Arya Samaj Indore

Arya Samaj Indore In Indore, the first Arya Samaj was established in Jan 1888 at 345, MG Road, Malharganj Hence arya Samaj malharganj indore is the first arya Samaj of the town.

The founder of Arya Samaj, Maharishi Dayanand Sarswati visited Indore twice in his life span. Indore naresh at that time, maharaj tukojirav holkar II wanted to meet him and wanted to see him at Indore. Swami ji first visited indore in paush samwat 1938 (1881 BC) but Indore naresh had to go out of town for some reason and couldn’t meet swami ji then. The staff of indore naresh did a splendid job we

lcoming swami ji to the town. Swami ji stayed in indore for a week giving religious teachings and then he left for Mumbai and visited indore again next year. On his next visit to indore, indore naresh extended his hospitality to maharishi and welcomed him in lal bagh palace. During this visit, swami ji inspired the people of indore to establish an arya Samaj in the town and then he left for Udaipur. Finally, on maghshukl 4, tuesday 1944 vs (January 17, 1888 BC) arya Samaj indore was inaugurated by Paramhans Swami vishveshwaranand saraswath and brahmchari nityanand ji at the residence of Dr. Govind rao sharma Chaskar. Its founder pillars were Late Pt shambhu ll sharma (Teacher in daily college) the fater of late shri harish Chandra sharma), Dr bharow Prasad sharma, Dr lalbhai rawal, Seth ghnshyanmdass gupt, shri gn kirkare, motiram verma, biharilal sharma AND GHOJHERAM Chandra sharma.

01/12/2016

आर्य समाज दयानंद गंज में दिनांक २५ दिसंबर से ३० दिसंबर तक गायत्री माह यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है. साथ ही दिनांक २५ दिसंबर को स्वामी श्रद्धानंद बलिदान दिवस भी मनाया जायेगा.

अन्य जानकारियां जल्द ही

11/07/2016

☀ आईये वेदों की ओर लौट चलें ☀
🔶 जानिए वेद की आज्ञाओं के उलंघन का कितना भयंकर परिणाम हो सकता है ? भारत की दुर्गति के पीछे वेद की आज्ञाओं का उलंघन ही था ।

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🔶 पहली आज्ञा :
🔸 अक्षैर्मा दिव्य: (ऋ 10/34/13)
🔹 अर्थात् "जुआ मत खेलो ।" इस आज्ञा का उलंघन हुआ । इस आज्ञा का उलंघन धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्टर ने किया ।

🔷 परिणाम : एक स्त्री का भरी सभा में अपमान । महाभारत जैसा भयंकर युद्ध जिसमें लाखों, करोड़ों योद्धा और हज़ारों विद्वान मारे गए । आर्यवर्त पतन की ओर अग्रसर हुआ ।

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🔶 दूसरी आज्ञा :
🔸 मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः (ऋ 8/48/14)
🔹 अर्थात् "आलस्य, प्रमाद और बकवास हम पर शासन न करें ।" लेकिन इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । महाभारत के कुछ समय बाद भारत के राजा आलस्य प्रमाद में डूब गये ।

🔷 परिणाम : विदेशियों के आक्रमण ।

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🔶 तीसरी आज्ञा :
🔸 सं गच्छध्वं सं वद्ध्वम (ऋ 10/191/2)
🔹 अर्थात् "मिलकर चलो और मिलकर बोलो ।" वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब विदेशियों के आक्रमण हुए तो देश के राजा मिलकर नहीं चले । बल्कि कुछ ने आक्रमणकारियों का ही सहयोग किया ।

🔷 परिणाम : लाखों लोगों का कत्ल, लाखों स्त्रियों के साथ दुराचार, अपार धन-धान्य की लूटपाट, गुलामी ।

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🔶 चौथी आज्ञा :
🔸 कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः (अथर्व 7/50/8)
🔹 अर्थात् "मेरे दाएं हाथ में कर्म है और बाएं हाथ में विजय ।" वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ । लोगों ने कर्म को छोड़कर ग्रहों फलित ज्योतिष आदि पर आश्रय पाया ।

