Bhakti Marg Sadhan

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09/03/2026
*होली का पर्व 'अधर्म पर धर्म' और 'अहंकार पर भक्ति' की विजय का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर सोना शुद्ध हो जाता है...
02/03/2026

*होली का पर्व 'अधर्म पर धर्म' और 'अहंकार पर भक्ति' की विजय का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर सोना शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार 'होलिका दहन' हमारे भीतर की बुराइयों, ईर्ष्या और द्वेष को जलाकर मन को निर्मल करने का अवसर है।*
*भक्त प्रह्लाद का विश्वास: प्रह्लाद अटूट विश्वास के प्रतीक हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह संदेश है कि यदि परमात्मा पर अडिग विश्वास हो, तो संसार की कोई भी विषम परिस्थिति (होलिका) आपका अहित नहीं कर सकती।*
*समरसता का रंग: जब हम एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, तो चेहरे की पहचान मिट जाती है और केवल 'आनंद' शेष रहता है। यह इस बात का प्रतीक है कि आत्मा का कोई रंग या भेद नहीं होता; हम सब उस एक परमात्मा की ही संतान हैं।*

समुद्र मंथन— भागवत पुराण - स्कन्ध 8एक समय की बात है, देवताओं और असुरों ने अमृत, अमरता का अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीर ...
23/02/2026

समुद्र मंथन
— भागवत पुराण - स्कन्ध 8
एक समय की बात है, देवताओं और असुरों ने अमृत, अमरता का अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीर सागर (दूध के सागर) को मथने का फैसला किया। उन्होंने मंदरा पर्वत को मथानी और सर्प वासुकी को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया। विष्णु ने अपने कूर्म (कछुए) अवतार में, पर्वत को अपनी पीठ पर सहारा दिया। जैसे ही उन्होंने मंथन किया, कई अद्भुत चीजें निकलीं: दिव्य गाय कामधेनु, इच्छापूर्ति वृक्ष कल्पवृक्ष, देवी लक्ष्मी, और अंत में, धन्वंतरि अमृत के बर्तन के साथ। हालाँकि, घातक विष हलाहल भी सतह पर आ गया, जिससे ब्रह्मांड नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा। भगवान शिव ने अपनी असीम करुणा में जहर पी लिया और उसे अपने गले में रख लिया, जिससे उनकी गर्दन नीली हो गई, इसलिए उनका नाम नीलकंठ पड़ा। अमृत के लिए देवताओं और असुरों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। विष्णु ने अपने मोहिनी अवतार (एक सुंदर जादूगरनी) में, असुरों को धोखा दिया और केवल देवताओं को अमृत वितरित किया, जिससे उनकी जीत और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का संरक्षण सुनिश्चित हुआ। यह कहानी अच्छाई और बुराई के बीच शाश्वत संघर्ष और दैवीय हस्तक्षेप के महत्व को उजागर करती है।
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महाशिवरात्रि केवल एक व्रत या त्योहार नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर छिपे 'शिवत्व' को जगाने का एक महापर्व है। इसका आध्या...
15/02/2026

महाशिवरात्रि केवल एक व्रत या त्योहार नहीं है, बल्कि यह स्वयं के भीतर छिपे 'शिवत्व' को जगाने का एक महापर्व है। इसका आध्यात्मिक संदेश गहरा और परिवर्तनकारी है।

1. अज्ञान से ज्ञान की ओर (अंधकार का अंत)
'शिवरात्रि' का अर्थ है—शिव की रात्रि। रात्रि अंधकार, अज्ञान और तमस का प्रतीक है। महाशिवरात्रि का संदेश है कि हम अपने भीतर के अज्ञान (अंधकार) को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ें। यह रात स्वयं के आत्म-साक्षात्कार के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
2. मन का नियंत्रण और ध्यान
शिव को 'पशुपतिनाथ' कहा जाता है, जिसका अर्थ है—इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त करने वाला।
सजगता: इस रात जागरण का अर्थ केवल जागते रहना नहीं, बल्कि अपनी चेतना के प्रति सजग (Aware) होना है।
शून्यता: शिव 'शून्य' भी हैं और 'अनंत' भी। यह पर्व हमें सिखाता है कि जब हम अपने अहंकार को शून्य कर देते हैं, तभी हम अनंत परमात्मा से जुड़ पाते हैं।
3. विष का रूपांतरण
समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तो शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया।
आध्यात्मिक संदेश: हमारे जीवन में आने वाली नकारात्मकता, क्रोध और ईर्ष्या रूपी विष को दूसरों पर उगलने के बजाय, उसे धैर्य और ध्यान की शक्ति से रूपांतरित करना ही सच्ची साधना है।
4. अर्धनारीश्वर: संतुलन का प्रतीक
शिव और शक्ति का मिलन पुरुष और प्रकृति, यानी 'दृढ़ता' और 'करुणा' के संतुलन का संदेश देता है। यह सिखाता है कि पूर्णता के लिए भीतर के स्त्रीत्व और पुरुषत्व दोनों गुणों का सामंजस्य आवश्यक है।
#हरहर महादेव
@ऊं नमः शिवाय

