श्री राम ज्योतिष वास्तु हस्तरेखा अंक गणित कुंडली ग्रह

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ज्योतिषीय महागोचर: कर्क राशि में 12 वर्ष बाद देवगुरु बृहस्पति का उच्च होना और जीवन पर प्रभावज्योतिष शास्त्र में देवगुरु ...
25/05/2026

ज्योतिषीय महागोचर: कर्क राशि में 12 वर्ष बाद देवगुरु बृहस्पति का उच्च होना और जीवन पर प्रभाव

ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति (गुरु) को सौभाग्य, संपदा, ज्ञान, करुणा और मुक्ति का नैसर्गिक कारक माना गया है। दूसरी ओर, चंद्रमा के आधिपत्य वाली कर्क राशि प्रेम, दया, जल और रक्षा की प्रतीक है। जब ज्ञान के प्रदाता देवगुरु बृहस्पति जल तत्व की कर्क राशि में प्रवेश करते हैं, तो वे अपने 'उच्च' (Exalted) स्वरूप को प्राप्त कर संपूर्ण हो जाते हैं।

गुरु के गोचर की तिथियां और अवधि (Transit Timeline)
लगभग 12 वर्षों के बाद गुरु कर्क राशि में उच्च के होने जा रहे हैं। यह गोचर दो चरणों में पूरा होगा:

कर्क राशि में प्रथम प्रवेश: 2 जून 2026
प्रथम चरण की अवधि: 2 जून 2026 से 31 अक्टूबर 2026 तक। (इसके बाद गुरु सिंह राशि में प्रवेश कर जाएंगे)।
कर्क राशि में पुनः वापसी: अगले वर्ष 25 जनवरी 2027 को गुरु वक्री/मार्गी अवस्था में वापस कर्क राशि में प्रवेश करेंगे।
गोचर का अंत: गुरु जून 2027 तक कर्क राशि में ही विराजमान रहेंगे।

गुरु ग्रह और कर्क राशि का गूढ़ संबंध: एक गौरी-शंकर योग
बृहस्पति को ज्योतिष में 'जीव' कहा गया है, जिससे जीवन शब्द बना है, और जीवन पूरी तरह जल पर निर्भर है। काल पुरुष की कुंडली में कर्क राशि चतुर्थ भाव में आती है, जो माता, हृदय, सुख और हमारे अंतःकरण का भाव है।
कर्क राशि की अधिष्ठात्री देवी मां पार्वती (गौरी) हैं और गुरु के अधिष्ठाता (प्रत्याधि देवता) आदिगुरु भगवान शिव (शंकर) हैं। इसलिए जब गुरु कर्क राशि में आते हैं तो यह अद्भुत 'गौरी-शंकर' का स्वरूप बन जाता है।
एक वृद्धि कारक (Amplifier) ग्रह होने के नाते, गुरु इस राशि में एक अत्यंत मजबूत ढाल बनकर हमारी और हमारे घर की रक्षा करते हैं।

शास्त्रों में उच्च गुरु की महिमा
गुरु के इसी रक्षक और विशाल स्वरूप के बारे में महर्षि पाराशर जी ने अपने प्रसिद्ध श्लोक में स्पष्ट कहा है:

"किं कुर्वन्ति ग्रहाः सर्वे यस्य केन्द्रे बृहस्पतिः।"
(जिस व्यक्ति के केंद्र स्थान में बृहस्पति विराजमान हों, सभी अनिष्ट ग्रह मिलकर भी उसका क्या बिगाड़ सकते हैं!)
गुरु अज्ञान के अंधकार को मिटाकर हमें ज्ञान की रोशनी देते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय (ज्ञान कर्म सन्यास योग) में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान की महत्ता बताते हुए कहते हैं:
"न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।"
(इस विश्व में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है।)
जब गुरु उच्च के होते हैं, तो वे व्यक्ति को 'परा-विद्या' (आध्यात्मिक ज्ञान) और सर्वोच्च आदर्शों की ओर ले जाते हैं।