🔷 परिणाम : कर्महीनता, भाग्य के भरोसे रहकर आक्रान्ताओं को मुँहतोड़ जवाब न देना । धन-धान्य का अपव्यय, मनोबल की कमी और मानसिक दरिद्रता ।

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🔶 पाँचवीं आज्ञा :
🔸 उतिष्ठत सं नह्यध्वमुदारा: केतुभिः सह ।
सर्पा इतरजना रक्षांस्य मित्राननु धावत ।।
(अथर्व 11/10/1)
🔹 अर्थात् "हे वीर योद्धाओ ! आप अपने झण्डे को लेकर उठ खड़े हो और कमर कसकर तैयार हो जाओ । हे सर्प के समान क्रुद्ध रक्षाकारी विशिष्ट पुरुषो ! अपने शत्रुओं पर धावा बोल दो ।" वेद की इस आज्ञा का भी उलंघन हुआ । जब लोगों के बीच बुद्ध ओर जैन मत के मिथ्या अहिंसावाद का प्रचार हुआ । लोग आक्रमणकारियों को मुँहतोड़ जवाब देने की बजाय मिथ्या अहिंसावाद को मुख्य मानने लगे ।

🔷 परिणाम : अशोक जैसे महान योद्धा का युद्ध न लड़ना । विदेशियों के द्वारा इसका फायदा उठाकर भारत पर आक्रमण ।

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🔶 छठी आज्ञा :
🔸 मिथो विघ्राना उप यन्तु मृत्युम (अथर्व 6/32/3)
🔹 अर्थात् "परस्पर लड़ने वाले मृत्यु का ग्रास बनते हैं और नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं ।" वेद की इस आज्ञा का उलंघन हुआ ।

🔷 परिणाम : भारत के योद्धा आपस में ही लड़-लड़कर मर गये और विदेशियों ने इसका फायदा उठाया ।

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🔶 सातवीं आज्ञा :
🔸 न तस्य प्रतिमा अस्ति
🔹 अर्थात् "ईश्वर का कोई प्रतिमान नहीं है ।" लेकिन इस आज्ञा का उलंघन हुआ और परिणाम आपके समक्ष है ।

🔷 परिणाम : ईश्वर के सत्य स्वरुप को छोड़कर भिन्न स्वरुप की उपासना और सत्य धर्म को भूला देना ।

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☀ तो आइये, फिर से वेदों की ओर लौट चलें . . .

*थाईलैंड में आज भी राम का राज्य है*°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°( *विश्वव्यापी भारतीय संस्कृति , भाग:-1*)🌹🌼🌻🌺🌼🌸🌹🌺🌻भारत  क...
06/07/2016

*थाईलैंड में आज भी राम का राज्य है*
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
( *विश्वव्यापी भारतीय संस्कृति , भाग:-1*)
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भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है l वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट "भूमिबल अतुल्य तेज " राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम (Rama 9 th) कहा जाता है l

1-भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास-
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे , रामायण के बालकाण्ड के सर्ग ,70 . 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है , जिसका सारांश है
मिथिला के राजा सीरध्वज थे , जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था , जिनकी पुत्री सीता जी थीं , जिनका विवाह राम से हुआ था l
राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे l इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी
उर्मिला लक्षमण से ,
मांडवी भरत से ,
और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी l

केशव दास रचित " रामचन्द्रिका "-पृष्ठ 354 ( प्रकाशन संवत 1715 ) .के अनुसार ,
राम और सीता के पुत्र लव और कुश ,
लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष ,
शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात
हुए थे l
भगवान राम के समय ही राज्यों बटवारा इस प्रकार हुआ था --
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर )
पूर्व में कुश को कुशावती ,
तक्ष को तक्षशिला ,
अंगद को अंगद नगर ,
चन्द्रकेतु को चंद्रावती l
कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था l थाईलेंड के राजा उसी कुश के वंशज हैं l इस वंश को "चक्री वंश ( Chakri Dynasty ) कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है , और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को "राम " की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम "भूमिबल अतुल्य तेज " है