01/02/2026

वेलेंटाइन डे कहाँ से और कैसे शुरू हुआ इसका एक ऐसा आश्चर्यचकित इतिहास स्वर्गीय श्री #राजीव_दीक्षित जी ने विस्तृत रूप से बताया है जो आपको चकित कर देगा…!!!
आइये जानते हैं क्या बता रहे हैं श्री राजीव दीक्षित जी.!!

कहाँ से आया वेलेंटाइन-डे और इसे क्यों मनाया जा रहा है! जानिए इतिहास..!!


श्री राजीव दीक्षित ने बताया है कि #यूरोप और #अमेरिका का #समाज जो है वो रखैलों (Kept) में विश्वास करता है पत्नियों में नहीं। यूरोप और अमेरिका में आपको शायद ही ऐसा कोई #पुरुष या #महिला मिले जिसकी एक ही #शादी हुई हो, ये एक दो नहीं हजारों साल की उनकी परम्परा है ।
आपने एक शब्द सुना होगा “ in Relationship इसका मतलब होता है कि कुछ समय तक “बिना शादी के पति-पत्नी की तरह रहना” ।
यूरोप और अमेरिका में ये परंपरा आज भी चलती है। खुद प्लेटो (एक यूरोपीय दार्शनिक) का एक #स्त्री से सम्बन्ध नहीं रहा, #प्लेटो ने लिखा है कि “मेरा 20-22 स्त्रियोँ से सम्बन्ध रहा है” अरस्तु भी यही कहते है, और #रूसों ने तो अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “एक
स्त्री के साथ रहना, ये तो कभी संभव ही नहीं हो सकता, It’s Highly Impossible” ।
इन सभी महान दार्शनिकों का तो कहना है कि “स्त्री में तो #आत्मा ही नहीं होती। स्त्री तो मेज और कुर्सी के समान हैं, जब पुराने से मन भर गया तो पुराना हटा के नया ले आये “।
बीच-बीच में यूरोप में कुछ-कुछ ऐसे लोग निकले जिन्होंने इन बातों का विरोध किया और इन रहन-सहन की व्यवस्थाओं पर कड़ी टिप्पणी की । उन कुछ लोगों में से एक ऐसे ही #यूरोपियन #व्यक्ति थे जो आज से लगभग 1500 साल पहले पैदा हुए, उनका नाम था – #वेलेंटाइन । ये कहानी है 478 AD (after death) की, यानि ईसा की मृत्यु के बाद ।
उस वेलेंटाइन नाम के महापुरुष का कहना था कि “हम लोग (यूरोप के लोग) जो शारीरिक सम्बन्ध रखते हैं जानवरों की तरह, ये अच्छा नहीं है, इससे यौन संबंधी रोग (Venereal Disease) होते हैं, इनको सुधारो, एक पति-पत्नी के साथ रहो, #विवाह कर के रहो।” वो वेलेंटाइन महाशय रोम में घूम-घूम कर यही भाषण दिया करते थे।
संयोग से वो एक चर्च के पादरी हो गए तो चर्च में आने वाले हर व्यक्ति को वो यही शिक्षा देते थे।कुछ लोगों ने उनसे पूछा कि ये वायरस आप में कहाँ से घुस गया? ये तो हमारे यूरोप में कहीं नहीं है।
तो वो कहते थे कि “आजकल मैं भारतीय संस्कृति और दर्शन का अध्ययन कर रहा हूँ, और मुझे लगता है कि वो उत्तम है, और इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप लोग इसे मानो।
तो जो लोग उनकी बात मानते थे, उनकी #शादियाँ वो #चर्च में कराते थे। ऐसी एक-दो नहीं उन्होंने #सैकड़ों शादियाँ करवाई थी ।
जिस समय वेलेंटाइन हुए, उस समय #रोम का #राजा था #क्लौड़ीयस। जो बड़ा क्रूर था ।
क्लौड़ीयस ने कहा कि “ये जो आदमी है-वेलेंटाइन, ये हमारे यूरोप की परंपरा को बिगाड़ रहा है, हम बिना शादी के रहने वाले लोग हैं, #मौज-मजे में डूबे रहने वाले लोग हैं, और ये शादियाँ करवाता फिर रहा है, ये तो असंस्कृति फैला रहा है, हमारी #संस्कृति को नष्ट कर रहा है”।
इसलिए क्लौड़ीयस के आदेश पर वेलेंटाइन को #14 फरवरी #498 ई.वी. को #फाँसी दे दी गई। उसका आरोप क्या था कि वो बच्चों की शादियाँ कराता था। मतलब यूरोप में शादी करना जुर्म था ।
तो जिन बच्चों ने वेलेंटाइन के कहने पर शादी की थी वो बहुत #दुखी हुए और उन सब ने उस वेलेंटाइन की दुःखद याद में 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे मनाना शुरू किया तो उस दिन से यूरोप में वेलेंटाइन डे मनाया जाता है ।
तो ये था वेलेंटाइन-डे का इतिहास और इसके पीछे का आधार ।
अब यही वेलेंटाइन-डे भारत में जब अंग्रेज आये तब वो लोग मनाते थे तो भारत के कुछ अंग्रेज के चाटुकार, मूर्ख और लालची लोग भी मनाने लगे ।
भारत में अंग्रेज वेलेंटाइन डे इसलिए मना रहे थे कि भारत के लोगों का नैतिक पतन हो जिससे वो अंग्रेजो के सामने लड़ ही न सके और लंबे समय तक भारत गुलाम बनाफिर अंग्रेज तो गये लेकिन विदेशी कम्पनियां ने सोचा कि हम अगर भारत में वेलेंटाइन डे को बढ़ावा देते हैं तो हमें अरबों खबरों का फायदा होगा तो उन्होंने टीवी, अखबार आदि में खूब-प्रचार प्रसार किया जिससे उन्होंने महंगे ग्रीटिंग कार्ड, गिफ्ट, फूल चॉकलेट आदि से कई करोड़ो रुपए कमाएं। इसके इलावा ब्ल्यू फिल्म, गर्भ निरोधक साधन, पोनोग्राफी, उतेजक पोप म्यूजिक जैसी काम उतेजक दवाइयां बनाने वाली विदेशी कम्पनियां अपने आर्थिक लाभ हेतु समाज को चरित्रभ्रष्ट करने के लिए करोड़ों अरबों रूपये खर्च कर रही है।
वाणिज्य एवम उद्योग मंडल (एसोचैमके ) के एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2016 में वेलेन्टाइन डे से जुड़े सप्ताह के दौरान फूल, चॉकलेट, आदि विभिन्न उपहारों की बिक्री का कारोबार 22,000 करोड़ रूपये था । इस बार 30,000 करोड़ रूपये का कारोबार होने का अनुमान है । वस्तुत: वेलेन्टाइन डे के विदेशी बाजारीकरण वासनापूर्ति को बढ़ावा देने वाला दिन है ।
अब ये #वेलेंटाइन डे हमारे स्कूलों में कॉलजों में बड़े धूम-धाम से मनाया जा रहा है और हमारे यहाँ के #लड़के-लड़कियाँ बिना सोचे-समझे एक दूसरे को वेलेंटाइन डे का कार्ड, गिफ्ट फूल दे रहे हैं।

