मानों प्रेम और आनंद का समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा हो। एक-दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनन्दाश्रु बहने लगे। दोनों ही एक-दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर खड़े रहे। जब विष्णु भगवान ने शिव शंकर से पूछा तो मालूम हुआ कि शंकर जी को भी रात्रि में इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानों विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे हैं, जिस रूप में अब उनके सामने खड़े थे।

दोनों के स्वप्न के वृत्तान्त से अवगत होने के बाद दोनों एक-दूसरे को अपने निवास ले जाने का आग्रह करने लगे। नारायण ने कहा कि वैकुण्ठ चलो और भोलेनाथ कहने लगे कि कैलाश की ओर प्रस्थान किया जाए। दोनों के आग्रह में इतना अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाए?

इतने में ही क्या देखते हैं कि वीणा बजाते, हरिगुण गाते नारद जी कहीं से आ निकले। बस, फिर क्या था? लगे दोनों उनसे निर्णय कराने कि कहां चला जाए? बेचारे नारदजी तो स्वयं परेशान थे, उस अलौकिक-मिलन को देखकर। वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने। अब निर्णय कौन करे? अंत में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दें, वही ठीक है।

भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं। अंत में वे दोनों की ओर मुख करते हुए बोलीं, "हे नाथ, हे नारायण, आप लोगों के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके निवास अलग-अलग नहीं हैं, जो कैलाश है, वही वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है, वही कैलाश है, केवल नाम में ही भेद है। यहीं नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो हैं।"

मुझे तो स्पष्ट लग रहा है कि आपकी पत्नियां भी एक ही हैं। जो मैं हूं, वही लक्ष्मी हैं और जो लक्ष्मी हैं, वही मैं हूं। केवल इतना ही नहीं, मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गई है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानों दूसरे के प्रति ही करता है। एक की जो पूजा करता है, वह मानों दूसरे की भी पूजा करता है। मैं तो तय समझती हूं कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है।

मैं देखती हूं कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवंचना कर रहे हैं, मुझे असमंजस में डाल रहे हैं, मुझे भुला रहे हैं। अब मेरी यह प्रार्थना है कि आप लोग दोनों ही अपने-अपने लोक की ओर पधारिये। श्री विष्णु यह समझें कि हम शिव रूप में वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णु रूप में कैलाश-गमन कर रहे हैं।

इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए, दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया और अत्यंत हर्षित होकर अपने-अपने लोक को प्रस्थान किया। लौटकर जब श्री विष्णु वैकुण्ठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी ने उनसे प्रशन किया, "हे प्रभु, आपको सबसे अधिक प्रिय कौन है?''

भगवन बोले, "प्रिये, मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकर हैं। देहधारियों को अपने देह की भांति वे मुझे अकारण ही प्रिय हैं। एक बार मैं और श्री शंकर दोनों पृथ्वी पर घूमने निकले। मैं अपने प्रियतम की खोज में इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में देश-देशांतर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा।

थोड़ी देर के बाद मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गई। वास्तव में मैं ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूं। अलग-अलग दो घड़ों में रखे हुए जल की भांति मुझमें और उनमें कोई अंतर नहीं है। शंकरजी के अतिरिक्त शिव की चर्चा करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरीत जो शिव की पूजा नहीं करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते।''

इस तरह जो शिव की पूजा करता है वह वैकुंठवासी विष्णु को भी स्वीकार है और जो श्री विष्णु की वंदना करता है, वह त्रिपुरारी को भी मना लेता है।

जय श्री शंकर नारायणया

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