सभी 12 लग्नों (Ascendants) पर उच्च गुरु के गोचर का विस्तृत प्रभाव
(विशेष नोट: यह फलादेश लग्न के आधार पर है। सर्वोत्तम परिणामों के लिए अपनी व्यक्तिगत दशा और जन्म कुंडली के ग्रहों की स्थिति का अवलोकन भी आवश्यक है।)

मेष (Aries):
चौथे भाव में गुरु का आना घर, माता और सुख-सुविधाओं के लिए उत्तम है। नया मकान बनाने, प्लॉट खरीदने, घर को रिनोवेट करने या वाहन खरीदने के योग प्रबल होंगे। घर का माहौल शांतिपूर्ण रहेगा और माता के स्वास्थ्य में सुधार आएगा। अष्टम भाव पर दृष्टि के कारण पैतृक संपत्ति से जुड़े मामले उभर सकते हैं और घर के बड़े-बुजुर्गों से संबंध बेहतर होंगे। दशम भाव पर दृष्टि कार्यक्षेत्र में आपकी मान-प्रतिष्ठा बढ़ाएगी।

सावधानी: 12वें भाव पर दृष्टि खर्चे बनाए रखेगी। सुख-सुविधाओं के भाव में गुरु के बैठने से वजन बढ़ने, बीपी या कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो सकती है, अतः जंक फूड और खानपान पर नियंत्रण रखें।

वृषभ (Ta**us):
तीसरे भाव में आयेश (11वें भाव के स्वामी) का गोचर बताता है कि आय बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे। यह मेहनत लंबे समय में बड़ा लाभ देगी। जो लोग यूट्यूब, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, या ट्रेवलिंग (यात्राओं) से जुड़े कार्य करते हैं, उनके लिए यह समय बहुत शुभ है। सप्तम भाव पर दृष्टि से विवाह के अच्छे प्रस्ताव आ सकते हैं और बिजनेस पार्टनरशिप में ग्रोथ मिलेगी।

सावधानी: भाई-बहनों (Siblings) के जीवन में उन्नति होगी, लेकिन 'ईगो' (अहंकार) के कारण उनके साथ वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, इसलिए संबंध मधुर बनाए रखने का प्रयास करें।

मिथुन (Gemini):
दूसरे (धन व वाणी) भाव में उच्च गुरु आर्थिक स्थिति और पारिवारिक सहयोग के लिए शानदार है। फैमिली बिजनेस का विस्तार होगा। आपकी वाणी में अत्यधिक सौम्यता और ज्ञान (Wisdom) झलकेगा। यदि आप बोलने, पढ़ाने, या ज्योतिषीय काउंसलिंग जैसे पेशों में हैं, तो आपके द्वारा दी गई सलाह सटीक बैठेगी और दूसरों का मार्गदर्शन करेगी। दशम भाव पर दृष्टि करियर में प्रमोशन या दिशा में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

सावधानी: लोन (कर्ज) आसानी से मिल जाएगा। छठे और अष्टम भाव पर दृष्टि के कारण लाइफस्टाइल से जुड़ी या वंशानुगत (Hereditary) बीमारियां उभर सकती हैं, अतः मीठे और तैलीय भोजन से बचें।

कर्क (Cancer):
लग्न में ही गुरु का उच्च होना आपको अत्यधिक ज्ञानी और अच्छे सलाहकार की भूमिका में ले आएगा। भाग्येश (नवम भाव का स्वामी) लग्न में होने से भाग्य का पूरा सहयोग मिलेगा। सप्तम भाव पर दृष्टि वैवाहिक जीवन और पार्टनर के साथ बॉन्डिंग को मजबूत करेगी।

सावधानी: छठे भाव का स्वामी लग्न में होने से पुराने विवाद, पुराना कर्जा या कोई छिपी हुई शत्रुता सामने आ सकती है, जिसे समझदारी से सुलझाएं। सबसे महत्वपूर्ण बात, इस दौरान 'मैं' (अहंकार या ईगो) की भावना को खुद पर हावी न होने दें।

