Sayyad Nahar Shah Vali Dargah Khajrana indore

Sayyad Nahar Shah Vali Dargah Khajrana indore Khajrana is a muslim population aria Of Indore City ____The Dargah of Hazrat Nahar Shah Wali Rah. verified

located in Khajrana is a very famous religious place.... javed Shah Khajrana

इंदौर के बुज़ुर्ग हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार रहमतुल्लाह अलैह का हैरतअंगेज़ वाक़िया — दरख़्त से रुपयों की बारिश*✍🏻 जावेद...
19/03/2026

इंदौर के बुज़ुर्ग हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार रहमतुल्लाह अलैह का हैरतअंगेज़ वाक़िया — दरख़्त से रुपयों की बारिश*
✍🏻 जावेद शाह खजराना(लेखक)

इंदौर के इलाक़ा तुकोगंज में, हाईकोर्ट के रू-ब-रू एक ऐसी मुक़द्दस सरज़मीं मौजूद है ,जहाँ रूहानियत की खुशबू हर सू महकती है। यहाँ एक नूरानी दरगाह, उससे मुत्तसिल एक तारीखी मस्जिद और एक क़दीम क़ब्रिस्तान आज भी अहल-ए-दिल को अपनी जानिब खींचते हैं। 😇

यह दरगाह हज़रत नियाज़ अली शाह रहमतुल्लाह अलैह की है, जिनकी पैदाइश उन्नीसवीं सदी के आग़ाज़ में सूबा उत्तर प्रदेश के ज़िला रायबरेली के कस्बा ऊँचे गाँव में हुई। आपका ताल्लुक़ एक सैय्यदी दीनी घराने से था, जिसकी बरकत से बचपन ही से आपका मिज़ाज ज़ुह्द-ओ-तक़्वा और परहेज़गारी की तरफ़ माइल रहा।

जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही आपको तलाश-ए-हक़ की लगन ने बेकरार कर दिया, और आप अपने पीर-ओ-मुर्शिद की जस्तजू में नसीराबाद जा पहुँचे। वहाँ आपने हज़रत अबुल नसीराबादी रहमतुल्लाह अलैह की सोहबत इख़्तियार की और पूरे पंद्रह बरस तक अदब-ओ-इख़्लास के साथ उनकी ख़िदमत में गुज़ारे।आख़िरकार, आपको इंदौर की सरज़मीं की तरफ़ रुख़ करने का इशारा मिला। 🥰
(तज़किरा-ए-हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार, सफ़्हा 15-16)

हज़रत सैयद नियाज़ अली सरकार, जिन्हें मुहब्बत से “दादा पीर” कहा जाता था, जब इंदौर की तरफ़ रवाना हुए तो रास्ते में आपकी मुलाक़ात एक मज़्ज़ूब सिफ़त बुज़ुर्ग से हुई—जिनकी शख़्सियत में जज़्ब का रंग ग़ालिब था और जिनकी लंबी-लंबी मूँछें देखने वालों को हैरत में डाल देती थीं।

दादा पीर के दिल में एक लम्हे के लिए यह ख़याल गुज़रा कि इतने बड़े बुज़ुर्ग होकर भी इनकी मूँछें शरीअत के मुताबिक़ तराशी हुई नहीं हैं।
बस, यही ख़याल दिल में आना था कि वह बुज़ुर्ग मुस्कुराए और फ़रमाने लगे:

“साहिबज़ादे! हम भी मूँछें तराशना चाहते हैं, मगर पास में पैसे नहीं हैं…”

जैसे ही ये अल्फ़ाज़ उनकी ज़ुबान से अदा हुए, उसी दरख़्त के साये में—जहाँ दोनों बैठे थे—एक अजीब मंजर ज़ाहिर हुआ। दरख़्त से रुपयों की बारिश होने लगी! 💫

उस बुज़ुर्ग ने आसमान की तरफ़ नज़र उठाकर अर्ज़ किया:
“तोहरे कारण अब हम बोलत भी नाहीं…”
*यानि: ऐ मेरे मालिक! अब तो मैं कुछ कहूँ भी नहीं कि तू हर बात पूरी कर देता है।

यह मंजर देखकर दादा पीर गहरे तौर पर मुतास्सिर हुए और दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि कुछ रोज़ इन बुज़ुर्ग की सोहबत में रहकर रूहानी फ़ैज़ हासिल किया जाए।

मगर उस मज़्ज़ूब सिफ़त बुज़ुर्ग ने फ़रमाया:
आपको तो आपके पीर-ओ-मुर्शिद पहले ही मुकम्मल कमाल अता कर चुके हैं। हमारे पास आपको देने को कुछ नहीं। लिहाज़ा अपने मुर्शिद के हुक्म के मुताबिक़ इंदौर की तरफ़ सफ़र जारी रखिए।”

इसके बाद दादा पीर इंदौर तशरीफ़ लाए—उस वक़्त इंदौर, होलकर सल्तनत की राजधानी था और यहाँ तुकोजीराव द्वितीय की हुकूमत क़ायम थी।

इंदौर में शुरुआती क़याम आपने रानीपुरा की पक्की मस्जिद में फ़रमाया, फिर कुछ अरसा निहालपुरा क़ब्रिस्तान में गुज़ारा, और आख़िरकार तुकोगंज को अपना मुक़ीम बनाया—जहाँ आज आपकी रूहानी मज़ार मरकज़-ए-अक़ीदत बनी हुई है।

23 ज़ीक़ादतुल हराम 1310 हिजरी, बरोज़ जुमे के दिन आपने इस फ़ानी दुनिया से पर्दा फ़रमाया। 🌹

आज आपकी औलाद पाकिस्तान में मुक़ीम है, मगर इंदौर और उसके इर्द-गिर्द आपके मुरीदीन और चाहने वालों की तादाद काफ़ी ज़्यादा है। आपकी ज़ात से बेशुमार करामातें ज़ाहिर हुईं—जिनका तफ़सीली ज़िक्र इंशा अल्लाह आइंदा किश्त में पेश किया जाएगा। 🌺✨⸻

