All India Banna & Baisa

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10/10/2021
31/05/2021

#हरनावां चलो....हरनावां चलो....
#हरनावा_हत्याकांड
#आगामी 2 जून को सुबह 11 बजे हरनावा

08/01/2021

=हुतात्मा ठाकुर मोहन सिंह मडाड(रघुवंशी प्रतिहार)=


(यादगार अहमद की तवारीखें-सलतीने-अफगाना; इलियट एंड डौसन भाग 5; बाबरनामा, सर एडीलवर्ट टेबोलेट का अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)



ठाकुर मोहन सिंह मडाड का इतिहास साहस और शौर्य की परकाष्ठा है और भारत के इतिहास में जालौर के सोनीगारा चौहान वीरमदेव के बाद क्षत्रियों का शौर्य प्रदर्शित करने वाले इस दुर्लभ वीर पुरुष की जितनी प्रशंशा की जाय वह कम ही होगी क्योकि अल्प और सीमित साधन रहते हुए इन्होंने उस बाबर की समुद्र सी लहराती प्रबल सत्ता को चुनौती दी उसके अह्निर्श विजयों से उत्तर भारत थर थर काँप रहा था, इन्होंने उस महाबली बाबर को भी अपनी तलवार का पानी पिला कर छोड़ा।

यह घटना है सन 1530 की है| उस समय बाबर लाहौर में था और आगरा जाने की तैयारी में था। 4 मार्च सन् 1530 ईस्वी को बाबर ने लाहौर से आगरा जोन के लिए प्रस्थान किया।
सरहिंद पहुँचने पर उसे समाना के काजी ने उससे मुलाकात कर बताया की कैथल के मोहन सिंह मडाड (मंडहिर) नामक राजपूत ने उसकी इमलाक (जागीर) पर हमला करके उसे लूटकर जलाया और उसके बेटे को मार डाला। काजी की बात सुन के आग बबूला हुए बाबर ने फ़ौरन ही तीन हजार घुड़सवारों के साथ अली कुली हमदानी को कैथल परगना में ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव भेजा।

यादगार अहमद बताता है की अलसुबह मुग़लों की सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुँचीं उस समय गाँव में बारात आई हुयी थी। जोड़े का दिन था और उस दिन ठण्ड भी कुछ ज्यादा ही था। जब मुघल सेना की गाँव की तरफ कूच की खबर सुनी तब वह भी अपने नौजवानों के साथ बाहर निकला और सामने आते ही मडाडों ने तेजी से वाणों की वर्षा करते हुए शाही सेना के पाँव उखाड़ दिए। इस भयंकर युद्ध में 1 हजार तुर्क मारे गए शेष भाग कर पास के ही एक जंगल में छिप गए।

यादगार अहमद को शर्मिंदगी उठाते हुए भी इस घटना का जिक्र करना पड़ा और उसने हार का बहाना बनाते हुए लिखा के जाड़े की दिनों में तुर्की धनुष की तांत अकड़ जाती है इस वजह से तुर्क कायदे से धनुष पर बाण चढ़ा ही नहीं सके।

जंगल में पहुचने के बाद तुर्कों ने लकड़ियाँ इकट्ठी कर के उसमे आग जलाकर पूरी तरह तापा और आग से धनुष की तांत को ढीला कर फर से योजना बनाकर एक बार फिर मोहन के गाँव की और बढ़ने लगे। तुर्कों की इस धृष्टता को देखकर राजपूतों की आँखों में खून उतर आया और उन्होंने दुगने उत्साह से तुर्कों से मुकाबला किया। इस बार भी बहुत सारे शाही सैनिक मारे गए। बाकि सैनिको को लेकर अली खान हमदानी भाग चला और सरहिंद पहुँच कर ही साँस ली।

शाही सेना की हार सुनकर बाबर शर्मसार होते हुए ठाकुर मोहन सिंह मडाड के नाश का संकल्प लेते हुए तुरन्त 6000 घुड़सवार सैनिकों के साथ अपने सिपहसालार तरसम बहादुर और नौरंगवेग को भेजा जो पानीपत दोनों युद्धों में अपनी तलवार और तीर का जौहर दिखा चुके थे। इन्होंने छोटे मोटे युद्ध तो देखे ही नहीं थे बड़ी बड़ी लड़ाइयों में अपनी योग्यता दिखाने का आनंद आता था। ठाकुर मोहन सिंह मडाड के पराकम की कहानी अली कुली हमदानी के मुँह से तरसेम बेग ने सुनी थी। हमदानी संकोच करते हुए बेग को बताता है की अब तक लड़ीं हुईं लड़ाइयों में सिर्फ ठाकुर मोहन सिंह मडाड ने ही उसकी पीठ देखी है।

