Sidheshwar Mandir Rajapark Jaipur

Sidheshwar Mandir Rajapark Jaipur Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Sidheshwar Mandir Rajapark Jaipur, Religious organisation, Gali no 3, Raja Park, Jaipur.

A place to worship Hindu Gods with a special focus on Yoga,Spiritual upliftment,Social welfare of the society by various activities like help to widows,Poor children,scholarship to poor students,Free homeopathic dispensary,Food to poor

SIDHESHWAR MAHADEV Sidheshwar Mandir OM NAMAH SHIVAY
07/06/2026

SIDHESHWAR MAHADEV

Sidheshwar Mandir

OM NAMAH SHIVAY

14/05/2026

पत्थरों पर लिखी जीत

घने जंगलों और ऊँचे पर्वतों के बीच बसे एक प्राचीन गुरुकुल में दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा लेने आते थे। उसी गुरुकुल में एक दुबला-पतला, शांत स्वभाव का बालक भी पढ़ता था—नाम था वरद। लेकिन बाकी बच्चों से वह बिल्कुल अलग था। जहाँ दूसरे शिष्य कठिन श्लोक पलभर में याद कर लेते, वहीं वरद एक साधारण पाठ भी ठीक से नहीं समझ पाता था।

गुरुकुल के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते—
“अरे, इसे तो ‘मंदबुद्धि वरद’ कहना चाहिए!”
उनकी हँसी उसके दिल को तीर की तरह चुभती। गुरु आचार्य सोमदेव ने भी उसे बहुत समझाया, बार-बार पढ़ाया, पर परिणाम वही रहा। एक दिन आचार्य ने भारी मन से कहा—
“बेटा, हर व्यक्ति हर काम के लिए नहीं बना होता। शायद विद्या तुम्हारे भाग्य में नहीं है। घर लौट जाओ।”

यह सुनते ही वरद की आँखें भर आईं।
उस रात उसने अकेले नदी किनारे बैठकर बहुत रोया। अगले ही सुबह वह अपना छोटा-सा झोला उठाकर घर की ओर निकल पड़ा। दोपहर की तपती धूप… सुनसान रास्ता… और कई कोस चलने के बाद उसे तेज प्यास लगी। तभी दूर उसे एक पुराना कुआँ दिखाई दिया।
वह वहाँ पहुँचा तो कुछ महिलाएँ रस्सी से पानी खींच रही थीं। थके हुए वरद ने पानी पिया और जैसे ही लौटने लगा, उसकी नजर पत्थर पर पड़े गहरे निशानों पर पड़ी।
वह चौंक गया।

“इतने कठोर पत्थर पर ये गहरे कटाव कैसे?” उसने आश्चर्य से पूछा। एक बूढ़ी महिला मुस्कुराई— “बेटा, ये किसी हथियार के निशान नहीं हैं। वर्षों से रस्सी के बार-बार रगड़ खाने से पत्थर भी घिस गया।”

वरद स्तब्ध रह गया। उसके भीतर जैसे बिजली कौंध गई। “यदि एक मुलायम रस्सी लगातार प्रयास से पत्थर को काट सकती है… तो क्या मैं अभ्यास से अपनी कमजोरी नहीं मिटा सकता?”

उसकी आँखों में फिर चमक लौट आई।
वह तुरंत वापस गुरुकुल की ओर दौड़ पड़ा।
गुरुकुल पहुँचते ही उसने गुरुजी के चरण पकड़ लिए— “गुरुदेव! मुझे एक आखिरी अवसर दीजिए। मैं हार नहीं मानूँगा।”

उस दिन के बाद वरद बदल चुका था। जब सारे विद्यार्थी सो जाते, तब भी उसकी कुटिया में दीपक जलता रहता। वह रात-रात भर अभ्यास करता। गलती करता… फिर दोहराता… फिर सीखता। धीरे-धीरे शब्द उसके मित्र बनने लगे।
श्लोक उसके मन में उतरने लगे।
जिस बालक को सब मूर्ख समझते थे, वही अब सबसे कठिन प्रश्नों का उत्तर देने लगा।

साल बीतते गए… एक दिन पूरे राज्य में घोषणा हुई— “महान संस्कृत आचार्य वरदराज पधार रहे हैं!”

