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13/07/2020

लोक में शिव...
शिव को पतिरूप में पाने के लिए तपस्या करतीं माता पार्वती की परीक्षा लेने गए सप्तर्षियों ने कहा, "किसके लिए तप कर रही हो देवी? उस शिव के लिए जिसके पास न घर है न दुआर? न खेत है न बाग-बगीचे? कुछ काम धाम करता नहीं, भांग खा कर मस्त पड़ा रहता है। जिसके पास स्वयं पहनने के लिए कपड़े नहीं वह तुमको क्या पहनाएगा भला? तुम जैसी विदुषी और सुन्दर कन्या का विवाह तो किसी राजकुल में होना चाहिए, छोड़ो यह तप घर चलो..."
पार्वती जगदम्बा थीं, जानती थीं कि शिव पर केवल और केवल उन्ही का अधिकार है। उसी अधिकार से कहा, "सुनिए साधु बाबा! जिसने भेजा है उससे जा कर कह दीजिये कि वे स्वयं मना करें तब भी नहीं मानूँगी... शिव के लिए करोड़ जन्म लेने पड़े तब भी कोई दिक्कत नहीं, पर पति चाहिए तो शिव ही चाहिए..."
वियहकटवे सप्तर्षियों की ड्यूटी पूरी हुई, वे हँसते हुए शिव के लोक चले। जा कर बताया, "विवाह कर लीजिए देवता! माता नहीं मानेंगी..."
शास्त्रों से इतर लोक में जो शिव पार्वती का स्वरूप है, उसके हिसाब से शिव इस सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ पति हैं। माता पार्वती हमारे घर बार की सामान्य स्त्रियों की तरह बार बार पति से गुस्सा होती हैं, और बेचारे भोले बाबा उनको मनाते रहते हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करते रहते हैं। जीवन में धन-धान्य का नाम तक नहीं है, फिर भी पत्नी की कोई इच्छा खाली नहीं जाती। इसीलिए गाँव की लड़कियां अब भी सावन के सोमबार को शिव की आराधना कर के उन से उन्ही जैसा वर मांगती हैं। "भोला भाला पति, जिसके हृदय में पत्नी के लिए कोई छल न रहे... धन दौलत तनिक कम भी रहे, पर गुस्सा होने पर पति मनाए... उसे उसकी पूरी प्रतिष्ठा, पूरा सम्मान दे, हर इच्छा पूरी करे..." इससे अच्छा पति और कैसा होगा...
अब शिव की ओर से देखिये, वे हमेशा अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले पुरुष हैं। तपस्या में गए तो युगों युगों तक किसी की कोई चिन्ता ही नहीं। न घर, न पत्नी, न बच्चे, न सेवकों की चिन्ता... औघड़दानी व्यक्तित्व, जिसने जो मांगा उसे वह सहज भाव से दे दिया। भारतीय पुरुष सामान्यतः ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्ति के साथ कोई स्त्री कैसे निबाह करे? पर माता पार्वती ने किया... उन्ही के रंग में रङ्ग गयीं। शिव दैत्यों को उटपटांग वरदान दे देते, फिर माता शक्तिरूप में आ कर उनसे मुक्ति दिलातीं... कभी विरोध नहीं किया, कभी हाथ नहीं रोका... सम्बन्धों के मध्य धर्म था, और धर्म के पीछे पीछे प्रेम! सो पति की बुराइयां भी अधिक बुरी नहीं लगीं। सो दुर्गम पहाड़ों के बीच भी जीवन स्वर्गिक हो गया...
पति की सामाजिक प्रतिष्ठा पत्नी ही तय करती है। शिव की शक्ति माता पार्वती ही थीं...
सच पूछिए तो जीवन में यदि धर्म के पथ पर हाथ पकड़ कर चलने वाला, निश्छल और प्रेम करने वाला संगी मिल गया तो जीवन सुन्दरतम हो जाता है। धन, वैभव, सामाजिक प्रतिष्ठा सब द्वितीयक है...
प्रेम में बड़ी शक्ति होती है। सम्बन्धों को निभाने के लिए ढेर सारे संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। धर्म, प्रेम और समर्पण हो तो हर सम्बन्ध चिरंजीवी हो जाता है, और जीवन सुख से भर जाता है। कभी आजमा कर देखिएगा, पति पत्नी के बीच उपजे सामान्य विवादों को एक सहज मुस्कान समाप्त कर देती है।
भगवान शिव और माता पार्वती के वैवाहिक जीवन को भारतीय लोक ने आदर्श समझा और माना था, तभी भारतीय विवाहों में अब भी शिव पार्वती के ही गीत गाये जाते हैं।
सावन चल रहा है, हाथ जोड़िए गौरी-शंकर को! दाम्पत्य सुखी रहेगा।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

06/07/2020

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ादेव

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सूर्यग्रहण 21 जून 2020”पर विशेष :     सूर्य ग्रहण का हिन्दू धर्म और वैदिक ज्योतिष में बड़ा महत्व है।   विज्ञान के अनुसार...
21/06/2020

सूर्यग्रहण 21 जून 2020”पर विशेष :


सूर्य ग्रहण का हिन्दू धर्म और वैदिक ज्योतिष में बड़ा महत्व है। विज्ञान के अनुसार तो ग्रहण एक खगोलीय घटना है लेकिन भारतीय ज्योतिष में यह बड़े परिवर्तन का कारक माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सूर्य ग्रहण के घटित होने से पहले ही उसका प्रभाव दिखना शुरू हो जाता है और ग्रहण की समाप्ति के बाद भी कई दिनों तक उसका असर देखने को मिलता है । सूर्य ग्रहण 21 जून को भारत में दिखाई देने के कारण ही इस सूर्य ग्रहण का धार्मिक प्रभाव और सूतक मान्य होंगे ।

सूर्य ग्रहण 21 जून 2020

यह ग्रहण आषाढ़ की अमावस्या के दिन रविवार को सुबह 10:09 बजे से मध्याह्न 1:36 बजे तक घटित होगा, जो कि भारत, म्यांमार, दक्षिणी रूस ,मंगोलिया बांग्लादेश श्रीलंका थाईलैंड मलेशिया कोरिया जापान इंडोनेशिया पूर्वी ऑस्ट्रेलिया अफ़्रीका अफ़्रीका ईरान इराक़ अफ़ग़ानिस्तान नेपाल पाकिस्तान आदि देशों में खंडग्रास के रूप में दिखाई देगा। अफ़्रीका के कुछ क्षेत्र, यमन, ओमान, दक्षिणी चीन के कुछ भागों में तथा उत्तरी भारत में कंकणाकृति सूर्यग्रहण दृश्यमान होगा ।