सरहिंद से चलते चलते तरसेम बेग ने सोचा की मोहन सिंह जरूर विशेष किस्म का बहादुर व्यक्ति होगा नहीं तो सब ओअर गालियाँ न्योछावर करने वाला अली कुली मोहन सिंह के तारीफों के पुल नहीं बाँधता। रास्ता तय करते हुए उसने सोच लिया के दुश्मन को सिर्फ बल से नहीं छल से मारना और हराना होगा।

ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गांव के नजदीक आने पर तरसेम बेग ने अपने सैनिकों को तीन भागों में बाँट दिया। हरावल दस्ते को यह हिदायत दी की वे गाँव के पास जाकर मडाडों को ललकारें। जब ललकार सुनकर राजपूत गाँव से बाहर युध्द के लिए आग बाबुल होकर निकलें तो हरावल दस्ता भाग चले और भागते जाए इसी बीच उसकी राइट विंग गाँव को घेर ले और उसमें आग लगा दे इस विंग की कमांड उसने खुद अपने हाथों में ली और नौरंग बेग के हाथों में 2 हजार घुड़सवारों की सेना रिजर्व रखी। जब मडाड बीच में घिर जाएँ तब उन पर जोरदार करना इस दस्ते का काम था।

यादगार अहमद बताता है के जिस दिन जब शाही सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुची संयोग वष उस दिन भी गांव में बारात आई हुई थी।

जब शाही सेना का हरावल दस्ता गाँव के नजदीक पहुँचा तो योजना अनुसार उन्होंने मडाडों को ललकारा तब मडाडों की नस नस में चिंगारी दौड़ पङी और वह तुरन्त तैयार होकर बहार निकले और शाही सेना पर तीरों की बौछार करने लगे।राजपूतों के आम के साथ ही पूर्व योजनानुसार शाही सेना पश्चिम की ओर भागने लगी और क्षत्रियों ने उनका तेजी से पीछा किया। शाही सेना भागती रही और राजपूत सेना उसका पीछा करती रही इसी बीच तरसेम बेग की टुकड़ी ने राजपूत विहीन गाँव में आग लगा दी। जब राजपूतों ने गाँव से उमड़ता हुआ धुँआ देखा तो वग वापिस लौटे। उनके पीछे मुड़ते ही भागती हुई सेना लौटने लगी। इस प्रकार राजपूतों की सेना शाही सेना के बीच फंस गयी। इसी समय नौरंगबेग अपनी सेना के साथ राजपूतों पर टूट पड़ा। चारों और से घिरने के बाद भी राजपूत वीरता और शौर्य से लड़े उधर गाँव धु धु करता जलता रहा। राजपूत शाही सेना के इस छल को नहीं समझ पाए और पूरा साहस और पराक्रम होते हुए भी इन्हें पराजित होना पड़ा।

इस युद्ध में एक हजार वीर राजपूत शहीद हुए । ठाकुर मोहन सिंह अंत तक लड़ते रहे परन्तु कब तक ? आखिर उन्हें भी पृथ्वीराज चौहान की तरह कैदी बनना पड़ा। उस दिन हजारों नर नारियों और बच्चों को शाही सेना ने कैद कर लिया और मोहन सिंह के साथ उन कैदियों को दिल्ली ले जाया गया क्योकि तब तक बाबर सरहिंद से रवाना होकर दिल्ली पहुँच गया था।

दिल्ली दरबार में ठाकुर मोहन सिंह मडाड की पेशी हुई और बाबर ने इन्हें सजा ए मौत का फरमान सुनाया पर साथ साथ यह भी कहा यदि ठाकुर मोहन सिंह मडाड इस्लाम कबूल लेतें है तो उनकी सजा माफ़ कर दी जायेगी। ठाकुर साहब चाहते तो मुस्लिम बनकर अपने प्राण बचा सकते थे परन्तु उस योद्धा को जीवन से प्यारा वह मूल्य था जो क्षत्रियों के लिए अभिप्रीत था उनका धर्म। मोहन सिंह मडाड ने यह साबित कर दिया के वह एक सच्चे प्रतिहार और रघुवंशी थे जिनकी रीत में ही प्राणों से पहले वचन और धर्म की रक्षा करना है।

