04/09/2026
*जब योगेश्वर के दर्शन के लिए स्वयं योगीश्वर आए…*
ब्रज की उस पावन धरती पर एक दिन ऐसा दृश्य घटित हुआ, जिसकी कल्पना करना भी भक्ति से हृदय भर देता है।
एक ओर नन्दभवन में नन्हे बालकृष्ण अपनी बाल लीलाओं से समूचे गोकुल को मोहित कर रहे थे…
और दूसरी ओर कैलाश पर समाधिस्थ महादेव को जब यह समाचार मिला कि स्वयं परब्रह्म ने ब्रज में बालरूप धारण किया है, तो उनका मन उस नन्हे श्यामसुंदर के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठा।
महादेव ने मन ही मन कहा.....
*“जिस परम तत्त्व का मैं ध्यान करता हूँ,*
*आज वही तत्त्व ब्रज की गलियों में बालक बनकर खेल रहा है।*
*फिर मैं उसके दर्शन के लिए क्यों न जाऊँ?”*
और फिर…
कैलाश का योगी ब्रज की ओर चल पड़ा।
जटाओं को साधु का रूप दिया, शरीर पर भस्म रमाई, हाथ में त्रिशूल लिया और अपने गणों श्रृंगी-भृंगी के साथ एक जोगी का वेश धारण कर महादेव गोकुल पहुँचे।
नन्दभवन के द्वार पर पहुँचकर उन्होंने अलख जगाई।
द्वार पर खड़ी दासी ने भीतर जाकर यशोदा मैया से कहा....
*“मैया! द्वार पर बड़े विचित्र जोगी आए हैं।*
*शरीर पर भस्म, गले में सर्प, सिर पर जटाएँ और हाथ में त्रिशूल है।”*
यशोदा मैया बाहर आईं।
उन्होंने उस जोगी को प्रणाम किया और भिक्षा अर्पित करते हुए कहा....
*“महाराज! यह भिक्षा स्वीकार कीजिए और हमारे लाला को आशीर्वाद दीजिए।”*
लेकिन जोगी ने भिक्षा लेने से मना कर दिया।
उन्होंने कहा....
*“माता, मुझे भिक्षा नहीं चाहिए।*
*मैं तो तुम्हारे लाला के दर्शन करने आया हूँ।”*
यशोदा मैया थोड़ी घबरा गईं।
“महाराज! हमारा लाला अभी बहुत छोटा है। आपके गले में सर्प हैं, हाथ में त्रिशूल है। आपको देखकर वह डर जाएगा।”
तब उस जोगी के मुख से ऐसी वाणी निकली, मानो स्वयं कैलाश बोल उठा हो.....
*“माता! जिसे तुम अपना लाला समझ रही हो,*
*वह साधारण बालक नहीं है।*
*“वह मुझे पहचानता है, माता।*
*मैं उसके दर्शन के बिना यहाँ से नहीं जाऊँगा।*
*न अन्न ग्रहण करूँगा, न जल।*
*यहीं बैठकर अपने लाला की प्रतीक्षा करूँगा।”*
और महादेव नन्दभवन के द्वार पर बैठ गए।
*उधर नन्दभवन में एक अद्भुत लीला आरम्भ हुई।*
नन्हे कृष्ण अचानक रोने लगे।
यशोदा मैया ने उन्हें गोद में लिया।
दूध पिलाया…
झुलाया…
लोरी सुनाई…
खिलौने दिखाए…
लेकिन नन्दलाला का रोना बंद ही नहीं हुआ।
तभी किसी दासी ने आशंका से कहा...
*“मैया! कहीं बाहर बैठे उस जोगी ने कोई मंत्र तो नहीं कर दिया?”*
यशोदा चिंतित हो उठीं।
शांडिल्य ऋषि को बुलाया गया।
ऋषि ने ध्यान लगाया और तुरंत जान लिया...
नन्दभवन के बाहर कोई साधारण जोगी नहीं बैठा।
वह तो स्वयं *देवाधिदेव महादेव* थे।
ऋषि ने कहा...
