25/02/2026
🕌 जामा मस्जिद का नक़्शा ज़ाहिर करने वाले वली-ए-कामिल हज़रत शेख़ ख़्वाजा सैयद अबूल क़ासिम उर्फ़ हरे भरे शाह रह०🤲🤲
✍🏻 जावेद शाह खजराना (लेखक)
दिल्ली की फ़िज़ाओं में एक रूहानी दास्ताँ आज भी सरगोशी करती है…🤳
एतबार के क़ाबिल रिवायतों में आता है कि एक रात मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने ख़्वाब में एक नूरानी, शानदार मस्जिद देखी। सुबह आँख खुली तो मंज़र दिल में था, मगर नक़्शा ज़हन से ओझल हो चुका था। दरबार सजा, मशवरे हुए, और ऐलान कर दिया गया कि जो उस ख़्वाबी मस्जिद का सही नक़्शा पेश करेगा, उसे दौलत-ओ-इनआम से नवाज़ा जाएगा।❇️
बेशुमार नक़्शे आए… मगर बादशाह के दिल को सुकून न मिला।❤️
आख़िर में शाही ख़ानसामा फ़ाज़िल ख़ाँ ने एक नक़्शा पेश किया। जैसे ही नज़र पड़ी, बादशाह की आँखें चमक उठीं—
“यही है वो मस्जिद… जो मैंने ख़्वाब में देखी थी!”🌹🌹
इनाम का हुक्म हुआ, मगर फ़ाज़िल ख़ाँ ने अदब से अर्ज़ किया:
“हुज़ूर, ये कमाल मेरा नहीं… मेरे पीर-ओ-मुर्शिद का फ़ैज़ है। मैंने उनसे दरख़्वास्त की, तो उन्होंने अपना कंबल ओढ़ाकर फ़रमाया—देखो वो मस्जिद जो बादशाह को ख़्वाब में नज़र आई। मस्जिद मेरी आँखों के सामने ज़ाहिर हो गई… और मैंने उसी का नक़्शा बना दिया।”🤲
उन बुज़ुर्ग का नाम था — हरे भरे शाह रह०।
बादशाह ख़ुद उनकी ख़ानक़ाह पहुँचे। वली-ए-कामिल ने मेहमाननवाज़ी की, भेंट क़ुबूल की… और फिर वही भेंट फ़ाज़िल ख़ाँ को अता कर दी। बादशाह के लिए दुआ फ़रमाई। यही फ़क़्र, यही इस्तिग़ना औलिया की पहचान होती है।🌺
रिवायत है कि हरे भरे सरकार ने फ़रमाया:
“ये मस्जिद अक्सा की मिसाल है… जैसे चौथे आसमान पर मस्जिद-ए-अक्सा है।”
बादशाह इस क़दर मुतास्सिर हुए कि उसी पहाड़ी के दामन में, जहाँ शेख़ की ख़ानक़ाह थी, इस आलीशान मस्जिद की तामीर करवाई। आज भी जामा मस्जिद के पूर्वी दरवाज़े के उत्तर में सीढ़ियों के क़रीब हज़रत हरे भरे शाह रह० की दरगाह मौजूद है — ख़ामोश, मगर नूर से लबरेज़।🤲🌹
हरे भरे सरकार सब्ज़वार से तशरीफ़ लाए। आप हज़रत सरमद शहीद के भी पीर-ओ-मुर्शिद रहे।
कम बोलना, अक्सर रोज़ा रखना, सारी रात इबादत में गुज़ार देना—ये आपकी ज़िंदगी का शिआर था।कभी किसी को झिड़का नहीं… मुहब्बत से गले लगाया, बुरों को भी संवार दिया।
19 शव्वाल 1065 हिजरी को आपने पर्दा फ़रमाया, मगर आपका फ़ैज़ आज भी जारी है।
और जामा मस्जिद की एक और दिलनशीं रिवायत—
1180 हिजरी में मोहम्मद तहसीन ख़ाँ महली ने ख़्वाब में सरकार-ए-दो आलम ﷺ को मस्जिद के वुज़ूख़ाने में वुज़ू करते देखा। एहतराम में वहाँ संगमरमर का ख़ूबसूरत कटहरा बनवाया गया, जो आज भी क़ाबिले-ज़ियारत है।🤲❇️
दोस्तों,
ये दास्ताँ हमें बताती है कि तामीर सिर्फ़ पत्थरों से नहीं होती—
कुछ इमारतें दुआओं, फ़ैज़ और रूहानी तवज्जोह से खड़ी होती हैं।❤️
अगर आप कभी जामा मस्जिद जाएँ, तो सीढ़ियों के पास ठहर कर एक फ़ातिहा हरे भरे शाह रह० के नाम भी पढ़ दीजिए…
क्योंकि कभी एक वली की निगाह ने ही इस मस्जिद का नक़्शा ज़ाहिर किया था। 🌿
9340949476🤳