सिजदा से गर वहिश्त मिले दूर कीजिये,
दोजख ही सही सर को झुकाना नहीं अच्छा।
बेटा तूं राजपूत, याद सदा ही राखिजे,
माथा झुके न सूत, चाहे शीश ही कटिजे।।

==== मृत्युंजय मोहन ====

स्वाभिमानी ठाकुर मोहन अपना सर नहीं झुका सका और ख़ुशी ख़ुशी मृत्यु को आलिंगन करते हुए आगे बढे।क्षत्रियों के इस वारिस को बाबर ने एक विषेश प्रकार की विधि से मौत देने का फैसला किया।
ठाकुर मोहन सिंह को कमर तक मिटटी में दफना दिया गया और शाही सेना ने उनपर तीरों की बौछारें शुरू कर दी। सैकड़ों तीर देखते ही देखते ठाकुर मोहन सिंह का शरीर भेदने लगे। उनके शरीर से खून की फुहारें छूटने लगीं परन्तु गर्दन और शीश बाबर के सामने तना खड़ा रहा। वह अभी भी नहीं झुका जिससे बाबर झल्ला उठा। जब तक रक्त की अंतिम बूँद ठाकुर मोहन सिंह के शरीर से नहीं छुटी वह तन के खड़े रहे और देखने वाले भी हैरानी से देखते रहे की इतनी आघातों के बाद भी उनके चेहरे पर दर्द और पीड़ा नहीं छलक रही थी जैसे वह संवेदनहीन ही हो गए हो। अंत में ठाकुर मोहन सिंह जी का शीश धरती माँ को वंदन करते हुए छु पड़ा और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

ठाकुर मोहन सिंह मर कर भी अमर हो गए। उन्होंने दो बार शाही सेना को अपने शौर्य से पराजित किया जिससे बाबर लज्जित हुआ उसने अपनी आत्म कथा तजुके बाबरी में जहाँ छोटी छोटी बातें भी दर्ज कर लीं थी वहीं शर्मिन्दिगी के कारण इस प्रसंग को छोड़ दिया। इस महत्वपूर्ण घटना का पूर्ण विवरण हुमायूँ कालीन यादगार अहमद ने अपनी तवारीख ए सलातीने अफगाना में दिया।

इस युद्ध में मुआँना गाँव के परम् योद्धा ठाकुर मामचन्द मडाड भी शाही सेना के साथ युद्ध करते हुए शहीद हुए वे ठाकुर मोहन सिंह के रिसालदार थे, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कपूर कँवर सतीं हूईं। जिनकी देवली मुआँना गाँव तहसील सफीदों जिला जींद हरयाणा में आज तक बनीं हुई है जहाँ शादी के बाद हर नव विवाहिता राजपूत क्षत्राणी आशीर्वाद और सौभाग्य लेने जाती है।

=== संदर्भ ===

1. डॉक्टर विंद्यराज चौहान कृत भारत के प्रहरी प्रतिहार वंश।
2. ब्रिटिश कालीन करनाल गजट
3. ठाकुर ईश्वर सिंह मडाड कृत राजपूत वंशवाली

सोजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

#मूढाड

30/10/2020

प्रतिहार/पड़िहार राजपूतों का का मंडोर राज चिन्ह.... ....

's
#कुलदेवी_कृपा

सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

17/10/2020

#ट्रेंड_के_लिए_पूरी_पोस्ट_पढ़े

हैशटैग -



समय - कल 8 बजे

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सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

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09/09/2020

बहुत ही शानदार👌👌 बोर्ड लगवाने सभी भाइयों को बहुत बहुत धन्यवाद। जय राजपूताना।।
जय मां भवानी।।

#मिहिरभोज #प्रतिहार #राजपूताना

08/09/2020

देवीसिंह मंडावा ने अपनी पुस्तक “प्रतिहारों का मूल इतिहास” में उनकी उत्पत्ति से सम्बन्धित लिखा है-

इतिहास से प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार प्रतिहारों में मण्डोर (राजस्थान) के प्रतिहारों का पहला राजघराना है जिसका शिलालेखों से वर्णन मिलता है। मण्डोर के प्रतिहारों के कई शिलालेख मिले हैं जिनमें से तीन शिलालेखों में पड़िहारों की उत्पति और वंश क्रम का वर्णन प्राप्त है। उनका वर्णन इस प्रकार है-

