19/03/2026
इंदौर के बुज़ुर्ग हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार रहमतुल्लाह अलैह का हैरतअंगेज़ वाक़िया — दरख़्त से रुपयों की बारिश*
✍🏻 जावेद शाह खजराना(लेखक)
इंदौर के इलाक़ा तुकोगंज में, हाईकोर्ट के रू-ब-रू एक ऐसी मुक़द्दस सरज़मीं मौजूद है ,जहाँ रूहानियत की खुशबू हर सू महकती है। यहाँ एक नूरानी दरगाह, उससे मुत्तसिल एक तारीखी मस्जिद और एक क़दीम क़ब्रिस्तान आज भी अहल-ए-दिल को अपनी जानिब खींचते हैं। 😇
यह दरगाह हज़रत नियाज़ अली शाह रहमतुल्लाह अलैह की है, जिनकी पैदाइश उन्नीसवीं सदी के आग़ाज़ में सूबा उत्तर प्रदेश के ज़िला रायबरेली के कस्बा ऊँचे गाँव में हुई। आपका ताल्लुक़ एक सैय्यदी दीनी घराने से था, जिसकी बरकत से बचपन ही से आपका मिज़ाज ज़ुह्द-ओ-तक़्वा और परहेज़गारी की तरफ़ माइल रहा।
जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही आपको तलाश-ए-हक़ की लगन ने बेकरार कर दिया, और आप अपने पीर-ओ-मुर्शिद की जस्तजू में नसीराबाद जा पहुँचे। वहाँ आपने हज़रत अबुल नसीराबादी रहमतुल्लाह अलैह की सोहबत इख़्तियार की और पूरे पंद्रह बरस तक अदब-ओ-इख़्लास के साथ उनकी ख़िदमत में गुज़ारे।आख़िरकार, आपको इंदौर की सरज़मीं की तरफ़ रुख़ करने का इशारा मिला। 🥰
(तज़किरा-ए-हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार, सफ़्हा 15-16)
हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार, जिन्हें मुहब्बत से “दादा पीर” कहा जाता था, जब इंदौर की तरफ़ रवाना हुए तो रास्ते में आपकी मुलाक़ात एक मज़्ज़ूब सिफ़त बुज़ुर्ग से हुई—जिनकी शख़्सियत में जज़्ब का रंग ग़ालिब था और जिनकी लंबी-लंबी मूँछें देखने वालों को हैरत में डाल देती थीं।
दादा पीर के दिल में एक लम्हे के लिए यह ख़याल गुज़रा कि इतने बड़े बुज़ुर्ग होकर भी इनकी मूँछें शरीअत के मुताबिक़ तराशी हुई नहीं हैं।
बस, यही ख़याल दिल में आना था कि वह बुज़ुर्ग मुस्कुराए और फ़रमाने लगे:
“साहिबज़ादे! हम भी मूँछें तराशना चाहते हैं, मगर पास में पैसे नहीं हैं…”
जैसे ही ये अल्फ़ाज़ उनकी ज़ुबान से अदा हुए, उसी दरख़्त के साये में—जहाँ दोनों बैठे थे—एक अजीब मंजर ज़ाहिर हुआ। दरख़्त से रुपयों की बारिश होने लगी! 💫
उस बुज़ुर्ग ने आसमान की तरफ़ नज़र उठाकर अर्ज़ किया:
“तोहरे कारण अब हम बोलत भी नाहीं…”
*यानि: ऐ मेरे मालिक! अब तो मैं कुछ कहूँ भी नहीं कि तू हर बात पूरी कर देता है।
यह मंजर देखकर दादा पीर गहरे तौर पर मुतास्सिर हुए और दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि कुछ रोज़ इन बुज़ुर्ग की सोहबत में रहकर रूहानी फ़ैज़ हासिल किया जाए।
मगर उस मज़्ज़ूब सिफ़त बुज़ुर्ग ने फ़रमाया:
आपको तो आपके पीर-ओ-मुर्शिद पहले ही मुकम्मल कमाल अता कर चुके हैं। हमारे पास आपको देने को कुछ नहीं। लिहाज़ा अपने मुर्शिद के हुक्म के मुताबिक़ इंदौर की तरफ़ सफ़र जारी रखिए।”
इसके बाद दादा पीर इंदौर तशरीफ़ लाए—उस वक़्त इंदौर, होलकर सल्तनत की राजधानी था और यहाँ तुकोजीराव द्वितीय की हुकूमत क़ायम थी।
इंदौर में शुरुआती क़याम आपने रानीपुरा की पक्की मस्जिद में फ़रमाया, फिर कुछ अरसा निहालपुरा क़ब्रिस्तान में गुज़ारा, और आख़िरकार तुकोगंज को अपना मुक़ीम बनाया—जहाँ आज आपकी रूहानी मज़ार मरकज़-ए-अक़ीदत बनी हुई है।
23 ज़ीक़ादतुल हराम 1310 हिजरी, बरोज़ जुमे के दिन आपने इस फ़ानी दुनिया से पर्दा फ़रमाया। 🌹
आज आपकी औलाद पाकिस्तान में मुक़ीम है, मगर इंदौर और उसके इर्द-गिर्द आपके मुरीदीन और चाहने वालों की तादाद काफ़ी ज़्यादा है। आपकी ज़ात से बेशुमार करामातें ज़ाहिर हुईं—जिनका तफ़सीली ज़िक्र इंशा अल्लाह आइंदा किश्त में पेश किया जाएगा। 🌺✨⸻
9340949476🤳