यह सूर्य ग्रहण मिथुन राशि और मृगशिरा तथा आर्द्रा नक्षत्र में लग रहा है, इसलिए इस राशि और नक्षत्र से संबंधित जातकों के लिए यह परेशानी का कारण बन सकता है। ऐसे जातकों को इस ग्रहण को देखना नहीं चाहिए । यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा इसलिए यहां पर इसका धार्मिक महत्व और सूतक माना जाएगा।

ग्रहण का समय :

ग्रहण प्रारम्भ काल :
प्रातः 10:09 (21 जून 2020)
परमग्रास :
प्रातः 11:47 तक (21 जून 2020)
ग्रहण समाप्ति काल :
प्रातः 01:36 तक (21 जून 2020)
की अवधि : 03:27:
सूतक आरंभ :
रात्रौ 10:09 (20 जून 2020))शनिवार

सूर्य ग्रहण का सूतक :

21 जून 2020 को दिखाई देने वाले सूर्य ग्रहण का सूतक एक दिन पूर्व 20 जून 2020 को 22:09 से प्रारंभ होगा । अतः 20 जून 2020 से ही सूतक के नियम प्रभावी हो जाएंगे। इस समय में मूर्ति पूजा और स्पर्श आदि कार्य न करें।

सूतक का महत्व :

हिंदू धर्म में ग्रहण के समय कुछ कार्यों को वर्जित माना गया है। क्योंकि सूतक या सूतक काल एक ऐसा अशुभ समय होता है, जिसमें कुछ विशेष कार्य करने की मनाही होती है। सामान्यत: सूर्य ग्रहण लगने से बारह घंटों पहले तथा चन्द्र ग्रहण लगने से नौ घन्टे पूर्व सूतक काल शुरू हो जाता है और ग्रहण के समाप्त होने पर स्नान के बाद सूतक समाप्त हो जाता है।

सूर्य ग्रहण के दौरान क्या करें और क्या ना करें :

सूर्य ग्रहण के दौरान कुछ कार्यों को विशेष रुप से करने की मनाही होती है तो कुछ कार्यों के लिए सर्वोत्तम समय होता है। यदि आप कोई सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं तो उसके लिए मंत्र जाप करने हेतु ग्रहण काल सर्वोत्तम माना गया है।

स्पर्शे स्नानं जपं कुर्यान्मध्ये होमं सुरार्चनम।
मुच्यमाने सदा दानं विमुक्तौ स्नानमाचरेत।। (ज्ये. नि.)

अर्थात ग्रहण काल के प्रारंभ में स्नान और जप करना चाहिए तथा ग्रहण के मध्य काल में होम अर्थात यज्ञ और देव पूजा करना उत्तम रहता है। ग्रहण के मोक्ष होने के समय दान करना चाहिए तथा पूर्ण रूप से ग्रहण का मोक्ष होने पर स्नान करके स्वयं को पवित्र करना चाहिए।

दानानि यानि लोकेषु विख्यातानि मनीशिभः।
तेषां फलमाप्नोति ग्रहणे चन्द्र सूर्ययोः।। (सौर पुराण)

अर्थात इस समस्त संसार में जितने भी दान दिए जाते हैं, कोई भी प्राणी उन सभी दानों का फल चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण काल में दान करने से प्राप्त कर लेता है। वास्तव में दान करने की बहुत महिमा बताई गयी है।

अन्नं पक्वमिह त्याज्यं स्नानं सवसनं ग्रहे।
वारितक्रारनालादि तिलैदम्भौर्न दुष्यते।। (मन्वर्थ मुक्तावली)

सूर्य ग्रहण के दौरान भगवान सूर्य की पूजा विभिन्न सूर्य स्रोतों के द्वारा करनी चाहिए तथा आदित्य हृदय स्त्रोत्र आदि का पाठ करना काफी अच्छा परिणाम देता है। पका हुआ अन्न और कटी हुई सब्जियों का त्याग कर देना चाहिए क्योंकि वे दूषित हो जाती है। यद्यपि घी,तेल, दही, दूध, दही, मक्खन, पनीर, आचार, चटनी, जैसी चीजों में कुशा रख देने से ग्रहण काल में दूषित नहीं होते हैं। यदि कोई सूखा खाद्य पदार्थ है तो उसमें कुशा रखने की भी आवश्यकता नहीं होती।

चन्द्रग्रहे तथा रात्रौ स्नानं दानं प्रशस्यते।

यदि चंद्र ग्रहण हो अथवा सूर्य ग्रहण रात्रि के समय दौरान स्नान दान करना प्रशस्त माना गया है।

न स्नायादुष्णतोयेन नास्पर्शं स्पर्शयेत्तथा।।

ग्रहण काल के दौरान तथा ग्रहण की समाप्ति के बाद गर्म जल से स्नान नहीं करना चाहिए। हालांकि बालकों, वृद्धों, गर्भवती स्त्री और रोगियों के लिए निषेध नहीं है।

यन्नक्षत्रगतो राहुर्ग्रसते शशिभास्करौ।
तज्जातानां भवेत्पीड़ा ये नराः शांतिवर्जिताः।।

किसी नक्षत्र में राहु चंद्र अथवा सूर्य को ग्रसित करता है ऐसे लोगों को विशेष रूप से पीड़ा होने की संभावना होती है।

ग्रस्यमाने भवेत्स्नानं ग्रस्ते होमो विधीयते।
मुच्यमाने भवेद्दानं मुक्ते स्नानं विधीयते।।
सर्वगङ्गा समं तोयं सर्वेव्यास समद्विजाः।
सर्वभूमि समं दानं ग्रहणे चन्द्र -सूर्ययोः।।

ग्रहण काल के दौरान शुद्ध जल किसी भी स्थान से लिया जाए वो श्री गंगा जल के समान निर्मल होता है। स्नान और दान करना सभी प्रकार से उचित होता है। सभी प्रकार के द्विज व्यास जी के समान माने जाते हैं। चंद्रग्रहण अथवा सूर्य ग्रहण के अंत में दिया जाने वाला दान भी सर्व भूमि दान के बराबर माना जाता है ।

~~ कैसे करें श्रीगणेश का ध्यान,जिससे मिले विद्या और बुद्धि का वरदान!!!!!!!!  श्रीगणेश बुद्धि के देवता हैं । अक्षरों को ‘...
03/06/2020

~~ कैसे करें श्रीगणेश का ध्यान,जिससे मिले विद्या और बुद्धि का वरदान!!!!!!!!