वही वरद, जिसे कभी गुरुकुल से निकाल दिया गया था, अब विद्या का सूर्य बन चुका था। उसके लिखे ग्रंथ दूर-दूर तक पढ़े जाने लगे। राजा भी उसका सम्मान करने लगे।

सभा में अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए वरदराज ने कहा— “भाग्य इंसान को अवसर देता है, लेकिन अभ्यास उसे महान बनाता है। याद रखो—लगातार गिरने वाली पानी की बूंद भी पत्थर में छेद कर देती है।” उस दिन पूरा गुरुकुल तालियों से गूंज उठा… और पत्थरों पर पड़े रस्सी के निशान एक अमर सीख बन गए।

*शिक्षा*

अभ्यास की शक्ति का तो कहना ही क्या हैं। यह आपके हर सपने को पूरा करेगी। अभ्यास बहुत जरूरी है चाहे वो खेल मे हो या पढ़ाई में या किसी ओर चीज़ में। बिना अभ्यास के आप सफल नहीं हो सकते हो। अगर आप बिना अभ्यास के केवल किस्मत के भरोसे बैठे रहोगे, तो आखिर मैं आपको पछतावे के सिवा और कुछ हाथ नहीं लगेगा।

SIDHESHWAR MAHADEV OM NAMAH SHIVAY
04/05/2026

SIDHESHWAR MAHADEV

OM NAMAH SHIVAY

20/04/2026

*मन का इलाज*

एक समय की बात है, एक राज्य में एक बुद्धिमान राजा राज करता था। उसके पास एक बकरी थी, जो देखने में साधारण थी, लेकिन उसी बकरी के कारण एक दिन पूरे राज्य में एक अनोखी घोषणा हुई। राजा ने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवाया — “जो कोई इस बकरी को जंगल में चराकर पूरी तरह तृप्त कर देगा, मैं उसे अपने राज्य का आधा हिस्सा दे दूँगा। लेकिन ध्यान रहे, बकरी का पेट भरा है या नहीं, इसकी परीक्षा मैं स्वयं करूँगा।”

यह सुनते ही कई लोग उत्साहित हो उठे। आधा राज्य पाने का लालच किसे नहीं होता! अगले ही दिन एक आदमी राजा के पास पहुँचा और बोला, “महाराज, बकरी को पेट भर खिलाना कोई कठिन काम नहीं है। मैं यह काम अवश्य कर सकता हूँ।” राजा ने उसे बकरी सौंप दी। वह आदमी बकरी को जंगल में ले गया और दिन भर उसे हरी-हरी घास खिलाता रहा। शाम तक उसने सोचा, “आज तो बकरी ने बहुत घास खा ली है, अब इसका पेट अवश्य भर गया होगा।”
वह बकरी को लेकर दरबार में पहुँचा। राजा ने बकरी के सामने थोड़ी-सी ताज़ी घास रखी। जैसे ही बकरी ने घास देखी, वह तुरंत उसे खाने लगी। यह देखकर राजा मुस्कुराए और बोले, “तुम इसे पेट भर नहीं खिला सके। यदि पेट भर गया होता, तो यह फिर घास क्यों खाती?”

ऐसा कई लोगों ने किया। वे बकरी को दिन भर खूब घास खिलाते, पर दरबार में आते ही बकरी फिर घास खाने लगती। कोई भी सफल नहीं हो पाया। इसी बीच एक बुद्धिमान साधु ने यह घोषणा सुनी। उसने सोचा, “इसमें अवश्य कोई गहरा रहस्य छिपा है। केवल अधिक खिलाने से काम नहीं चलेगा, कुछ अलग करना होगा।”
वह राजा के पास पहुँचा और बकरी को जंगल ले गया। जब भी बकरी घास खाने के लिए आगे बढ़ती, साधु उसे हल्की-सी लकड़ी से डाँटता या मारता। पूरे दिन यही क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे बकरी के मन में यह डर बैठ गया कि घास खाने का मतलब मार खाना है। शाम को साधु बकरी को दरबार में ले आया और बोला, “महाराज, मैंने इसे भरपेट खिला दिया है। अब यह घास नहीं खाएगी।” राजा ने फिर से बकरी के सामने ताज़ी घास रखी। इस बार बकरी ने घास की ओर देखा भी नहीं, बल्कि डरकर पीछे हट गई। राजा समझ गए कि साधु ने रहस्य को पहचान लिया है। उन्होंने प्रसन्न होकर उसे आधा राज्य दे दिया।

