Sidheshwar Mandir Rajapark Jaipur

Sidheshwar Mandir Rajapark Jaipur Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Sidheshwar Mandir Rajapark Jaipur, Religious organisation, Gali no 3, Raja Park, Jaipur.

A place to worship Hindu Gods with a special focus on Yoga,Spiritual upliftment,Social welfare of the society by various activities like help to widows,Poor children,scholarship to poor students,Free homeopathic dispensary,Food to poor

29/01/2026

"मैं" की समाप्ति और "राम" की प्राप्ति!

14 वर्षों के कठिन वनवास और रावण वध के पश्चात, अयोध्या में आनंद का सागर उमड़ रहा था। श्रीराम राजसिंहासन पर विराजमान थे। चारों ओर उल्लास था, परन्तु राजमाता कैकेयी के अंतर्मन में एक गहरा अंधकार छाया हुआ था। पश्चाताप की अग्नि उन्हें पल-पल जला रही थी।

दृश्य 1: क्षमा और मार्गदर्शन

एक दिन, अपने अपराधबोध से व्याकुल होकर माता कैकेयी श्रीराम के कक्ष में पहुंचीं। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं। श्रीराम ने जैसे ही माता को देखा, वे सिंहासन से उठ खड़े हुए और आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया।

कैकेयी का स्वर कांप रहा था, "राम! मैंने पुत्र-मोह में अंधा होकर तुम्हें वनवास भेजकर घोर अनर्थ किया है। मेरा अपराध अक्षम्य है। यद्यपि तुम उदार हो, परन्तु मेरा मन मुझे धिक्कारता है। हे रघुनंदन! मुझे अपनी शरण में ले लो। मुझे कोई ऐसा मार्ग दिखाओ जिससे मेरे इस अज्ञान का नाश हो और मुझे इस आत्मग्लानि से मुक्ति मिल सके।"

श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से माता के हाथ थामे और बोले, "माते! आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी मान रही हैं। उस समय तो स्वयं माँ सरस्वती आपकी जिह्वा पर विराजित थीं। यह सब विधि का विधान था, इसमें आपका कोई दोष नहीं। मेरे मन में आपके प्रति लेशमात्र भी रोष नहीं है।"

परंतु कैकेयी का मन शांत न हुआ। वे मोक्ष का, आत्म-ज्ञान का मार्ग चाहती थीं। श्रीराम कुछ क्षण मौन रहे, उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कहा, "माते! आपके प्रश्न का उत्तर और आपके मन की शांति का उपाय मैं नहीं, बल्कि लक्ष्मण कल आपको दिला देंगे।"

दृश्य 2: विचित्र निर्देश

श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाया और आदेश दिया, "लक्ष्मण! कल प्रात:काल माता कैकेयी को नगर के बाहर सरयू तट पर ले जाना। वहां जहां भेड़ें (sheep) चरती हैं, वहां माता को खड़ा करना और भेड़ों के मुख से थोड़ा 'उपदेश' सुनवाकर वापस ले आना।"

लक्ष्मण यह सुनकर हतप्रभ रह गए। वे सोचने लगे, "भैया राम भी क्या लीला करते हैं? वेदों और शास्त्रों का ज्ञान छोड़कर माता को भेड़ों का उपदेश सुनवाना चाहते हैं? भला एक पशु क्या ब्रह्मज्ञान देगा?" किन्तु श्रीराम की आज्ञा शिरोधार्य थी।

दृश्य 3: सरयू तट और भेड़ों का झुंड

अगले दिन सूर्योदय के समय, लक्ष्मण रथ में माता कैकेयी को लेकर सरयू के हरे-भरे तट पर पहुंचे। वहां प्रकृति शांत थी, केवल दूर से कुछ ध्वनियां आ रही थीं।

लक्ष्मण ने रथ रोका और संकोचपूर्वक कहा, "माते, भैया राम का आदेश है कि आप यहाँ इन भेड़ों के पास खड़ी हों और उनके उपदेश को ध्यान से सुनें।"

कैकेयी को एक पल के लिए गहरा आघात लगा। उन्हें लगा कि राम ने उनका उपहास किया है। "क्या मैं इतनी गिर गयी हूँ कि अब मुझे जानवरों से सीखना पड़ेगा?" उनके मन में क्रोध और अपमान के विचार उठने लगे। तभी, वहां भेड़ों का एक विशाल झुंड घास चरते हुए आ पहुंचा।

वातावरण में एक ही ध्वनि गूंजने लगी— "में... में... में...!"
सैकड़ों भेड़ें एक साथ मिमिया रही थीं। कैकेयी ने जाने की सोची, तभी उन्हें श्रीराम की सौम्य छवि याद आई। उन्होंने सोचा, "राम कभी किसी का उपहास नहीं करते। यदि उन्होंने भेजा है, तो इस साधारण दृश्य में अवश्य कोई असाधारण सत्य छिपा होगा।"