सिंह (Leo):
12वें भाव में गोचर ध्यान (Meditation), आध्यात्मिक उन्नति, और भीतर की यात्रा (Inward journey) के लिए बेहतरीन है। यह सांसारिक चीजों से कुछ हद तक वैराग्य देगा। चौथे भाव पर दृष्टि घर में शांति लाएगी और घर में कोई नई चीज आने के योग बनेंगे। अष्टम भाव में बैठे शनि पर गुरु की दृष्टि आपके मन के पुराने डर और तनाव को दूर करेगी। विदेश यात्रा या विदेशी संपर्कों से लाभ होगा।

सावधानी: 12वां भाव व्यय का है, अतः खर्चों की पहले से प्लानिंग करें। हॉस्पिटलाइजेशन के योग से बचने के लिए अपना नियमित रूटीन हेल्थ चेकअप जरूर कराते रहें।

कन्या (Virgo):
11वें (लाभ) भाव में गुरु का आना आपकी नेटवर्किंग को बहुत मजबूत करेगा। दोस्तों और सोशल सर्कल की मदद से करियर में बड़े मौके मिलेंगे। जीवनसाथी और बिजनेस पार्टनर के विकास के लिए यह समय बहुत अच्छा है। सप्तम भाव (जहां शनि बैठा है) पर गुरु की दृष्टि तनाव को कम करेगी; यदि पार्टनर कोई सलाह दे, तो उसे मानें। पंचम भाव पर दृष्टि बुद्धि को प्रखर करेगी और जो लोग संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, उनके लिए यह समय शुभ है।

सावधानी: सप्तमेश (मार्केश) का 11वें भाव में उच्च होना दवाइयों का सेवन बढ़ा सकता है, इसलिए स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

तुला (Libra):
दशम (कर्म) भाव में गुरु का गोचर करियर में बड़े और निर्णायक बदलाव (Decisive shift) ला सकता है। आर्थिक दृष्टिकोण से (धन भाव पर दृष्टि) समय अच्छा रहेगा। जो लोग स्पोर्ट्स, वकालत या लगातार बदलाव वाले काम में हैं, उनके लिए समय बेहतर है।

सावधानी: कार्यक्षेत्र में 'ऑफिस पॉलिटिक्स' और काम का भारी तनाव (Work stress) आपको परेशान कर सकता है। अपनी एथिक्स को लेकर अत्यधिक अड़े रहने के बजाय परिस्थितियों के अनुसार ढलना सीखें। आलस्य छोड़ें और काम पर नियमित रहें। घरेलू मानसिक क्लेश से बचने के लिए बड़े-बुजुर्गों की सलाह लें।

वृश्चिक (Scorpio):
नवम (भाग्य) भाव में गुरु का यह गोचर सभी 12 लग्नों में सबसे शानदार गोचरों में से एक है। सही समय पर सही लोगों से मुलाकात होगी जो करियर को नई दिशा देंगे। धन भाव पर दृष्टि से आर्थिक स्थिति सुधरेगी। उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों के लिए यह बेहतरीन समय है। संतान आपके साथ अच्छा समय व्यतीत करेगी और उनका पूर्ण सहयोग मिलेगा। पुराने दोस्तों या छोटे भाई-बहनों से दोबारा संपर्क (Reconnect) स्थापित करने के लिए यह बहुत अच्छा समय है।

सावधानी: लग्न पर गुरु की दृष्टि वजन बढ़ा सकती है, इसलिए मोटापे पर नियंत्रण रखें।

धनु (Sagittarius):
अष्टम भाव में लग्नेश गुरु का गोचर आपको अपनी पुरानी पहचान छोड़कर कुछ नया करने के लिए प्रेरित करेगा। यह समय सांसारिक मामलों से हटकर वैदिक ज्योतिष, टैरो, ध्यान (Meditation) और गूढ़ विद्याओं (Occult) के गहन शोध के लिए अत्यंत उत्तम है। धन का प्रवाह बना रहेगा, लेकिन खर्चे भी उसी अनुपात में होंगे। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में या शहर से दूर आपकी कोई संपत्ति है, तो उसके रेट बढ़ सकते हैं।

सावधानी: मानसिक शांति के लिए ऐसी जगह की यात्रा करें जहां की भाषा और संस्कृति बिल्कुल अलग हो। व्यय भाव पर दृष्टि के कारण खर्चे बढ़ेंगे।