2-थाईलैंड की अयोध्या---
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंगरेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं , क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है , देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है ,

"क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि "

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया है l इस नाम की एक और विशेषता है l इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता है l कुछ लोग आसानी के लिए इसे "महेंद्र अयोध्या " भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

3-असली राम राज्य थाई लैंड में है-
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं ,इसलिए ,थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है ,थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

राजा राम 9 और पत्नी =
http://i.telegraph.co.uk/multimedia/archive/01216/thai-king-460_1216645c.jpg

4-थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं , फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है l जिसे थाई भाषा में " राम-कियेन " कहते हैं l जिसका अर्थ राम-कीर्ति होता है , जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी , जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ ,क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है ,जो नाम के हिन्दू हैं , लेकिन उनके असली बाप का नाम उनकी माँ भी नहीं बता सकती , हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग है l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है l राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं
फ्र राम (राम), 2 फ्र लक (लक्ष्मण), 3 पाली (बाली), 4 सुक्रीप (सुग्रीव), 5 ओन्कोट (अंगद), 6 खोम्पून ( जाम्बवन्त ) ,7 बिपेक ( विभीषण ), 8 तोतस कन ( दशकण्ठ ) रावण, 9 सदायु ( जटायु ), 10 सुपन मच्छा ( शूर्पणखा ) 11मारित ( मारीच ),12इन्द्रचित ( इंद्रजीत )मेघनाद , 13 फ्र पाई( वायुदेव ), इत्यादि l थाई राम कियेन में हनुमान की पुत्री और विभीषण की पत्नी का नाम भी है, जो यहाँ के लोग नहीं जानते l रामकियेन इस लिंक में है=
http://www.seasite.niu.edu/thai/literature/ramakian/ramakian.htm

5-थाईलैंड में हिन्दू देवी देवता
थाईलैंड में बौद्ध बहुसंख्यक और हिन्दू अल्प संख्यक हैं l वहां कभी सम्प्रदायवादी दंगे नहीं हुए l इस से सिद्ध होता है दंगे और आतंकवाद केवल मुसलमान ही करते हैं l कुछ दिन ब्रह्मा के मंदिर में विस्फोट करने वाले मुस्लिम ही थे , थाई लैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते है , उनके नाम इस प्रकार हैं
1 . फ्र ईसुअन ( ईश्वन ) ईश्वर शिव , 2 फ्र नाराइ ( नारायण ) विष्णु , 3 फ्र फ्रॉम ( ब्रह्म ) ब्रह्मा,
4 . फ्र इन ( इंद्र ), 5 .फ्र आथित ( आदित्य ) सूर्य , 6 . फ्र पाय ( पवन ) वायु l

6-थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है , जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The brahminy kite ) कहा जाता है , इसका वैज्ञानिक नाम "Haliastur indus " है l फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ Mathurin Jacques Brisson ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डीचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था l इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है l इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है l चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं , और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है , और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं , इसलिए उन्होंने
" गरुड़ " को राष्ट्रीय चिन्ह ( ) घोषित किया है l यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना
हुआ है -
http://www.thaizer.com/wp-content/uploads/2013/10/garuda.jpg

7-सुवर्णभूमि हवाई अड्डा--+++
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य , क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पार हैं l जैसे हुमायूँ रोड , अकबर रोड , औरंगजेब रोड इत्यादि , इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे (AirPort) का नाम सुवर्ण भूमि है l यह आकार के मुताबिक दुनियां का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है l इसका क्षेत्रफल (563,000 square metres or 6,060,000 square feet) है . इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ है l पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग , मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थे l मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थे l और जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है l देखिये स्वर्ण भूमि=
http://www.tour-bangkok-legacies.com/images/suvarnabhumi-airport-display.jpg