तब साधु ने सभी को समझाया—
“यह बकरी हमारे मन के समान है। मन की इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होतीं। चाहे उसे कितना भी सुख और साधन दे दो, वह और चाहता ही रहेगा। लेकिन यदि हम अपने मन को विवेक और अनुशासन की लकड़ी से नियंत्रित करें, तो वह हमारे वश में आ सकता है।”

*शिक्षा*
मन की इच्छाएँ बकरी की तरह होती हैं—उन्हें जितना खिलाओ, उतना बढ़ती हैं। यदि जीवन में शांति और संतोष चाहिए, तो मन पर विवेक, अनुशासन और संयम का अंकुश लगाना जरूरी है। जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और सुख प्राप्त करता है।

19/04/2026

*कभी कभी नुकसान ही सबसे बड़ा फायदा होता है*

एक दार्शनिक अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहा था। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।
खैर, दोनों को प्यास लगी थी सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया।

अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे। दार्शनिक बोला, “ श्रीमान, क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!” “ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमाते हुए बोला।

“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इनता बड़ा है पर इसमें कोई फसल नही बोई गयी है, और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं…तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, दार्शनिक ने प्रश्न किया। “जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”, आदमी ने समझाया।

दार्शनिक और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “ शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!” दोनों रुकने को तैयार हो गए।

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी दार्शनिक ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे।” शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था। दोनों भैंस को मार कर रातों-रात गायब हो गए!

यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिए एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाए और उसकी आर्थिक मदद की जाए। अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा।

शिष्य को अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था… टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं। शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के मरने के बाद वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिए वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।

“ शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था।”, शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला। “नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे…कैसे भूल सकता हूँ उस दिन को; उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया। आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी चट्टान से गिरकर मर गयी। कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी… सौभाग्य से फसल अच्छी निकल गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बागीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ…सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की मौत ना हुई होती !

“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था! पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी, कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है सो कोशिश ही नहीं की पर जब भैंस मर गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”

आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था।

कई बार हम परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं, फिर चाहे वो परिस्थितियां बुरी ही क्यों न हों! हम अपनी जॉब से नफरत करते हैं पर फिर भी उसे पकड़े-पकड़े ज़िन्दगी बिता देते हैं, तो कई बार हम बस इसलिए नये business के बारे में नहीं सोचते क्योंकि हमारा मौजूदा बिजनेस दाल-रोटी भर का खर्चा निकाल देता है! पर ऐसा करने में हम कभी भी अपने full potential को realize नहीं कर पाते हैं और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने की हमारे अन्दर क्षमता है और जो हमारी life को कहीं बेहतर बना सकती हैं।

सोचिये, कहीं आपकी ज़िन्दगी में भी तो कोई ऐसी भैंस नहीं जो आपको एक बेहतर ज़िन्दगी जीने से रोक रही है…कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको लग रहा है कि आपने उस भैंस को बाँध कर रखा है जबकि असलियत में उस भैंस ने आपको बाँध रखा है! और अगर आपको लगे कि ऐसा है, तो आगे बढिए…हिम्मत करिए, अपनी रस्सी को काटिए; आजाद होइए… आपके पास खोने के लिए बहुत थोड़ा है पर पाने के लिए पूरा जहान है! जाइए उसे पाकर दिखाइए

01/04/2026

*राम सुमर ले तो बंधन छूटे*

एक पंडित जी प्रतिदिन रानी को कथा सुनाने महल मे जाया करते थे । कथा के अंत में प्रतिदिन कहते कि