मकर (Capricorn):
सप्तम भाव में गुरु बिजनेस पार्टनरशिप और विवाह के लिए अति शुभ है। रसूखदार और बड़े क्लाइंट्स (Leads) से जुड़ने का मौका मिलेगा। स्थान परिवर्तन (Relocation) या विदेश जाने के प्रयासों में सफलता मिलेगी। अपने मन की बात या दबी हुई भावनाओं को दूसरों के सामने स्पष्ट रूप से रखने का साहस आएगा। आपके जीवनसाथी की इस अवधि में अच्छी ग्रोथ होगी।

सावधानी: 12वें भाव का स्वामी होने के कारण यदि कोई स्वास्थ्य समस्या पहले से चल रही है, तो उसे नजरअंदाज न करें और रेगुलर मेडिकल चेकअप करवाते रहें।

कुंभ (Aquarius):
छठे भाव में धन भाव के स्वामी का गोचर आर्थिक रूप से वर्ष को बहुत अच्छा बनाएगा। नौकरी पेशा लोगों और अपनी वाणी से धन कमाने वालों के लिए समय उत्तम है। प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive exams) की तैयारी कर रहे छात्रों के प्रयास इस दौरान सफल होंगे और अच्छे परिणाम मिलेंगे।

सावधानी: छठे भाव में गुरु दीर्घकालिक (Lifestyle) रोगों को बढ़ा सकता है, अतः सेहत का विशेष ध्यान रखें। धन आएगा, लेकिन खर्चे भी बराबर बने रहेंगे। घर-परिवार में कटु शब्दों के प्रयोग से बचें, अन्यथा वाणी के कारण घर का माहौल खराब हो सकता है।

मीन (Pisces):
पंचम भाव में लग्नेश गुरु का गोचर आपके लिए एक 'स्वर्णिम काल' (Golden Period) लेकर आया है। बुद्धि और विवेक का सही इस्तेमाल कर आप नए अवसर खुद तैयार करेंगे। शिक्षा, रचनात्मक कार्यों (Creative fields), और संतान पक्ष के लिए समय उत्कृष्ट है। नवम भाव पर दृष्टि धार्मिक यात्राओं और सत्संग में रुचि बढ़ाएगी। लग्न में बैठे शनि का तनाव अब गुरु की दृष्टि से समाप्त हो जाएगा। पिछले गोचर (मिथुन राशि) की तुलना में अब आपको अपने जीवन में स्पष्ट और बड़े सकारात्मक बदलाव महसूस होंगे।

सावधानी: लग्न में शनि के गोचर और पंचम भाव में गुरु के प्रभाव के कारण अत्यधिक सोच-विचार (Overthinking) से बचें। अपने मन और अपनी भावनाओं (Mental and Emotional coordination) के बीच सही सामंजस्य बनाए रखना आवश्यक है। अपने ज्ञान का प्रयोग सोच-समझकर करें और जीवन में आलस्य या ठहराव (Stagnancy) को हावी न होने दें

गुरु को बलवान बनाने के अचूक उपाय

१. व्यवहारिक उपाय (Behavioural Remedies)
गुरु ग्रह को प्रसन्न करने के लिए कर्म और आचरण की शुद्धि सबसे बड़ा उपाय है:
ज्ञान का निस्वार्थ दान: यदि कोई आपसे सलाह या मार्गदर्शन मांगे, तो उसे सही रास्ता दिखाएं। अपने अनुभव और ज्ञान को समाज की भलाई के लिए उपयोग करना गुरु का सबसे बड़ा उपाय है।

अहंकार (Ego) से बचें: उच्च का गुरु व्यक्ति में ज्ञान का अहंकार पैदा कर सकता है। हमेशा खुद को एक विद्यार्थी मानें और दूसरों के विचारों का सम्मान करें।

सत्य और वचनबद्धता: हमेशा सत्य बोलें और किसी को दिया हुआ वादा (Promise) कभी न तोड़ें। कार्यक्षेत्र में नैतिकता (Ethics) बनाए रखें।