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हज़रत अब्दुल करीम शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह❇️~जुलवानिया की सरज़मीं पर उतरी एक रूहानी बरकत😇✍️ जावेद शाह खजराना(लेखक)रियासत...
02/03/2026

हज़रत अब्दुल करीम शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह❇️
~जुलवानिया की सरज़मीं पर उतरी एक रूहानी बरकत😇
✍️ जावेद शाह खजराना(लेखक)

रियासत के दौर में पंजाब की सरज़मीं से एक फक़ीर-ए-बेक़रार हिजरत करके निमाड़ की ख़ामोश वादियों में आ बसा। यह दरवेश थे हज़रत अब्दुल करीम शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह। आपके वालिद का नाम लाल मोहम्मद था। जवानी ही में आपने दुनिया की रंगीनियों से किनारा कर लिया और फक़ीरी को अपना मुक़द्दर बना लिया। लोग आपको “मस्त मलंग” कहते थे, मगर असल में आप अल्लाह के सच्चे दोस्त थे।🌺

जुलवानिया (ज़िला बड़वानी) की सरज़मीं ने आपको अपने दामन में जगह दी। पुराने बम्बई–आगरा रोड पर मेन रास्ते के क़रीब आपकी दरगाह शरीफ़ आज भी रूहानी सुकून का मरकज़ है। अकीदतमंदों की मोहब्बत ने इस इलाके को “करीम नगर” के नाम से भी मशहूर कर दिया।❇️

🌸 मेरा रिश्ता-ए-मोहब्बत😇
हज़रत करीम शाह बाबा मेरे क़रीबी रिश्तेदार थे। आपने शादी नहीं की, मगर अपने भाई अज़ीज़ साहब की बेटियों और नवासियों से बेपनाह मोहब्बत की। आपकी भाई की नवासियाँ आज भी खजराना (इंदौर) में आबाद हैं।🌺

मरहूम नसीम शाह (ज़ाकिर शाह) साहिबा, जो मेरी भाभी थीं, उन्हीं नवासियों में से थीं। बाबा ने अपनी सारी जायदाद और खेती-बाड़ी अपनी नवासियों के नाम कर दी। यह आपकी रहमत और करमदिली की खुली मिसाल है।❤️

🕊️ मस्ताना अंदाज़, ज़िक्र-ए-इलाही❤️🌺
आपका ज़्यादातर वक़्त ज़िक्र-ए-इलाही में गुज़रता। कभी जुलवानिया की गलियों में मस्त चाल से घूमते, कभी राह चलते लोगों को दुआओं से नवाज़ते।

बम्बई–आगरा रोड से गुज़रने वाले ट्रक ड्राइवरों से आपका ख़ास लगाव था। उनके साथ चाय और पान साझा करते, खुश होते तो दुआ देते, और नाराज़ होते तो डांट भी लगा देते — मगर हर लफ़्ज़ में मुहब्बत छुपी होती।मेरे वालिद ने आपको देखा था और आपकी खूब तारीफ़ करते थे ।

आज भी आपकी दरगाह पर रोज़ चाय और पान पेश किया जाता है, क्योंकि यह आपकी पसंदीदा चीज़ थी।🤲

🌊 करामात-ए-डेब नदी
जुलवानिया के क़रीब बहने वाली डेब नदी आपकी एक मशहूर करामात की गवाह है।👇
जब आप पर रूहानी कैफ़ियत तारी होती, तो अपना मुबारक पैर नदी में डाल देते। लोग हैरत से देखते कि मछलियाँ आकर आपके पैरों का गोश्त खाती रहतीं। मगर जब आप पैर बाहर निकालते, तो वह बिल्कुल सही-सलामत होता, बस गहरे निशान दिखाई देते।

यह मंज़र उस दौर में कई लोगों ने देखा। यही वजह है कि आज भी डेब नदी का ज़िक्र आते ही लोगों की आँखों में अकीदत चमक उठती है।🤲

🌟 छड़ी की रहमत
कहा जाता है कि जो भी मुराद लेकर आता, बाबा अपनी छड़ी से हल्का सा इशारा करते या मारते। लोगों का यक़ीन है कि इससे उनकी मुराद पूरी हो जाती।❇️

वली वो होते हैं जो अल्लाह के क़रीब होते हैं। जब वह दुआ करते हैं, तो दर-ए-रहमत खुल जाते हैं।❤️

🌹 यादें जो ज़िंदा हैं
करीब 50 साल गुज़र जाने के बावजूद, हज़रत अब्दुल करीम शाह बाबा रह० का नाम आज भी जुलवानिया की हवा में गूंजता है। आपकी दरगाह पर लोग हाज़िरी देते हैं, चाय-पान पेश करते हैं और अपने दिलों का बोझ हल्का करते हैं।🌹

अल्लाह तआला अपने इस मस्त मलंग वली के सदके हमें सच्ची मोहब्बत, सादगी और यक़ीन अता फरमाए।🤲🤲
आमीन। 🌿🤲

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इस्मे आज़म की ताक़त ✅(जिसे पढ़ते ही हजारों मील दूर रखा तख़्त सामने हाज़िर हो गया )👌✍🏻 जावेद शाह खजराना (लेखक)दोस्तों दुन...
01/03/2026

इस्मे आज़म की ताक़त ✅
(जिसे पढ़ते ही हजारों मील दूर रखा तख़्त सामने हाज़िर हो गया )👌
✍🏻 जावेद शाह खजराना (लेखक)

दोस्तों दुनिया में कुछ इल्म ऐसे होते है जो अल्लाह अपने ख़ास बंदों को अता करता है ।✍🏻

