29/01/2026
"मैं" की समाप्ति और "राम" की प्राप्ति!
14 वर्षों के कठिन वनवास और रावण वध के पश्चात, अयोध्या में आनंद का सागर उमड़ रहा था। श्रीराम राजसिंहासन पर विराजमान थे। चारों ओर उल्लास था, परन्तु राजमाता कैकेयी के अंतर्मन में एक गहरा अंधकार छाया हुआ था। पश्चाताप की अग्नि उन्हें पल-पल जला रही थी।
दृश्य 1: क्षमा और मार्गदर्शन
एक दिन, अपने अपराधबोध से व्याकुल होकर माता कैकेयी श्रीराम के कक्ष में पहुंचीं। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं। श्रीराम ने जैसे ही माता को देखा, वे सिंहासन से उठ खड़े हुए और आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया।
कैकेयी का स्वर कांप रहा था, "राम! मैंने पुत्र-मोह में अंधा होकर तुम्हें वनवास भेजकर घोर अनर्थ किया है। मेरा अपराध अक्षम्य है। यद्यपि तुम उदार हो, परन्तु मेरा मन मुझे धिक्कारता है। हे रघुनंदन! मुझे अपनी शरण में ले लो। मुझे कोई ऐसा मार्ग दिखाओ जिससे मेरे इस अज्ञान का नाश हो और मुझे इस आत्मग्लानि से मुक्ति मिल सके।"
श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से माता के हाथ थामे और बोले, "माते! आप व्यर्थ ही स्वयं को दोषी मान रही हैं। उस समय तो स्वयं माँ सरस्वती आपकी जिह्वा पर विराजित थीं। यह सब विधि का विधान था, इसमें आपका कोई दोष नहीं। मेरे मन में आपके प्रति लेशमात्र भी रोष नहीं है।"
परंतु कैकेयी का मन शांत न हुआ। वे मोक्ष का, आत्म-ज्ञान का मार्ग चाहती थीं। श्रीराम कुछ क्षण मौन रहे, उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कहा, "माते! आपके प्रश्न का उत्तर और आपके मन की शांति का उपाय मैं नहीं, बल्कि लक्ष्मण कल आपको दिला देंगे।"
दृश्य 2: विचित्र निर्देश
श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाया और आदेश दिया, "लक्ष्मण! कल प्रात:काल माता कैकेयी को नगर के बाहर सरयू तट पर ले जाना। वहां जहां भेड़ें (sheep) चरती हैं, वहां माता को खड़ा करना और भेड़ों के मुख से थोड़ा 'उपदेश' सुनवाकर वापस ले आना।"
लक्ष्मण यह सुनकर हतप्रभ रह गए। वे सोचने लगे, "भैया राम भी क्या लीला करते हैं? वेदों और शास्त्रों का ज्ञान छोड़कर माता को भेड़ों का उपदेश सुनवाना चाहते हैं? भला एक पशु क्या ब्रह्मज्ञान देगा?" किन्तु श्रीराम की आज्ञा शिरोधार्य थी।
दृश्य 3: सरयू तट और भेड़ों का झुंड
अगले दिन सूर्योदय के समय, लक्ष्मण रथ में माता कैकेयी को लेकर सरयू के हरे-भरे तट पर पहुंचे। वहां प्रकृति शांत थी, केवल दूर से कुछ ध्वनियां आ रही थीं।
लक्ष्मण ने रथ रोका और संकोचपूर्वक कहा, "माते, भैया राम का आदेश है कि आप यहाँ इन भेड़ों के पास खड़ी हों और उनके उपदेश को ध्यान से सुनें।"
कैकेयी को एक पल के लिए गहरा आघात लगा। उन्हें लगा कि राम ने उनका उपहास किया है। "क्या मैं इतनी गिर गयी हूँ कि अब मुझे जानवरों से सीखना पड़ेगा?" उनके मन में क्रोध और अपमान के विचार उठने लगे। तभी, वहां भेड़ों का एक विशाल झुंड घास चरते हुए आ पहुंचा।
वातावरण में एक ही ध्वनि गूंजने लगी— "में... में... में...!"