"राम सुमर ले तो बंधन छूटे।"

कुछ दिन कथा सुनने के पश्चात एक दिन पिंजरे में बंद तोता बोला -

"यूं मत कहो रे पंडित झूठे।"

उस समय तो पंडित जी मन मसोस कर रह गये और चुपचाप चले गये। परन्तु अब तो तोता प्रतिदिन पंडित को झूठे कह कर सम्बोधित करने लगा।

पंडित जी को मन में क्रोध आता कि ये सब क्या सोचेंगे, रानी क्या सोचेगी? परेशान हो कर पंडित जी अपने गुरु जी के पास गये। गुरु जी को सब हाल बताया। गुरु जी अगले दिन पंडित जी के साथ स्वयं कथा करने गये और एकान्त मे तोते के पास जा कर पूछा तुम पंडित को झूठा क्यों कहते हो?

तोते ने कहा- मैं पहले खुले आकाश में उड़ता था। एक बार मैं एक आश्रम में जा बैठा जहां सब साधू-संत राम-राम-राम बोल रहे थे। वहां बैठा तो मैंने भी राम-राम बोलना शुरू कर दिया। एक दिन मैं उसी आश्रम में राम-राम बोल रहा था, तभी एक संत ने मुझे पकड़ कर पिंजरे में बंद कर लिया। फिर मुझे दो-चार श्लोक सिखाये। आश्रम में एक सेठ ने संत को भारी दान दक्षिणा दी। संत ने आशीर्वाद. स्वरूप मुझे सेठ को सौंप दिया।

अब सेठ ने मुझे चांदी के पिंजरे में रखा। मेरा बंधन बढ़ता गया। अब मै स्वच्छ वायु और ताजा फलों के लिए भी तरसने लगा। निकलने की कोई संभावना न रही।

एक दिन उस सेठ ने राजा से अपना काम निकलवाने के लिए उपहार स्वरूप मुझे राजा को दे दिया। राजा ने खुशी-खुशी मुझे ले लिया, क्योंकि मैं राम-राम और श्लोक बोलता था। रानी धार्मिक प्रवृत्ति की है तो राजा ने मुझे रानी को दे दिया। रानी ने सोने का पिंजरा बनवा दिया और खाने मे हमेशा मेवे और अन्य कीमती भोज्य पदार्थ ही मिलते हैं। मिर्च खाना और पेड़ पर लटके फलों मे चोंच मार कर स्वाद लेना भूल ही गया हूं। अपनी मर्जी से चहकना भूल गया हूं।

अब मैं कैसे कहूं कि "राम-राम कहे तो बंधन छूटे।" तोते ने गुरुजी से कहा आप ही कोई युक्ति बताएं, जिससे मेरा बंधन छूट जाए।

गुरु जी बोले- "आज तुम खा कर थोड़ी देर बाद चुपचाप पड़ जाना, हिलना भी नहीं। हिलाया जाये तो भी मरणासन्न अवस्था मे पड़े रहना। " तोते ने ऐसा ही किया। रानी ने पिंजरा खोल कर खुब हिलाया-डूलाया। थोड़ी देर बाद रानी ने सेवकों से कहा-

"यह तो मर गया है। इसे बाग मे गड्ढा खोद कर दबा दो।". जैसे ही तोते को लेकर सेवक बाग मे पहुँचे तोता फुर्र से उड़ गया। तोता पिंजरे से निकलकर आकाश में उड़ते हुए बोलने लगा

"गुरु मिले तो बंधन छूटे।"

अतः शास्त्र कितना भी पढ़ लो, कितना भी जप कर लो, लेकिन सच्चे गुरु जब तक रास्ता ना बताऐं तब तक मुक्ति पाना सम्भव नही।

Sidheshwar Mandir Ram navmi CelebrationOM NAMAH SHIVAY JAI SHRI RAM
26/03/2026

Sidheshwar Mandir

Ram navmi Celebration

OM NAMAH SHIVAY

JAI SHRI RAM

Sidheshwar MahadevOM NAMAH SHIVAY
21/03/2026

Sidheshwar Mahadev

OM NAMAH SHIVAY

29/01/2026

"मैं" की समाप्ति और "राम" की प्राप्ति!

