07/02/2026
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*गीता के पहले अध्याय का मंतव्य*
अर्जुन ने कहा-_
*“केशव! सामने अपने हैं।”*
_श्रीकृष्ण ने कहा-_
*“अपने हैं तो सामने क्यों हैं ?”*
श्रीकृष्ण का यह कथन केवल युद्धभूमि में अर्जुन को कर्म के लिए प्रेरित करने वाला वाक्य नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र, समाज और व्यक्ति- तीनों के लिए आत्ममंथन का शंखनाद है। “अपने” यदि सच में अपने हों, तो वे सामने शस्त्र लेकर खड़े नहीं होते। जो सामने खड़ा है, जो राष्ट्र के मार्ग में बाधा है, जो समाज को तोड़ने का कार्य कर रहा है- वह केवल रक्त से अपना हो सकता है, विचार से नहीं।
राष्ट्रवाद रक्त-संबंधों से नहीं, राष्ट्र के प्रति निष्ठा से बनता है।
भारत का इतिहास गवाह है कि सबसे गहरे घाव बाहरी आक्रमणों से नहीं, बल्कि भीतर के विश्वासघात से लगे हैं। जब-जब निजी स्वार्थ, सत्ता की लालसा, या वैचारिक भ्रम ने राष्ट्रहित से ऊपर स्थान पाया, तब-तब “अपने” ही “सामने” खड़े दिखाई दिए।
श्रीकृष्ण अर्जुन को यह नहीं सिखा रहे कि अपनों से युद्ध करो, बल्कि यह समझा रहे हैं कि अधर्म के पक्ष में खड़ा व्यक्ति, चाहे कितना ही निकट क्यों न हो, राष्ट्र और धर्म के लिए “अपना” नहीं रह जाता। राष्ट्रवाद भावुकता नहीं, विवेक है। यह आँख मूँदकर अपनाने की नहीं, सत्य को पहचानने की शक्ति है।
आज के भारत में भी यह प्रश्न उतना ही प्रासंगिक है। जब राष्ट्र की एकता, संस्कृति और संप्रभुता पर चोट होती है, तब हमें पूछना होगा- जो भारत को कमजोर करने की भाषा बोलता है, जो समाज को बाँटता है, जो राष्ट्रविरोधी विचारों को पोषित करता है- क्या वह सच में वह “अपना” है....?
यदि वह सामने खड़ा है, तो श्रीकृष्ण का उत्तर आज भी स्पष्ट है। राष्ट्रवाद का अर्थ घृणा नहीं, बल्कि स्पष्टता है। यह किसी समुदाय या व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि राष्ट्रविरोधी सोच के विरुद्ध खड़ा होना है। जैसे अर्जुन को मोह त्यागकर धर्म का पक्ष लेना पड़ा, वैसे ही आज हर नागरिक को भ्रम, डर और झूठे सहानुभूति के आवरण से बाहर निकलना होगा।
श्रीकृष्ण का यह वाक्य हमें सिखाता है कि राष्ट्र पहले है, रिश्ते बाद में और जब रिश्ते राष्ट्र के विरुद्ध खड़े हों, तब राष्ट्र ही सर्वोपरि है। यही भारत की चेतना है, यही राष्ट्रधर्म है और यही सच्चा राष्ट्रवाद। क्योंकि जो राष्ट्र के साथ है, वही अपना है और जो राष्ट्र के सामने अर्थात राष्ट्र के विरूद्ध है, वह चाहे कोई भी हो, अपना नहीं है।
*वंदेमातरम्*