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो l अपने धर्म की उपेक्षा करके और दुश्मनों की चाटुकारी करके सेकुलर बनने से तो मर जाना ही श्रेष्ठ है l और जिन लोगों को खुद के राम भक्त होने पर गर्व है वह विचार करें की थाईलैंड में भी आपके धर्म भाई हैं, जो आपके प्रेम के भूखे हैं l सोचिये उन को कैसा लगता होगा जब हमारे प्रधान मंत्री उनको छोड़ कर मुस्लिम देशों से सम्बन्ध बनाने को जाते हैं , और उनके पास थाईलैंड आने के लिए समय नहीं है l क्या हिंदुओं के भगवान राम हिन्दुओं द्वारा राम के वंशज की ऐसे उपेक्षा को क्षमा करेंगे ?
.. ...



वेदों की ओर लौटो!
ओ३म्!

http://www.tour-bangkok-legacies.com/images/suvarnabhumi-airport-display.jpg

सोमो॑ अ॒स्मभ्यं॑ द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे च प॒शवे॑ । अ॒न॒मी॒वा इष॑स्करत् ॥ ऋग्वेद 3.62.14somo asmabhyaṁ dvipade catuṣpade ca ...
08/03/2016

सोमो॑ अ॒स्मभ्यं॑ द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे च प॒शवे॑ । अ॒न॒मी॒वा इष॑स्करत् ॥ ऋग्वेद 3.62.14

somo asmabhyaṁ dvipade catuṣpade ca paśave | anamīvā iṣas karat ॥

पदार्थः हे मनुष्यो ! जो (सोमः) चन्द्रमा (द्विपदे) मनुष्य आदि (अस्मभ्यम्) हम लोगों के (चतुष्पदे) गौ आदि के (च) और (पशवे) अन्य पशु के लिये (अनमीवाः) रोग निवर्त्तक (इषः) अन्न आदि ओषधिसमूहों को (करत्) करै उसका सबकाल में सत्कार करो।

भावार्थः जो वैद्य लोग सब दो पैरवाले अर्थात् मनुष्य आदि और चौपाये गौ आदिकों को रोगरहित करैं वे सब लोगों को मान करने योग्य होवैं।

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी के बोधोत्सव को आर्य समाज, महर्षि दयानंदगंज, इंदौर में सहर्ष मानते हुए नगर के आर्यजन
06/03/2016

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी के बोधोत्सव को आर्य समाज, महर्षि दयानंदगंज, इंदौर में सहर्ष मानते हुए नगर के आर्यजन

06/02/2016

आखिर क्या थे ऋषि दयानन्द ???

मित्रों देव दयानन्द के सम्बन्ध में यूं तो सभी ने अपने-अपने विचार रखे हैं किसी ने प्रशंसा में तो किसी ने आलोचना में भी अपनी बात कही है |

परन्तु एक ऐसे भी हुए हैं जिनके विचार और श्रध्दा ऋषि के प्रति अपने अाप में अद्वितीय हैं और वो हैं अल्लामा चम्पतराय "सादिक" |

अरे भाई ! नहीं पहचाने; चलो मैं ही बता देता हुँ, ये विद्वान वो हैं जिन्होनें उस वक्त मोर्चा संभाला जब मुस्लिम न जाने श्री कृष्ण के पावन चरित्र पर क्या क्या आपत्तिजनक और अश्लील पुस्तके रच रहे थे तब इन्होनें जो प्रामाणिक पुस्तक "रंगीला रसूल" लिखी उसने मुस्लिमों को पूरी तरफ बौखला दिया ऐसे हमारे विद्वान; पश्चात् "पं० चमूपति एम• ए•" के नाम से जाने गये |

पं० जी ने ऋषि के सम्बन्ध में लिखते हैं कि...

"दयानन्द केवल भक्ति नहीं, केवल वीरता नहीं, बन्धुत्व नहीं, एकेश्वरवाद नहीं, सत्यनिष्ठा और विद्वत्ता नहीं | दयानन्द ये सब कुछ है | किसी को बुरा न लगे तो दयानन्द मानवता है |"

बहुत से जन अपने से पूर्वो की बात केवल इस्लिए ही मानते हैं क्योंकि वो उनके नबी हुए हैं, गुरू हुए हैं या मसीहा आदि परन्तु पं० जी देव दयानन्द के सम्बन्ध में लिखते हैं कि...

