14/02/2025
#आध्यात्मिक_ज्ञान_गंगाPart-6 के आगे पढिए.....)
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#आध्यात्मिक_ज्ञान_गंगाPart-7
(क) श्री मद्भगवत् गीता के अध्याय 7 का सारांश
"इस ज्ञान को जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं" अध्याय 7 के श्लोक 1 से 5 में कहा है कि अर्जुन जो कोई मेरे (ब्रह्म) में पूर्णरूप से आसक्त होकर लगा हुआ है और जिस ज्ञान से मेरा परमभक्त पूर्ण ज्ञान युक्त हो जाएगा। इस ज्ञान से उसे पता लग जाएगा कि कौन कितने पानी में है। श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी, ब्रह्म, परब्रह्म तथा पूर्णब्रह्म तक की स्थिति से परिचित हो जाएगा तथा पूर्ण सन्त की खोज करके तत् ब्रह्ना (पूर्ण परमात्मा) की भक्ति की चेष्टा करेगा। इस ज्ञान को समझने के उपरान्त फिर जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहेगा। वह ज्ञान अब कहूँगा। हजारों साधको में कोई एक प्रभु प्राप्ति करने का यत्न करता है जो मेरे से पूर्ण परिचित है कि मैं वास्तव में काल हूँ। फिर वह साधक जन्म-मत्यु से छूटने की भरसक कोशिश करता है। (गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री देवी भागवत महापुराण जिसके सम्पादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, चिमन लाल गोस्वामी, के पष्ठ 123 पर भी यह प्रमाण है। लिखा है कि भगवान शिव ने दुर्गा (प्रकति देवी) की महिमा करते हुए कहा, शिवे! सम्पूर्ण संसार की सष्टि करने में तुम बड़ी चतुर हो, मात! पथ्वी, जल, पवन, आकाश, अग्नि, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, बुद्धि, मन और अहंकार ये सब तुम्हीं हो। इस संसार की सष्टि, स्थिति और संहार करने में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं। उन्हीं तीनों गुणों से उत्पन्न हम (ब्रह्मा, विष्णु, शंकर) नियमानुसार कार्य करने में तत्पर रहते हैं। गीता अध्याय 7 श्लोक 4 से 6 में स्पष्ट किया है कि मेरी आठ प्रकार की माया जो आठ भाग में विभाजित है पाँच तत्व तथा तीन (मन, बुद्धि, अहंकार) ये आठ भाग हैं। यह तो जड़ प्रकति है। सर्व प्राणियों को उत्पन्न करने में सहयोगी हैं, जैसे मन के कारण प्राणी नाना इच्छाएँ करता है। इच्छा ही जन्म का कारण है। पाँच तत्वों से स्थूल शरीर बनता है तथा मन, बुद्धि, अहंकार के सहयोग से सूक्ष्म शरीर बना है तथा इससे दूसरी चेतन प्रकति (दुर्गा) है। यही दुर्गा (प्रकति) ही अन्य तीन रूप (महालक्ष्मी महासावित्री महागौरी) बनाकर काल ब्रह्म के सहयोग से तीनों पुत्रों रजगुण युक्त श्री ब्रह्मा जी, सतगुण युक्त श्री विष्णु जी, तमगुण युक्त श्री शिव जी को उत्पन्न करती है। फिर भूल भूलईयाँ (जाल साजी) करके तीन अन्य स्त्री रूप बनाकर तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी, श्री शिव जी) से विवाह करके काल के जीव उत्पन्न करती है। जो चेतन प्रकति (शेरॉवाली) है। इसके सहयोग से काल सर्व प्राणियों की उत्पत्ति करता है, (प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में।) इस अध्याय 7 श्लोक 6-7 में गीता ज्ञान दाता काल ब्रह्म कह रहा है कि मैं सारे संसार के जीवों के प्रलय तथा उत्पत्ति का कारण हूँ। (क्योंकि काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणी प्रतिदिन खाने पड़ते हैं)। सातवें श्लोक में कहा है कि सर्व संसार मेरे (ब्रह्म) में जकड़ा है। कबीर साहेब जी महाराज कहते हैं कि सुर नर मुनिजन तेतिस करोड़ी। बंधे सब ज्योति निरंजनडोरी ।।
"बल तथा बुद्धि काल के वश"
गीता अध्याय 7 श्लोक 8 से 11 तक ब्रह्म कहता है कि मैं जल का गुण रस हूँ, प्रकाश हूँ तथा वेदों में (प्रणव) औंकार (ॐ) हूँ और सर्व तत्व का गुण भी मैं ही हूँ। मनुष्यों में श्रेष्ठ हूँ तथा मुझे ही सर्व प्राणियों (स्थूल शरीर व सूक्ष्म शरीर में जीव) का कारण जान। तेजस्वियों का तेज भी मेरे से ही है। बुद्धिमानों की बुद्धि (जब चाहे बुद्धि प्रदान कर देता हूँ जब चाहे बुद्धि भ्रष्ट कर देता हूँ), तपस्वियों का तप भी मैं (काल) ही हूँ। (चूंकि तपस्वियों को राज देता है वहाँ भी आनन्द मन (काल) ही लेता है।) मैं (काल) ही शक्तिशालियों का बल हूँ तथा सब प्राणियों में व्यवस्थित काम (सैक्स) हूँ। (जैसे पहले अर्जुन को बल दे कर योद्धा बना दिया। युद्ध जीता, अर्जुन ने बड़े 2 योद्धा मार डाले फिर बल वापिस ले लिया। जब भगवान श्री कष्ण जी का वध एक शिकारी ने कर दिया तो अर्जुन गोपियों (कष्ण जी की 16000 (सोलह हजार) अवैध स्त्रियों) को लाने द्वारिका गया तो रास्ते में भीलों ने अर्जुन को पीटा तथा गोपियों को लूट ले गए तथा कुछ गोपियों को साथ भी ले गए। उस समय काल ब्रह्म ने अर्जुन को बल रहित कर दिया जिसके कारण अर्जुन से गांडिय धनुष भी नहीं चला और काम वासना (सैक्स) का भी मन ही आनन्द लेता है।)
दूसरा उदाहरण :- बल तथा बुद्धि काल के वश जिस समय लंका पति रावण ने सीता जी का अपहरण कर लिया था। उस समय सीता जी को खोज में श्री राम वन-2 भटक रहे थे। उन्हें पता नहीं था कि उनकी पत्नी सीता जी को कौन उठा ले गया है? कहां है? क्योंकि काल ब्रह्म ने उसकी बुद्धि को बंद कर रखा था। उसी समय पार्वती जी (पत्नी शिव जी) सीता जी का रूप धारण करके श्री रामचन्द्र जी की परीक्षा लेने आई तो श्री राम ने पहचान लिया की आप पार्वती हैं। उस समय काल ब्रह्म अर्थात् गीता ज्ञान दाता ने श्री रामचन्द्र (श्री विष्णु) की बुद्धि खोल दी। इसीलिए यहां श्लोक 10,11 में कहा है कि बलवानों का बल तथा बुद्धिमानों की बुद्धि मेरे हाथ में है।
"तीनों गुणों के पुजारी दुष्कर्मी, राक्षसवती के, मनुष्यों में नीच, मूर्ख हैं"
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