09/06/2026
ॐ साई राम
*मेरे साईं जी ने फरमाया है जो भक्त पूर्णतः मेरे शरणागत हो जाता है तथा निष्कपट भाव से मेरी पूजा, ध्यान तथा सतत् मेरा ही चिंतन करता है, मै ऐसे भक्त का सदा ही ऋणी रहता हूँ। ऐसे भक्त मे सांसारिक वासनाएं कभी प्रवेश नही कर सकती। जैसा कि मैने अपने ग्यारह वचनों मे कहा है कि "धन्य धन्य वह भक्त अनन्य, मेरी शरण तज जिसे ना अन्य" मै अपने भक्तों के अधीन हूँ। संतों की कार्यप्रणाली अगम्य होती है। संत भी अपने भक्त की सेवा के लिए सदैव लालायित रहते हैं।*
*बाबा साईं सबकी भली कर रहे हैं*
*सबका मालिक एक*🙏❤️