श्री राम ज्योतिष वास्तु हस्तरेखा अंक गणित कुंडली ग्रह

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21/08/2026
🌹 #जन्मकुंडली_में_वेश्यावृत्ति_के_योग🌹************************************•  #शुक्र_ग्रहः ज्योतिष में व्यक्ति में वासना ...
21/08/2026

🌹 #जन्मकुंडली_में_वेश्यावृत्ति_के_योग🌹
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• #शुक्र_ग्रहः ज्योतिष में व्यक्ति में वासना और भोग-विलास का कारण शुक्र ग्रह को माना गया है। इसके अत्यधिक प्रभाव से उसमें विलासिता और कामुकता के गुण आ जाते हैं। यह मंगल और चंद्र के साथ मिलकर उत्तेजना बढ़ा देता है। किसी स्त्री की जन्म कुंडली में यदि शुक्र ग्रह चंद्रमा के साथ नीच राशि में स्थित हो, तो यह क्रूर माने गए मंगल ग्रह के साथ मिलकर उसे चारिहीनता की ओर ले जाता है। अर्थात मंगल शुक्र ग्रह को अपने प्रभाव में लेने के बाद उस स्त्री को यौन आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बाध्य करता है और वह चारित्रिक सीमा को बेहिचक लांघ जाती है।

• #नीच_का_शुक्रः यदि किसी की कुंडली में शुक्र ग्रह मेष, सिंह, धनु, वृश्चिक में हो या फिर वह नीच के भाव में रहे तथा मंगल, राहु, केतु या शनि के साथ योग करे तो उस व्यक्ति में अत्यधिक यौन-कामना की इच्छा जागृत हो जाती है। वैसी स्त्री वैवाहिक संबंध की मार्यादा को तोड़ देती है।

• #राहु- #केतुः कुंडली में शुक्र-मंगल का योग यानि कि मंगल का शुक्र की राशि में स्थित होने के साथ-साथ यदि उनका योग राहू-केतु के लग्न या लग्नेश के साथ हो जाता है तब वह वासनपूर्ति के लिए अपराध करने तक से नहीं चूकता है। ऐसी स्त्री कई के साथ शारीरिक संबंध बनाने में जरा भी नहीं हिचकती है। उनपर चरित्रहीनता का आरोप लग जाता है, या फिर वह वेश्यवृति के दलदल में धंस जाती है।

• चंद्रमा और शुक्रः जिस किसी स्त्री की कुंडली में तुला राशि के साथ चंद्रमा और शुक्र के योग हो जाते हैं उसकी काम वासना कई गुणा बढ़ जाती है। यह योग अगर राहू या मंगल से प्रभावित हो जाए तब वह स्त्री काम-वासना पूर्ति के लिए किसी भी हद तक चली जाती है।

• #नवांश_कुंडलीः जिस किसी भी स्त्री की नवांश कुंडली में शनि शुक्र की राशि में और शुक्र शनि की राशि में रहे तो उसकी यौन आकांक्षा बढ़ जाती है। इसी तरह से यदि शुक्र मंगल की राशि में और मंगल शुक्र की राशि में रहे तब वैसी स्त्री परपुरुष से संबंध बनाने का मौका निकाल ही लेती है।

• #बुध_और_शुक्रः स्त्री की कुंडली के अनुसार उसके सातवें भाव में बुध के साथ शुक्र के आ मिलने से वह गुप्त अनैतिक तरीके से काम-वसना पूर्ति करती है। इसके लिए चारित्रिक लांछन की चिंता से बेखबर किसी भी हद तक जा सकती है।

• #शुक्र_और_मंगलः जिस किसी स्त्री की कुंडली के तीसरे भाव में शुक्र स्थित हो और वह मंगल से प्रभावित हो जाए, तथा छठे भाव में मंगल की राशि होने के साथ-साथ चंद्रमा बारहवें स्थान पर रहे तब उसमें यौनाचार की चरित्रहीनता आ जाती है। कुंडली के सप्तम भाव में मंगल चारित्रिक दोष पैदा करने वाला साबित होता है। इस दोष से ग्रसित स्त्री या पुरुष को नाजायज संबंध रखने वाले जीवनसाथी मिलने के योग बन बन जाते हैं।

• #शनि- #मंगलः स्त्री की कुंडली में यदि शनि लग्न में स्थित हो तो उसमें वासना की अधिकता रहती है। शनि के साथ मंगल के योग होने पर उसकी यौन आकांक्षा प्रबल हो जाती है। शनि का दशवें स्थान पर होना भी स्त्री की कामुकता को बढ़ता है, जबकि शनि के चौथे भाव में होने पर वह यौनाचार करने के लिए बाध्य हो जाती है। शनि शुक्र, मंगल और चंद्रमा के साथ योग कर व्यक्ति की कामुकता को काफी बड़ा कर देता है।

• #चंद्रमाः कुंडली में चंद्रमा के विभिन्न स्थान में होने से वह व्यक्ति की कमुकता को प्रभावित करता है। विशेषकर यदि चंद्रमा स्त्री की कुंडली के अनुसार बारहवें भाव में मीन राशि में हो, तब वैसी स्त्री कई पुरुषों के साथ यौन संबंध बना लेती है। चंद्रमा के नौंवे भाव मंे होने की स्थिति में स्त्री व्यभिचार करने के लिए प्रेरित हो जाती है। यानि कि यदि स्त्री की कुंडली मंे यदि चंद्रमा उच्च का हो तब उसे प्रेम-प्रसंग में सफलता मिलती है, लेकिन नीच की स्थिति में होने और दूसरे ग्रहों के शुभ नहीं हाने पर वह देह-व्यापर की ओर रूख कर सकती है।

• #सप्तम_भाव_में_चंद्रमाः जन्म कुंडली के सप्तम भाव में चंद्रमा होने और उसके शनि के साथ योग बनाने की स्थिति में वैसी स्त्री अपने जीवनसाथी के साथ प्रेम नहीं कायम कर पाती है। उसके प्रेम-संबंध दूसरे पुरुष के साथ बना रहता है।

• #शनि_और_राहुः ज्योतिष के अनुसार इन दोनों ग्रहों का योग अच्छा नहीं माना जाता है। खासकर किसी स्त्री की जन्मकुंडली के लिए तो बिल्कुल ही नहीं। इस योग के कारण प्रभावित स्त्री वेश्यावृति के प्रभाव में आ सकती है और कष्टमय जीवन गुजारती है।