श्रीगणेश बुद्धि के देवता हैं । अक्षरों को ‘गण’ कहा जाता है, उनके ईश होने के कारण इन्हें ‘गणेश’ कहा जाता है । इसलिए श्रीगणेश ‘विद्या-बुद्धि के दाता’ कहे गये हैं ।

आदिकवि वाल्मीकि ने श्रीगणेश की वन्दना करते हुए कहा है—‘गणेश्वर ! आप चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता तथा देवताओं के आचार्य बृहस्पतिजी को भी विद्या प्रदान करने वाले हैं । कठ को भी अभीष्ट विद्या देने वाले आप है (अर्थात् कठोपनिषद् के दाता है) । आप द्विरद हैं, कवि हैं और कवियों की बुद्धि के स्वामी हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ ।’

श्रीगणेश असाधारण बुद्धि व विवेक से सम्पन्न होने के कारण अपने भक्तों को सद्बुद्धि व विवेक प्रदान करते हैं । इसीलिए हमारे ऋषियों ने मनुष्य के अज्ञान को दूर करने, बुद्धि शुद्ध रखने व काम में एकाग्रता प्राप्त करने के लिए बुद्धिदाता श्रीगणेश की सबसे पहले पूजा करने का विधान किया है ।

श्रीगणेश की कृपा से कैसे मिलता है तेज बुद्धि का वरदान ?

श्रीगणेश की कृपा से तीव्र बुद्धि और असाधारण प्रतिभा कैसे प्राप्त होती है, इसको योग की दृष्टि से समझा जा सकता है । योगशास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर में छ: चक्र होते हैं । इनमें सबसे पहला चक्र है ‘मूलाधार चक्र’ है जिसके देवता हैं—श्रीगणेश । प्रत्येक मनुष्य के शरीर में रीढ़ की हड्डी के मूल में, गुदा से दो अंगुल ऊपर मूलाधार चक्र है । इसमें सम्पूर्ण जीवन की शक्ति अव्यक्त रूप में रहती है । इसी चक्र के मध्य में चार कोणों वाली आधारपीठ है जिस पर श्रीगणेश विराजमान हैं ।

यह ‘गणेश चक्र’ कहलाता है, इसी के ऊपर कुण्डलिनी शक्ति सोयी रहती है । श्रीगणेश का ध्यान करने मात्र से कुण्डलिनी जग कर (प्रबुद्ध होकर) स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र में प्रविष्ट होकर सहस्त्रार चक्र में परमशिव के साथ जा मिलती है जिसका अर्थ है सिद्धियों की प्राप्ति । अत: मूलाधार के जाग्रत होने का फल है असाधारण प्रतिभा की प्राप्ति ।

इस प्रकार गणेशजी की आकृति का ध्यान करने से मूलाधार की सिद्धि प्राप्त हो जाती है । ध्यान योग के द्वारा योगियों को इसका दर्शन होता है । श्रीगणेश का ध्यान करने से भ्रमित मनुष्य को सुमति और विवेक का वरदान मिलता है और श्रीगणेश का गुणगान करने से सरस्वती प्रसन्न होती हैं ।

तीव्र बुद्धि और स्मरण-शक्ति के लिए श्रीगणेश का करें प्रात:काल ध्यान!!!!!!

विद्या प्राप्ति के इच्छुक मनुष्य को प्रात:काल इस श्लोक का पाठ करते हुए श्रीगणेश के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए—

प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं
सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम्
उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-
माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम् ।।

अर्थात्—जो अनाथों के बन्धु हैं, जिनके दोनों कपोल सिन्दूर से शोभायमान हैं, जो प्रबल विघ्नों का नाश करने में समर्थ हैं और इन्द्रादि देव जिनकी वन्दना करते हैं, उन श्रीगणेश का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ ।

विद्या प्राप्ति और तीव्र स्मरण-शक्ति के लिए बुधवार को करें श्रीगणेश के ये उपाय !!!!!!

▪️बुध ग्रह भी बुद्धि देने वाले हैं । बुधवार के दिन गणेशजी की पूजा बहुत फलदायी होती है । श्रीगणेश अपनी संक्षिप्त अर्चना से ही संतुष्ट हो भक्त को ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कर देते हैं । गणेशजी को प्रसन्न करना बहुत ही सरल है । इसमें ज्यादा खर्च की आवश्यकता नही है ।

▪️स्नान आदि करके पूजा शुद्ध पीले वस्त्र पहन कर करें ।

▪️पूजा-स्थान में गणेशजी की तस्वीर या मूर्ति पूर्व दिशा में विराजित करें । श्रीगणेश को रोली, चावल आदि चढ़ाएं । कुछ न मिले तो दो दूब ही चढ़ा दें । घर में लगे लाल (गुड़हल, गुलाब) या सफेद पुष्प (सदाबहार, चांदनी) या गेंदा का फूल चढ़ा दें ।

▪️श्रीगणेश को सिंदूर अवश्य लगाना चाहिए ।

▪️श्रीगणेश को बेसन के लड्डू बहुत प्रिय हैं यदि लड्डू या मोदक न हो तो केवल गुड़ या बताशे का भोग लगा देना चाहिए ।

▪️एक दीपक जला कर धूप दिखाएं और हाथ जोड़ कर छोटा-सा एक श्लोक बोल दें–

तोहि मनाऊं गणपति हे गौरीसुत हे ।
करो विघ्न का नाश, जय विघ्नेश्वर हे ।।
विद्याबुद्धि प्रदायक हे वरदायक हे ।
रिद्धि-सिद्धिदातार जय विघ्नेश्वर हे ।।