14 वर्षों के कठिन वनवास और रावण वध के पश्चात, अयोध्या में आनंद का सागर उमड़ रहा था। श्रीराम राजसिंहासन पर विराजमान थे। चारों ओर उल्लास था, परन्तु राजमाता कैकेयी के अंतर्मन में एक गहरा अंधकार छाया हुआ था। पश्चाताप की अग्नि उन्हें पल-पल जला रही थी।

दृश्य 1: क्षमा और मार्गदर्शन

एक दिन, अपने अपराधबोध से व्याकुल होकर माता कैकेयी श्रीराम के कक्ष में पहुंचीं। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं। श्रीराम ने जैसे ही माता को देखा, वे सिंहासन से उठ खड़े हुए और आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया।

कैकेयी का स्वर कांप रहा था, "राम! मैंने पुत्र-मोह में अंधा होकर तुम्हें वनवास भेजकर घोर अनर्थ किया है। मेरा अपराध अक्षम्य है। यद्यपि तुम उदार हो, परन्तु मेरा मन मुझे धिक्कारता है। हे रघुनंदन! मुझे अपनी शरण में ले लो। मुझे कोई ऐसा मार्ग दिखाओ जिससे मेरे इस अज्ञान का नाश हो और मुझे इस आत्मग्लानि से मुक्ति मिल सके।"

श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से माता के हाथ थामे और बोले, "माते! आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी मान रही हैं। उस समय तो स्वयं माँ सरस्वती आपकी जिह्वा पर विराजित थीं। यह सब विधि का विधान था, इसमें आपका कोई दोष नहीं। मेरे मन में आपके प्रति लेशमात्र भी रोष नहीं है।"

परंतु कैकेयी का मन शांत न हुआ। वे मोक्ष का, आत्म-ज्ञान का मार्ग चाहती थीं। श्रीराम कुछ क्षण मौन रहे, उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कहा, "माते! आपके प्रश्न का उत्तर और आपके मन की शांति का उपाय मैं नहीं, बल्कि लक्ष्मण कल आपको दिला देंगे।"

दृश्य 2: विचित्र निर्देश

श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाया और आदेश दिया, "लक्ष्मण! कल प्रात:काल माता कैकेयी को नगर के बाहर सरयू तट पर ले जाना। वहां जहां भेड़ें (sheep) चरती हैं, वहां माता को खड़ा करना और भेड़ों के मुख से थोड़ा 'उपदेश' सुनवाकर वापस ले आना।"

लक्ष्मण यह सुनकर हतप्रभ रह गए। वे सोचने लगे, "भैया राम भी क्या लीला करते हैं? वेदों और शास्त्रों का ज्ञान छोड़कर माता को भेड़ों का उपदेश सुनवाना चाहते हैं? भला एक पशु क्या ब्रह्मज्ञान देगा?" किन्तु श्रीराम की आज्ञा शिरोधार्य थी।

दृश्य 3: सरयू तट और भेड़ों का झुंड

अगले दिन सूर्योदय के समय, लक्ष्मण रथ में माता कैकेयी को लेकर सरयू के हरे-भरे तट पर पहुंचे। वहां प्रकृति शांत थी, केवल दूर से कुछ ध्वनियां आ रही थीं।

लक्ष्मण ने रथ रोका और संकोचपूर्वक कहा, "माते, भैया राम का आदेश है कि आप यहाँ इन भेड़ों के पास खड़ी हों और उनके उपदेश को ध्यान से सुनें।"

कैकेयी को एक पल के लिए गहरा आघात लगा। उन्हें लगा कि राम ने उनका उपहास किया है। "क्या मैं इतनी गिर गयी हूँ कि अब मुझे जानवरों से सीखना पड़ेगा?" उनके मन में क्रोध और अपमान के विचार उठने लगे। तभी, वहां भेड़ों का एक विशाल झुंड घास चरते हुए आ पहुंचा।

