Mandir Govind Dev Ji, Jaipur - Rajasthan

Mandir Govind Dev Ji, Jaipur - Rajasthan The History was enriched with a Golden Page When before the foundation of Jaipur City, Thakur Shri Radha-Govind Devji Maharaj.
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जयपुर के इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ के साथ समृद्ध किया गया था जब जय निवास गार्डन में वर्ष 1735 ठाकुर श्री राधा-गोविंद देवजी महाराज प्रतिष्ठापित (मंदिर श्री गोविन्द देवजी महाराज) में।.......!!और यह भी एक नए युग की शुरुआत की गई थी; तत्कालीन आमेर राज्य के शासकों की कच्छावा राजवंश जो जयपुर, भारत के गुलाबी शहर की नींव रखी, ठाकुर गोविंद देवजी महाराज के कमल चरणों के लिए खुद को प्रस्तुत की। वे प्रभु राज

ा इस राज्य के रूप में गोविंद प्रशंसित और खुद को उसे करने के लिए अधीन दरबारियों के रूप में आत्मसमर्पण कर दिया। राजा सवाई जयसिंह राजा अपने प्रभु सील "श्री गोविन्द देव चरन, सवाई जयसिंह शरण" में हो गया।

मंदिर का इतिहास
श्री रूप गोस्वामी को भगवान गोविन्द देवजी की अभिव्यक्ति की खबर के तुरंत ओर्रिसा पर नीलाचल में चैतन्य महाप्रभुजी (गौरांग महाप्रभु) के लिए भेजा गया था ताकि वह वृन्दावन के लिए आना चाहिए। हालांकि, उनकी बीमारी के कारण, महाप्रभुजी आठ धातुओं (अष्टधातु) 'दर्शना' होने का उद्देश्य के लिए खुद का चित्रण की एक छोटी सी छवि बना दिया है और छवि में उनकी दिव्य शक्ति इंजेक्शन। उन्होंने कहा कि उनकी बारीकी से विश्वसनीय और प्रिय श्रीमान काशीश्वर पंडित वृन्दावन को महोदय के साथ उसके बारे में इस छवि को भेजा है। छवि एक पवित्र स्नान (अभिषेक) दिया गया था और भगवान गोविंद देवजी के अधिकार पर रखा गया था। यह ठाकुर श्री गौर ने गोविंद के नाम का फायदा हुआ। यह माना जाता है कि इसके बाद एक साल के अंतराल में महाप्रभुजी पुरी में भगवान जगन्नाथजी के मंदिर के अंदर प्रवेश किया हरिनाम संकीर्तन करामाती और देवत्व में अपने होने विलय कर दिया।

जयपुर के श्री राधा गोविंद देव जी का इतिहास:

भगवान श्री कृष्ण के पौत्र मथुरा पति वज्रनाभ ने भगवान कृष्ण के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। उन्होंने राजा परीक्षित की विधवा मां से गोविंद के स्वरूप का वर्णन सुनकर गोविंद देव जी का वैसा ही विग्रह कारीगरों से बनवाया था। बरसों बाद यक्षुओ के शासन में भगवान् की मूर्तियों को तोड़ने का अभियान चला। तब वृंदावन वासियों ने गोविन्द जी की मूर्ति को बचाने के लिए यमुना किनारे जमीन में दफन कर दिया था। पंच गंगा प्रकाशन के मुताबिक बाद में गुप्त वंशीय राजाओं ने गोविंद देव जी को भूमि से निकाल कर प्राकट्य करवाया ।इसके बाद 10 वीं शताब्दी में विदेशी आक्रांताओं के डर से ब्रजवासियों ने फिर से गोविंदजी के विग्रह को वृंदावन के गोमा टीले में दफन कर छुपा दिया था।
बाद में बंगाल के चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर उनके शिष्य रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी में गोमा टीले से गोविन्द देव जी के विग्रह को निकाला और पर्णकुटी बनाकर चबूतरे पर बिठा दिया। देश में अकबर का शासन था। तब आमेर महाराजा मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में लाल पत्थर का विशाल मंदिर बनाया। सन 1590 में आमेर के शिल्पी कल्याण दास, माणकचंद शिल्पकार गोविंद राम और कारीगर गोरख दास की देखरेख में गोविंद देव जी का मंदिर 20 बरस में बनकर तैयार हुआ।
वृंदावन में गोविंद देव जी का यह मंदिर बनने के बाद उड़ीसा के वृहदभानों नामक शासक के वंशज पुरुषोत्तम देव राधाजी की मूर्ति को उड़ीसा से पालकी में बिठा कर वृंदावन लाए और राधा जी को गोविंद देव जी के वाम भाग में विराजमान किया।
गोविंद देव जी के प्रकट होने के 17 वर्ष बाद राधा रानी का उनसे वृंदावन में मिलन हुआ था।
सन 1669 में औरंगजेब ने मंदिरों को तोड़ने का फरमान जारी कर दिया था। वृंदावन में गोविंद देव जी मन्दिर की बुर्जो को तोड़ा गया। तब गोस्वामी जी गोविंद देव जी को मुगल आक्रांताओ बचाने के लिए सबसे पहले राधाकुंड ले आए। राधा कुंड के बाद महंत शिव राम गोस्वामी जी के पोते गोविंद शरण गोस्वामी जी गोविंद देव जी को कामा ले आए। कामा में आमेर महाराजा मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र रतन सिंह का शासन था। सन 1675 तक राधा गोविंद देव जी कामा में रहे । उसके बाद गोविंद देव जी को आमेर रियासत के गोविंदपुरा रोपाड़ा में लाया गया।
यह गोविंदपुरा गांव आमेर नरेश महाराजा मान सिंह प्रथम ने गोविंद देव जी की जागीर में दिया था। गोविंद देव जी महाराज को गोस्वामी शिवराम के पोते गोविंद शरण महंत जी लाए थे।
आमेर महाराजा सवाई राम सिंह प्रथम के समय राधा गोविंददेव जी को गोविंदपुरा से लाकर कनक वृंदावन में विराजमान किया गया।
सवाई जय सिंह जी ने जब जयपुर बसाया तब उन्होंने सिटी पैलेस के पास सूरज महल में गोविंद देव जी को सन 1739 में पाटोत्सव मना कर स्थापित करवाया। जय निवास उद्यान भी गोविंद देव जी के लिए बनवाया गया ।बाद में महाराजा भवानी सिंह जी ने यह बाग नगर निगम को सौंप दिया था।
सवाई जयसिंह के समय राजमुद्रा में
श्री गोविंद देव चरण।
सवाई जय सिंह शरण
लिखा गया।
जयपुर रियासत में गोविंद देव जी की सबसे बड़ी सवा लाख रुपए साल की जागीर थी। करीब दो दर्जन गांव जागीर में दिए गए। मंदिर में विराजमान राधा जी की सेवा के लिए दूसरी सखी विशाखा की मूर्ति को सवाई प्रताप सिंह ने बनवा कर लगाया। सवाई ईश्वर सिंह जी के समय प्रति हजार आमदनी के पेटे सवा रुपैया गोविंद देव जी के निमित्त किया गया ।
महाराजा के जन्मदिवस पर वे जितने साल के होते उतनी ही स्वर्ण मुद्राएं भेंट की जाती थी। कहा जाता है .. "जहां गोविंद है"
वही गुप्त वृंदावन है"
इसलिए जयपुर को वृंदावन का दूसरा स्वरूप भी माना गया। रिकॉर्ड के मुताबिक महाराजा मानसिंह प्रथम प्रत्येक कार्तिक मास में गोविंद देव जी के दर्शन करने वृंदावन जाते थे।

मैं अरज करू श्री राधा गोविंद सुण लीजो, सुण लीज्यो;थाँका चरण कमल की भक्ति सदा मोहे दीज्यो............,🌹 गोविन्द आँगन राधे...
30/01/2026

मैं अरज करू श्री राधा गोविंद सुण लीजो, सुण लीज्यो;
थाँका चरण कमल की भक्ति सदा मोहे दीज्यो............,
🌹 गोविन्द आँगन राधे राधे; मन-वृन्दावन राधे राधे 🌹

जयश्री राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे गोविंदभजो राधे गोविन्द राधे गोविन्द राधे गोविन्द,रटो राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे गो...
30/01/2026

जयश्री राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे गोविंद
भजो राधे गोविन्द राधे गोविन्द राधे गोविन्द,
रटो राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे गोविन्द,
जयश्री राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे गोविंद..🙏

26/01/2026

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🇮🇳✨️🙏

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Jaipur
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