वि. सं. 894 चैत्र सुदि 5 ईसवी 837 का शिलालेख जोधपुर शहर पनाह की दीवार पर लगा हुआ है। यह शिलालेख पहले मण्डोर स्थित भगवान विष्णु के किसी मन्दिर में था। यह शिलालेख मण्डोर के शासक बाउक पड़िहार का है।वि. सं. 918 चैत्र सुदि 2 ईस्वी के दोनों ही घटियाला के शिलालेख हैं एक संस्कृत में लिखित है तथा दूसरा उसी भाषा का अनुवाद है। ये दोनों शिलालेख मण्डोर के पड़िहार के है।1 इन तीनों ही शिलालेखों में रघुकुल तिलक श्री रामचन्द्र के भाई लक्ष्मण से इस प्रतिहारों कुल की उत्पत्ति होना वर्णित किया है। सम्बन्धित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं। बाउक पड़िहार का जोधपुर का अभिलेख

स्वभ्रात्त्रा रामभद्रस्य प्रतिहार कृतं यतः, श्री प्रतिहार वड्शो यमतक्ष्चोन्नति माप्नुयात।3,4।

अर्थात्-अपने भाई के रामभद्र ने प्रतिहारी का कार्य किया। इससे यह प्रतिहारों का वंश उन्नति को प्राप्त करें। घटियाला अभिलेख

रहुतिलओपडिहारो आसीसिरि लक्खणोंतिरामस्य, तेण पडिहारवन्सो समुणईएन्थसम्पती।

अर्थात्-रघुकुल तिलक लक्ष्मण श्रीराम का प्रतिहार था। उससे प्रतिहार वंश सम्पति और समुन्नति को प्राप्त हुआ। इसी अभिलेख में दिया हैं कि संवत् 918 चैत्र माह में जब चन्द्रमा हस्त नक्षत्र में था, शुक्ल पक्ष की द्वितीया बुधवार को श्री कक्कुक ने अपनी कीर्ति की वृद्धि करने हेतु रोहिन्सकूप ग्राम में एक बाजार बनवाया जो महाजनों, विप्रों, क्षत्रियों एवं व्यापारियों से भरा रहता था।

भोज प्रतिहार की ग्वालियर प्रशस्ति

प्रतिहारों की उत्पति के विषय में ग्वालियर में मिली हुई कन्नोज के प्रतिहार सम्राट भोज के समय की प्रशस्ति में लिखा है कि –

मन्विक्षा कुक्कुस्थ (त्स्थ) मूल पृथव: क्ष्मापाल कल्पद्रुमाः।2।।

तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वजैषु घोरं,

रामः पौलस्त्य हिन्श्रं (हिस्रं) क्षतविहित समित्कर्म्म चक्रे पलाशेः ।

श्लाघ्यस्तस्यानुजो सौ मधवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये,

सौमित्रिस्तीव्रदंडः प्रतिहरण विर्धर्यः प्रतिहार आसीत् ।।3।।

तावून्शे प्रतिहार केतन भृति त्रैलोक्य रक्षा स्पदे

देवो नागभटः पुरातन मुने मूर्तिब्बमूवाभिदुत्तम ।।2

अर्थात् ‘सूर्यवंश में मनु, इक्ष्वाकु, काकुस्थ आदि राजा हुए, उनके वंश में पौलस्त्य (रावण) को मारने वाले राम हुए, जिनका प्रतिहार उनका छोटा भाई सौमित्र (लक्ष्मण) था, उसके वंश में नागभट्ट हुआ। आगे चलकर इसी प्रशस्ति में वत्सराज को इक्ष्वाकु वंश को उन्नत करने वाला कहा है। इसी प्रशस्ति के सातवें श्लोक में वत्सराज के लिये लिखा है कि उस क्षत्रिय पुगंव ने बलपूर्वक भडिकुल का साम्राज्य छीनकर इक्ष्वाकु कुल की उन्नति की।


सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

07/09/2020

वीर_प्रतापी_चक्रवर्ती_क्षत्रिय_सम्राट_मिहिरभोज_प्रतिहार

इस राजपूत की गाथा भले ही हिन्दू स्मृति में आज नही है, केवल नाम भर जानते है, लेकिन इस्लाम पर इस प्रतापी वीर राजपूत ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है ....