क़ुरान शरीफ में ऐसे कुछ ख़ास बंदों का अल्लाह ने इशारों में जिक्र किया है ।

क़ुरान शरीफ की सुरह अल क़हफ़ की आयात 60 से 82 में जिक्र है 👇
एक मर्तबा हज़रत मूसा से एक शख़्स ने पूछा इस दुनिया में क्या आपसे भी ज़्यादा इल्म रखने वाला कोई है ?
तब हज़रत मूसा ने फरमाया …नहीं
इस जवाब पर अल्लाह ने हज़रत मूसा को बताया कि …ए मूसा इस दुनिया में आपसे भी ज़्यादा इल्म रखने वाला एक शख़्स है ,जिसे हमने इल्मे लदून्नी से नवाज़ा है ।
हज़रत मूसा ने गुजारिश कि अल्लाह मैं उस शख़्स से मिलकर इल्म सिखाना चाहता हूँ ।तब अल्लाह ने हज़रत मूसा की मुलाक़ात हज़रत ख़िज़र से उस मुकाम पर कराई जहाँ दो समुंदर आकर मिलते है।

दूसरा क़िस्सा 👇
क़ुरान की सूरह अन-नम्ल (27:39–40) में मलिका-ए-सबा के तख़्त का वाक़िआ बयान होता है।

हज़रत सुलेमान ने मलिका सबा को अल्लाह की क़ुदरत दिखाने के लिए सोचा क्यों ना उसी का तख़्त बैतूल मुक़द्दस में हाज़िर करके मलिका को ताज्जुब में डाला जाए लिहाज़ा
आपने दरबारियों से पूछा …
मलिका बिल्किस का तख़्त कौन जल्दी हाज़िर कर सकता है ?
(बैतूल मुक़द्दस से सबा शहर करीब 1500 किलोमीटर दूर था ।)

हजरत सुलेमान की दरख्वास्त सुनकर पहले एक ताक़तवर जिन्न ने अर्ज़ किया कि वह तख़्त को थोड़ी देर में ला सकता है। यानि आपका दरबार ख़त्म होने से पहले ।

मगर फिर क़ुरआन फरमाता है👇
“जिस शख़्स के पास किताब का इल्म था, उसने कहा: मैं उसे आपकी नज़र झपकने से पहले ले आऊँगा।”
क़ुरान (27:40)

मुफ़स्सिरीन की मशहूर राय के मुताबिक वह शख़्स आसिफ़ बिन बरख़िया थे — जो हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के क़रीबी वज़ीर और “इस्म-ए-आज़म” के इल्म वाले माने जाते हैं।

अल्लाह के नाम की बरकत से उन्होंने पलक झपकते ही तख़्त हाज़िर कर दिया।🌹
सुबहान अल्लाह

दोस्तों ये ताक़त की इल्म की जो अल्लाह के नाम में था यानी अल्लाह का वो पाक नाम जिसका इल्म सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल ,नबियों और वलियों को है ।

और जब तख़्त सामने मौजूद हुआ, तो सुलेमान अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

“هٰذَا مِنْ فَضْلِ رَبِّي لِيَبْلُوَنِي أَأَشْكُرُ أَمْ أَكْفُرُ”
“यह मेरे रब का फ़ज़्ल है, ताकि वह मुझे आज़माए कि मैं शुक्र करता हूँ या नाशुक्री।”

हमारे नबी ने भी फरमाया इल्म हासिल करने के लिए अगर चीन भी जाना पड़े तो जाओ ।

सबक क्या है?
इल्म हो या ताक़त — सब अल्लाह की अता है।
करामात का असल मक़सद रब की कुदरत दिखाना है, न कि इंसान की बड़ाई।
असली कामयाबी “शुक्र” में है, न कि “घमंड” में।

🤲 या अल्लाह! हमें भी ऐसा इल्म और ऐसा दिल अता कर, जो हर नेमत पर कहे —
हाज़ा मिन फ़ज़्ले रब्बी।

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दिल्ली के पच्चीस ख़्वाजा 🌹 (पार्ट ~1)दिल्ली के पहले ख़्वाजाहजरत कुतबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह🤲✍🏻 जावेद शाह खज...
25/02/2026

दिल्ली के पच्चीस ख़्वाजा 🌹 (पार्ट ~1)
दिल्ली के पहले ख़्वाजा
हजरत कुतबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह🤲
✍🏻 जावेद शाह खजराना (लेखक)

दारुल हुकूमत दिल्ली सिर्फ़ बादशाहों का हुक़ूमती शहर नहीं, बल्कि वलियों का भी मुक़द्दस मक़ाम रही है। जब से हिन्द में इस्लाम आया, तब से दिल्ली बुज़ुर्गों के क़दमों से बा-बरकत होती चली आई। इसकी आग़ोश में जहां बेशुमार सलातीन आराम फ़रमा रहे हैं, वहीं सैकड़ों औलिया-ए-किराम भी इस सरज़मीं को नूरानी बनाए हुए हैं।

मैं सिलसिलेवार “दिल्ली के 25 ख़्वाजा” का ज़िक्र करूँगा, और इस मुबारक सिलसिले की शुरुआत होती है दिल्ली के पहले ख़्वाजा — हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रह. से।

📅 14 रबी-उल-अव्वल — आपका उर्स मुबारक।

🌿 ख़िलाफ़त और दिल्ली आमद
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रह. (ख़्वाजा ग़रीब नवाज़) ने अजमेर में दीन-ए-इस्लाम की तबलीग़ फ़रमाई और अपने जांनशीन ख़लीफ़ा हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी को दिल्ली रवाना किया।
ख़िलाफ़त अता करते वक़्त अपने पीरो-मुर्शिद ख्वाजा उस्मान हारूनी का असा (लाठी), ख़िरका, क़ुरआन शरीीफ़ और मुसल्ला भी अता फ़रमाया।

क़ुतुब साहब दिल्ली तशरीफ़ लाए, पहले किलोकड़ी में क़याम किया, फिर सुल्तान के इसरार पर महरौली में रहने लगे।