▪️एक पीली मौली गणेशजी को अर्पित करते हुए कहें—‘करो बुद्धि का दान हे विघ्नेश्वर हे’ । पूजा के बाद उस मौली को माता-पिता, गुरु या किसी आदरणीय व्यक्ति के पैर छूकर अपने हाथ में बांध लें।

▪️श्रीगणेश पर चढ़ी दूर्वा को अपने पास रखें, इससे एकाग्रता बढ़ती है ।

▪️‘ॐ गं गणपतये नम:’ इस गणेश मन्त्र का १०८ बार जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है ।

▪️गणपति अथर्वशीर्ष में कहा गया है—‘जो लाजों (धान की खील) से श्रीगणेश का पूजन करता है, वह यशस्वी व मेधावी होता है ।’ अत: गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने से भी विद्या, बुद्धि, विवेक व एकाग्रता बढ़ती है ।

बुद्धि के सागर और शुभ गुणों के घर गणेशजी का स्मरण करने से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।

देवी देवताओं की आरती के बाद, क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र?????हिंदू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु मंदिरों ...
02/06/2020

देवी देवताओं की आरती के बाद, क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र?????

हिंदू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु मंदिरों में या घरों में होनी वाली दैनिक पूजा विधान में देवी देवताओं की आरती पूर्ण होने के बाद कुछ वैदिक मंत्रों का उच्चारण अनिवार्य रूप से करते है । सभी देवी-देवताओं की स्तुति के मंत्र भी अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी यज्ञ या पूजा समपन्न होता है, तो उसके बाद भगवान की आरती की जाती और आरती के पूर्ण होते ही इस दिव्य व अलौकिक मंत्र को विशेष रूप से बोला जाता है ।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि ।।1

मन्दारमालाकुलितालकायै कपालमालांकितकन्धराय।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय॥2॥

श्री अखण्डानन्दबोधाय शोकसन्तापहारिणे।
सच्चिदानन्दस्वरूपाय शंकराय नमो नम:॥3॥

- इस अलौकिक मंत्र के प्रत्येक शब्द में भगवान शिवजी की स्तुति की गई हैं । इसका अर्थ इस प्रकार है- कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले । करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं । संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं । भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं । सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है ।

अर्थात- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

आखिर आरती के बाद यही मंत्र क्यों????

किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं । भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है । ये माना जाता है कि भगवान शिव जी शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी प्रवत्ति वाला है ।

लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य और सुंदर है । भगवान शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति ।

ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे, शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं । ऐसे शिवजी हमारे मन में शिव वास कर, मृत्यु का भय दूर करें।

 ्रीहरि 🚩   इस शरीर को त्याग कर इस जगत में दूसरा शरीर धारण करना भी सुव्यवस्थित है, मनुष्य तभी मरता है जब यह निश्चित हो ज...
30/05/2020

्रीहरि 🚩

इस शरीर को त्याग कर इस जगत में दूसरा शरीर धारण करना भी सुव्यवस्थित है, मनुष्य तभी मरता है जब यह निश्चित हो जाता है कि अगले जीवन में उसे किस प्रकार का शरीर प्राप्त होगा, इसका निर्णय उच्च अधिकारी करते हैं, स्वयं जीव नहीं करता इस जीवन में अपने कर्मो के अनुसार हम उन्नति या अवनति करते हैं, यह जीवन अगले जीवन की तैयारी है।

अतएव यदि हम इस जीवन में भगवद्धाम पहुँचने की तैयारी कर लेते हैं तो इस शरीर को त्यागने के बाद हम भगवान् के ही सदृश आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करते हैं, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अध्यात्मवादियों के कई प्रकार है- ब्रह्मवादी, परमात्मावादी तथा भक्त, और जैसा कि उल्लेख हो चुका है, ब्रह्मज्योति (आध्यात्मिक आकाश) में असंख्य आध्यात्मिक लोक है, इन लोकों की संख्या भौतिक जगत के लोकों की संख्या से कहीं अधिक बड़ी है, यह भौतिक जगत अखिल सृष्टि का केवल चतुर्थाश है "एकांशेष स्थितो जगतः"

इस भौतिक खण्ड में लाखों करोडों ब्रह्माण्ड है, जिनमें अरबों लोक और तारें है, किन्तु यह सारी भौतिक सृष्टि सम्पूर्ण सृष्टि का एक खण्ड मात्र है, अधिकांश सृष्टि तो आध्यात्मिक आकाश में है, जो व्यक्ति परब्रह्म से तदाकार होना चाहता है वह तुरन्त ही परमेश्वर की ब्रह्मज्योति में भेज दिया जाता है, और इस तरह वह आध्यात्मिक आकाश को प्राप्त होता है, जो भक्त भगवान् के सान्निध्य का भोग करना चाहता है वह वैकुण्ठ लोको में प्रवेश करता है, जिनकी संख्या अनन्त है।

जहाँ पर परमेश्वर अपने पूर्ण अंशो, चतुर्भुज नारायण के रूप में तथा प्रधुम्न, अनिरुद्ध तथा गोविन्द जैसे विभिन्न नामों से भक्तों के साथ-साथ रहते हैं, अतएव जीवन के अन्त में अध्यात्मवादी ब्रह्मज्योति, परमात्मा या भगवान् श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं, प्रत्येक दशा में वे आध्यात्मिक आकाश में प्रविष्ट होते हैं, लेकिन केवल भक्त या परमेश्वर से सम्बन्धित रहने वाला ही वैकुण्ठलोक में या गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करता है।

सज्जनों! इसमें कोई सन्देह नहीं है, इस पर दृढ़ विश्वास करना चाहियें, हमें चाहिये कि जो हमारी कल्पना से मेल नहीं खाता उसका बहिष्कार न करें, हमारी मनोवृत्ति अर्जुन की सी होनी चाहिये, आपने जो कुछ कहा उस पर मैं विश्वास करता हूँ, अतएव जब भगवान् यह कहते हैं कि मृत्यु के समय जो भी ब्रह्म, परमात्मा या भगवान् के रूप में उनका चिन्तन करता है वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं है, इस पर अविश्वास करने का प्रश्न ही नहीं उठता?