सैकड़ों भेड़ें एक साथ मिमिया रही थीं। कैकेयी ने जाने की सोची, तभी उन्हें श्रीराम की सौम्य छवि याद आई। उन्होंने सोचा, "राम कभी किसी का उपहास नहीं करते। यदि उन्होंने भेजा है, तो इस साधारण दृश्य में अवश्य कोई असाधारण सत्य छिपा होगा।"
यह सोचकर कैकेयी ने अपने नेत्र बंद कर लिए और उस शोर को 'शब्द' मानकर सुनने का प्रयास करने लगीं।
दृश्य 4: आत्मज्ञान की प्राप्ति
जैसे ही कैकेयी ने एकाग्रचित्त होकर सुना, भेड़ों की वह "में... में..." की ध्वनि उनके कानों को भेदकर सीधे आत्मा में उतर गयी।
उन्हें प्रतीत हुआ कि ये भेड़ें केवल मिमिया नहीं रही हैं, बल्कि वे निरंतर "मैं... मैं..." (अर्थात 'मैं' और 'मेरा') चिल्ला रही हैं।
सहसा कैकेयी के भीतर का अज्ञान का पर्दा गिर गया। उन्हें समझ आ गया कि श्रीराम क्या समझाना चाहते थे। यह जीव (भेड़) जीवन भर "मैं-मैं" चिल्लाता है, लेकिन अंत में कसाई के हाथों मारा जाता है या काल का ग्रास बन जाता है। उसकी यह 'मैं' (अहंकार) ही उसके बंधन का कारण है।
दृश्य 5: राजभवन में वापसी
ज्ञान चक्षु खुलने के बाद कैकेयी के चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "वत्स! चलो, मुझे मेरा उत्तर मिल गया। अब राम के पास चलते हैं।"
राजभवन पहुंचकर कैकेयी ने श्रीराम के चरण स्पर्श किए। राम ने पूछा, "माते! क्या आपको उपदेश प्राप्त हुआ?"
कैकेयी ने गदगद कंठ से कहा, "हाँ राम! तुम्हारी कृपा से आज मुझे भेड़ों ने सबसे बड़ा गूढ़ ज्ञान दे दिया है।"
श्रीराम ने पूछा, "क्या ज्ञान मिला माते?"
कैकेयी ने उत्तर दिया:
> "राम! वो भेड़ें निरंतर 'में-में' यानी 'मैं-मैं' कर रही थीं। यही 'मैं' (अहंकार) और 'मेरा' (ममता) ही सारे दुखों की जड़ है।
> मैंने जीवन भर यही किया— 'मेरा पुत्र', 'मेरा वचन', 'मेरा अधिकार'। इसी 'मैं' के कारण मैंने तुम्हें वन भेजा और वैधव्य का दुख भोगा।
> भेड़ों ने मुझे सिखा दिया कि जब तक जीव के भीतर 'मैं-मैं' की रट लगी रहती है, तब तक वह विपत्तियों में फंसा रहता है। जिस दिन यह 'मैं' मिट जाएगी, केवल 'तू' (परमात्मा) शेष रह जाएगा। अब मैंने अपनी 'मैं' और 'ममता' का त्याग कर दिया है।"
श्रीराम मुस्कुराए और बोले, "सत्य है माते। 'मैं' (अहंकार) का मिटना ही ईश्वर से मिलन का द्वार है। जब 'मैं' नहीं रहता, तभी 'हरि' आते हैं।
संसार में दुःख का मूल कारण हमारी आसक्ति (Attachment) और अहंकार (Ego) है— "यह मेरा घर, यह मेरा परिवार, यह मेरा धन।" जिस प्रकार भेड़ 'मैं-मैं' करती है, वैसे ही मनुष्य भी 'मैं' में उलझा रहता है। शांति और मोक्ष तभी संभव है जब हम 'मैं' को त्यागकर सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दें।