सम्मान करें: अपने से बड़ों, गुरुओं, शिक्षकों और माता-पिता का हृदय से सम्मान करें। धर्म, पवित्र ग्रंथों और संतों की कभी निंदा न करें।

२. पूजा-पाठ और शास्त्रीय उपाय
विष्णु सहस्रनाम का पाठ: भगवान नारायण के स्वरूप गुरु की कृपा पाने के लिए और जीवन में सुरक्षा चक्र मजबूत करने के लिए प्रतिदिन या गुरुवार को विष्णु सहस्रनाम का नियमित पाठ करें।

पलाश के फूल का प्रयोग: पलाश का फूल गुरु का अत्यंत प्रिय माना जाता है। धन (धन योग) और अक्षय संपदा की वृद्धि के लिए इसे लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें। पुराने रोगों से मुक्ति पाने के लिए इसे पीले कपड़े में सिलकर रविवार को गुरु की होरा में दाहिने हाथ में बांधें।

रुद्राक्ष धारण: भगवान शिव गुरु के अधिष्ठाता देवता हैं, अतः 5 मुखी या 10 मुखी रुद्राक्ष गुरु के लिए श्रेष्ठ है। चूंकि कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा हैं, अतः चंद्रमा के लिए 2 मुखी रुद्राक्ष और सबसे उत्तम 'गौरी-शंकर' रुद्राक्ष (दो जुड़े हुए रुद्राक्ष) धारण करना इस गोचर का सर्वोत्तम उपाय माना गया है।

25/05/2026
🔱 क्यों कहलाए महादेव 'त्रिपुरारी'? जानिए उस महायुद्ध की कथा जब स्वयं नारायण बने बाण और ब्रह्माजी बने सारथि!🏹 त्रिपुरारी ...
21/05/2026

🔱 क्यों कहलाए महादेव 'त्रिपुरारी'? जानिए उस महायुद्ध की कथा जब स्वयं नारायण बने बाण और ब्रह्माजी बने सारथि!