• #सप्तम_में_राहुः कुंडली के सप्तम भाव में राहु होने पर स्त्री विवाह के बाद अवैध संबंध बना लेती है। यहां तक कि इस दोष के कारण उसे जीवनसाथी भी कई के साथ अवैध संबंध कायम रखने वाला मिलता है। ऐसे लोग दांपत्य जीवन के प्रति लापरवाह होते हैं।

• #सूर्यः जन्म कुंडली का सप्तम भाव व्यक्ति की कामुकता और विवाहेत्तर संबंध को दर्शाता है। ऐसे में यदि स्त्री की कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसके नाजायज संबंध बन सकते हैं। या फिर उसे अनैतिक संबंध बनाने वाला जीवनसाथी मिल सकता है।

#ग्रहों_की_किस_स्थिति_में_स्त्री_को_वेश्या_बनना_पड़ता_है -:
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– यदि किसी महिला की कुंडली में सातवें, आठवें और दसवें घर में बुध या शुक्र ग्रह विराजमान हों तो ऐसी स्थिति में उस स्त्री के वैश्यावृत्ति के व्यापार में आने के योग बनते हैं।
– वैश्यावृत्ति के लिए शुक्र और मंगल अधिक प्रभावकारी और महत्वपूर्ण होते हैं। शुक्र और मंगल के दसवें और सातवें भाव में होने पर ऐसा होना संभव है।
—-जिस इंसान की कुडली मे चाहे वह महिला हो या पुरुष 7th भाव और 8th भाव मंगल + शुक् से संबंधित हो या मंगल लगन भाव में और चंद्रमा 7 th भाव में हो वह इंसान बहुत कामुक होता है इसके साथ राहु हो जाये मतलब दृष्टि -युती -nakshtr – भाव में तो p**n पिक्चर का शौक होता है।
—इस संबंध में महिला की कुंडली के सातवें, आठवें और दसवें भाव का अध्ययन जरूर करना चाहिए।
—-ज्योतिष की मान्यता है कि यदि इन भावों में बुध अथवा शुक्र विराजमान हों तो इस बात की काफी संभावना होती है कि वह महिला वेश्यावृत्ति में चली जाए। खासतौर पर यदि शुक्र और मंगल कुंडली के सातवें अथवा दसवें भाव में विराजमान हों। यह योग अगर अन्य क्रूर ग्रहों की युति एवं दृष्टि से बने तो महिला का जीवन तबाह हो जाता है। उसे अपने जीवन का काफी समय वेश्यावृत्ति में बिताना पड़ता है।
—-उच्च का चंद्रमा प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करता है लेकिन यही जब नीच राशि में स्थित होता है तो जीवन में कष्ट लेकर आता है।
—अगर महिला की कुंडली में नीच का चंद्रमा हो और अन्य ग्रह शुभ न हों तो वह भविष्य में देह व्यापार का मार्ग चुन लेती है। इस प्रकार शुक्र, मंगल और चंद्रमा का दोषपूर्ण संबंध महिला के जीवन की राह निर्धारित करता है।
—-तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
—शनि और राहु का संबंध ज्योतिष शास्त्र में अच्छा नहीं माना जाता। यह महिलाओं के लिए बहुत कष्टपूर्ण होता है। इन दोनों ग्रहों का संबंध वेश्यावृत्ति का योग बनाता है।
–इसी प्रकार अष्टम में शुक्र या शनि, शुक्र व मंगल की युति किसी महिला के जीवन का कड़ा इम्तिहान लेती है और उसे देह व्यापार में धकेल देती है। शुक्र और राहु का योग भी वेश्यावृत्ति के लिए जिम्मेदार होता है।
– किसी महिला की कुंडली में शुक्र और मंगल का आपस में संबंध हो अथवा यह दोनों ग्रह पीडित हों।
– कुंडली में चंद्रमा ग्रह नीच स्थान में अथवा पीडित हो तो भी स्त्री के देह व्यापार में आने की संभावना प्रबल हो जाती है।
– शुक्र ग्रह का अष्टम भाव में होना, शनि-शुक्र की युति होना और शनि, शुक्र और मंगल की युति होने पर।
– जिस स्त्री की कुंडली में शुक्र और राहु की युति बन रही हो उसके देह व्यापार से जुड़ने की संभावना रहती है।
– कुंडली में अष्टमेश का प्रबल होना, चंद्रमा बारहवें भाव में उपस्थित होना एवं दशम भाव में राहु का उपस्थित होना बहुत ज्यादा खराब स्थिति को दर्शाता है।
– शनि और राहु के संबंध में भी वैश्यावृत्ति के योग बनते हैं।