यूं कहें तो तो अगर मुसलमान " सुंवर " से घृणा करते है तो इन्ही राजा के कारण , ओर अगर मूंछे नही रखते, तो इन्ही राजा के कारण !! 36 लाख की सेना हर दिशा में 9 लाख सैनिक ! जिसमे महिलाएं भी शामिल थी, आज की इजरायल सुरक्षा नीति उन्ही का अनुसरण कर रही है ।

अब आपको यह समझना चाहिए कि इतिहास को छिन्न भिन्न करने वाला वामपंथ ओर इस्लाम अगर किसी के इतिहास के साथ खिलवाड़ करेगा, तो इसी राजा के इतिहास के साथ करेगा, क्यो की बहुत बुरी यादें जो जुड़ी है ।

राजपूतो इतिहास के लेखकों ने भी इनका इतिहास लिखा है, लेकिन वही विदेशी इतिहास को ध्यान में रखकर .... उसे ही पढ़कर, उसी को आधार मानकर ...

लेकिन भारतीय लोगो का इतिहास को संजोने का एक ओर तरीका है, वह है लोकगीत ओर कथाएं !! , की अगर लिखित इतिहास खत्म भी किसी शक्ति द्वारा कर दिया जाए, तो भी वह कभी खत्म न हो ......

लेकिन बड़ा दुर्भाग्य है, की बड़े से बड़ा इतिहासकार इन बातों की ओर ध्यान नही देता, ओर वही इतिहास छाप देता है, जो विदेशी इतिहासकरो द्वारा मार्गदर्शित होता है !!

मिहिरभोज के जन्म के बारे में केवल यह आप कह सकते है, की यह मुहम्मद के समकालीन थे । महाराज रामभद्र के इस पुत्र की जितनी प्रसंसा की जाए कम है, स्कन्दपुराण, भारतीय अभिलेख ओर मुस्लिम लेखक भी मिहिरभोज की प्रशंसा करते नही थकते !!

वास्तव में मिहिरभोज एक ऐसे प्रतापी राजा ने , जिसने भारत माता का सर गर्व से ऊपर उठा दिया !!

मिहिरभोज का चरित्र और नेतृत्व भारत के महान शाशको में उन्हें अग्रणी स्थान पर लाकर खड़ा करता है । बड़ी बड़ी आंखे, लंबी भुजाएं, विशाल सुडौल काया, प्रिय वचन बोलने वाला, प्रज्ञावान ओर स्वम् ब्राह्मणो जैसा विद्धवान , सभी शास्त्रों का ज्ञाता ....

उनकी महानता यह थी कि प्रतीत होता है, माता लक्ष्मी ने खुद उनके घर निवाश किया था । किन्तु इतना सब होने के बाद भी, उनमें कोई अहंकार या दोष नही था ! उनकी वाणी हमेशा सत्यवादी ओर प्रिय ही थी । वह माता भगवती के परमभक्त तो थे ही, साथ मे विष्णु भगवान के प्रति भी उनकी अपार श्रद्धा थी !! उन्होंने विष्णु जी के नाम पर तो अपनी सेना का नाम " वराह सेना " रखा था । इसी वराह सेना ने भारत पर कुदृष्टि डालने वाले असुरो अर्थात मुसलमानो का घोर विनाश किया था ! भारत ही नही, मुसलमानो को रंगदेते हुए यह तो अरब तक पहुंच गए थे ।

राजा भोज के गद्दी ओर बैठने के समय उनका राज्य संकट की अवस्था मे ही था, भोज के गद्दी पर बैठने से पहले उनके राज्य की स्तिथि कुछ अच्छी नही थी, उनके पिता रामभद्र युद्ध करतर हुए ही वीरगति को प्राप्त हुए थे ।

भारत भ्रमण आये बगदाद के इतिहासकार अलमसूदी ने अपनी किताब मिराजुल - जहाब में इस महाशक्तिशाली , महापराक्रमी सेना का विवरण किया है। उसने इस सेना की संख्या लाखों में बताई है। जो चारो दिशाओं में लाखो की संख्या में रहती है। उनकी सेना का नाम " वराह " सेना है ।