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।

भगवद्गीता में (8/6) उस सामान्य सिद्धान्त की भी व्याख्या है जो मृत्यु के समय ब्रह्म का चिन्तन करने से आध्यात्मिक धाम में प्रवेश करना सुगम बनाता है, मनुष्य अपने इस शरीर को त्यागते समय जिस-जिस भाव का स्मरण करता है, वह अगले जन्म में उस-उस भाव को निश्चित रूप से प्राप्त होता है, सज्जनों! अब सर्वप्रथम हमें यह समझना चाहिये कि भौतिक प्रकृति परमेश्वर की एक शक्ति का प्रदर्शन है, विष्णु पुराण में (6/7/61) भगवान् की समग्र शक्तियों का वर्णन हुआ है।

विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा।
अविधाकर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते।।

परमेश्वर की शक्तियाँ विविध तथा असंख्य हैं और हमारी बुद्धि के परे है, लेकिन बड़े-बड़े विद्वान् मुनियों या मुक्तात्माओं ने इन शक्तियों का अध्ययन करके इन्हें तीन भागों में बाँटा है, सारी शक्तियाँ विष्णु-शक्ति है, अर्थात् वे भगवान् विष्णु की विभिन्न शक्तियाँ है, पहली शक्ति परा या आध्यात्मिक है जीव भी परा शक्ति है जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अन्य अपरा शक्तियाँ भौतिक है जो तामसी है, मृत्यु के समय हम या तो इस संसार की अपरा शक्ति में रहते हैं या फिर आध्यात्मिक जगत की शक्ति में चले जाते हैं।

सज्जनों! जीवन में हम या तो भौतिक या आध्यात्मिक शक्ति के विषय में सोचने के आदी है, हम अपने विचारों को भौतिक शक्ति से आध्यात्मिक शक्ति में किस प्रकार ले जा सकते हैं? ऐसे बहुत से साहित्य है- यथा समाचार पत्र-पत्रिकायें, उपन्यास जो हमारे विचारों को भौतिक शक्ति से भर देते हैं, हमें ऐसे साहित्य में लगे अपने चिन्तन को वैदिक साहित्य की ओर मोड़ना है, अतएव महर्षियों ने अनेक वैदिक ग्रन्थ लिखे हैं, जैसे पुराण, ये पुराण कल्पनाप्रसूत नहीं है, अपितु ऐतिहासिक लेख हैं।

मायामुग्ध जीवेर नाहि स्वतः कृष्णज्ञान।
जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण।।

चैतन्य-चरितामृत में (मध्य 20/122) यह कथन है- भुलक्कड़ जीवों या बद्धजीवों ने परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को भुला दिया है और वे सब भौतिक कार्यों के विषय में सोचने में मग्न रहते हैं, इनकी चिन्तन शक्ति को आध्यात्मिक आकाश की ओर मोड़नेके लिये ही कृष्णद्वैपायन व्यास ने प्रचुर वैदिक ग्रन्थ प्रदान किये है, सर्वप्रथम उन्होंने वेद के चार विभाग किये, फिर उन्होंने उनकी व्याख्या पुराणोंमें की, और अल्पज्ञों के लिये उन्होंने महाभारत की रचना की, महाभारत में ही भगवद्गीता दी हुई है।

तत्पश्चात वैदिक साहित्य का सार वेदान्त-सूत्र में दिया गया है और भावी पथ-प्रदर्शन के लिये उन्होंने वेदान्त-सूत्र का सहज भाष्य भी कर दिया जो श्रीमद्भागवतम् कहलाता है, हम इन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन में अपना चित्त लगाना चाहियें, जिस प्रकार भौतिकतावादी लोग नाना प्रकार के समाचार पत्र-पत्रिकायें तथा अन्य संसारी साहित्य को पढ़ने में ध्यान लगाते हैं, उसी तरह हमें भी व्यासदेव द्वारा प्रदत्त साहित्य के अध्ययन में ध्यान लगाना चाहियें, इस प्रकार हम मृत्यु के समय परमेश्वर का स्मरण कर सकेंगे।

श्री हरि 🚩"C"

18/05/2020

#शिव .....🚩

भगवान शिव शंकर बहुत भोले हैं, इसीलिए हम उन्हें भोलेभंडारी कहते है , यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा से उन्हें सिर्फ एक लोटा पानी भी अर्पित करे तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं।

भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कुछ छोटे और अचूक उपायों के बारे शिवपुराण में भी लिखा है, ये उपाय इतने सरल हैं कि इन्हें बड़ी ही आसानी से किया जा सकता है। हर समस्या के समाधान के लिए शिवपुराण में एक अलग उपाय बताया गया है, ये उपाय इस प्रकार हैं-

शिवपुराण के अनुसार इन छोटे उपायों से भगवान शिव को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है :-

1~भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2~ तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3~जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4~गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।

यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद जरूरतमंदों में बांट देना चाहिए।

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन-सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से क्या फल मिलता है?

1~बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है, सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा भगवान शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2~तीक्ष्ण बुद्धि के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

3~शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

4~शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

5~शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।

6~यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर है तो उसे उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का अभिषेक गौ माता के शुद्ध घी से करना चाहिए ।

शिवपुराण के अनुसार,भगवान शिव को कौन-सा फूल चढ़ाने से क्या फल मिलता है?

1~ लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2~चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है।

3~अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4~शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5~बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6~जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7~कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8~हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9~धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है।

10~दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

इन उपायों से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव?

1~ सोमवार के 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ॐ नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं, इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

2~अगर आपके घर में किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सोमवार को सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें तथा गुग्गुल का धूप दें।

3~ सोमवार को शिवलिंग पर केशर मिला दुध चढाने से विवाह कार्य में आ रही बाधा दूर होती है।

4~ सोमवार की नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं। इससे जीवन में ‘राजा’ ‘महाराजा’ जैसी सुख-समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।

5~ सोमवार को गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी।

6~ सोमवार को रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद शिव मंदिर में भगवान शिव का जल से अभिषेक कर उन्हें काले तिल अर्पण करें तत्पश्चात मन ही मन में ॐ नम: शिवाय मंत्र का जप करें। इससे मन को शांति मिलेगी।

सोमवार किसी नदी या तालाब जाकर ॐ नमः शिवाय का जप करते हुए आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं, यह धन प्राप्ति का बहुत ही सरल उपाय है।