#व्यभिचारिणी_योग :-
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यह योग बहुत घातक होता है। क्योकि व्यभिचार सारे अनर्थों की जड़ है। इसके कारण कुल अथवा परिवार की मर्यादा और यश का सर्वनाश हो जाता है। इस योग से भरे पूरे परिवार का सफाया हो जाता है। इसलिए स्त्री की कुंडली में यदि ये योग हो तो विवाह नही करना चाहिए।
—-यदि कुंडली में सप्तम भाव में कर्क राशि में सूर्य व मंगल हो तो लड़की व्यभिचारिणी होती है तथा इस योग से वह खुद के जीवन को नष्ट कर लेती है।
——मेष , वृश्चिक , मकर , अथवा कुम्भ , राशि का लग्न हो और उसमे शुक्र व चन्द्रमा दोनों ही बैठें हो तथा इन पर पापी ग्रह की दृष्टि हो तो लड़की के साथ उसकी माता भी व्यभिचार करती है।
—-चन्द्र ,मंगल , व शुक्र , तीनों अथवा इनमे से कोई दो ग्रह यदि सप्तम भाव में हो तो लड़की चरित्रहीन होती है।
—-मंगल व शुक्र यदि एक दूसरे के नवांश में हो तो स्त्री व्यभिचारिणी होती है।
——अगर मंगल का त्रिशांश कुंडली में हो तो स्त्री दबंग, पति को वश में रखने वाली, स्वेच्छाचारिणी, पुरुषवत् आचरण करने वाली तथा पति से हमेशा द्वेष रखने वाली होती है। अगर शनि का त्रिशांश हो तो स्त्री दरिद्र, उम्र से अधिक दिखने वाली, परपुरुष गामिनी एवं सौभाग्यहीन मानी जाती है। अगर बुध का त्रिशांश हो तो स्त्री कपट करने वाली, गूढ़ मन वाली तथा दूसरों पर डोरे डालने वाली होती है। शुक्र के त्रिशांश के चारित्रिक चंचल, परपुरुष की कामना करने वाली और गुरु के त्रिशांश वाली स्त्री सौभाग्यशाली, पुत्रवती एवं भाग्यवान होती है।
—–तुला या वृष लग्न में शनि का नवांश हो तथा उस पर शुक्र अथवा शनि की दृष्टि हो तो स्त्री अप्राकृतिक तरीके से अपनी कामवासना को शांत करती है।
——यदि शनि व शुक्र एक दूसरे के नवांश में हो और एक दूसरे को देखते हो तो भी ये उपरोक्त फल होता है।
—-यदि मंगल व शनि एक दूसरे के नवांश में हो तो स्त्री गलत कर्मों से धन अर्जित करती है।
—–अगर स्त्री की कुंडली में लग्र या चंद्रमा से सप्तम भाव ग्रहरहित या निर्बल हों तथा पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो वह स्त्री डरपोक स्वभाव वाले, दब्बू एवं कामचोर पुरुष की पत्नी बनती है। सप्तम में बुध या शनि हों तो उस स्त्री का पति अन्य स्त्रियों से शारीरिक संबंध रखने वाला, कम संतान वाला तथा परदेश में रहने वाला होता है। अगर सप्तम भाव में चरराशि हो या सप्तमेश चरराशि से नवांश हो गया हो तो उस स्त्री का पति निश्चित रूप से परदेश में रहने वाला ही होता है।
—-यदि लग्न चन्द्र व लग्नेश तीनों ही चर राशि में हो तथा उन्हें कोई पापी ग्रह देखता हो तो वह स्त्री विवाह से पहले ही अनेक पुरुषों से सम्बन्ध रखती है जो विवाह के बाद भी रहते है।
—-यदि लग्न व चन्द्र दोनों ही चर राशि में हो और कोई बली पाप ग्रह किसी केंद्र में हो तो वह स्त्री कामवासना से ग्रसित होकर दुराचार करती है।
—जिस कन्या की कुंडली में सातवें भाव में राहु अथवा केतु हो तथा सप्तमेश पापी ग्रहों के साथ तथा सप्तम भाव पर भी पापी ग्रह की दृष्टि हो तो वह स्त्री किसी मजबूरी में अथवा बुरी संगत में आकर गलत कार्य करती है।
—स्त्री की कुंडली के सप्तम में सूर्य हो तो स्त्री का पति से संबंध-विच्छेद तथा मंगल हो तो विधवा का योग बनता है। अगर सप्तमस्थ शनि को कोई पाप ग्रह देख रहा हो तो कन्या का विवाह या तो बहुत विलम्ब से होता है या फिर होता ही नहीं। अगर सप्तम में सभी पाप ग्रह हों तो स्त्री विधवा, शुभ एवं अशुभ दोनों ही हो तो दूसरा पति पाने वाली, सप्तम में चंद्र, शुक्र एवं मंगल हों तो पति की इच्छा से पर पुरुष सम्पर्क रखने वाली होती है।
—यदि शुक्र से सातवें भाव में मंगल या सूर्य दोनों हो तो स्त्री गुप्त रूप से अन्य पुरुष से सम्बन्ध रखती है।
—-आठवें भाव में सूर्य और सातवें भाव में शुक्र हो तो स्त्री वेश्या बनती है।
—-शुक्र व मंगल एक दूसरे की राशि में हो तो भी स्त्री दुराचार ही अपनाती है।
—-किसी केंद्र भाव में पापी ग्रह के साथ मंगल हो तो वह स्त्री स्वसुख के लिए अन्य पुरुष से सम्बन्ध बनाती है।
विशेष :- प्राचीन शास्त्रो में इस प्रकार के व्यभिचार के योग दिए गए है। परन्तु यह अंतिम निर्णय नही है। इसके अतिरिक्त कुंडली में अन्य योगो का सूक्ष्म विचार करके ही अंतिम निर्णय पर पहुँचना चाहिए।

21/08/2026

🌹 #नवनाथ_१२_पंथ_८४_सिद्ध_संक्षिप्त_वर्णन🌹नवनाथ कलियुग कालीन नहीं सृष्टि संरचना से भी पूर्व से शिवावतार स्वरूप प्रतियुग म...
21/08/2026

🌹 #नवनाथ_१२_पंथ_८४_सिद्ध_संक्षिप्त_वर्णन🌹

नवनाथ कलियुग कालीन नहीं सृष्टि संरचना से भी पूर्व से शिवावतार स्वरूप प्रतियुग में तंत्र शक्तियों से हम भूतल वासियों को कृतार्थ करते हुए अवतार धारण करते हैं ।
आज हम आपको #परमनवनाथ के नाम बताते हैं ।
१ प्रकाशानन्द नाथ
२ विमर्शानंद नाथ
३ आनंदानंद नाथ
४ ज्ञानानंद नाथ
५ सत्यानन्द नाथ
६ पूर्णानंद नाथ
७ स्वभावानंद नाथ
८ प्रतिभानंद नाथ
९ सुभगानंद नाथ
इन्ही नवनाथो द्वारा नाथक्रम की उत्तपत्ति हुई ।

नाथ सम्प्रदाय नवनाथ,चौरासी, सिद्धबारह पंथ.

नाथ सम्प्रदाय

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं।

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रवृत्ति ने एक प्रकार की स्वच्छंदता को जन्म दिया जिसकी प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय शुरू हुआ। नाथ-साधु हठयोग पर विशेष बल देते थे। वे योग मार्गी थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे। तथाकथित नीची जातियों के लोगों में से कई पहुंचे हुए सिद्ध एवं नाथ हुए हैं। नाथ-संप्रदाय में #गोरखनाथ सबसे महत्वपूर्ण थे। आपकी कई रचनाएं प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त #चौरन्गीनाथ, #गोपीचन्द, #भरथरी आदि नाथ पन्थ के प्रमुख कवि है। इस समय की रचनाएं साधारणतः दोहों अथवा पदों में प्राप्त होती हैं, कभी-कभी चौपाई का भी प्रयोग मिलता है। परवर्ती संत-साहित्य पर सिध्दों और विशेषकर नाथों का गहरा प्रभाव पड़ा है।

गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है।

गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर है। गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परम्परा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। ऐसा नाथ सम्प्रदाय में माना जाता है।

गोरखनाथ से पहले अनेक सम्प्रदाय थे, जिनका नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया। शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव योग मार्गी भी उनके सम्प्रदाय में आ मिले थे।

गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणीधान को अधिक महत्व दिया है। इनके माध्‍यम से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया। गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे। गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या ४० बताई जाती है किन्तु डा. बड़्थ्याल ने केवल १४ रचनाएं ही उनके द्वारा रचित मानी है जिसका संकलन ‘गोरखबानी’ मे किया गया है।

जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’

गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

सिद्ध योगी : गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं :- चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव आदि। 13वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे।

नाथ सम्प्रदाय गुरु गोरखनाथ से भी पुराना है। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के इलाकों में ही ज्यादा रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में इनके योग मठ स्थापित हुए। आगे चलकर यह सम्प्रदाय भी कई भागों में विभक्त होता चला गया।

यह सम्प्रदाय भारत का परम प्राचीन, उदार, ऊँच-नीच की भावना से परे एंव अवधूत अथवा योगियों का सम्प्रदाय है।

इसका आरम्भ आदिनाथ शंकर से हुआ है और इसका वर्तमान रुप देने वाले योगाचार्य बालयति श्री गोरक्षनाथ भगवान शंकर के अवतार हुए है। इनके प्रादुर्भाव और अवसान का कोई लेख अब तक प्राप्त नही हुआ।

पद्म, स्कन्द शिव ब्रह्मण्ड आदि पुराण, तंत्र महापर्व आदि तांत्रिक ग्रंथ बृहदारण्याक आदि उपनिषदों में तथा और दूसरे प्राचीन ग्रंथ रत्नों में श्री गुरु गोरक्षनाथ की कथायें बडे सुचारु रुप से मिलती है।

श्री गोरक्षनाथ वर्णाश्रम धर्म से परे पंचमाश्रमी अवधूत हुए है जिन्होने योग क्रियाओं द्वारा मानव शरीरस्थ महा शक्तियों का विकास करने के अर्थ संसार को उपदेश दिया और हठ योग की प्रक्रियाओं का प्रचार करके भयानक रोगों से बचने के अर्थ जन समाज को एक बहुत बड़ा साधन प्रदान किया।

श्री गोरक्षनाथ ने योग सम्बन्धी अनेकों ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे जिनमे बहुत से प्रकाशित हो चुके है और कई अप्रकाशित रुप में योगियों के आश्रमों में सुरक्षित हैं।

श्री गोरक्षनाथ की शिक्षा एंव चमत्कारों से प्रभावित होकर अनेकों बड़े-बड़े राजा इनसे दीक्षित हुए। उन्होंने अपने अतुल वैभव को त्याग कर निजानन्द प्राप्त किया तथा जन-कल्याण में अग्रसर हुए। इन राजर्षियों द्वारा बड़े-बड़े कार्य हुए।

श्री गोरक्षनाथ ने संसारिक मर्यादा की रक्षा के अर्थ श्री मत्स्येन्द्रनाथ को अपना गुरु माना और चिरकाल तक इन दोनों में शका समाधान के रुप में संवाद चलता रहा। श्री मत्स्येन्द्र को भी पुराणों तथा उपनिषदों में शिवावतर माना गया अनेक जगह इनकी कथायें लिखी हैं।

यों तो यह योगी सम्प्रदाय अनादि काल से चला आ रहा किन्तु इसकी वर्तमान परिपाटियों के नियत होने के काल भगवान शंकराचार्य से 200 वर्ष पूर्व है। ऐस शंकर दिग्विजय नामक ग्रन्थ से सिद्ध होता है।

बुद्ध काल में वाम मार्ग का प्रचार बहुत प्रबलता से हुअ जिसके सिद्धान्त बहुत ऊँचे थे, किन्तु साधारण बुद्धि के लोग इन सिद्धान्तों की वास्तविकता न समझ कर भ्रष्टाचारी होने लगे थे।

इस काल में उदार चेता श्री गोरक्षनाथ ने वर्तमान नाथ सम्प्रदाय क निर्माण किया और तत्कालिक 84 सिद्धों में सुधार का प्रचार किया। यह सिद्ध वज्रयान मतानुयायी थे।

इस सम्बन्ध में एक दूसरा लेख भी मिलता है जो कि निम्न प्रकार हैः-
1ओंकार नाथ,
2उदय नाथ,
3सन्तोष नाथ,
4अचल नाथ,
5गजबेली नाथ,
6ज्ञान नाथ,
7चौरंगी नाथ,
8मत्स्येन्द्र नाथ,
9गुरु गोरक्षनाथ।
सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है।

यह योगी सम्प्रदाय बारह पन्थ में विभक्त है, यथाः-
1 सत्यनाथ,
2 धर्मनाथ,
3 दरियानाथ,
4 आई पन्थी,
5 रास के,
6 वैराग्य के,
7 कपिलानी,
8 गंगानाथी,
9 मन्नाथी,
10 रावल के,
11 पाव पन्थ,ी
12 पागल।

इन बारह पन्थ की प्रचलित परिपाटियों में कोई भेद नही हैं। भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में योगी सम्प्रदाय के बड़े-बड़े वैभवशाली आश्रम है और उच्च कोटि के विद्वान इन आश्रमों के संचालक हैं।
श्री गोरक्षनाथ का नाम नेपाल प्रान्त में बहुत बड़ा था और अब तक भी नेपाल का राजा इनको प्रधान गुरु के रुप में मानते है और वहाँ पर इनके बड़े-बड़े प्रतिष्ठित आश्रम हैं। यहाँ तक कि नेपाल की राजकीय मुद्रा (सिक्के) पर श्री गोरक्ष का नाम है और वहाँ के निवासी गोरक्ष ही कहलाते हैं।
काबुल-गान्धर सिन्ध, विलोचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रान्तों में यहा तक कि मक्का मदीने तक श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और ऊँचा मान पाया था।
इस सम्प्रदाय में कई भाँति के गुरु होते हैं यथाः- चोटी गुरु, चीरा गुरु, मंत्र गुरु, टोपा गुरु आदि।

श्री गोरक्षनाथ ने कर्ण छेदन-कान फाडना या चीरा चढ़ाने की प्रथा प्रचलित की थी। कान फाडने को तत्पर होना कष्ट सहन की शक्ति, दृढ़ता और वैराग्य का बल प्रकट करता है।

