Sai narayan darbar, jabalpur

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24/03/2020

एक निवेदन है,

रिसोर्सेज पर सबका हक़ है, इतना भी संचय न करे कि दूसरों को मिलने में परेशानी होने लगें. पैनिक मत हों।।

सरकार सब कुछ मुहैया करवायेगी भरोसा रखें परंतु संचय आवश्यकता से अधिक न करें जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दें

घर पर रहें , और कम संसाधनों में उचित नियंत्रण करने का प्रबंधन करें ।

इससे बेहतर तरीके से देशप्रेम और देशसेवा का मौका आपको पूरे जीवन मे कभी नही मिलेगा।

💐💐💐

31/12/2018

क़िस्त दर क़िस्त कट कर निकल गया
यह एक साल भी जरूरतें पूरी करते करते...
और ख्वाहिशे अब भी पहले जैसी ही बनी रही...
कुछ पूरी हुईं...
कुछ नहीं भी...
और कुछ संभवतः छोड़ दी गयीं...
पर...
फिर एक प्रदीप्ति है...
फिर एक उत्साह है...
फिर एक आलाप है...
फिर से कुछ पा जाने को
कुछ नया अदम्य अद्भुद कर जाने को
किसी से काम आ जाने को..
किसी के दिल का हो जाने को...!!
अपनी ख्वाहिशो के चलते किसी का मन न दुखाने को
किसी जरुरतमंद की जरुरत बन जाने को...
सबको शिक्षा,स्वच्छता, आवास मिले...
सभी काबिल हो दो वक़्त का भोजन पाने को...
न कोई किसान हानि की मौत मारने को मजबूर हो...
न कोई हो बलाधिकार से रुतवा ज़माने को...
सभी खुश रहें पुरे वर्ष भर...
हर दिन को आह्लादपूर्वक हर्षपूर्ण मनाने को....



#नववर्षकीमंगलकामना

19/11/2018

न खूब किया जप तप प्रभु, न खूब किया अरदास;
जो मन से चाहा तुझे,पाया अपने पास;
इस जग में न काउ की पूरी होती आस;
बस इतना कर दो प्रभु,सुख करे हर घर वास;
अतिउत्सुक्ता मिट चले, आलस न भटके पास;
जब तक तन में प्राण हैं, खुद पर हो विश्वास;
तेरा मेरा कुछ नहीं, सब प्रभु करें प्रकाश;
आ मिल बैठें खाइये, जे गुरुदेव प्रसाद;
इस पल जैसी अति ख़ुशी आँखन को दीजो आप;
हे गुरु इक अरदास है, संग बस रखियो आप।।

That's the kind of  !♥️The Raza Library Rampur was built by Nawab Faizullah Khan in the late 18th centuryIts minaret is ...
10/09/2018

That's the kind of !♥️

The Raza Library Rampur was built by Nawab Faizullah Khan in the late 18th century

Its minaret is a standing symbol of India's spirit of mutual understanding, peaceful co-existence, brotherhood and religious freedom.
Credit :

15/12/2017

------ सत्संग की महिमा ------

श्री गुरु नानक देव जी के पास एक बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था।
उसके कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे।
एकदम बहरा और एक शब्द भी नहीं सुन सकता था।

किसी ने श्री गुरु नानक देव जी से कहा- बाबा जी! वह जो वृद्ध बैठे हैं,
वह कथा सुनते-सुनते हंसते तो हैं पर हैं वे बहरे।

श्री गुरु नानक देव जी सोचने लगे,
बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा,
और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा।
रस नहीं आता होगा तो यहां बैठना भी नहीं चाहिए, उठ कर चले जाना चाहिए।
पर यह जाता भी नहीं है।

श्री गुरु नानक देव जी ने इशारे से उस वृद्ध को अपने पास बुला लिया।

सेवक से कागज और कलम मंगाया,
और उस पर लिखकर पूछा- तुम सत्संग में क्यों आते हो?