शिव की पूजा से बढ़ाए आमदनी ?
सावन के महीने में या सोमवार को किसी भी दिन घर में पारद शिवलिंग की स्थापना करें और उसकी यथा विधि पूजन करें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का 108 बार जप करें-

ऐं ह्रीं श्रीं ऊं नम: शिवाय: श्रीं ह्रीं ऐं
प्रत्येक मंत्र के साथ बिल्वपत्र पारद शिवलिंग पर चढ़ाएं, बिल्वपत्र के तीनों दलों पर लाल चंदन से क्रमश: ऐं, ह्री, श्रीं लिखें। अंतिम 108 वां बिल्वपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद निकाल लें तथा उसे अपने पूजन स्थान पर रखकर प्रतिदिन उसकी पूजा करें।

संतान प्राप्ति के लिए अद्भुत उपाय?
सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव का पूजन करें, इसके पश्चात गेहूं के आटे से 11 शिवलिंग बनाएं। अब प्रत्येक शिवलिंग का शिव महिम्न स्त्रोत से जलाभिषेक करें। इस प्रकार 11 बार जलाभिषेक करें, उस जल का कुछ भाग प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। यह प्रयोग लगातार 21 दिन तक करें। गर्भ की रक्षा के लिए और संतान प्राप्ति के लिए गर्भ गौरी रुद्राक्ष भी धारण करें। इसे किसी शुभ दिन शुभ मुहूर्त देखकर धारण करें।

उत्तम स्वास्थ्य और बीमारी ठीक करने के लिए उपाय?

किसी सोमवार को पानी में दूध व काले तिल डालकर शिवलिंग का अभिषेक करें, अभिषेक के लिए तांबे के बर्तन को छोड़कर किसी अन्य धातु के बर्तन का उपयोग करें।

अभिषेक करते समय ॐ जूं स: मंत्र का जाप करते रहें। इसके बाद भगवान शिव से रोग निवारण के लिए प्रार्थना करें और प्रत्येक सोमवार को रात में सवा नौ बजे के बाद गाय के सवा पाव कच्चे दूध से शिवलिंग का अभिषेक करने का संकल्प लें। इस उपाय से बीमारी ठीक होने में लाभ मिलता है ।

ः_शिवाय 🚩

17/05/2020

ौन_हम_या_अफ़रीदी...?

यह वही #अफ़रीदी है, जिसके NGO में दान देने के लिए हरभजन सिंह और युवराज सिंह ने ट्विटर पर लाइव वीडियो डालकर जनता से अपील की थी, अफ़रीदी की एक आवाज पर दोनों पूर्व भारतीय स्टार खिलाड़ी कटोरा लेकर जनता के सामने आ खड़े हुए थे! वो गधा होकर भी गुर्रा रहा है, और तुम शेर होकर भी ढेंचू ढेंचू करे जा रहे हो

मैं अफ़रीदी के इस क़दम से जरा भी विचलित नहीं हूँ! चूँकि वह पाकिस्तान का है तो मुझे उसके वयान से कोई आपत्ति नहीं है, वह अपने देश के हित में खुलकर बोल रहा है, राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए उसने अपने सभी प्रोफेशनल रिलेशन्स को ठोकर मार दी।

यह वाकया कोई नया नहीं है, पूर्व पाकिस्तानी कप्तान इंजमाम उल हक जैसे क्रिकेट जगत के मशहूर खिलाड़ियों के साथ साथ पाकिस्तानी टीम के सदश्य खेल के अन्य प्रारूपों में भी भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हुए कट्टर देशभक्ति का अद्वितीय उदाहरण पेश करते रहे हैं। वर्तमान पाक प्रधानमंत्री इमरान खान से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है।

बाबजूद इसके कि पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद का वाहक, इस्लामिक आतंकवाद का गढ़ होने के कारण एवं अस्लामिक धर्मानुयायियों के ऊपर हो रहे अत्याचारी धर्म परिवर्तन कराने के कारण फिलाहल अलग थलग पड़ा है, वह आर्थिक रूप से कंगाल हो चुका है, कुछ क्षेत्रों में भुखमरी फैली हुई है, ऐसे में जिम्मेबारी बनती है कि प्रबुद्ध वर्ग देश में शांति स्थापित करने एवं विश्व के रवैये को अपने पक्ष में करने के लिए इस प्रकार की हर गतिविधि को विराम दे।

लेक़िन आप देख ही रहे होंगे, उन्होंने सभी दवावों को ताक में रख दिया है, और कट्टरता के साथ देश की किसी भी परिस्तिथि में उसके साथ खड़े हैं, उनके आंतरिक मसले जो भी हों वो भारत या हिंदुओं के विरुद्ध बोलना नहीं छोड़ते। जब कोरोना ने बुहान में अपने पैर पसार लिए थे तब मोदी जी ने पहले अपने देश के नागरिकों को वहाँ से एयरलिफ्ट किया, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के नागरिकों को भी एयरलिफ़्ट किया गया।

लेकिन इतनी विकराल स्तिथि होने पर भी पाकिस्तान ने डरके मारे अपने नागरिकों को वहाँ से निकालने से साफ़ मना करके उन्हें उनके अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया था, तो मानवता के नाते मोदी जी ने दुश्मनी को भुलाकर पाकिस्तान के नागरिकों को वहाँ से सुरक्षित वहाँ से निकाललाने के लिए पाकिस्तान को मदद की पेशकश की थी। जिसका ज़बाब चीन में फँसे पाकिस्तानी नागरिकों ने वीडियो जारी करके दिया था, और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की प्रशंशा करते हुए मोदी जी को भला बुरा कहा था।

कहने का तात्पर्य यह है, कि जब हमें हमारे देश ने हमें पाला है, हमारी प्रतिष्ठा को बढ़ाया है, हमारे सुख दुःख में समान साथ दिया है, एक क्रिकेटर होने के नाते ही इस जनता ने तुम्हें अपनी पलकों पर बिठा लिया! लेक़िन तुमने इसका मोल भारत माता को बेइज्जत करके चुकाया। तुमने जिसकी मदद की पेशकश की थी ट्विटर पर वीडियो जारी करके। आज उसी शाहिद अफरीदी ने तुम्हारी भारत माता और उसके प्रधान सेवक को गालियाँ देकर 130 करोड़ देशवासियों की इज्जत का पलीता बना दिया।

अरे भाई वो बौराया हुआ कुत्ता है, उसका कोई स्टैंडर नहीं है, वो तो ऐसे ही भौंकेगा और तुम हो कि यह जानते हुए भी उसे शेरू शेरू कहकर घर बर्बाद करने के लिए आमंत्रित कर रहे हो। अरे ददा जब वो अपने बौरत्व पर गुरूर रखता है तो आप भी अपनी इन हरकतों से अपने देश की इज्जत की लंका तो न लगवाओ।

#भज्जी_युवी_माँफी_माँगो

आज हम आपको श्रीमद्देवीभागवत पुराण के बारे में बतायेगें!श्रीमद् देवी भागवत् पुराण परम पवित्र वेद की प्रसिद्ध श्रुतियों के...
15/05/2020

आज हम आपको श्रीमद्देवीभागवत पुराण के बारे में बतायेगें!