"दयानन्द का कथन है, इस लिए न मानो कि दयानन्द का वचन है | इस कारण मानो कि तुम्हारी बुध्दि का है | मलीन बुध्दि का नहीं | परिपक्व बुध्दि का है |"

पं० जी ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि "यात्रा का आनन्द ध्येय प्राप्ति में नहीं, यात्रा में ही है |" और इसी विचार को पढ़कर अमर क्रान्तिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने निम्न पंक्ति "लज़्ज़ते सहरा नवर्दी दूरीय मनज़िल में है |" को रचा |

आगे पं० जी के ही शब्दों में सुनते हैं कि दयानन्द क्या था और क्या नहीं था जिसे उनहोंने सुरो के माध्यम से बताया हैं...

दयानन्द परमात्मा न था, ये नीचा सुर था | दयानन्द परमात्मा का प्रतिनिधि था जैसे हम हैं, ये ऊंचा सुर था |

दयानन्द पूर्ण न था, ये नीचा सुर था | दयानन्द पूर्णता का प्रयास था ये ऊंचा सुर था |

दयानन्द ने ब्राह्मण को मनुष्य कहा, ये नीचा सुर था | दयानन्द ने शूद्र को ब्राह्मण बनाया, ये ऊंचा सुर था |

दयानन्द ने पुरूष को पुरूष कहा, ये नीचा सुर था | दयानन्द ने स्त्री को पुरूष की माता बताया, ये ऊंचा सुर था |

दयानन्द व्यक्ति हुआ, ये पतला सुर था | दयानन्द समाज बन गया, ये मोटा सुर था |

दयानन्द फल भोगने में स्वतन्त्र था, ये मध्दम सुर था | दयानन्द कर्म करने में स्वतन्त्र था, ये ऊंचा सुर था |

अन्त मैं मैं भी बस यही कहुगाँ कि...

दयानन्द मानवता है |
दयानन्द मानवता है |
दयानन्द मानवता है |

ओ३म्...!
जय आर्य ! जय आर्यावर्त !!

06/02/2016

डीडी न्यूज पर दिखाई गई महर्षि दयानंद पर रिपोर्ट

बतायें तुम्हें हम दयानन्द क्या थे ?ऋषि थे मुनि थे कोई देवता थे ।अँधेरे में ठोकर जो जन खा रहे थे ।वह उन गुमरहों के लिए रह...
04/11/2015

बतायें तुम्हें हम दयानन्द क्या थे ?

ऋषि थे मुनि थे कोई देवता थे ।
अँधेरे में ठोकर जो जन खा रहे थे ।
वह उन गुमरहों के लिए रहनुमां थे ।

जिन्हें हमने गलती से समझा था दुश्मन ।
वही राष्ट्र-नौका के नाविक महा थे ।

उन्हीं की थी हिम्मत बचाया अगर ना ।
निशां हिंदुओं के मिटे जा रहे थे ।

गरज कोई माने न माने 'मुसाफिर' ।
दयानन्द दर्दे वतन की दवा थे ।
बतायें तुम्हें हम दयानन्द क्या थे ।

हर्ष का विषय है की, आर्य समाज महर्षि दयानंदगंज, गंजी कंपाउंड, इंदौर में शनिवार, दिनांक १७ अक्टूबर २०१५ को सुश्री प्रियंक...
09/10/2015

हर्ष का विषय है की, आर्य समाज महर्षि दयानंदगंज, गंजी कंपाउंड, इंदौर में शनिवार, दिनांक १७ अक्टूबर २०१५ को सुश्री प्रियंका आर्य - आर्य कन्या गुरुकुल भुसावर, भरतपुर राजस्थान, का व्याख्यान "वैदिक संस्कृति रक्षा में महिलाओं का योगदान" विषय पर होगा।