जानकारी प्रत्येक भारतीय तक पहुंचाने के लिए शेयर जरूर करें
#राजीव_दीक्षित #रूसों #वेलेंटाइन #यूरोपियन
Aniruddhachary Ji Maharaj
Bhajan Marg

31/01/2026

गृहस्थके लिये सुनहरी शिक्षाएँ🌹🙏 कल्याण 🙏🌹
बहुत सुन्दर जानकारी, गीता वाटिका गोरखपुर।
(कृपया शेयर लाइक करें करते जाइए)

१. यह घर प्रभुका है और तुम प्रभुके सेवक हो, इसे कभी मत भूलो ।
२. प्रभुसे डरो, उन्हें कभी भूलो मत ।
३. पवित्रता धारण करो और जीवनको सादा रक्खो ।
४. सर्वदा उच्च विचारोंका सेवन करो ।
५. घरमें शान्ति रक्खो। केवल सेवाभाव रक्खोगे तो आप ही शान्ति रहेगी ।
६. विभिन्न प्रकारकी सत् चर्चाएँ मर्यादामें रहकर करो ।
७. सत्यके साथ-साथ मीठा भाषण करो ।
८. वाद-विवाद कळहका मूल है। इससे बचे रहो।
९. नवागन्तुक जीव अपना प्रारब्ध अपने साथ लाता है। इसे याद रक्खो ।
१०. अतिथिका उसकी योग्यताके अनुसार अवश्य सत्कार करो
११. प्रत्येक वस्तु योग्य और नियत स्थानपर रक्खो ।
१२. काममें न आनेवाली वस्तुओंका ढेर मत लगाओ ।
१३. बालकों और नौकरोंके साथ प्रेम और नम्रतासे बातचीत और बर्ताव करो ।
१४. कलके विषयमें आज ही विचार कर लो
१५. आजका काम आज ही पूरा कर दो।
१६. सब काम धीरज और शान्तिसे करो ।
१७. शत्रुको प्रेमसे परास्त करो ।
१८. सुखका विस्तार करनेमें कृपण मत बनो ।
१९. गृहस्थका सच्चा आभूषण नम्रता है
२०. प्रेम ही प्रभुकी प्राप्तिका मार्ग है।
२१. सारे दुःखके मूल असन्तोषको दूर करो ।