यह सोचकर कैकेयी ने अपने नेत्र बंद कर लिए और उस शोर को 'शब्द' मानकर सुनने का प्रयास करने लगीं।

दृश्य 4: आत्मज्ञान की प्राप्ति

जैसे ही कैकेयी ने एकाग्रचित्त होकर सुना, भेड़ों की वह "में... में..." की ध्वनि उनके कानों को भेदकर सीधे आत्मा में उतर गयी।
उन्हें प्रतीत हुआ कि ये भेड़ें केवल मिमिया नहीं रही हैं, बल्कि वे निरंतर "मैं... मैं..." (अर्थात 'मैं' और 'मेरा') चिल्ला रही हैं।

सहसा कैकेयी के भीतर का अज्ञान का पर्दा गिर गया। उन्हें समझ आ गया कि श्रीराम क्या समझाना चाहते थे। यह जीव (भेड़) जीवन भर "मैं-मैं" चिल्लाता है, लेकिन अंत में कसाई के हाथों मारा जाता है या काल का ग्रास बन जाता है। उसकी यह 'मैं' (अहंकार) ही उसके बंधन का कारण है।

दृश्य 5: राजभवन में वापसी

ज्ञान चक्षु खुलने के बाद कैकेयी के चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "वत्स! चलो, मुझे मेरा उत्तर मिल गया। अब राम के पास चलते हैं।"

राजभवन पहुंचकर कैकेयी ने श्रीराम के चरण स्पर्श किए। राम ने पूछा, "माते! क्या आपको उपदेश प्राप्त हुआ?"

कैकेयी ने गदगद कंठ से कहा, "हाँ राम! तुम्हारी कृपा से आज मुझे भेड़ों ने सबसे बड़ा गूढ़ ज्ञान दे दिया है।"
श्रीराम ने पूछा, "क्या ज्ञान मिला माते?"

कैकेयी ने उत्तर दिया:

> "राम! वो भेड़ें निरंतर 'में-में' यानी 'मैं-मैं' कर रही थीं। यही 'मैं' (अहंकार) और 'मेरा' (ममता) ही सारे दुखों की जड़ है।
> मैंने जीवन भर यही किया— 'मेरा पुत्र', 'मेरा वचन', 'मेरा अधिकार'। इसी 'मैं' के कारण मैंने तुम्हें वन भेजा और वैधव्य का दुख भोगा।

> भेड़ों ने मुझे सिखा दिया कि जब तक जीव के भीतर 'मैं-मैं' की रट लगी रहती है, तब तक वह विपत्तियों में फंसा रहता है। जिस दिन यह 'मैं' मिट जाएगी, केवल 'तू' (परमात्मा) शेष रह जाएगा। अब मैंने अपनी 'मैं' और 'ममता' का त्याग कर दिया है।"

श्रीराम मुस्कुराए और बोले, "सत्य है माते। 'मैं' (अहंकार) का मिटना ही ईश्वर से मिलन का द्वार है। जब 'मैं' नहीं रहता, तभी 'हरि' आते हैं।

संसार में दुःख का मूल कारण हमारी आसक्ति (Attachment) और अहंकार (Ego) है— "यह मेरा घर, यह मेरा परिवार, यह मेरा धन।" जिस प्रकार भेड़ 'मैं-मैं' करती है, वैसे ही मनुष्य भी 'मैं' में उलझा रहता है। शांति और मोक्ष तभी संभव है जब हम 'मैं' को त्यागकर सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दें।

SIDHESHWAR MANDIR OM NAMAH SHIVAY
04/01/2026

SIDHESHWAR MANDIR

OM NAMAH SHIVAY

SIDDHESHWAR MAHADEV Om Namah Shivay
27/12/2025

SIDDHESHWAR MAHADEV

Om Namah Shivay

Siddheshwar Mahadev Om namah Shivay
21/12/2025

Siddheshwar Mahadev

Om namah Shivay

SIDDHESHWAR MAHADEV OM NAMAH SHIVAY
24/11/2025

SIDDHESHWAR MAHADEV

OM NAMAH SHIVAY

18/11/2025

आप और तुम

आप और तुम मे क्या अंतर है। आप मे वो अपनापन नहीं जो तुम मे है ।आप के आगे हम रो नही सकते, दिलखोल कर बात नही कर सकते ।तुम्हारे आगे हम खुल कर रो सकते हैं, हंस सकते हैं बातें कर सकते हैं ।आप अपने होकर भी पराए से लगते हो ।तुम पुकारते ही तुम अपने ही लगते हो ।आप के आगे हम
कुछ कह नहीं सकते तुम्हारे आगे दिल खोल के रख देते हैं ।यही सच है

Siddheshwar Mahadev OM NAMAH SHIVAY
26/10/2025

Siddheshwar Mahadev

OM NAMAH SHIVAY

15/10/2025

व्यवहार सुंदर बनाएं

*एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि आप चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है , तो आप क्या करोगे ?

