27/01/2023
"खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं,
विरत्त चित्ता आयतिके भविस्मं।
ते खीण बीजा अविरूल्हिच्छन्दा,
निब्बन्ति धीरा यथायंपदीपो।।"
- रतन सुत्त
अर्थात-
जिनके सारे पुराने कर्म क्षीण हो गये हैं और नये कर्मों की उत्पत्ति नहीं होती ; पुनर्भव में जिनकी आसक्ति समाप्त हो गयी है, वे क्षीण - बीज / अरहंत तृष्णा - विमुक्त हो गये हैं । वे इसी प्रकार निर्वाण को प्राप्त होते हैं जैसे तेल समाप्त होने पर दीपक।
"खीणं पुराणं" - जो पुराने भव संस्कार है वे क्षीण हो जाते हैं
और "नत्थि सम्भवं "- नई भव संस्कार नहीं बनते हैं तो तृष्णा से विमुक्त हो जाते है। उन अर्हंत का पुनर्भव नहीं होता है और निर्वाण हो जाता हैं जैसे तेल समाप्त होते ही दीपक बुझ जाता है, वह दीपक फिर जलता नहीं है।
तथागत ने "खीण बीजा"-
क्षीण बीज होने के लिए
प्रतित्य-समुत्पाद का उपदेश दिया।
☸️ पटिच्चसमुप्पाद ☸️
( प्रतित्य- समुत्पाद )
अनुलोम
( अवरोह पतनोन्मुख )
" अविज्जापच्चया सङ्खारा,
सङ्खारपच्चया विञ्ञाणं,
विञ्ञाणपच्चया नामरूपं,
नामरूपपच्चया सळायतनं,
सळायतनपच्चया फस्सो,
फस्सपच्चया वेदना,
वेदनापच्चया तण्हा,
तण्हापच्चया उपादानं,
उपादानपच्चया भवो,
भवपच्चया जाति,
जातिपच्चया जरा- मरण-सोक- परिदेव- दुक्ख-दोमनस्स- उपायासा सम्भवन्ति।
एवमेतस्स केवलस्स दुक्खखन्धस्स समुदयो होति।।"
इस प्रकार, सारा का सारा दुःख- समुदय ही उठ खड़ा हो जाता है।
प्रतिलोम
( आरोहण- उन्नोन्मुख )
" अविज्जाय त्वेव असेस - विराग- निरोधा सङ्खारनिरोधो,
सङ्खारनिरोधा विञ्ञाणनिरोधो,
विञ्ञाणनिरोधा नामरूपनिरोधो,
नामरूपनिरोधा सळायतननिरोधो,
सळायतननिरोधा फस्सनिरोधो,
फस्सनिरोधा वेदनानिरोधो,
वेदनानिरोधा तण्हानिरोधो,
तण्हानिरोधा उपादाननिरोधो,
उपादाननिरोधा भवनिरोधो,
भवनिरोधा जातिनिरोधो,
जातिनिरोधा जरा- मरण-सोक- परिदेव- दुक्ख-दोमनस्स- उपायासा निरूज्झन्ति।
एवमेतस्स केवलस्स दुक्खखन्धस्स निरोधो होति।।
इस प्रकार, सारा का सारा दु:ख - समुदय ही रूक जाता है।
अनुलोम यह भवचक्र है।
प्रतिलोम धम्मचक्र है।
यही दु:ख मुक्ति का मनोवैज्ञानिक मार्ग है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