श्री गुरु गोरक्षनाथ ने यह प्रथा प्रचलित करके अपने अनुयायियों शिष्यों के लिये एक कठोर परीक्षा नियत कर दी। कान फडाने के पश्चात मनुष्य बहुत से सांसारिक झंझटों से स्वभावतः या लज्जा से बचता हैं। चिरकाल तक परीक्षा करके ही कान फाड़े जाते थे और अब भी ऐसा ही होता है। बिना कान फटे साधु को 'ओघड़' कहते है और इसका आधा मान होता है।

भारत में श्री गोरखनाथ के नाम पर कई विख्यात स्थान हैं और इसी नाम पर कई महोत्सव मनाये जाते हैं।
यह सम्प्रदाय अवधूत सम्प्रदाय है। अवधूत शब्द का अर्थ होता है " स्त्री रहित या माया प्रपंच से रहित" जैसा कि " सिद्ध सिद्धान्त पद्धति" में लिखा हैः-

" #सर्वान्_प्रकृति_विकारन_वधु_नोतीत्यऽवधूतः।"

अर्थात् जो समस्त प्रकृति विकारों को त्याग देता या झाड़ देता है वह अवधूत है। पुनश्चः-
" वचने वचने वेदास्तीर्थानि च पदे पदे।
इष्टे इष्टे च कैवल्यं सोऽवधूतः श्रिये स्तुनः।"
"एक हस्ते धृतस्त्यागो भोगश्चैक करे स्वयम्
अलिप्तस्त्याग भोगाभ्यां सोऽवधूतः श्रियस्तुनः॥"
उपर्युक्त लेखानुसार इस सम्प्रदाय में नव नाथ पूर्ण अवधूत हुए थे और अब भी अनेक अवधूत विद्यमान है।

नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से अपने इष्ट देव का ध्यान करते है। परस्पर आदेश या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है जिसका वर्णन वेद और उपनिषद आदि में किया गया है।

योगी लोग अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते है जिसे 'सिले' कहते है। गले में एक सींग की नादी रखते है। इन दोनों को सींगी सेली कहते है यह लोग शैव हैं अर्थात शिव की उपासना करते है। षट् दर्शनों में योग का स्थान अत्युच्च है और योगी लोग योग मार्ग पर चलते हैं अर्थात योग क्रिया करते है जो कि आत्म दर्शन का प्रधान साधन है। जीव ब्रह्म की एकता का नाम योग है। चित्त वृत्ति के पूर्ण निरोध का योग कहते है।

वर्तमान काल में इस सम्प्रदाय के आश्रम अव्यवस्थित होने लगे हैं। इसी हेतु "अवधूत योगी महासभा" का संगठन हुआ है और यत्र तत्र सुधार और विद्या प्रचार करने में इसके संचालक लगे हुए है।
प्राचीन काल में स्याल कोट नामक राज्य में शंखभाटी नाम के एक राजा थे। उनके पूर्णमल और रिसालु नाम के पुत्र हुए। यह श्री गोरक्षनाथ के शिष्य बनने के पश्चात क्रमशः चोरंगी नाथ और मन्नाथ के नाम से प्रसिद्ध होकर उग्र भ्रमण शील रहें। "योगश्चित वृत्ति निरोधः" सूत्र की अन्तिमावस्था को प्राप्त किया और इसी का प्रचार एंव प्रसार करते हुए जन कल्याण किया और भारतीय या माननीय संस्कृति को अक्षूण्ण बने रहने का बल प्रदान किया। उर्पयुक्त 12 पंथो में जो "मन्नाथी" पंथ है वह इन्ही का श्री मन्नाथ पंथ है। श्री मन्नाथ ने भ्रमण करते हुए वर्तमान जयपुर राज्यान्तर्गत शेखावाटी प्रान्त के बिसाऊ नगर के समीप आकर अपना आश्रम निर्माण किया। यह ग्राम अब 'टाँई' के नाम से प्रसिद्ध है। श्री मन्नाथ ने यहीं पर अपना शरीर त्याग किया था, यही पर इनका समाधि मन्दिर है और मन्नाथी योगियों का गुरु द्वार हैं। 'टाँई' के आश्रम के अधीन प्राचीन काल से 2000 बीघा जमीन है, अच्छा बड़ा मकान है और इसमे कई समाधियाँ बनी हुई है। इससे ज्ञात होता है कि श्री मन्नाथ के पश्चात् यहाँ पर दीर्घकाल तक अच्छे सन्त रहते रहे है। इस स्थान में बाबा श्री ज्योतिनाथ जी के शिष्य श्री केशरनाथ रहते थे। अब श्री ज्ञाननाथ रहते हैं। इन दिनों इस आश्रम का जीर्णोद्वार भी हुआ हैं। श्री मन्नाथ के परम्परा में आगे चल कर श्री चंचलनाथ अच्छे संत हुए और इन्होने कदाचित सं. 1700 वि. के आस पास झुंझुनु(जयपुर) में अपना आश्रम बनाया यही इनका समाधि मन्दिर हैं।

इससे आगे का इतिहास इस पुस्तक के परिशिष्ट सं. 2 में लिखा गया है। यदि सम्भव हुआ तो श्री गोरक्षनाथ की शिक्षाएँ एकत्र करके प्रकाशित करने की चेष्टा की जायगी।

नाथ लक्षणः-
"नाकरोऽनादि रुपंच'थकारः' स्थापयते सदा"
भुवनत्रय में वैकः श्री गोरक्ष नमोल्तुते।
"शक्ति संगम तंत्र॥

अवधूत लोग अद्वैत वादी योगी होते है जो कि बिना किसी भौतिक साधन के यौगग्नि प्रज्वलित करके कर्म विपाक को भस्म कर निजानन्द में रमण करते है और अपनी सहज शिक्षा के द्वारा जन कलयाण करते रहते है। तभी उपयुक्त नाथ शब्द सार्थक होता है।

इनका सिद्धान्तः-
न ब्रह्म विष्णु रुद्रौ, न सुरपति सुरा,
नैव पृथ्वी न चापौ।
नैवाग्निनर्पि वायुः न च गगन तलं,
नो दिशों नैव कालः।
नो वेदा नैव यज्ञा न च रवि शशिनौ,
नो विधि नैव कल्पाः।
स्व ज्योतिः सत्य मेकं जयति तव पदं,
सच्चिदानन्दमूर्ते,
ऊँ शान्ति ! प्रेम!! आनन्द!!!