👑 सुल्तान अल्तमश की अक़ीदत
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश आपसे बेइंतहा मोहब्बत और अक़ीदत रखते थे। उन्होंने “शैखुल इस्लाम” का ओहदा पेश किया, मगर आपने इंकार फ़रमा दिया। आप परहेज़गार, तक़वा-परस्त और दुनिया से बेनियाज़ थे।

मशहूर है कि कुतुब मीनार का नाम भी आपकी निस्बत से मशहूर हुआ। इसकी तामीर को मुकम्मल करने का श्रेय भी सुल्तान इल्तुतमिश को जाता है।

🍞 “काकी” कहलाने की वजह
आपका असल नाम “क़ुतुबुद्दीन” था, लेकिन ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ आपको “बख़्तियार” कहकर पुकारते थे।

“काकी” लफ़्ज़ के पीछे बड़ी दिलचस्प दास्तान है। बयान किया जाता है (जिसे दारा शिकोह ने भी नक़्ल किया) कि आप किसी से तोहफ़ा क़ुबूल नहीं करते थे। घर के हालात सादगी भरे थे। एक पड़ोसी बक़ाल से कभी-कभार क़र्ज़ लेना पड़ता।

जब एक दिन पड़ोसन ने ताना दिया तो आपने अपनी बीवी से फ़रमाया कि अब किसी से क़र्ज़ न लिया जाए। आपने इशारा किया कि ज़रूरत के वक़्त दीवार की ताक़ में हाथ डालकर “काक” (रोटियाँ) निकाल लिया करो।
घर वाले और मेहमान सब वही काक खाते।
इसी करामत की वजह से लोग आपको “काकी” (रोटी देने वाले) कहने लगे।


🌟 नूर का मुक़ाम
आप 1214 ई. में दिल्ली तशरीफ़ लाए और 1235 ई. तक यहीं रहे। आपकी मजार-ए-मुबारक महरौली में नूर का मुक़ाम मानी जाती है।

रिवायत में आता है कि सुलेमान अलैहिस्सलाम का तख़्त जब इस मुक़ाम से गुज़रा तो आसमान से ज़मीन तक नूर बरसता देखा। फ़रिश्तों ने बताया कि यह सरज़मीं अल्लाह के महबूब बंदे, ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी का मदफ़न होगी।
(हवाला: रोज़तुल अक़ताब, दिल्ली के बाईस ख़्वाजा)

सुभान अल्लाह 🌹

अल्लाह तआला हमें उस नूरानी दरगाह की ज़ियारत नसीब फ़रमाए, जहाँ दिलों को सुकून और रूह को राहत मिलती है।



🌹

🕌 जामा मस्जिद का नक़्शा ज़ाहिर करने वाले वली-ए-कामिल हज़रत शेख़ ख़्वाजा सैयद अबूल क़ासिम उर्फ़ हरे भरे शाह रह०🤲🤲✍🏻 जावेद...
25/02/2026

🕌 जामा मस्जिद का नक़्शा ज़ाहिर करने वाले वली-ए-कामिल हज़रत शेख़ ख़्वाजा सैयद अबूल क़ासिम उर्फ़ हरे भरे शाह रह०🤲🤲
✍🏻 जावेद शाह खजराना (लेखक)

दिल्ली की फ़िज़ाओं में एक रूहानी दास्ताँ आज भी सरगोशी करती है…🤳

एतबार के क़ाबिल रिवायतों में आता है कि एक रात मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने ख़्वाब में एक नूरानी, शानदार मस्जिद देखी। सुबह आँख खुली तो मंज़र दिल में था, मगर नक़्शा ज़हन से ओझल हो चुका था। दरबार सजा, मशवरे हुए, और ऐलान कर दिया गया कि जो उस ख़्वाबी मस्जिद का सही नक़्शा पेश करेगा, उसे दौलत-ओ-इनआम से नवाज़ा जाएगा।❇️

बेशुमार नक़्शे आए… मगर बादशाह के दिल को सुकून न मिला।❤️

आख़िर में शाही ख़ानसामा फ़ाज़िल ख़ाँ ने एक नक़्शा पेश किया। जैसे ही नज़र पड़ी, बादशाह की आँखें चमक उठीं—
“यही है वो मस्जिद… जो मैंने ख़्वाब में देखी थी!”🌹🌹

इनाम का हुक्म हुआ, मगर फ़ाज़िल ख़ाँ ने अदब से अर्ज़ किया:
“हुज़ूर, ये कमाल मेरा नहीं… मेरे पीर-ओ-मुर्शिद का फ़ैज़ है। मैंने उनसे दरख़्वास्त की, तो उन्होंने अपना कंबल ओढ़ाकर फ़रमाया—देखो वो मस्जिद जो बादशाह को ख़्वाब में नज़र आई। मस्जिद मेरी आँखों के सामने ज़ाहिर हो गई… और मैंने उसी का नक़्शा बना दिया।”🤲

उन बुज़ुर्ग का नाम था — हरे भरे शाह रह०।

बादशाह ख़ुद उनकी ख़ानक़ाह पहुँचे। वली-ए-कामिल ने मेहमाननवाज़ी की, भेंट क़ुबूल की… और फिर वही भेंट फ़ाज़िल ख़ाँ को अता कर दी। बादशाह के लिए दुआ फ़रमाई। यही फ़क़्र, यही इस्तिग़ना औलिया की पहचान होती है।🌺

रिवायत है कि हरे भरे सरकार ने फ़रमाया:
“ये मस्जिद अक्सा की मिसाल है… जैसे चौथे आसमान पर मस्जिद-ए-अक्सा है।”

बादशाह इस क़दर मुतास्सिर हुए कि उसी पहाड़ी के दामन में, जहाँ शेख़ की ख़ानक़ाह थी, इस आलीशान मस्जिद की तामीर करवाई। आज भी जामा मस्जिद के पूर्वी दरवाज़े के उत्तर में सीढ़ियों के क़रीब हज़रत हरे भरे शाह रह० की दरगाह मौजूद है — ख़ामोश, मगर नूर से लबरेज़।🤲🌹