उस वृद्ध ने लिखकर जवाब दिया- बाबा जी! सुन तो नहीं सकता हूं,
लेकिन यह तो समझता हूं कि ईश्वर प्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं।
संसारी आदमी जब बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है।
लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती है।
मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूं पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं।
दूसरी बात आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं,
उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है।

श्री गुरु नानक देव जी ने देखा कि यह तो ऊंची समझ के धनी हैं।
उन्होंने कहा- मैं यह जानना चाहता हूं कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुंच जाते हैं,
और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों?

उस वृद्ध ने लिखकर जबाब दिया- मैं परिवार में सबसे बड़ा हूं,
और बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं।
मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा।
शुरूआत में कभी-कभी मैं बहाना बनाकर उसे ले आता था।
मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहां ले आया।
पत्नी बच्चों को ले आई।
और अब सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा है।
कुटुम्ब को संस्कार मिल गए।

ब्रह्मचर्चा और आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आए तो क्या,
सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से ही इतना पुण्य होता है,
कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने लगते हैं।
और पूरे परिवार का कल्याण होने लगता है।

फिर जो व्यक्ति श्रद्धा एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन करे,
उसके परम कल्याण में संशय ही क्या।

------ सत्संग के अलावा कोई भी चारा नहीं है ------

05/09/2016

‼🐚‼🐚🙏🐚‼🐚‼

दादी माँ बनाती थी.. रोटी !!
पहली.. गाय की ,
और आखरी.. कुत्ते की..!

हर सुबह.. नन्दी आ जाता था ,
दरवाज़े पर.. गुड़ की डली के लिए..!

कबूतर का.. चुग्गा ,
चीटियों.. का आटा..!

शनिवार, अमावस, पूर्णिमा का सीधा.. सरसों का तेल ,
गली में.. काली कुतिया के ब्याने पर.. चने गुड़ का प्रसाद..!

सब कुछ.. निकल आता था !

वो भी उस घर से..,
जिसमें.. भोग विलास के नाम पर.. एक टेबल फैन भी न था..!

आज..
सामान से.. भरे घरों में..
कुछ भी.. नहीं निकलता !
सिवाय लड़ने की.. कर्कश आवाजों के.!...हमको को आज भी याद है -
मकान चाहे.. कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे.. सच्चे थे..!!

चारपाई पर.. बैठते थे ,
दिल में प्रेम से.. रहते थे..!

सोफे और डबल बैड.. क्या आ गए ?
दूरियां हमारी.. बढा गए..!

छतों पर.. सब सोते थे !
बात बतंगड.. खूब होते थे..!

आंगन में.. वृक्ष थे ,
सांझे.. सबके सुख दुख थे..!

दरवाजा खुला रहता था ,
राही भी.. आ बैठता था...!

कौवे छत पर.. कांवते थे
मेहमान भी.. आते जाते थे...!

एक साइकिल ही.. पास था ,
फिर भी.. मेल जोल का वास था..!

रिश्ते.. सभी निभाते थे ,
रूठते थे , और मनाते थे...!

पैसा.. चाहे कम था ,
फिर भी..
माथे पे.. ना कोई गम था..!

मकान चाहे.. कच्चे थे ,
पर..रिश्ते सारे सच्चे थे..!!

अब शायद..सब कुछ पा लिया है !
पर..
लगता है कि.. बहुत कुछ गंवा दिया!!!

‼💎‼🐚🔔🐚‼💎‼

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ये गणपति भगवान की दुर्लभ फोटो है। इसमें दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि ,दोनों पुत्र शुभ और लाभ और पुत्री संतोषीमाता ,दो...
05/09/2016

ये गणपति भगवान की दुर्लभ फोटो है। इसमें दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि ,दोनों पुत्र शुभ और लाभ और पुत्री संतोषीमाता ,दोनों बहुएं तुष्टि और पुष्टि,दोनों पौत्र आनंद और प्रमोद। श्री गणपति गजानंद परिवार की जय ।

28/08/2016

👉👹अंहकार👹👈

महाकवि कालिदास अपने समय के महान विद्वान कवि थे।

उनके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था। शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित
नहीं कर सकता था।

अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान था।
एक बार कालिदास को अपनी
विद्वत्ता का घमंड हो गया। उन्हें लगा कि
उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर
लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं
बचा। उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा
नहीं।

एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ
का निमंत्रण पाकर कालिदास महाराज
विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर
रवाना हुए।

गर्मी का मौसम था, धूप काफी तेज़ और
लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग
आई। जंगल का रास्ता था और दूर तक कोई
बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी। थोङी तलाश
करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी।

पानी की आशा में वो उस ओर बढ चले। झोपड़ी
के सामने एक कुआं भी था। कालिदास जी ने
सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी
देने का अनुरोध किया जाए। उसी समय
झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर
निकली। बच्ची ने कुएं से पानी भरा और जाने
लगी।

कालिदास उसके पास जाकर बोले ” बालिके!
बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे।”

बच्ची ने कहा, “आप कौन हैं? मैं आपको जानती
भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए।”

कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं
जानता मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता?
फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले, “बालिके
अभी तुम छोटी हो। इसलिए मुझे नहीं जानती।
घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो। वो मुझे
देखते ही पहचान लेगा। मेरा बहुत नाम और
सम्मान है दूर-दूर तक। मैं बहुत विद्वान व्यक्ति
हूं।”

कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से
अप्रभावित बालिका बोली,

“आप असत्य कह
रहे हैं। संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन
दोनों को मैं जानती हूं। अपनी प्यास बुझाना
चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं?”

थोङी देर सोचकर कालिदास बोले, “मुझे नहीं
पता, तुम ही बता दो। मगर मुझे पानी पिला
दो। मेरा गला सूख रहा है।”

बालिका बोली, “दो बलवान हैं ‘अन्न’ और
‘जल’।
भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से
बड़े बलवान को भी झुका दें। देखिए तेज़ प्यास ने
आपकी क्या हालत बना दी है।”

कलिदास चकित रह गए। लड़की का तर्क
अकाट्य था। बड़े से बड़े विद्वानों को
पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने
निरुत्तर खङे थे।

बालिका ने पुनः पूछा, “सत्य बताएं, कौन हैं
आप?” वो चलने की तैयारी में थी,

कालिदास
थोड़ा नम्र होकर बोले, “बालिके! मैं बटोही
हूं।”

मुस्कुराते हुए बच्ची बोली, “आप अभी भी झूठ
बोल रहे हैं। संसार में दो ही बटोही हैं। उन
दोनों को मैं जानती हूँ, बताइए वो दोनों
कौन हैं?”

तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास जी की
बुद्धि क्षीण कर दी थी। लेकिन लाचार होकर
उन्होंने फिर अनभिज्ञता व्यक्त कर दी।

बच्ची बोली, “आप स्वयं को बङा विद्वान
बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते? एक स्थान से
दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही
कहलाता है। बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और
दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं। आप तो
थक गए हैं। भूख प्यास से बेदम हो रहे हैं। आप कैसे
बटोही हो सकते हैं?”

इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका
उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई। अब तो
कालिदास और भी दुखी हो गए। इतने
अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए। प्यास से
शरीर की शक्ति घट रही थी। दिमाग़ चकरा
रहा था। उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़
देखा।
तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली। उसके
हाथ में खाली मटका था। वो कुएं से पानी
भरने लगी।

अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास
बोले, “माते प्यास से मेरा बुरा हाल है। भर पेट
पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।”

बूढी माँ बोलीं, ” बेटा मैं तुम्हे जानती नहीं।
अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला
दूँगी।”

कालिदास ने कहा, “मैं मेहमान हूँ, कृपया
पानी पिला दें।”
“तुम मेहमान कैसे हो सकते
हो? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और
दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता,

सत्य बताओ कौन हो तुम?”

अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश
कालिदास बोले “मैं सहनशील हूं। पानी पिला
दें।”

“नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती
जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है,
उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज
के भंडार देती है। दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो
फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच
बाताओ कौन हो?”

कालिदास लगभग मूर्छा की स्थिति में आ गए
और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले, ” मैं हठी
हूं।”

“फिर असत्य। हठी तो दो ही हैं, पहला नख और
दूसरा केश। कितना भी काटो बार-बार
निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप?”

पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके
कालिदास ने कहा, “फिर तो मैं मूर्ख ही हूं।”

“नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं।
पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब
पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित
जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर
भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा
करता है।”

कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास
वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना
में गिड़गिड़ाने लगे।

उठो वत्स… ये आवाज़ सुनकर जब कालिदास ने
ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां
खड़ी थी।
कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए

“शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने
शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा
को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और
अहंकार कर बैठे। इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने
के लिए ये स्वांग करना पड़ा।”

कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और
भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।
🚩🚩 सरस्वती मां की जय

25/08/2016

दुर्योधन ने श्री कृष्ण की पूरी नारायणी सेना मांग ली थी।
और अर्जुन ने केवल श्री कृष्ण को मांगा था।
उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की चुटकी (मजाक) लेते हुए
कहा:
"हार निश्चित हैं तेरी, हर दम रहेगा उदास ।
माखन दुर्योधन ले गया, केवल छाछ बची तेरे पास ।"
अर्जुन ने कहा :- हे प्रभु
"जीत निश्चित हैं मेरी, दास हो नहीं सकता उदास ।
माखन लेकर क्या करूँ, जब माखन चोर हैं मेरे पास...!!!!
" *जय श्री कृष्ण* "
Happy Janmastami

29/05/2016

💎💎चार कीमती रत्न💎💎

एक वृद्ध संत ने अपनी अंतिम घड़ी नज़दीक देख अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा,
मैं तुम बच्चों को चार कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम इन्हें सम्भाल कर रखोगे और पूरी ज़िन्दगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बनाओगे।

1~पहला रत्न है: "माफी"।
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।
2~दूसरा रत्न है: "भूल जाना"।
अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~तीसरा रत्न है: "विश्वास"।
हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीँ लिखा होगा। परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास हि तुम्हें जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा।

4~चौथा रत्न है: "वैराग्य"।
हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निशिचत हि हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए किसी के लिए अपने मन में लोभ-मोह न रखना।

मेरे बच्चों जब तक तुम ये चार रत्न अपने पास सम्भालकर रखोगे, तुम खुश और प्रसन्न रहोगे।

🌹💎💎💎💎🌹

10/02/2016

स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो
सकती....
जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "......
गौतम बुद्ध
===============
============
संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक
क्षेत्रों की यात्रा की...
एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक
स्त्री उनके पास आई और
बोली- आप तो कोई "राजकुमार" लगते
हैं। ...क्या मैं जान सकती हूं
कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने
का क्या कारण है ?
बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया
कि...
"तीन प्रश्नों" के हल ढूंढने के लिए
उन्होंने संन्यास लिया..
बुद्ध ने कहा.. हमारा यह शरीर जो युवा
व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह "वृद्ध"
होगा, फिर "बीमार" और ....अंत में
"मृत्यु" के मुंह में चला जाएगा। मुझे
'वृद्धावस्था', 'बीमारी' व 'मृत्यु' के
कारण का ज्ञान प्राप्त करना है .....
बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस
स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित
किया....
शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई।
गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह
किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने
न जाएं....!!!
क्योंकि वह "चरित्रहीन" है.....
बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा ?....क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री
चरित्रहीन है...?
मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं
कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है....।
आप उसके घर न जाएं।
बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा...
और उसे ताली बजाने को कहा... मुखिया
ने कहा...मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा
सकता...
"क्योंकि मेरा दूसरा हाथ
आपने पकड़ा हुआ है"...
बुद्ध बोले...इसी प्रकार यह
स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती
है...????.. जब तक इस गांव के "पुरुष
चरित्रहीन" न हों...!!!!अगर गांव के
सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत
ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के
लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं....
यह सुनकर सभी "लज्जित" हो गए........लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष
"लज्जित" नही "गौरवान्वित" महसूस
करते है....... क्योकि यही हमारे "पुरूष प्रधान"
समाज की रीति एवं नीति है..॥
सकारात्मक सोचो
सकारात्मक सोच से ही अपना और अपने
घर समाज देश का विकास होगा।

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Jabalpur
482002

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