🏹 त्रिपुरारी लीला: जब महादेव ने किया त्रिपुर का सर्वनाश 🏹
तारकासुर का वध भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के हाथों हुआ था। अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए उसके तीन पुत्रों— तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने ब्रह्मदेव की घोर तपस्या की।
अमरता का वरदान न मिलने पर उन्होंने ब्रह्माजी से एक अत्यंत चतुर युक्ति मांगी:
"हे परमपिता! आप हमारे लिए तीन अलग नगरों की स्थापना करें। ये तीनों नगर अलग-अलग दिशाओं में घूमते रहें और १००० वर्षों में केवल एक बार, कुछ क्षणों के लिए ही एक सीध में आएं। उस समय अगर कोई एक ही बाण से इन तीनों नगरों का नाश कर सके, तभी हमारी मृत्यु हो।" ब्रह्माजी ने 'तथास्तु' कह दिया।
🔹 तीन अभेद्य नगरियां: 'त्रिपुर'
ब्रह्माजी के आदेश पर मय दानव ने तीन महाशक्तियों वाले नगर बनाए:
लौहपुर: विद्युन्माली के लिए पृथ्वी पर लोहे की नगरी।
रजतपुर: कमलाक्ष के लिए आकाश में चांदी की नगरी।
स्वर्णपुर: तारकाक्ष के लिए स्वर्ग में सोने की नगरी।
इन तीनों को एक साथ 'त्रिपुर' कहा गया। ये नगर इतने शक्तिशाली थे कि कोई भी अस्त्र इन्हें अकेले भेद नहीं सकता था। ९९९ वर्ष बीत गए और दैत्यों का अत्याचार चरम पर पहुँच गया, क्योंकि वे जानते थे कि अब १०००वां वर्ष आने वाला है जब ये नगर एक सीध में होंगे।
🔹 जब महादेव के लिए बना ब्रह्मांड का सबसे अनोखा रथ
जब देवता इन दैत्यों से त्रस्त होकर शिवजी के पास पहुँचे, तो महादेव ने लीला रचते हुए कहा— "आप मुझे युद्ध करने को कहते हैं, किन्तु न मेरे पास रथ है, न सारथि और न ही कोई अस्त्र।"
तब महादेव की इस अलौकिक लीला के लिए पूरी सृष्टि एकजुट हुई और एक अद्भुत रथ तैयार हुआ:
रथ: स्वयं माता पृथ्वी रथ बनीं।
पहिये: सूर्य और चंद्रमा इस रथ के दो पहिये बने।
धनुष: पर्वतों में श्रेष्ठ मेरु पर्वत महादेव का धनुष बने।
प्रत्यंचा: स्वयं शेषनाग (वासुकि) धनुष की डोरी बने।
बाण: स्वयं भगवान विष्णु बाण बने, अग्नि देव उसकी नोक और वायु देव उसके पार्श्व बने।
सारथि: इस महाशक्तिशाली रथ के सारथि स्वयं परमपिता ब्रह्माजी बने।
जब महादेव रथ पर सवार हुए, तो पृथ्वी उनका भार न संभाल सकी। तब भगवान विष्णु स्वयं बैल का रूप धारण कर रथ की ध्वजा पर विराजे और रथ आगे बढ़ा।
🔹 त्रिपुर दहन और मय दानव की रक्षा
जैसे ही १०००वें वर्ष में वे तीनों नगरियां एक सीध (एक रेखा) में आईं, महादेव ने रौद्र रूप धारण कर मेरु रूपी धनुष से नारायण रूपी बाण का संधान किया।
महादेव की करुणा: बाण छोड़ने के बाद महादेव को स्मरण आया कि इन पुरियों का रचयिता मय दानव (जो शिव भक्त था) अभी भी भीतर ही है। महादेव की प्रेरणा से विष्णु जी ने बाण की गति धीमी की और नंदी ने तीव्रता से जाकर मय दानव को सुरक्षित बाहर निकाला।
इसके ठीक बाद, महादेव का महाप्रलयंकारी बाण त्रिपुर से टकराया और तीनों पुरियां तीनों भाइयों सहित तत्काल भस्म हो गईं। इस विजय के बाद महादेव ने अपना प्रसिद्ध "त्रिपुर नाश नर्तन" किया।
🌟 देवताओं का भ्रम और भगवान विष्णु की ३ परम सीख
त्रिपुर के नाश के बाद देवताओं को अहंकार हो गया कि महादेव ने उनकी सहायता और उनके रथ-अस्त्रों के कारण यह युद्ध जीता है। देवताओं का यह भ्रम तोड़ने के लिए भगवान विष्णु ने उन्हें ३ परम सत्य बताए:
शक्ति का स्रोत: भगवान शिव किसी की शक्ति के मोहताज नहीं हैं, वे स्वयं इस समस्त ब्रह्मांड की शक्ति के मूल स्रोत हैं।
ब्रह्माजी के वरदान का मान: महादेव चाहते तो इन दैत्यों को कभी भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने १००० वर्ष प्रतीक्षा सिर्फ इसलिए की ताकि ब्रह्मदेव का वरदान झूठा न हो और उनके वचन का मान रहे।
दृष्टि मात्र से विनाश: त्रिपुर के सर्वनाश के लिए शिवजी को किसी रथ, सारथि या बाण की आवश्यकता नहीं थी। वे केवल अपने एक 'दृष्टिपात' (तीसरी आँख खोलने) से ही तीनों पुरियों को राख कर सकते थे। यह सब तो केवल उनकी एक लीला थी।
यह परम सत्य सुनकर इन्द्रादि समस्त देवता अत्यंत लज्जित हुए और त्रिदेवों के चरणों में नतमस्तक हो गए।
🌸 राधे राधे 🌸
अहंकार चाहे इंसानों में हो या देवताओं में, वह पतन का कारण बनता है। महादेव की यह लीला हमें सिखाती है कि ईश्वर सब कुछ करने में सक्षम होकर भी अपने भक्तों और नियमों का मान रखते हैं।
आपको यह अलौकिक इतिहास कैसा लगा? कमेंट में "जय महाकाल" लिखकर इस पोस्ट को आगे शेयर करें! 🙏

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