‘आम्ही वाचवू निज धर्म, संस्कृति अमृत कोष। मनसा वाचा कर्मणा जनी जनी निर्घोष।।’
निर्घोष अर्थात निश्चयात्मक घोष। श्री ओंकारेश्वर की भक्ती निश्चयात्मक है, सभी संकट से मुक्त करने वाली आश्वासक है। जलगांव शहर के जयनगर परिसर स्थित श्री ओंकारेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्री के औचित्य पर लाखो शिवभक्तों का जमावडा रहता है।
विगत पाँच दशकों से साकार किये हुए जयनगर परिसर स्थित श्री ओं
कारेश्वर मंदिर का संपूर्ण परिसर तथा अंतर्गत घटक विश्वभर के शिवभक्तों के आकर्षण का केंद्र रहा है। मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है. सुंदर मोरपंखी कलर, स्वयंभू त्रिपूंड, स्वयंभू जानवे, स्वयंभू ॐ चिन्ह है। मंदिर में शिवशंकर की मूर्ती अत्यंत सुंदर, विलोभनीय, पद्मासन एवं ध्यानस्थ स्वरूप में है और शिवभक्तों के अंत:करण में चिरंतन अंकित हुई है।
भाविकों के श्रद्धास्थान श्री ओंकारेश्वर मंदिर की देखभाल श्री ओंकारेश्वर चरिटेबल ट्रस्ट संस्था द्वारा की जाती है। प्रथम विश्वस्त विश्वस्त महर्षी पाराशर (पारीक विप्र) थे। शुक्ल यजुर्वेदीय माध्यंदिनी शाखा कुलोत्पन कै. ओंकारदासजी बालारामजी जोशी, जलगांव, महाराष्ट्र के सुपुत्र सर्वश्री जयनारायण ओंकारदास जोशी, शिवराम ओंकारदास जोशी, मिश्रीलाल ओंकारदास जोशी, पन्नालाल ओंकारदास जोशी, मुरलीधर मोहनलाल जोशी एवं प्रबंधक के रूप में श्री. पुरुषोत्तम मिश्रीलाल जोशी ने संस्था का कामकाज संभाला। मंदिर की वास्तू पूजा एवं मूर्ति प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव 0८ फरवरी १९७१ को अजमेर के सुप्रसिद्ध यज्ञाचार्य श्रीमान ब्रजमोहनजी व्यास के शुभहाथों से सुसंपन्न की गयी थी। मंदिर का निर्माणकार्य तीन हजार चौरस फीट में है और मंदिर का अंतर्गत निर्माणकार्य १५ बाय १५ चौरस फीट में है तथा मंदिर का शिखर ५१ फीट ऊँचाई वाला है। शिवालय का संपूर्ण निर्माणकार्य परंपरागत भारतीय वास्तुशैली में किया गया है और प्राचीन पद्धति से वास्तू को साकार करने का प्रयास किया है। मंदिर पर शंकर का गण, शिवपिंडी का अभिषिक्त जल प्राशन का प्रथम अधिकार प्राप्त श्री चंडेश्वर की स्थापना की गयी है। मंदिर के गाभारा से जलेकीद्वारा अभिषका का जल बाहर निकाला जाता है। भारत में अन्यत्र शिवमंदिर में अर्ध प्रदक्षिणा का प्रघात है। मात्र यहां जलेरी व्यवस्था के काऱण भाविकों को संपूर्ण प्रदक्षिणा करना सुलभ होता है।
मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा १९७१ में की गयी। श्री. मिश्रीलालजी जोशी ने अविरत परिश्रम किया। शिवलिंग के लिए अनेक प्रयास किये। श्री सदगुरू गुलवणी महाराज को की हुई प्रार्थना को सफलता प्राप्त हुई। ओंकारेश्वर के नर्मदा घाट पर शिवलिंग प्राप्त हुआ। मंदिर की वास्तूपूजा एवं मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा व ८ दिनों का रुद्रयाग करके सोमवार, दि. ८ फेब्रुवारी १९७१ को की गईय और सदर देवस्थान श्रीकृष्णके चरणों में अर्पित की गयी। मंदिर में विनामूल्य विशेष प्रसाद महाशिवरात्री को दिया जाता है।
पूजा की साधनसामग्री की, धार्मिक पुस्तकों के दालान मंदिर परिसर में है। मंदिर हररोज सुबह ५.३० को खोला जाता है और रात ९ बजे शयन आरती करके मंदिर के पट बंद कर दिये जाते है। मंदिर दोपहर १२ से ४ के दरमियान दर्शनार्थ बंद रहता है। मंदिर पर त्रिकाल आरती की जाती है। प्रात:आरती सुबह ७, सायंआरती ६ बजे भाविकों के सामुदायिक प्रार्थनासहित की जाती है। नवस की पूर्तता के निमित्त समय समय पर भाविकों ने अर्पण किये हुए छोटे-बड़े नवस के घंटों के बदले में उनका नाद कायमस्वरूपी रहे इसलिए मंदिर पर कायमस्वरूपी 225 किलों की महाघंटा लगायी गई है। संपूर्ण जिले में पद्मालय के बाद इतनी विशाल घंटा केवल ओंकारेश्वर मंदिर में ही है।