हरे भरे सरकार सब्ज़वार से तशरीफ़ लाए। आप हज़रत सरमद शहीद के भी पीर-ओ-मुर्शिद रहे।

कम बोलना, अक्सर रोज़ा रखना, सारी रात इबादत में गुज़ार देना—ये आपकी ज़िंदगी का शिआर था।कभी किसी को झिड़का नहीं… मुहब्बत से गले लगाया, बुरों को भी संवार दिया।

19 शव्वाल 1065 हिजरी को आपने पर्दा फ़रमाया, मगर आपका फ़ैज़ आज भी जारी है।

और जामा मस्जिद की एक और दिलनशीं रिवायत—
1180 हिजरी में मोहम्मद तहसीन ख़ाँ महली ने ख़्वाब में सरकार-ए-दो आलम ﷺ को मस्जिद के वुज़ूख़ाने में वुज़ू करते देखा। एहतराम में वहाँ संगमरमर का ख़ूबसूरत कटहरा बनवाया गया, जो आज भी क़ाबिले-ज़ियारत है।🤲❇️

दोस्तों,
ये दास्ताँ हमें बताती है कि तामीर सिर्फ़ पत्थरों से नहीं होती—
कुछ इमारतें दुआओं, फ़ैज़ और रूहानी तवज्जोह से खड़ी होती हैं।❤️

अगर आप कभी जामा मस्जिद जाएँ, तो सीढ़ियों के पास ठहर कर एक फ़ातिहा हरे भरे शाह रह० के नाम भी पढ़ दीजिए…
क्योंकि कभी एक वली की निगाह ने ही इस मस्जिद का नक़्शा ज़ाहिर किया था। 🌿


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दिल्ली के पच्चीस ख़्वाजा (पार्ट–2)दिल्ली के दूसरे ख़्वाजा — क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाहि अलैह✍🏻 जावेद शाह खजराना...
21/02/2026

दिल्ली के पच्चीस ख़्वाजा (पार्ट–2)
दिल्ली के दूसरे ख़्वाजा —
क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाहि अलैह
✍🏻 जावेद शाह खजराना (लेखक)

👑 बादशाह से शाह (वली अल्लाह) तक का रूहानी सफ़र👌
ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के बाद चिश्तिया सिलसिले की शम्अ को क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने रोशन रखा। और क़ुतुब साहब के उस्ताद थे — इल्म व इर्फ़ान के दरिया, तसव्वुफ़ के आफ़्ताब, हज़रत क़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी रह०।👌

आप बुख़ारा के शाही ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे। वालिद बुख़ारा के बादशाह थे और सल्तनत की ज़िम्मेदारी आपके हवाले कर दी गई थी। लेकिन क़ुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था…
अहलिया के इंतक़ाल ने आपकी ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। मौत और हयात के फ़लसफ़े ने दिल पर दस्तक दी। दुनिया-ए-फ़ानी की चमक फीकी पड़ गई और आपने ताजो-तख़्त छोड़कर फ़क़ीरी का रास्ता इख़्तियार कर लिया। 🌿

आपने शिहाबुद्दीन सुहरवर्दी से बैअत की और बारह बरस तक ख़िदमत व रियाज़त में गुज़ारे। आख़िरकार आपको खिलाफ़त अता हुई और रसूलल्लाह ﷺ का मुबारक जुब्बा बतौर अमानत मिला — एक रूहानी निशानी, एक इलाही एतमाद।🌷

बग़दाद से होते हुए आप पेशावर पहुँचे, जहाँ आपकी मुलाक़ात फिर से ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से हुई और उनके हमराह हिंदुस्तान में दाख़िल हुए।
561 हिजरी में राजस्थान के नागौर में एक सादा से घर — एक तेलन के आशियाने — को अपना क़यामगाह बनाया और वहीं से पैग़ाम-ए-हक़ की सदाएँ बुलंद कीं।🌹

बाद में दिल्ली तशरीफ़ लाए। सादगी ऐसी कि एक धोबी का घर ख़रीदकर उसी में रहने लगे। लेकिन रूहानी अज़मत ऐसी कि शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने आपको नागौर का क़ाज़ी मुक़र्रर किया। तक़रीबन तीस साल तक आप इस ओहदे पर फ़ायज़ रहे — और इसी निस्बत से “नागौरी” कहलाए।🌹

🎶 समा और बारिश की दुआ🤲
आपको समा से ख़ास शग़फ़ था। हिंदुस्तान में समा की रवायत को रौनक़ देने का सेहरा भी आपके सर है। एक बार दिल्ली में क़हत पड़ा। दुआओं का एहतमाम हुआ। आपने समा की फ़रमाइश की। जब महफ़िल सजी और अल्लाह का ज़िक्र बुलंद हुआ, तो रहमत की बारिश इस तरह बरसी कि लोगों ने दुआ की —
“या अल्लाह, अब काफ़ी है!” 🤲

✨ करामात और तअसीर
एक जोगी ज्ञान नाथ ने आपको ऐसी जड़ दी जिससे सोना बनता था। आपने उसे दरिया में फेंक दिया। जोगी हैरान हुआ। आपने दरिया से वही जड़ी निकाल कर दिखा दी, फिर उसकी नज़र को ऐसा वुसअत दी कि उसे चारों जानिब सोना ही सोना नज़र आने लगा। यह मंज़र देखकर वह ईमान ले आया।❤️
सुब्हानअल्लाह… कैसी तअसीर थी उस निगाह में! 🌹

🌙 विसाल का वाक़िआ
रमज़ान की नौवीं तारीख़, दौर-ए-हुकूमत अलाउद्दीन खिलजी का था। आपकी उम्र 180 बरस बताई जाती है। तरावीह में क़ुरआन की तिलावत की, नमाज़ के बाद सज्दे में गए… और उसी सज्दे में रब से जा मिले। लोग समझते रहे कि अभी सज्दे में मशग़ूल हैं।❇️