युवक ने कहा - उस पर नजर जायेगी, अगर पहचान वाली हुई तो उससे बातचीत करेंगे वरना उसे देखने लगेंगे। गुरु जी ने पूछा - वह लडकी आगे बढ गयी , तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ? लडके ने कहा - हाँ अगर दिल को भाई तो, गुरु जी ने फिर पूछा - जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ?

युवक ने कहा 5 - 10 मिनट तक, अगर अत्यधिक सुंदर हुई तो आध एक घंटे तक बस,
गुरु जी ने उस युवक से कहा - अब जरा कल्पना कीजिये.. आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना... आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं।

उन्हें आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई , तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में अंदर ले गए। पास में बैठाकर गरमा गरम लजीज व्यंजन भी खिलाएं। चलते समय आप से पूछा - भैया किस वाहन से आए हो ?

आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया - भैया, आप आराम से पहुँच गए..

अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ? युवक ने कहा - गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।

गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा —*

*"यह है जीवन की हकीकत।"

*"सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है, पर सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।"*

*बस यही है जीवन का गुरु मंत्र... अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दें..*

हर जीव के प्रति अपना व्यवहार सुंदर बनाईए।

SIDHESHWAR MAHADEV
06/10/2025

SIDHESHWAR MAHADEV

SIDDHESHWAR MAHADEV - Rajapark Jaipur Om namah Shivay
25/09/2025

SIDDHESHWAR MAHADEV - Rajapark Jaipur

Om namah Shivay

17/09/2025

-ईश्वर बहुत दयालु है

एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था। उसमें तरह-तरह के फल होते थे और उस बग़ीचे की सारी देखरेख एक किसान अपने परिवार के साथ करता था. वह किसान हर दिन बगीचे के ताज़े फल लेकर राजा के राजमहल में जाता था।

एक दिन किसान ने पेड़ों पे देखा नारियल अमरुद, बेर, और अंगूर पक कर तैयार हो रहे हैं, किसान सोचने लगा आज कौन सा फल महाराज को अर्पित करूँ, फिर उसे लगा अँगूर करने चाहिये क्योंकि वो तैयार हैं इसलिये उसने अंगूरों की टोकरी भर ली और राजा को देने चल पड़ा! किसान जब राजमहल में पहुचा, राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था और नाराज भी लग रहा था किसान रोज की तरह मीठे रसीले अंगूरों की टोकरी राजा के सामने रख दी और थोड़े दूर बेठ गया, अब राजा उसी खयालों-खयालों में टोकरी में से अंगूर उठाता एक खाता और एक खींच कर किसान के माथे पे निशाना साधकर फेंक देता।

राजा का अंगूर जब भी किसान के माथे या शरीर पर लगता था किसान कहता था, ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’ राजा फिर और जोर से* *अंगूर फेकता था किसान फिर वही कहता था ‘ईश्वर बड़ा दयालु है।

थोड़ी देर बाद राजा को एहसास हुआ की वो क्या कर रहा है और प्रत्युत्तर क्या आ रहा है वो सम्भल कर बैठा , उसने किसान से कहा, मै तुझे बार-बार अंगूर मार रहा हूँ , और ये अंगूर तुंम्हे लग भी रहे हैं, फिर भी तुम यह बार-बार क्यों कह रहे हो की ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’।

किसान ने नम्रता से बोला, महाराज, बागान में आज नारियल, बेर और अमरुद भी तैयार थे पर मुझे भान हुआ क्यों न आज आपके लिये अंगूर् ले चलूं लाने को तो मैं अमरुद और बेर भी ला सकता था पर मैं अंगूर ही लाया। यदि अंगूर की जगह नारियल, बेर या बड़े बड़े अमरुद रखे होते तो आज मेरा हाल क्या होता ? इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’!!

