20/12/2025
श्रीमद् भगवद्गीता
अध्याय 1, श्लोक 11 (अध्याय एक, श्लोक 11) – भावार्थ सहित:(संस्कृत श्लोक)
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
सरल हिंदी अर्थ
हमारे पक्ष की सेना (कौरवों की) असंख्य और असीमित है, जो पितामह भीष्म द्वारा सुरक्षित है।किन्तु पाण्डवों की सेना संख्या में कम होते हुए भी, उन्हें भीम जैसे प्रचण्ड वीर की रक्षण-शक्ति प्राप्त है।यह बात दुर्योधन, धृतराष्ट्र को बताने की दृष्टि से संजय के माध्यम से कही जा रही है, जहाँ दुर्योधन अपने पक्ष की बड़ी सेना पर भरोसा दिखाते हुए भी भीतर से पाण्डवों के पराक्रम से भयभीत है।
भावार्थ
(आध्यात्मिक / व्यावहारिक संकेत)संख्या से अधिक महत्व गुण और साहस का
केवल अधिक लोगों या साधनों का होना पर्याप्त नहीं होता; वास्तविक शक्ति योग्य नेतृत्व, साहस और संकल्प से आती है।
जैसे कौरवों की बड़ी सेना भी भीम जैसे साहसी और धर्मनिष्ठ योद्धा के सामने कमतर प्रतीत होती है।अधर्म की बाहरी शक्ति बनाम धर्म की भीतरी शक्तिकौरव पक्ष बाह्य शक्ति, वैभव और संख्याबल पर आधारित है।पाण्डव पक्ष धर्म, सत्य और परमात्मा के आश्रय पर आधारित है।
यह श्लोक संकेत देता है कि अधर्म चाहे कितना भी बड़ा दिखाई दे, धर्म की सच्ची शक्ति के सामने अंततः कमजोर ही ठहरती है।अहंकार और भीतर का डर
दुर्योधन ऊपरी तौर पर अपनी सेना की “अपर्याप्त नहीं, बहुत बड़ी” बता कर अहंकार दिखाता है, पर भीम के नाम पर विशेष टिप्पणी करके अपने भीतर के भय को प्रकट भी कर देता है।
इससे शिक्षा मिलती है कि अहंकार प्रायः भीतर के असुरक्षा-बोध को छिपाने का प्रयास होता है।व्यवहारिक जीवन में प्रयोगजब भी किसी धर्मिक, नैतिक या सही काम में आप संख्या या संसाधन के स्तर पर कम महसूस करें, तो यह श्लोक याद दिलाता है कि साहस, धर्म और दृढ़ संकल्प ही असली बल हैं।बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपने चरित्र, निष्ठा और सही उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए; वही “भीम जैसा बल” बनकर रक्षा करता है।