आपकी वसीयत थी कि आपको क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के कदमों की जानिब दफ़्न किया जाए। लिहाज़ा महरौली में, क़ुतुब साहब की मज़ार के क़दमों के पास, एक बुलंद चबूतरे पर आपको मदफ़ून किया गया।❇️

आज भी दिल्ली के महरौली में आपकी दरगाह रूहानी नूर बिखेर रही है — ख़ामोश, मगर असरदार… सादा, मगर पुरअसरार।

अल्लाह तआला हमें औलिया-ए-किराम की मोहब्बत और उनकी सीरत पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन। 🤲🌹




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चंदन की तरह महकती रूहानियत हज़रत शेख़ चंदन चिश्ती मंदसौरी सरकार की दरगाह❤️✍️ जावेद शाह खजराना(लेखक)⸻मालव माटी गहन गंभीर,...
21/02/2026

चंदन की तरह महकती रूहानियत हज़रत शेख़ चंदन चिश्ती मंदसौरी सरकार की दरगाह❤️
✍️ जावेद शाह खजराना(लेखक)

मालव माटी गहन गंभीर,
डगडग रोटी, पगपग नीर… 🌾

जिस तरह मालवा की सरज़मीन गेंहू की खुशबू और पानी की रवानी से सैराब है, उसी तरह ये ख़ित्त़ा अल्लाह वालों के क़दमों की बरकत से भी सरफ़राज़ है। क्या पहाड़, क्या बियाबान — हर सम्त औलिया-ए-किराम ने अपने नूर से इस धरती को रौशन किया।✅

उज्जैन, मांडव और धार को मालवा की दारुल-हुकूमत होने का शरफ़ हासिल रहा है ।ज़्यादातर इस्लामी बादशाह और रिआया यहीं आबाद थे, और इसी सबब दावत-ए-इस्लाम के लिए अल्लाह वाले इन मुक़ामात पर कसरत से तशरीफ़ लाते रहे। उनके क़दमों की आहट से आसपास के इलाक़े भी महक उठे।🌺

अल्लाह वाले इस्लाम फैलाने आगे भी बढ़े।उन्हीं इलाक़ों में से एक नाम आता है मंदसौर का ।
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मंदसौर — मालवा का एक क़दीम और तारीख़ी शहर — भी उसी रूहानी सिलसिले की एक कड़ी है। रानी दुर्गावती, शुजाअत खान और बहादुर शाह गुजराती के दौर-ए-हुकूमत में, आज से तक़रीबन पाँच सौ बरस पहले, एक करामाती बुज़ुर्ग — हज़रत शेख़ चंदन मंदसौरी सरकार — ने यहाँ क़याम फ़रमाया। हुमायूं और बहादुर शाह गुजराती की मशहूर मुठभेड़ भी मंदसौर की सरज़मीन पर हुई — और आप उसी दौर के रूहानी आफ़ताब थे।✅

आपका नसब औलिया की नस्ल से जुड़ा था। वालिद-ए-माजिद हज़रत बदहा, और उनके वालिद वली-ए-कामिल शेख़ छज्जू — यानी आपका ख़ानदान वलायत की अमानत सँभाले हुए था। आप शेख खामोश चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के मुरीद थे। ज़ाहिरी और बातिनी इल्म में कमाल रखते थे; सुलूक के मक़ामात आप पर ऐसे वाज़ेह थे मानो आसमानी ख़ज़ानों के दर खुल गए हों।🌺

नक़्द हो या जिंस — जो भी सवाली आया, खाली हाथ न लौटा। आपकी सख़ावत दरिया की तरह थी। लोग हैरत में पड़ जाते कि एक फ़क़ीर के पास इतना माल-ओ-असबाब कहाँ से आता है! मगर ये दौलत दरअसल तवक्कुल और तजल्लीयात की दौलत थी — जो ग़रीबों और हाजतमंदों के काम आती।🌹

सिर्फ़ ज़र-ओ-माल ही नहीं, आप इल्म की खुशबू भी बाँटते थे। हर फ़न की किताबें ख़रीद कर उलमा और तालिब-ए-इल्म तक पहुँचाते। अल-क़िस्सा, आपके दर से कोई सवाली मायूस न लौटा। सख़ावत, इल्म और इबादत — ये तीनों आप में यूँ जमा थे जैसे चंदन में ख़ुशबू।🌷🌷🌷

गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह आपका अकीदतमंद था। इसी दौर में भूपतराय रायसेनी से इख़्तिलाफ़ात बढ़े और जंग की नौबत आई। इस मुहिम में आपके क़बीले के कई अफ़राद ने जाम-ए-शहादत पिया। आज भी आपके आस्ताने पर मौजूद मज़ारें उस कुर्बानी की ख़ामोश गवाही देती हैं। आपकी दुआओं की बरकत से रायसेन का क़िला फ़तह हुआ।✅

आपकी करामातों में एक अजीब वाक़िआ मशहूर है। शेख मंजू अजमेरी हज से लौटकर अपने पाँव में भारी ज़ंजीर बाँध लाए और अज़्म किया कि जिस अल्लाह वाले के दीदार से ये ज़ंजीर खुल जाएगी, उसी को अपना मुर्शिद बनाएँगे। जब मंदसौर में आपकी बारगाह में हाज़िर हुए — तो ज़ंजीर अपने आप खुल पड़ी। यूँ वो आपके दामन-ए-इर्शाद से वाबस्ता हो गए।

आपके मुरीदों में बाज़ बहादुर के वालिद शुजाअत ख़ान भी शामिल थे, जो मालवा के सूबेदार रहे।

23 रमज़ान 953 हिजरी (1532 ई.) को आप इस दुनिया-ए-फ़ानी से आलम-ए-बक़ा की जानिब रवाना हुए। मंदसौर के क़स्बा टोडी में बुलंद मुक़ाम पर आपकी जन्नतनुमा दरगाह आज भी रूहानियत का मरकज़ है। फ़ज़ाओं में अजीब सी तस्कीन है — जैसे दिलों की थकान यहीं उतर जाती हो। सन 2021 के उर्स में, जब मुझे क़व्वाल हज़रात के साथ हाज़िरी की सआदत मिली, तो महसूस हुआ कि ये दर अब भी चंदन की तरह महक रहा है।