🌷 कथा सार 🌷
इसी प्रकार ईश्वर भी हमारी कई मुसीबतों को बहुत हल्का कर के हमें उबार लेता है पर ये तो हम ही नाशुकरे हैं जो शुकर न करते हुए उसे ही गुनहगार ठहरा देते हैं, मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ , मेरा क्या कसूर, आज जो भी फसल हम काट रहे हैं ये दरअसल हमारी ही बोई हुई है, बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होये।। और बबुल से अगर आम न मिला तो गुनहगार भी हम नहीं हैं , इसका भी दोष हम किसी और पर मढेंगे, कोई और न मिला तो ईश्वर तो है ही।

आज हमारे पास जो कुछ भी है अगर वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर देखेंगे तो वास्तव में हम इसके लायक भी नही हैं पर उसके बावजूद मेरे ईश्वर ने मुझे जरूरत से ज़्यादा दिया है और बजाय उनका धन्यवाद करने के हम उनहे हमेशा दोष ही देते रहते हैं। पर वो तो हमारा पिता है हमारी माता है किसी भी बात का कभी बुरा नहीं मानते और अपना आशीर्वाद हम पर बरसाते रहते है। अगर एक बार उनके तोहफों की तरफ देखेंगे तो सारी उम्र धन्यवाद दोगे तो भी कम पड़ेंगे।

15/09/2025

भगवान की आरती करने का सही तरीका

कोई भी पूजा भगवान की आरती के बाद ही संपन्न मानी जाती है. स्कंद पुराण के अनुसार आरती मुख्य रूप से सात प्रकार की होती है.

1. मंगला आरती- सुबह जल्दी की जाने वाली आरती.
2. पूजा आरती- पूजा के दौरान की जाने वाली आरती.
3. श्रृंगार आरती- भगवान के श्रृंगार के बाद की जाने वाली आरती.
4. भोग आरती- जब भगवान को भोग अर्पित किया जाता है, तब ये आरती की जाती है.
5. धूप आरती- धूप दिखाने के बाद की जाने वाली आरती.
6. संध्या आरती- शाम के समय की जाने वाली आरती.
7. शयन आरती- रात में सोने से पहले की जाने वाली आरती.

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है. मान्यताओं के अनुसार, नियमित रूप से पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है. वहीं, कोई भी पूजा भगवान की आरती के बाद संपन्न मानी जाती है. यानी पूजा में देवी-देवताओं की आरती करना आवश्यक माना गया है और बिना आरती के पूजा अधूरी होती है.

आरती करने का तरीका :

आरती हमेशा श्रद्धा और भक्ति भाव से करनी चाहिए. वहीं, भाव से अलग आरती करने के 4 मुख्य नियम हैं. ये नियम कुछ इस प्रकार हैं-
1. आरती की शुरुआत भगवान के चरणों से करें और चरणों में आरती की थाल को चार बार घुमाएं. ये खुद को परमात्मा के चरणों में समर्पित करने की ओर इशारा होता है.
2. इसके बाद आरती की थाली को भगवान की नाभि के पास दो बार घुमाएं. माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का जन्म भगवान विष्णु की नाभि से हुआ था, ऐसे में भगवान के चरणों में नमन करने के बाद नाभि का पूजन किया जाता है.
3. इसके बाद आरती की थाल को भगवान के मुखमंडल के सामने एक बार घुमाएं.
4. आखिर में दीये को भगवान के पूरे शरीर पर सात बार घुमाते हुए आरती करें.
इस तरह कुल 14 बार आरती घुमाने से चौदह भुवनों तक आपकी भक्ति पहुंचती है.
स्कंद पुराण के अनुसार आरती के नियम
स्कंद पुराण में भी आरती के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं. इसमें पंच प्रदीप का प्रयोग किया जाता है ।
पंच प्रदीप के लिए गाय के दूध से बने घी में डूबी हुई रुई की 5 बत्तियों का दीपक जलाएं. इसे पंच प्रदीप कहा जाता है.

श्रद्धा और भक्ति :

यदि कोई व्यक्ति मंत्र और पूजा विधि नहीं जानता, लेकिन श्रद्धापूर्वक आरती करता है, तो उसकी पूजा भी स्वीकार होती है.
आरती करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
• आरती हमेशा खड़े होकर करें- आरती के दौरान खड़े रहना शुभ माना जाता है.
• थोड़ा झुककर आरती करें- इसे भक्ति का प्रतीक माना जाता है.
• आरती की थाली सही धातु की हो- तांबे, पीतल या चांदी की थाली में आरती करें.
• थाली में पूजा सामग्री रखें- गंगाजल, कुमकुम, चावल, चंदन, अगरबत्ती, फूल और भोग में फल या मिठाई रखें.
ध्यान रखें कि आरती पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसे सही विधि से करने से न केवल पूजा पूरी होती है, बल्कि मन को शांति भी मिलती है. माना जाता है कि श्रद्धा और भक्ति से की गई आरती भगवान तक अवश्य पहुंचती है और भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.

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Gali No 3, Raja Park
Jaipur
302004

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Monday 6am - 9pm
Tuesday 6am - 9pm
Wednesday 6am - 9pm
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