इसी वराह सेना ने अरब पर आक्रमण कर दिया था ! उन दिनों मुहम्मद का उत्पात चरम पर था ! मिहिरभोज को मुसलमानो ने बहुत घृणा थी, वो तो अपने इतिहास में इन्हें असुर लिखवाते है, अरब पर आक्रमण जब किया ! तो उन्होंने पिगम्बर की मूंछे तक उखाड़ ली थी, अपनी जीत की निशानी स्वरूप उन मुछो को वे भारत ले आये, जो आज भी कश्मीर में है । उसी दिन से इस्लाम मे मुछे रखना हराम हो गया, वराह सेना ने यह काम किया था, इसलिए मुसलमान आज तक सुंवर से नफरत करते है।

एक ऐसा राजा जिसने अरब तुर्क आक्रमणकारियों को भागने पर विवश कर दिया और जिसके युग में भारत सोने की चिड़िया कहलाया। मित्रों परिहार/पड़िहार क्षत्रिय वंश के नवमीं शताब्दी में सम्राट मिहिरभोज भारत का सबसे महान शासक था। उसका साम्राज्य आकार, व्यवस्था , प्रशासन और नागरिको की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चक्रवर्ती गुप्त सम्राटो के समकक्ष सर्वोत्कृष्ट था।

भारतीय संस्कृति के शत्रु म्लेछो यानि मुस्लिम तुर्को -अरबो को पराजित ही नहीं किया अपितु उन्हें इतना भयाक्रांत कर दिया था की वे आगे आने वाली एक शताब्दी तक भारत की और आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सके।

चुम्बकीय व्यक्तित्व संपन्न सम्राट मिहिर भोज की बड़ी बड़ी भुजाये एवं विशाल नेत्र लोगों में सहज ही प्रभाव एवं आकर्षण पैदा करते थे। वह महान धार्मिक , प्रबल पराक्रमी , प्रतापी , राजनीति निपुण , महान कूटनीतिज्ञ , उच्च संगठक सुयोग्य प्रशासक , लोककल्याणरंजक तथा भारतीय संस्कृति का निष्ठावान शासक था।

ऐसा राजा जिसका साम्राज्य संसार में सबसे शक्तिशाली था। इनके साम्राज्य में चोर डाकुओ का कोई भय नहीं था। सुदृढ़ व्यवस्था व आर्थिक सम्पन्नता इतनी थी कि विदेशियो ने भारत को सोने की चिड़िया कहा।

यह जानकर अफ़सोस होता है की ऐसे अतुलित शक्ति , शौर्य एवं समानता के धनी मिहिरभोज को भारतीय इतिहास की किताबो में स्थान नहीं मिला।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासनकाल में सर्वाधिक अरबी मुस्लिम लेखक भारत भ्रमण के लिए आये और लौटकर उन्होंने भारतीय संस्कृति सभ्यता आध्यात्मिक-दार्शनिक ज्ञान विज्ञानं , आयुर्वेद , सहिष्णु , सार्वभौमिक समरस जीवन दर्शन को अरब जगत सहित यूनान और यूरोप तक प्रचारित किया।

क्या आप जानते हे की सम्राट मिहिरभोज ऐसा शासक था जिसने आधे से अधिक विश्व को अपनी तलवार के जोर पर अधिकृत कर लेने वाले ऐसे अरब तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों को भारत की धरती पर पाँव नहीं रखने दिया , उनके सम्मुख सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो गए। उसकी शक्ति और प्रतिरोध से इतने भयाक्रांत हो गए की उन्हें छिपाने के लिए जगह ढूंढना कठिन हो गया था। ऐसा किसी भारतीय लेखक ने नहीं बल्कि मुस्लिम इतिहासकारो बिलादुरी सलमान एवं अलमसूदी ने लिखा है। ऐसे महान सम्राट मिहिरभोज ने लगभग 50 वर्षो के सुदीर्घ काल तक शासन किया।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जी का जन्म सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में रामभद्र प्रतिहार की महारानी अप्पा देवी के द्वारा सूर्यदेव की उपासना के प्रतिफल के रूप में हुआ माना जाता है। मिहिरभोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इनके शासन काल की हमे जानकारी वराह ताम्रशासन पत्र से मालूम पडती है ।

50 वर्ष तक शाशन करने के बाद राजपाठ अपने पुत्र को सौंपकर वे सन्यास ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान कर गए !!

क्या मिहिरभोज किसी ईश्वर के अवतार से कम थे ????

जय मां चामुण्डा||
जय मिहिरभोज||
जय मंडोर||

सौजन्य:- श्री गाजण माता यूथ ब्रिगेड राजस्थान

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