आपके साहबज़ादे शेख़ मोहम्मद भी सज्जादानशीन रहे। 1593 ईस्वी में सूफ़ी मोहम्मद गौसी सत्तारी ने उनसे इसी दरगाह पर मुलाक़ात की। वो बयानात बाद में मशहूर किताब गुलज़ार-ए-अबरार में दर्ज हुए (सफ़्हा 430)।

ये तमाम तहरीर उन्हीं हवाले की बुनियाद पर, अपने अल्फ़ाज़ की चाशनी में ढालकर पेश की है। अगर लफ़्ज़ों में कहीं कोताही रह गई हो तो दरगुज़र फ़रमाइएगा।

हक़ीक़त ये है कि हज़रत चंदन चिश्ती सरकार का ज़िक्र करते ही दिल में अजीब सी महक उठती है — जैसे रूह पर चंदन का लेप कर दिया गया हो… 🌿


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नाहरशाह वली दरगाह के सामने बनी है इंदौर के जंजीरा वाला नवाब की बेगमों की क़ब्रें 🤳✍🏻जावेद शाह खजराना(लेखक)दोस्तों आपने ह...
08/02/2026

नाहरशाह वली दरगाह के सामने बनी है इंदौर के जंजीरा वाला नवाब की बेगमों की क़ब्रें 🤳
✍🏻जावेद शाह खजराना(लेखक)

दोस्तों आपने हजरत नाहर शाह वली दरगाह के ठीक सामने बना हरा ओटला जरूर देखा होगा ?🧐
उस ओटले पर बनी 3 कब्रें भी शायद आपने देखी हो?
क्या आप जानते है ये कब्रें किनकी है ?

बेशक!!
मै जो लिख रहा हूं
ये मालूमात बहुत कम लोगों को दरयाफ़्त है।
लिहाजा आपसे गुजारिश है कि
मेरा आर्टिकल पूरा जरूर पढ़े।🤳

दोस्तों
आपने इंदौर का जंजीर वाला चौराहा जरूर देखा होगा।इंदौर के न्यू पलासिया पर 56 दुकान से आगे जहां सावरकर की मूरत लगी है। उसी चौराहे का नाम पहले जंजीरा वाला चौराहा था । जो बाद में जंजीरा से जंजीर वाला चौराहा हो गया। क्योंकि इसी चौराहा के पश्चिम~उत्तर दिशा में जंजीरा नवाब की खूबसूरत हवेली थी।✅

जंजीरा के नवाब अफ्रीका के जंजीबारा से समुद्री लुटेरों के रूप में हिंदुस्तान आए थे। फिर यही बस गए। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आज भी गुजरात के जंबूर में बहुत से अफ्रीकी लोग रहते है। पूरा गांव अफ्रीकी लोगों से भरा हुआ है। जिधर देखोगे उधर अफ्रीकी नजर आयेंगे।इसलिए जंबूर को भारत का मिनी अफ्रीका भी कहते है।
इन्हीं की नस्ल से थे जंजीरा नवाब....👍

महाराष्ट्र के रायगड जिले के समुंद्री गाँव मुरुड में टापू पर एक किला हैं। इसी किले को जंजीरा किला और यहां हुकूमत करने वाले शासक को जंजीरा नवाब कहा जाता है।आज़ादी से पहले जंजीरा के नवाब इंदौर आकर बस गए।

जंजीरा के क़िले की बनावट बेहद अजीबो~गरीब है। भारत के पश्चिमी किनारे का ये अकेला किला हैं, जो की कभी भी जीता नही जा सका था। माना जाता है कि यह किला पंच पीर हजरत पंजातन शाह बांडया बाबा की हिफाज़त में है। यह किला 650 बरस पुराना है। लिहाज़ा जंजीरा के नवाब वली अल्लाह से बेपनाह निस्बत रखते थे ।❇️

सन 1922 में जंजीरा के नवाब सर अहमद खान का इंतकाल हो गया। उस वक्त सर अहमद खान और कुलसुम बेगम के बेटे नवाब मोहम्मद खान नाबालिग थे लिहाजा 1933 तक नवाब की गद्दी उनकी विधवा बेगम कुलसुम ने संभाली।🤳

पोस्ट में जो पेंटिंग नज़र आ रही है उसमें सर मोहम्मद ख़ान की विधवा और नाबालिग बेटा नज़र आ रहा है ।✅

हरे ओटले पर मौजूद तीन क़ब्रों में एक कब्र राबिया बेगम दूसरी कुलसुम बेगम और तीसरी मुमताज बेगम की है।

कुलसुम बेगम और नवाब मोहम्मद खान की ये खूबसूरत पेंटिंग कुलसुम बेगम की सौतन नाजली बेगम के बहनोई फैजी राहमीन ने बनाई है। नाजली बेगम के यहां जब औलाद ना हुई तो नवाब सर अहमद खान ने नाजली बेगम से इजाजत लेकर कुलसुम से निकाह किया।✅

दोस्तों आपको एक खास जानकारी देना चाहता हूं
नाजली बेगम और अतिया बेगम सगी बहनें थी।

अतिया बेगम बांबे में कत्थक स्कूल चलाती थी। पेंटर फैजी राहमिन उन्हीं के शौहर थे जिन्होंने ये पेंटिंग बनाई।फ़ैज़ी रहामीन हिंदुस्तानी के नामी पेंटर थे ।

अतिया बेगम को फिल्मों में डांस और कत्थक देने का श्रेय जाता है। मशहूर डांसर सितारा देवी को आपने कई महफिलों में नचाया। अतिया बेगम की एक महफिल में गुरु रविंद्रनाथ टैगोर , सरोजिनी नायडू और हिंदुस्तान के ढ़ेरों राजे~महाराजे शरीक थे। यही गुरु रविंद्र नाथ टैगोर ने सितारा देवी को कत्थक क्वीन की उपाधि से नवाजा।🌺