Bhakti Marg Sadhan मेरो वृंदावन

🚩 क्या प्राचीन भारत में सच में छुआछूत और जातिगत शोषण था?या फिर यह झूठ हमें बार-बार पढ़ाया गया?चलिए, हज़ारों साल पुराने इ...
31/01/2026

🚩 क्या प्राचीन भारत में सच में छुआछूत और जातिगत शोषण था?
या फिर यह झूठ हमें बार-बार पढ़ाया गया?
चलिए, हज़ारों साल पुराने इतिहास से खुद जवाब ढूंढते हैं 👇
📜 वैदिक और प्राचीन भारत
🔹 सम्राट शांतनु ने मछुआरे की पुत्री सत्यवती से विवाह किया।
उनके पुत्र के लिए भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली — क्या यह शोषण था या त्याग?
🔹 महाभारत के रचयिता वेदव्यास मछुआरे कुल से थे, फिर भी महर्षि बने, गुरुकुल चलाया।
🔹 विदुर, दासी पुत्र होकर भी हस्तिनापुर के महामंत्री बने — विदुर नीति आज भी राजनीति का महाग्रंथ है।
🔹 भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।
🔹 श्रीकृष्ण ग्वाल परिवार में जन्मे,
🔹 बलराम हल धारण करने वाले कृषक थे।
फिर भी श्रीकृष्ण पूरे विश्व के पूजनीय बने और गीता दी।
🔹 राम के मित्र निषादराज उनके साथ गुरुकुल में पढ़े।
🔹 लव-कुश ने शिक्षा पाई वनवासी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में।
👉 साफ़ है —
📌 शिक्षा, सम्मान और पद योग्यता से मिलते थे, जन्म से नहीं।
📌 वर्ण काम के आधार पर थे — आज की भाषा में Division of Labour।
🏹 जनपद और साम्राज्य काल
🔹 नन्द वंश (मगध) — नाई कुल से उठकर सम्राट बने।
🔹 मौर्य वंश — मोर पालने वाले चंद्रगुप्त को ब्राह्मण चाणक्य ने भारत का सम्राट बनाया।
🔹 गुप्त वंश — घोड़े का व्यापार करने वाले, 140 वर्षों तक स्वर्ण युग।
👉 प्राचीन काल का 92% शासन उन्हीं वर्गों का रहा जिन्हें आज “दलित-पिछड़ा” कहा जाता है।
तो फिर शोषण कहाँ था?
⚔️ मध्यकाल और मराठा युग
🔹 बाजीराव पेशवा ने
— ग्वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया
— चरवाहा होलकर को मालवा का शासक।
🔹 अहिल्याबाई होलकर — शिवभक्त, मंदिर और गुरुकुलों की निर्माता।
🔹 मीरा बाई (राजपूत) के गुरु — चर्मकार रविदास,
और रविदास के गुरु — ब्राह्मण रामानंद।
👉 यहाँ भी कोई जातिगत दीवार नहीं दिखती।
⛓️ असल गंदगी कब शुरू हुई?
🔻 मुगल काल में — पर्दा, गुलामी, बाल विवाह।
🔻 अंग्रेज़ी शासन (1800–1947) में —
“Divide & Rule” और जाति की सख़्त दीवारें।
📚 अंग्रेज अधिकारी Nicholas Dirks की किताब “Castes of Mind” बताती है
कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद को मजबूत किया
और कैसे कुछ स्वार्थी नेताओं ने उसे राजनीति बना दिया।
🌍 मेगास्थनीज, फाहियान, ह्वेनसांग, अलबरूनी —
किसी भी विदेशी यात्री ने नहीं लिखा कि भारत में जातिगत शोषण था।
🚩 निष्कर्ष
👉 प्राचीन भारत = योग्यता, कर्म और समरसता
👉 जातिवाद = औपनिवेशिक साजिश + आधुनिक राजनीति
अगर इतिहास सच में जानना है,
तो किताबें पढ़िए — न कि प्रोपेगेंडा।
✊ सच कड़वा हो सकता है,
लेकिन इतिहास झूठ नहीं बोलता।
📌 सहमत हों तो Like 👍
📌 सोच बदलनी हो तो Share 🔁
📌 असहमत हों तो Comment में तर्क दें 💬

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