अतः आप सभी सपरिवार, ईष्टमित्रों सहित पधारकर सत्संग और व्याख्यान का लाभ लेवें।

समय: सायं ७:०० से सायं ८:३० तक
स्थान: आर्य समाज, महर्षि दयानंदगंज, गंजी कंपाउंड, इंदौर

निवेदक:
श्री दिनेश जी गुप्ता, संयोजक तदर्थ समिति
आर्य समाज मंदिर, महर्षि दयानंदगंज, इंदौर
चलभाष: 99262 03956

सागरपार भारतीय क्रान्तिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिन महापुरुषों ने विदेश में रहकर क्रान्ति ...
04/10/2015

सागरपार भारतीय क्रान्तिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा

भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिन महापुरुषों ने विदेश में रहकर क्रान्ति की मशाल जलाये रखी, उनमें श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रणी है। चार अक्तूबर, 1857 को कच्छ (गुजरात) के मांडवी नगर में जन्मे श्यामजी पढ़ने में बहुत तेज थे।

इनके पिता श्रीकृष्ण वर्मा की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी; पर मुम्बई के सेठ मथुरादास ने इन्हें छात्रवृत्ति देकर विल्सन हाईस्कूल में भर्ती करा दिया। वहाँ वे नियमित अध्ययन के साथ पंडित विश्वनाथ शास्त्री की वेदशाला में संस्कृत का अध्ययन भी करने लगे।

मुम्बई में आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती आये, उनके विचारों से प्रभावित होकर श्यामजी ने संस्कृत भाषा एवं वैदिक विचारों के प्रचार का संकल्प लिया , महर्षि दयानन्द से ही प्रेरणा प्राप्त कर वह इंग्लैण्ड गये एवं वहां पर स्वतन्त्रता संग्राम के पावन यज्ञ को प्रज्वलित किया । वहाँ श्यामजी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के अध्यापक नियुक्त हुए; पर स्वतन्त्र रूप से उन्होंने वेदों का प्रचार भी जारी रखा।

कुछ समय बाद वे भारत लौट आये। उन्होंने मुम्बई में वकालत की तथा रतलाम, उदयपुर व जूनागढ़ राज्यों में काम किया। पुन: इंग्लैण्ड जाकर उन्होंने भारतीय छात्रों के लिए एक मकान खरीदकर उसका नाम इंडिया हाउस (भारत भवन) रखा। शीघ्र ही यह भवन क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन गया। उन्होंने राणा प्रताप और शिवाजी के नाम पर छात्रवृत्तियाँ प्रारम्भ कीं।

1857 के स्वातंत्र्य समर का अर्धशताब्दी उत्सव ‘भारत भवन’ में धूमधाम से मनाया गया। उन्होंने ‘इंडियन सोशियोलोजिस्ट’ नामक समाचार पत्र भी निकाला। उसके पहले अंक में उन्होंने लिखा – मनुष्य की स्वतन्त्रता सबसे बड़ी बात है, बाकी सब बाद में। उनके विचारों से प्रभावित होकर वीर सावरकर, सरदार सिंह राणा और मादाम भीकाजी कामा उनके साथ सक्रिय हो गये। लाला लाजपत राय, विपिनचन्द्र पाल आदि भी वहाँ आने लगे।

विजयादशमी पर्व पर ‘भारत भवन’ मंे वीर सावरकर और गांधी जी दोनों ही उपस्थित हुए। जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के अपराधी माइकेल ओ डायर का वध करने वाले ऊधमसिंह के प्रेरणास्रोत श्यामजी ही थे। अब वे शासन की निगाहों में आ गये, अतः वे पेरिस चले गये। वहाँ उन्होंने ‘तलवार’ नामक अखबार निकाला तथा छात्रों के लिए ‘धींगरा छात्रवृत्ति’ प्रारम्भ की।

भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए शस्त्रों का प्रबन्ध मुख्यतः वे ही करते थे। भारत में होने वाले बमकांडों के तार उनसे ही जुड़े थे। अतः पेरिस की पुलिस भी उनके पीछे पड़ गयी। उनके अनेक साथी पकड़े गये। उन पर भी ब्रिटेन में राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाने लगा। अतः वे जेनेवा चले गये। 30 मार्च, 1930 को श्यामजी ने और 22 अगस्त, 1933 को उनकी धर्मपत्नी भानुमति ने मातृभूमि से बहुत दूर जेनेवा में ही अन्तिम साँस ली।

श्यामजी की इच्छा थी कि स्वतन्त्र होने के बाद ही उनकी अस्थियाँ भारत में लायी जायें। उनकी यह इच्छा 73 वर्ष तक अपूर्ण रही। अगस्त, 2003 में गुजरात के तत्कालीनमुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी उनके अस्थिकलश लेकर भारत आये थे।

आज श्यामजी कृष्ण वर्मा के जन्म दिन पर उनको शत-शत नमन।

03/10/2015

संख्या दर्शन पर आचार्य श्री प्रभामित्र जी की व्याख्यान माला गत ५ सप्ताह से अविरल चली आ रही है। इस में सुनने वालो और ज्ञान लेने वालो को संख्या भी सप्ताह दर सप्ताह बढ़ती जा रही है। और हर्ष की बात ये है की आचार्य जी के प्रवचन का समय भी धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है। सभी लोग मंत्रमुग्ध हो कर आचार्य जी के प्रवचनों का लाभ लेते है और निर्धारित समय से भी अधिक समय बैठते हैं।

आने वाले समय में, हम इसी प्रकार की प्रवचन माला आयोजित करते रहेंगे जिसमे कर्म फल, वैदिक जीवन सूत्र, परिवार विषयक आदि अनेक विषयों पर प्रवचन एवं चर्चा आयोजित किये जायेंगे।

आप सभी के सुझाव आमंत्रित हैं।

03/10/2015

हिन्दुओं के विवेकानंद व आर्य समाज के विवेकानंद में जमीन आसमान का अन्तर--

वेदों उपनिषदों दर्शनों के विद्वान एवं महर्षि दयानंद के अनुयायी स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी आजकल सम्पूर्ण भारत में भ्रमण करते हुये स्कूल कालिजों में योग, वेद एवं महर्षि दयानंद की मान्यताओं के प्रचार प्रसार में कई वर्षों से अनवरत जुटे हुये हैं | स्वामी जी गत कई वर्षों से अहमदाबाद में दर्शन योग महाविद्यालय का संचालन भी कर रहे हैं …जहां से अनेक नवयुवक दर्शनाचार्य की उपाधि प्राप्त कर देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हैं |
स्वामी जी शुद्ध शाकाहारी व पशुबलि पाषाण पूजा मूर्तिपूजा आदि वेदविरुद्ध बातों को घोर विरोधी हैं | ईश्वर जीव प्रकृति -ये तीन पदार्थ अनादि हैं,तीनों का साध्य साधक व साधन का सम्बन्ध है - इस त्रैतवाद के वैदिक सिद्धान्त के स्वामी जी पक्षधर हैं | प्रत्येक मंगलवार को रात्रि ९.३० से १० बजे तक उनका शंका समाधान कार्यक्रम भी होता है |

हिन्दुओं के आदर्श व प्रिय स्वामी विवेकानंद में उक्त गुणों में से एक भी गुण न था | रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित साहित्य से पता चलता है कि यह विवेकानंद जी मांस खाते थे, काली मां को प्रसन्न करने के लिये बकरों की बलि देते थे,भारत के नवयुवकों व साधु सन्तों को भी मांस खाने को प्रेरित करते थे और मूर्ति पूजा करते थे | जीव व ब्रह्म एक हैं- उनकी इस प्रकार की अद्वैतवाद की मान्यता भी कोरी कल्पना व वेदविरुद्ध है |

भारत के नौजवानों व नेताओं ने यदि महर्षि दयानंद को अपना आदर्ष माना होता तो आज देश की दशा व दिशा कुछ और ही होती और धर्म के नाम पर इतना अन्धविश्वास व पाखंड न होता |

--डा मुमुक्षु आर्य

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