अतिया बेगम मशहूर डांसर मैडम अजुरी की भी उस्ताद थी।मैडम अजूरी फिल्म इंडस्ट्रीज की पहली कैबरे डांसर रह चुकी है।मैडम अजूरी के बाद कुक्कू फिर हेलेन फिल्मों में आई।🌹

पार्टिशन (आजादी) के बाद जंजीरा वाला नवाब सर अहमद खान की पहली बीवी नाजिला बेगम अपनी बहन अतिया बेगम , बहनोई फैजी राहमीन और डांसर मैडम अजुरी के साथ पाकिस्तान जा बसी। 🤳

कुलसुम बेगम आखरी नवाब मोहम्मद खान और बाकी लोगों को लेकर इंदौर आ गई।

फोटो में जो नन्हे बालक आपको नजर आ रहे है दरअसल यही आखरी नवाब सीदी मोहम्मद खान है।
जिनका जन्म 7 मार्च 1914 को हुआ।खूबसूरत सफेद साड़ी में लपटी कुलसुम बेगम इनकी मां है।जिनकी कब्र खजराना स्थित हरे ओटले पर बीचोंबीच है ।

जंजीरा नवाब का पूरा परिवार जंजीरा से जब इंदौर रहने आया तब महीनों तक लैंटर्न होटल में रुका रहा बाद में उन्होंने चौराहे पर कोठी खरीदी और उसे अपना मुकम्मल ठिकाना बनाया। ❤️

नवाब ज़ंजीरा को चीते पालने का शौक था । उनको देखने के लिये यहां भीड़ जुट जाती थी। एक मर्तबा नवाब साहब के ज़ख्म को उनके पालतू चीते ने चाट लिया तब नवाब साहब ने चीते को गोली मार दी।
क्योंकि चीते के मुंह खून जो लग गया था।🦁

आखरी नवाब सीदी मोहम्मद खान की शादी बेगम राबिया से सन 1933 में हुई ।

राबिया बेगम खजराना स्थित हजरत नाहर शाह वली दरगाह से बहुत अकीदत रखती थी। अक्सर दरगाह पर हाजरी देने आती थी। दरगाह के मुज़ावर मेरे नाना मेहबूब शाह और जंजीरा खानदान वालों से उन्होंने दरख्वास्त की थी कि मरने के बाद मुझे हजरत नाहर शाह वली के आस्ताने के सामने कदमों की जानिब दफनाया जाए......✍🏻

सन 1968 में राबिया बेगम का इंतकाल हुआ।

वसीयत के मुताबिक राबिया बेगम को हजरत नाहर शाह वली सरकार की दरगाह के ठीक सामने कदमों की जानिब दक्षिण दिशा में बने हरे ओटले पर दफनाया गया था। ये ओटला आज भी है और कब्रों के तावीज भी सही~सलामत हैं।❇️

हरे रंग से पुते ऊंचे ओटले पर जंजीरा के आखरी नवाब की बीवी राबिया बेगम उनकी सास कुलसुम बेगम और सौतन मुमताज़ बेगम आराम फरमा रही है। 🤲

बेशुमार राजे~महाराज और नवाब ना जाने कहां~कहाँ दफ्न है? किसी को खैर खबर ही नहीं।उनकी कब्रों पर चिराग जलाने और फूल चढ़ाने वाला कोई नहीं।🥺

नवाब की बेगम होने के बावजूद राबिया बेगम ने फकीर की चौखट पर उनके कदमों में दफ्न होने की ख्वाहिश इसलिए जाहिर की क्यूंकि वली अल्लाह के क़रीब दफ़्न होने से उनके सदके में लोग उनकी भी मग़फ़िरत की दुआ कर देते है ।

अलबत्ता वलियों के क़रीब दफ़्न होने की वजह से आज भी इनकी तुरबतों पर भूले~भटके जायरीन फूल पेश कर देते है जिससे इनकी दुआएं मगफिरत होती रहती है।🌹
हयात उसी की है जिसका जमीर जिंदा है,
अमीर मर गए लेकिन फकीर जिंदा है....🤲

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इंतक़ाल 😥बहुत ही गमगीन खबर है मशहूर कव्वाल जनाब आफ़ताब कादरी के साहबज़ादे 14 वर्षीय अली क़ादरी का इंतक़ाल हो गया है।अल्ल...
31/01/2026

इंतक़ाल 😥

बहुत ही गमगीन खबर है मशहूर कव्वाल जनाब आफ़ताब कादरी के साहबज़ादे 14 वर्षीय अली क़ादरी का इंतक़ाल हो गया है।

अल्लाह रब्बुल आलमीन मेरे लाड़ले अली को जन्नतुल फ़िरदौस में आला से आला मुकाम अता करें और घरवालों को सब्र की तौफ़ीक़ दे ।आमीन 🤲🤲🤲

✍🏻 जावेद शाह खजराना

हजरत नाहर शाह वली दरगाह पर कव्वाली की महफ़िल में भाजपा मंडल की टिम के साथ जावेद शाह खजराना
26/01/2026

हजरत नाहर शाह वली दरगाह पर कव्वाली की महफ़िल में भाजपा मंडल की टिम के साथ जावेद शाह खजराना

पत्रकारों की टीम ❤️हजरत नाहर शाह वली दरगाह पर उर्स के दौरान खजराना के नामी गिरामी पत्रकार शाहरुख कुरैशी जी , क़ासिम बरका...
26/01/2026

पत्रकारों की टीम ❤️
हजरत नाहर शाह वली दरगाह पर उर्स के दौरान खजराना के नामी गिरामी पत्रकार शाहरुख कुरैशी जी , क़ासिम बरकाती जी के साथ जावेद शाह खजराना ❤️🥰✅

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