नवनाथ

नवनाथ नाथ सम्प्रदाय के सबसे आदि में नौ मूल नाथ हुए हैं । वैसे नवनाथों के सम्बन्ध में काफी मतभेद है, किन्तु वर्तमान नाथ सम्प्रदाय के १८-२० पंथों में प्रसिद्ध नवनाथ क्रमशः इस प्रकार हैं -

१॰ आदिनाथ - ॐ-कार शिव, ज्योति-रुप
२॰ उदयनाथ - पार्वती, पृथ्वी रुप
३॰ सत्यनाथ - ब्रह्मा, जल रुप
४॰ संतोषनाथ - विष्णु, तेज रुप
५॰ अचलनाथ (अचम्भेनाथ) - शेषनाग, पृथ्वी भार-धारी
६॰ कंथडीनाथ - गणपति, आकाश रुप
७॰ चौरंगीनाथ - चन्द्रमा, वनस्पति रुप
८॰ मत्स्येन्द्रनाथ - माया रुप, करुणामय
९॰ गोरक्षनाथ - अयोनिशंकर त्रिनेत्र, अलक्ष्य रुप

चौरासी सिद्ध

जोधपुर, चीन इत्यादि के चौरासी सिद्धों में भिन्नता है । अस्तु, यहाँ यौगिक साहित्य में प्रसिद्ध नवनाथ के अतिरिक्त ८४ सिद्ध नाथ इस प्रकार हैं -
१॰ सिद्ध चर्पतनाथ,
२॰ कपिलनाथ,
३॰ गंगानाथ,
४॰ विचारनाथ,
५॰ जालंधरनाथ,
६॰ श्रंगारिपाद,
७॰ लोहिपाद,
८॰ पुण्यपाद,
९॰ कनकाई,
१०॰ तुषकाई,
११॰ कृष्णपाद,
१२॰ गोविन्द नाथ,
१३॰ बालगुंदाई,
१४॰ वीरवंकनाथ,
१५॰ सारंगनाथ,
१६॰ बुद्धनाथ,
१७॰ विभाण्डनाथ,
१८॰ वनखंडिनाथ,
१९॰ मण्डपनाथ,
२०॰ भग्नभांडनाथ,
२१॰ धूर्मनाथ ।
२२॰ गिरिवरनाथ,
२३॰ सरस्वतीनाथ,
२४॰ प्रभुनाथ,
२५॰ पिप्पलनाथ,
२६॰ रत्ननाथ,
२७॰ संसारनाथ,
२८॰ भगवन्त नाथ,
२९॰ उपन्तनाथ,
३०॰ चन्दननाथ,
३१॰ तारानाथ,
३२॰ खार्पूनाथ,
३३॰ खोचरनाथ,
३४॰ छायानाथ,
३५॰ शरभनाथ,
३६॰ नागार्जुननाथ,
३७॰ सिद्ध गोरिया,
३८॰ मनोमहेशनाथ,
३९॰ श्रवणनाथ,
४०॰ बालकनाथ,
४१॰ शुद्धनाथ,
४२॰ कायानाथ ।
४३॰ भावनाथ,
४४॰ पाणिनाथ,
४५॰ वीरनाथ,
४६॰ सवाइनाथ,
४७॰ तुक नाथ,
४८॰ ब्रह्मनाथ,
४९॰ शील नाथ,
५०॰ शिव नाथ,
५१॰ ज्वालानाथ,
५२॰ नागनाथ,
५३॰ गम्भीरनाथ,
५४॰ सुन्दरनाथ,
५५॰ अमृतनाथ,
५६॰ चिड़ियानाथ,
५७॰ गेलारावल,
५८॰ जोगरावल,
५९॰ जगमरावल,
६०॰ पूर्णमल्लनाथ,
६१॰ विमलनाथ,
६२॰ मल्लिकानाथ,
६३॰ मल्लिनाथ ।
६४॰ रामनाथ,
६५॰ आम्रनाथ,
६६॰ गहिनीनाथ,
६७॰ ज्ञाननाथ,
६८॰ मुक्तानाथ,
६९॰ विरुपाक्षनाथ,
७०॰ रेवणनाथ,
७१॰ अडबंगनाथ,
७२॰ धीरजनाथ,
७३॰ घोड़ीचोली,
७४॰ पृथ्वीनाथ,
७५॰ हंसनाथ,
७६॰ गैबीनाथ,
७७॰ मंजुनाथ,
७८॰ सनकनाथ,
७९॰ सनन्दननाथ,
८०॰ सनातननाथ,
८१॰ सनत्कुमारनाथ,
८२॰ नारदनाथ,
८३॰ नचिकेता,
८४॰ कूर्मनाथ ।
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बारह पंथ

नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी मुख्यतः बारह शाखाओं में विभक्त हैं, जिसे बारह पंथ कहते हैं । इन बारह पंथों के कारण नाथ सम्प्रदाय को ‘बारह-पंथी’ योगी भी कहा जाता है । प्रत्येक पंथ का एक-एक विशेष स्थान है, जिसे नाथ लोग अपना पुण्य क्षेत्र मानते हैं । प्रत्येक पंथ एक पौराणिक देवता अथवा सिद्ध योगी को अपना आदि प्रवर्तक मानता है । नाथ सम्प्रदाय के बारह पंथों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है -

१॰ सत्यनाथ पंथ - इनकी संख्या 31 बतलायी गयी है । इसके मूल प्रवर्तक सत्यनाथ (भगवान् ब्रह्माजी) थे । इसीलिये सत्यनाथी पंथ के अनुयाययियों को “ब्रह्मा के योगी” भी कहते हैं । इस पंथ का प्रधान पीठ उड़ीसा प्रदेश का पाताल भुवनेश्वर स्थान है ।

२॰ धर्मनाथ पंथ – इनकी संख्या २५ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक धर्मराज युधिष्ठिर माने जाते हैं । धर्मनाथ पंथ का मुख्य पीठ नेपाल राष्ट्र का दुल्लुदेलक स्थान है । भारत में इसका पीठ कच्छ प्रदेश धिनोधर स्थान पर हैं ।