श्रीमद् देवी भागवत् पुराण परम पवित्र वेद की प्रसिद्ध श्रुतियों के अर्थ से अनुमोदित, अखिल शास्त्रों के रहस्यका स्रोत तथा आगमों में अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है, यह सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुकीर्ति, मन्वन्तर आदि पाँचों लक्षणों से पूर्ण हैं, पराम्बा भगवती के पवित्र आख्यानों से युक्त है, इस पुराण में लगभग अट्ठारह हजार श्लोक है।

एक बार भगवत् अनुरागी तथा पुण्यात्मा महर्षियों ने श्री वेदव्यास के परम शिष्य सूतजी से प्रार्थना की- हे ज्ञानसागर! आपके श्रीमुख से विष्णु भगवान और शंकर के दैवी चरित्र तथा अद्भुत लीलायें सुनकर हम बहुत सुखी हुयें, ईश्वर में आस्था बढ़ी और ज्ञान प्राप्त किया।

अब कृपा कर मानव जाति को समस्त सुखों को उपलब्ध कराने वाले, आत्मिक शक्ति देने वाले तथा भोग और मोक्ष प्रदान कराने वाले पवित्रतम पुराण आख्यान सुनाकर अनुगृहीत कीजियें ज्ञानेच्छु और विनम्र महात्माओं की निष्कपट अभिलाषा जानकर महामुनि सूतजी ने अनुग्रह स्वीकार किया।

सूतजी महाराज ने कहा- जन कल्याण की लालसा से आपने बड़ी सुंदर इच्छा प्रकट की, मैं आप लोगों को उसे सुनाता हूँ, यह सच है कि श्री मद् देवी भागवत् पुराण सभी शास्त्रों तथा धार्मिक ग्रंथों में महान है, इसके सामने बड़े-बड़े तीर्थ और व्रत नगण्य हैं, इस पुराण के सुनने से पाप सूखे वन की भांति जलकर नष्ट हो जाते हैं, जिससे मनुष्य को शोक, क्लेश, दु:ख आदि नहीं भोगने पड़ते।

जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश के सामने अंधकार छंट जाता है, उसी प्रकार भागवत् पुराण के श्रवण से मनुष्य के सभी कष्ट, व्याधियां और संकोच समाप्त हो जाते हैं, महात्माओं ने सूतजी से भागवत् पुराण के संबंध में ये जिज्ञासाएं रखीं, पवित्र श्रीमद् देवी भागवत् पुराण का आविर्भाव कब हुआ?

इसके पठन-पाठन का समय क्या है? इसके श्रवण-पठन से किन-किन कामनाओं की पूर्ति होती है? सर्वप्रथम इसका श्रवण किसने किया? इसके पारायण की विधि क्या है? महर्षि पराशर और देवी सत्यवती के संयोग से श्रीनारायण के अंशावतार देव व्यासजी का जन्म हुआ।

व्यासजी ने अपने समय और समाज की स्थिति पहचानते हुए वेदों को चार भागों में विभक्त किया, और अपने चार पटु शिष्यों को उनका बोध कराया, इसके पश्चात् वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित नर-नारियों एवम् मंदबुद्धियों के कल्याण के लिए अट्ठारह पुराणों की रचना की, ताकि वे भी धर्म-पालन में समर्थ हो सकें।

सूतजी ने कहा- महात्मन्! गुरुजी के आदेशानुसार सत्रह पुराणों के प्रसार एवं प्रचार का दायित्व मुझ पर आया, किंतु भोग और मोक्षदाता भागवत पुराण स्वयं गुरुजी ने जन्मेजय को सुनाया, आप जानते हैं- जन्मेजय के पिता राजा परीक्षित को तक्षक सर्प ने डस लिया था, और राजा ने अपनी हत्या के कल्याण के लिए श्रीमद् भागवत् पुराण का श्रवण किया था।

राजा ने नौ दिन निरंतर लोकमाता भगवती दुर्गा की पूजा-आराधना की तथा मुनि वेदव्यास के मुख से लोकमाता की महिमा से पूर्ण भागवत पुराण का श्रवण किया, देवी पुराण की महिमा का बहुत बड़ा पावन माहात्म्य है, देवी पुराण के पढ़ने एवं सुनने से भयंकर रोग, अतिवृष्टि, अनावृष्टि भूत-प्रेत बाधा, कष्ट योग और दूसरे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आधिदैहिक कष्टों का निवारण हो जाता है।

सूतजी ने इसके लिए एक कथा का उल्लेख करते हुए कहा- वसुदेवजी द्वारा देवी भागवत पुराण को पारायण का फल ही था कि प्रसेनजित को ढूंढ़ने गये श्रीकृष्ण संकट से मुक्त होकर सकुशल घर लौट आयें थे, इस पुराण के श्रवण से दरिद्र धनी, रोगी-नीरोगी तथा पुत्रहीन स्त्री पुत्रवती हो जाती है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र चतुर्वर्णों के व्यक्तियों द्वारा समान रूप से पठनीय एवं श्रवण योग्य यह पुराण आयु, विद्या, बल, धन, यश तथा प्रतिष्ठा देने वाला अनुपम ग्रंथ है, सूतजी बोले- देवी भागवत की कथा श्रवण से भक्तों और श्रद्धालु श्रोताओं को ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है, मात्र क्षणभर की कथा श्रवण से भी देवी के भक्तों को कभी कष्ट नहीं आता।

