05/07/2026
यज्ञ की बात करने वालों से एक प्रश्न…
आज बहुत लोग कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा और पूर्वज विशाल-विशाल यज्ञ किया करते थे। यह बात सही है। लेकिन एक प्रश्न है—
आप स्वयं कितना यज्ञ करते हैं?
यदि प्रतिदिन 5–10 मिनट का भी समय हम अग्निहोत्र या दैनिक हवन के लिए नहीं निकाल सकते, तो केवल अतीत का गौरव गिनाने से क्या लाभ?
महर्षि दयानंद सरस्वती जी का महान योगदान यही है कि उन्होंने यह नहीं कहा कि आज भी प्रत्येक व्यक्ति प्राचीन काल के समान बड़े-बड़े राजसूय, अश्वमेध या विशाल वैदिक यज्ञ करे। उन्होंने उन महान वैदिक यज्ञों की परंपरा में से प्रत्येक गृहस्थ के लिए वेदसम्मत, शास्त्रीय, सरल और नित्य किए जाने योग्य अग्निहोत्र (दैनिक यज्ञ) को पुनः समाज के सामने स्थापित किया।
उन्होंने बताया कि जिस वैदिक परंपरा का पालन हमारे ऐतिहासिक पुरुष श्री राम और श्री कृष्ण करते थे, जिस परंपरा में माता कौशल्या नित्य यज्ञ-उपासना करती थीं, उसी परंपरा का यह दैनिक यज्ञ आज भी प्रत्येक व्यक्ति अपने घर में कर सकता है। यदि सभी मंत्र याद न हों, तो श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र के साथ भी आहुति दी जा सकती है।
यज्ञ केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि ईश्वर-उपासना, आत्मशुद्धि, अनुशासन, कृतज्ञता और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व का प्रतीक है। शुद्ध सामग्री, गौघृत और औषधीय द्रव्यों की आहुति के साथ किया गया यज्ञ व्यक्ति के भीतर सात्त्विकता जगाता है और वातावरण को भी पवित्र बनाने में सहायक होता है।
इसलिए प्रश्न केवल इतना है—
जो लोग बड़े-बड़े यज्ञों का गुणगान करते हैं, वे स्वयं प्रतिदिन 5–10 मिनट का वैदिक यज्ञ क्यों नहीं करते?
आलोचना करना सरल है, लेकिन परंपरा को अपने जीवन में उतारना ही सच्चा सम्मान है।
आइए संकल्प लें कि दिन की शुरुआत मोबाइल से नहीं, मंत्र और यज्ञ से करेंगे। यदि प्रत्येक घर में प्रतिदिन अग्निहोत्र प्रारंभ हो जाए, तो वही भारत की वैदिक संस्कृति के पुनर्जागरण की सबसे सशक्त शुरुआत होगी।
घर-घर यज्ञ जले, घर-घर वेद का प्रकाश फैले।