*“माता! जिनको तुम बाहर साधु समझ रही हो,*
*वे स्वयं महेश्वर हैं।*
*उनका तुम्हारे लाला से आज का नहीं,*
*जन्म-जन्मांतर का दिव्य संबंध है।*
*अपने लाला को उनके दर्शन करा दो।”*
यशोदा मैया ने अपने नन्हे श्याम को सजाया।
पीताम्बर पहनाया…
माथे पर तिलक लगाया…
गले में सिंहनख का आभूषण पहनाया…
और उन्हें लेकर बाहर आ गईं।
फिर वह क्षण आया…
जिसके लिए स्वयं महादेव कैलाश से ब्रज तक चले आए थे।
महादेव की दृष्टि बालकृष्ण पर पड़ी।
और कृष्ण की चंचल आँखें महादेव की आँखों से मिलीं।
*क्षण भर के लिए जैसे समय ठहर गया।*
एक ओर योगियों के योगेश्वर महादेव…
दूसरी ओर बालरूप में स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण…
जिस परम तत्त्व को संसार ध्यान में खोजता है, वह आज नन्हे बालक के रूप में सामने था।
और जिसे संसार देवाधिदेव कहकर पूजता है, वह उस बालक के दर्शन करके प्रेम में डूब गया।
तभी…
जो कृष्ण अभी तक रो रहे थे, वे महादेव को देखते ही मुस्कुरा उठे।
यशोदा मैया विस्मित रह गईं।
जिस लाला को कोई शांत नहीं कर पा रहा था, वह इस जोगी को देखते ही हँस पड़ा।
मैया समझ गईं...
*लाला ने अपने महादेव को पहचान लिया है।*
उन्होंने कृष्ण को महादेव की गोद में दे दिया।
और भोलेनाथ ने अपने आराध्य को अपनी बाहों में भर लिया।
जिस शिव के कंठ में संसार का विष था…
आज उन्हीं शिव की गोद में संसार के पालनहार थे।
जिस शिव के मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित होता है…
आज उन्हीं शिव की बाहों में नन्हे श्यामसुंदर खेल रहे थे।
महादेव का हृदय वात्सल्य से भर उठा।
वे कृष्ण को गोद में लेकर नाचने लगे।
और पूरा गोकुल उस दिव्य मिलन का साक्षी बन गया।
उस समय बालकृष्ण की छवि कैसी रही होगी?
भक्त सूरदास की पंक्तियाँ मानो उस दृश्य को आँखों के सामने उतार देती हैं..
*“सोभित कर नवनीत लिए।*
*घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किए॥*
*चारु कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिए।*
*लट लटकनि मनु मत्त मधुप-गन, मादक मधुहिं पिए॥*
*कठुला कंठ, वज्र केहरि-नख, राजत रुचिर हिए।*
*धन्य सूर, एकौ पल इहिं सुख का, सत कल्प जिए॥”*
ऐसे बालकृष्ण के दर्शन का एक क्षण भी सौ कल्पों के जीवन से अधिक हो जाए,सूरदास की भक्ति यही कहती है।
और सोचिए…
*जिस बालकृष्ण को देखकर ब्रज की माताएँ मोहित थीं,*
*आज उसी बालक को स्वयं महादेव अपनी गोद में लिए खड़े थे।*
यही है हरि और हर का प्रेम।
सनातन परंपरा ने शिव और विष्णु को कभी परस्पर विरोधी नहीं माना।
उनके संबंध की गहराई इस प्रसिद्ध श्लोक में दिखाई देती है..
*शिवाय विष्णुरूपाय*
*शिवरूपाय विष्णवे।*
*शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोश्च हृदयं शिवः॥*
अर्थात...
*शिव विष्णु के स्वरूप हैं और विष्णु शिव के स्वरूप हैं।*
*शिव के हृदय में विष्णु हैं और विष्णु के हृदय में शिव।*
और यही भाव कहता है..
“यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः।”
विष्णु शिवमय हैं और शिव विष्णुमय।
इसलिए ब्रज में महादेव का बालकृष्ण से मिलन केवल दो देवताओं का मिलन नहीं था।
यह था...
*योग का प्रेम से मिलन।*
*तपस्या का माधुर्य से मिलन।*
*भक्ति का भगवान से मिलन।*
*और हर का हरि से मिलन।*
इसीलिए ब्रज में महादेव केवल पूजित ही नहीं हैं…
वे *गोपेश्वर महादेव* हैं।
*हरि अनंत, हरि कथा अनंता।*
जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ शिव हैं।
जहाँ शिव हैं, वहाँ कृष्ण का प्रकाश है।
और जहाँ *हरि और हर का प्रेम* है…
वहीं सनातन की आत्मा मुस्कुराती है।
जय श्रीकृष्ण।
हर हर महादेव।
राधे राधे।