३॰ राम पंथ - इनकी संख्या ६१ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक भगवान् श्रीरामचन्द्र माने गये हैं । इनका प्रधान पीठ उत्तर-प्रदेश का गोरखपुर स्थान है ।

४॰ नाटेश्वरी पंथ अथवा लक्ष्मणनाथ पंथ – इनकी संख्या ४३ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक लक्ष्मणजी माने जाते हैं । इस पंथ का मुख्य पीठ पंजाब प्रांत का गोरखटिल्ला (झेलम) स्थान है । इस पंथ का सम्बन्ध दरियानाथ व तुलनाथ पंथ से भी बताया जाता है ।

५॰ कंथड़ पंथ - इनकी संख्या १० है । कंथड़ पंथ के मूल प्रवर्तक गणेशजी कहे गये हैं । इसका प्रधान पीठ कच्छ प्रदेश का मानफरा स्थान है ।

६॰ कपिलानी पंथ - इनकी संख्या २६ है । इस पंथ को गढ़वाल के राजा अजयपाल ने चलाया । इस पंथ के प्रधान प्रवर्तक कपिल मुनिजी बताये गये हैं । कपिलानी पंथ का प्रधान पीठ बंगाल प्रदेश का गंगासागर स्थान है । कलकत्ते (कोलकाता) के पास दमदम गोरखवंशी भी इनका एक मुख्य पीठ है ।

७॰ वैराग्य पंथ - इनकी संख्या १२४ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक भर्तृहरिजी हैं । वैराग्य पंथ का प्रधान पीठ राजस्थान प्रदेश के नागौर में राताढुंढा स्थान है ।इस पंथ का सम्बन्ध भोतंगनाथी पंथ से बताया जाता है ।

८॰ माननाथ पंथ - इनकी संख्या १० है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक राजा गोपीचन्द्रजी माने गये हैं । इस समय माननाथ पंथ का पीठ राजस्थान प्रदेश का जोधपुर महा-मन्दिर नामक स्थान बताया गया है ।

९॰ आई पंथ - इनकी संख्या १० है । इस पंथ की मूल प्रवर्तिका गुरु गोरखनाथ की शिष्या भगवती विमला देवी हैं । आई पंथ का मुख्य पीठ बंगाल प्रदेश के दिनाजपुर जिले में जोगी गुफा या गोरखकुई नामक स्थान हैं । इनका एक पीठ हरिद्वार में भी बताया जाता है । इस पंथ का सम्बन्ध घोड़ा चौली से भी समझा जाता है ।

१०॰ पागल पंथ – इनकी संख्या ४ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री चौरंगीनाथ थे । जो पूरन भगत के नाम से भी प्रसिद्ध हैं । इसका मुख्य पीठ पंजाब-हरियाणा का अबोहर स्थान है ।

११॰ ध्वजनाथ पंथ - इनकी संख्या ३ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक हनुमानजी माने जाते हैं । वर्तमान में इसका मुख्य पीठ सम्भवतः अम्बाला में है ।

१२॰ गंगानाथ पंथ - इनकी संख्या ६ है । इस पंथ के मूल प्रवर्तक श्री भीष्म पितामह माने जाते हैं । इसका मुख्य पीठ पंजाब में गुरुदासपुर जिले का जखबार स्थान है ।

कालान्तर में नाथ सम्प्रदाय के इन बारह पंथों में छह पंथ और जुड़े - १॰ रावल (संख्या-७१), २॰ पंक (पंख), ३॰ वन, ४॰ कंठर पंथी, ५॰ गोपाल पंथ तथा ६॰ हेठ नाथी ।

इस प्रकार कुल बारह-अठारह पंथ कहलाते हैं । बाद में अनेक पंथ जुड़ते गये, ये सभी बारह-अठारह पंथों की उपशाखायें अथवा उप-पंथ है । कुछ के नाम इस प्रकार हैं - अर्द्धनारी, अमरनाथ, अमापंथी। उदयनाथी, कायिकनाथी, काममज, काषाय, गैनीनाथ, चर्पटनाथी, तारकनाथी, निरंजन नाथी, नायरी, पायलनाथी, पाव पंथ, फिल नाथी, भृंगनाथ आदि ।।

नरहरि सुनार रहते तो पंढरपुर में थे, किन्तु इनका हृदय काशी के भोले बाबा ने चुरा लिया था। शिव की भक्ति में ये इतने मगन रहते थे कि पंढरपुर में रहकर भी विट्ठल भगवान् को न तो इन्होंने कभी देखा और न ही देखने को उत्सुक थे। नरहरि सुनारी का काम करते थे। इसलिए जब सोने के आभूषण बनाते, तो उस समय भी शिव, शिव, शिव, शिव का नाम सतत् इनके होंठों पर रहता। इसलिए इनके बनाए आभूषणों में भी दिव्य सौंदर्य झलकने लगता था।

पंढरपुर में ही रहता था एक साहूकार, जो कि विट्ठल भगवान् का भक्त था। उसके कोई पुत्र न था। उसने एक बार विट्ठल भगवान् से मनौती की कि यदि उसे पुत्र हुआ, तो वह विट्ठल भगवान् को सोने की करधनी (कमरबंद या कमर पट्टा) पहनाएगा।

विट्ठल भगवान् की कृपा से उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। वह खुशी से फूला न समाया और भागा-भागा नरहरि सुनार के पास सोना लेकर पहुँचा और बोला, नरहरि जी ! विट्ठल भगवान् ने प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान किया है। अतः मनौती के अनुसार आज मैं विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित सोने की करधनी पहनाना चाहता हूँ। पंढरपुर में आपके अलावा इस प्रकार की करधनी और कोई नहीं गढ़ सकता। इसलिए आप यह सोना ले लीजिए और पांडुरंग मंदिर में चलकर विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले आइए और जल्दी से करधनी तैयार कर दीजिए।

विट्ठल भगवान् का नाम सुनकर नरहरि जी बोले, "भैया ! मैं शिवजी के अलावा किसी अन्य देवता के मंदिर में प्रवेश नहीं करता। इसलिए आप किसी दूसरे सुनार से करधनी तैयार करा लें। लेकिन साहूकार बोला, नरहरि जी ! आपके जैसा श्रेष्ठ सुनार तो पंढरपुर में और कोई नहीं है, इसलिए मैं करधनी तो आपसे ही बनवाऊँगा। यदि आप मंदिर नहीं जाना चाहते हैं, तो ठीक है। मैं स्वयं विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ला देता हूँ। नरहरि जी ने मजबूरी में इसे स्वीकार कर लिया।