वातावरण में एक ही ध्वनि गूंजने लगी— "में... में... में...!"
सैकड़ों भेड़ें एक साथ मिमिया रही थीं। कैकेयी ने जाने की सोची, तभी उन्हें श्रीराम की सौम्य छवि याद आई। उन्होंने सोचा, "राम कभी किसी का उपहास नहीं करते। यदि उन्होंने भेजा है, तो इस साधारण दृश्य में अवश्य कोई असाधारण सत्य छिपा होगा।"

यह सोचकर कैकेयी ने अपने नेत्र बंद कर लिए और उस शोर को 'शब्द' मानकर सुनने का प्रयास करने लगीं।

दृश्य 4: आत्मज्ञान की प्राप्ति

जैसे ही कैकेयी ने एकाग्रचित्त होकर सुना, भेड़ों की वह "में... में..." की ध्वनि उनके कानों को भेदकर सीधे आत्मा में उतर गयी।
उन्हें प्रतीत हुआ कि ये भेड़ें केवल मिमिया नहीं रही हैं, बल्कि वे निरंतर "मैं... मैं..." (अर्थात 'मैं' और 'मेरा') चिल्ला रही हैं।

सहसा कैकेयी के भीतर का अज्ञान का पर्दा गिर गया। उन्हें समझ आ गया कि श्रीराम क्या समझाना चाहते थे। यह जीव (भेड़) जीवन भर "मैं-मैं" चिल्लाता है, लेकिन अंत में कसाई के हाथों मारा जाता है या काल का ग्रास बन जाता है। उसकी यह 'मैं' (अहंकार) ही उसके बंधन का कारण है।

दृश्य 5: राजभवन में वापसी

ज्ञान चक्षु खुलने के बाद कैकेयी के चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "वत्स! चलो, मुझे मेरा उत्तर मिल गया। अब राम के पास चलते हैं।"

राजभवन पहुंचकर कैकेयी ने श्रीराम के चरण स्पर्श किए। राम ने पूछा, "माते! क्या आपको उपदेश प्राप्त हुआ?"

कैकेयी ने गदगद कंठ से कहा, "हाँ राम! तुम्हारी कृपा से आज मुझे भेड़ों ने सबसे बड़ा गूढ़ ज्ञान दे दिया है।"
श्रीराम ने पूछा, "क्या ज्ञान मिला माते?"

कैकेयी ने उत्तर दिया:

> "राम! वो भेड़ें निरंतर 'में-में' यानी 'मैं-मैं' कर रही थीं। यही 'मैं' (अहंकार) और 'मेरा' (ममता) ही सारे दुखों की जड़ है।
> मैंने जीवन भर यही किया— 'मेरा पुत्र', 'मेरा वचन', 'मेरा अधिकार'। इसी 'मैं' के कारण मैंने तुम्हें वन भेजा और वैधव्य का दुख भोगा।

> भेड़ों ने मुझे सिखा दिया कि जब तक जीव के भीतर 'मैं-मैं' की रट लगी रहती है, तब तक वह विपत्तियों में फंसा रहता है। जिस दिन यह 'मैं' मिट जाएगी, केवल 'तू' (परमात्मा) शेष रह जाएगा। अब मैंने अपनी 'मैं' और 'ममता' का त्याग कर दिया है।"

श्रीराम मुस्कुराए और बोले, "सत्य है माते। 'मैं' (अहंकार) का मिटना ही ईश्वर से मिलन का द्वार है। जब 'मैं' नहीं रहता, तभी 'हरि' आते हैं।

संसार में दुःख का मूल कारण हमारी आसक्ति (Attachment) और अहंकार (Ego) है— "यह मेरा घर, यह मेरा परिवार, यह मेरा धन।" जिस प्रकार भेड़ 'मैं-मैं' करती है, वैसे ही मनुष्य भी 'मैं' में उलझा रहता है। शांति और मोक्ष तभी संभव है जब हम 'मैं' को त्यागकर सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दें।

SIDHESHWAR MANDIR OM NAMAH SHIVAY
04/01/2026

SIDHESHWAR MANDIR

OM NAMAH SHIVAY

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Gali No 3, Raja Park
Jaipur
302004

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