साहूकार विट्ठल भगवान् की कमर का नाप लेकर आ गया और नरहरि जी ने उस नाप की रत्नजड़ित सोने की करधनी बना दी। साहूकार आनंद पूर्वक उस करधनी को लेकर अपने आराध्य देव विट्ठल भगवान् को पहनाने मंदिर गया। जब पुजारी जी वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनाने लगे, तो वह करधनी कमर से चार अंगुल बड़ी हो गई।
साहूकार करधनी लेकर वापिस नरहरि जी के पास लौटा और उस करधनी को छोटा करवा लिया। जब वह पुनः करधनी लेकर मंदिर पहुँचा और पुजारी ने वह करधनी विट्ठल भगवान् को पहनानी चाही, तो अबकी बार वह चार अंगुल छोटी निकली।

नरहरि जी ने करधनी फिर बड़ी की, तो वह चार अंगुल बढ़ गई। फिर छोटी की, तो वह चार अंगुल कम हो गई। ऐसा चार बार हुआ। पुजारी जी व अन्य श्रद्धालुओं ने साहूकार को सलाह दी कि नरहरि जी स्वयं ही विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले लें।
साहूकार के अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर नरहरि जी बड़ी मुश्किल से विट्ठल भगवान् के मंदिर में जाकर स्वयं नाप लेने को तैयार हुए। किन्तु कहीं उन्हें विट्ठल भगवान् के दर्शन न हो जाएँ, यह सोचकर उन्होंने साहूकार के सामने यह शर्त रखी कि मंदिर में घुसने से पहले मैं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँगा और हाथों से टटोल कर ही आपके विट्ठल भगवान् की कमर की नाप ले सकूँगा। साहूकार ने नरहरि जी की यह शर्त मान ली। अनेक शिवालयों से घिरे पांडुरंग मंदिर की ओर कदम बढ़ाने से पहले नरहरि जी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। साहूकार इन्हें मंदिर के अंदर ले आया और विट्ठल भगवान् के सामने खड़ा कर दिया।

जब नरहरिजी ने नाप लेने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए और मूर्ति को टटोलना शुरू किया, तो उन्हें लगा कि वे पाँच मुख, दस हाथ वाले, साँपों के आभूषण पहने हुए, मस्तक पर जटा और उसमें से प्रवाहित हो रही गंगा वाले शंकर भगवान् की मूर्ति का स्पर्श कर रहे हैं। नरहरि जी ने सोचा, 'कहीं साहूकार मुझ से ठिठोली करने के लिए विट्ठल भगवान् के मंदिर की जगह किसी शिवालय में तो नहीं ले आए हैं। यह सोचकर ये अपने आराध्य देव के दर्शन के लोभ से बच नहीं पाए और प्रसन्न होकर इन्होंने अपनी आँखों से पट्टी खोल दी।

किन्तु आँखें खोलकर देखा तो ठगे से रह गए। देखा सामने उनके आराध्य शिव भगवान् नहीं विट्ठल ही खड़े हैं। झट इन्होंने फिर से अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी और पुनः नाप लेने लगे। लेकिन जैसे ही इन्होंने पुनः मूर्ति के दोनों ओर अपने हाथ ले जाकर कमर की नाप लेने का प्रयास किया, तो इन्हें पुन: ऐसा आभास हुआ कि मानो ये अपने इष्टदेव बाघाम्बर धारी भगवान् शिवजी का ही आलिंगन कर रहे हों। जैसे ही आँखों से पट्टी खोलकर देखा, तो पुनः विट्ठल भगवान् की मुस्कराती हुई छवि दिखलाई पड़ी। हड़बड़ाते हुए इन्होंने तुरंत अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और फिर से मूर्ति की कमर का नाप लेने लगे। लेकिन आँखें बंद करने पर पुनः मूर्ति में शंकर भगवान् का आभास हुआ।
जब ऐसा तीन बार हुआ, तो नरहरि जी असमंजस में पड़ गए। इन्हें समझ में आ गया कि शिव और विट्ठल भगवान् अलग-अलग नहीं हैं। जो शंकर हैं, वे ही विट्ठल (विष्णु) हैं और जो विट्ठल (विष्णु) हैं, वे ही शंकर हैं। अब तो इन्होंने झट अपनी आँखों पर बँधी अज्ञान की पट्टी उतारकर फेंकी और क्षमा माँगते हुए विट्ठल भगवान् के चरणों में गिर पड़े और सुबक-सुबककर रोते हुए कहने लगे, हे विश्व के जीवनदाता ! मैं आपकी शरण में आया हूँ। मैं शिवजी में और आपमें अंतर करता था। इसीलिए मुझ नराधम ने आज तक आपके दर्शन तक न किए। आज आपने मेरे मन का अज्ञान और अंधकार दूर कर दिया। कृपया अपने इस अपराधी को क्षमा कर दीजिए।
नरहरि जी की इस सरलता पर विट्ठल भगवान् रीझ गए और उन्होंने प्रसन्न होकर नरहरि के इष्टदेव शिवजी को सम्मान देते हुए अपने शीश पर शिवलिंग धारण कर लिया। विट्ठल भगवान् को सिर पर शिवलिंग धारण किए देखकर नरहरि जी और भी अधिक रोमांचित हो गए और अश्रुपात करते हुए गद्गद स्वर से उनकी स्तुति करने लगे।
अब की बार नरहरि जी ने विट्ठल भगवान् की कमर की नाप लेकर प्रेम पूर्ण हृदय से जो करधनी बनाई, वह उनकी कमर में बिल्कुल ठीक बैठी। विट्ठल भगवान् को रत्नजड़ित करधनी पहने देख नरहरि जी और साहूकार भाव-विभोर हो उठे।
अब नरहरि जी विट्ठल भगवान् को अपने इष्ट देव शिव भगवान् का ही रूप मानने लगे थे, अतः ये विट्ठल-भक्तों के वारकरी मंडल में शामिल हो गए। ये विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल, विट्ठल का भगवन्नाम संकीर्तन करते हुए मस्ती में नृत्य करते। आज भी अपने सिर पर शिवलिंग धारण किए पंढरपुर के विट्ठल भगवान् के दर्शन कर भक्तजनों को नरहरि सुनार की इस कथा की बरबस याद आ जाती है।
"जय जय विट्ठल”

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