सभी तीर्थों और व्रतों का फल देवी भागवत के एक बार के श्रवण मात्र से प्राप्त हो जाता है, सतयुग, त्रेता तथा द्वापर में तो मनुष्य के लिए अनेक धर्म-कर्म हैं, किंतु कलियुग में तो पुराण सुनने के अतिरिक्त कोई अन्य धार्मिक आचरण नहीं है, कलियुग के धर्म-कर्महीन तथा आचारहीन मनुष्यों के कल्याण के लिए ही श्री व्यासजी ने पुराण-अमृत की सृष्टि की थी।

देवी पुराण के श्रवण के लिए यों तो सभी समय फलदायी है, किंतु फिर भी आश्विन, चैत्र, मार्गशीर्ष तथा आषाढ़ के महिने में एवं दोनों नवरात्रों में पुराण के श्रवण से विशेष पुण्य होता है, वास्तव में यह पुराण नवाह्र यज्ञ है, जो सभी पुण्य कर्मों से सर्वोपरि एवं निश्चित फलदायक है।

इस नवाह्न यज्ञ से छली, मूर्ख, अमित्र, वेद-विमुख निंदक, चोर, व्यभिचारी, उठाईगीर, मिथ्याचारी, गो निंदक, देवता निंदक और ब्राह्मण निंदक तथा गुरुद्वेषी जैसे भयानक पापी शुद्ध और पापरहित हो जाते हैं, बड़े-बड़े व्रतों, तीर्थ-यात्राओं, बृहद् यज्ञों या तपों से भी वह पुण्य फल प्राप्त नहीं होता जो श्रीमद् देवी भागवत् पुराण के नवाह्र पारायण से प्राप्त होता है।

न गंगा न गया न काशी न नैमिषं न मथुरा न पुष्करम्।
पुनाति सद्य: बदरीवनं नो यथा हि देवीमख एष विप्रा:।।

गंगा, गया, काशी, नैमिषारण्य, मथुरा, पुष्कर और बदरीवन आदि तीर्थों की यात्रा से भी वह फल प्राप्त नहीं होता, जो नवाह्र पारायण रूप देवी भागवत श्रवण यज्ञ से प्राप्त होता है, सूतजी के अनुसार- आश्विन् मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को स्वर्ण सिंहासन पर श्रीमद् भागवत की प्रतिष्ठा कराकर ब्राह्मण को देने वाला देवी के परम पद को प्राप्त कर लेता है।

इस पुराण की महिमा इतनी महान है कि नियमपूर्वक एक-आध श्लोक का पारायण करने वाला भक्त भी मां भगवती की कृपा प्राप्त कर लेता है, भगवान् श्रीकृष्ण जब प्रसेनजित को ढूंढ़ने के प्रयास में खो गयें थे जो श्रीदेवी भगवती के आशीर्वाद से सकुशल लौट आयें।

यह वृत्तांत महर्षियों की इच्छा से विस्तार से सुनाते हुए श्री सूतजी कहने लगे- सज्जनों! बहुत पहले द्वारका पुरी में भोजवंशी राजा सत्राजित रहता था, सूर्य की भक्ति-आराधना के बल पर उसने स्वमंतक नाम की अत्यंत चमकदार मणि प्राप्त की, मणि की क्रांति से राजा स्वयं सूर्य जैसा प्रभा-मंडित हो जाता था।

इस भ्रम में जब यादवों ने श्रीकृष्ण से भगवान सूर्य के आगमन की बात कही, तब अंतर्यामी कृष्ण ने यादवों की शंका का निवारण करते हुए कहा कि आने वाले महानुभाव स्वमंतक मणिधारी राजा सत्राजित हैं, सूर्य नहीं, स्वमंतक मणि का गुण था कि उसको धारण करने वाला प्रतिदिन आठ किलो स्वर्ण प्राप्त करेगा।

उस प्रदेश में किसी भी प्रकार की मानवीय या दैवीय विपत्ति का कोई चिह्न तक नहीं था, स्वमंतक मणि प्राप्त करने की इच्छा स्वयं कृष्ण ने भी की लेकिन सत्राजित ने अस्वीकार कर दिया, एक बार सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को धारण करके घोड़े पर चढ़कर शिकार को गया तो एक सिंह ने उसे मार डाला।

संयोग से जामवंतजी नामक रीछ ने सिंह को ही मार डाला और वह मणि को लेकर अपनी गुफा में आ गयें, जामवंतजी की बेटी मणि को खिलौना समझकर खेलने लगी, प्रसेनजित के न लौटने पर द्वारका में यह अफवाह फैल गई कि कृष्ण को सत्राजित द्वारा मणि देने से इनकार करने पर दुर्भावनावश कृष्ण ने प्रसेनजित की हत्या करा दी और मणि पर अपना अधिकार कर लिया।

कृष्ण इस अफवाह से दु:खी होकर प्रसेनजित को खोजने के लिए निकल पड़े, वन में कृष्ण और उनके साथियों ने प्रसेनजित के साथ एक सिंह को भी मरा पाया, उन्हें वहां रीछ के पैरों के निशानों के संकेत भी मिले, जो भीतर गुफा में प्रवेश के सूचक थे, इससे कृष्ण ने सिंह को मारने तथा मणि के रीछ के पास होने का अनुमान लगाया।

मणि ढूंढने को गयें श्रीकृष्ण नेअपने साथियों को बाहर रहकर प्रतीक्षा करने के लिये कहकर स्वयं गुफा के भीतर प्रवेश कर गयें, काफी समय बाद भी कृष्ण के वापस न आने पर निराश होकर लौटे साथी ने कृष्ण के भी मारे जाने का मिथ्या प्रचार कर दिया, कृष्ण के न लौटने पर उनके पिता वसुदेव पुत्र-शोक में व्यथित हो उठे।

उसी समय महर्षि नारदजी का आगमन हुआ, यह समाचार जानकर नारदजी ने वसुदेव से श्रीमद् देवी भागवत पुराण के श्रवण का उपदेश दिया, वसुदेव मां भगवती की कृपा से पूर्व परिचित थे, उन्होंने नारदजी से कहा- देवर्षि! देवकी के साथ कारागारवास करते हुए जब छ: पुत्र कंस के हाथों मारे जा चुके थे तो हम दोनों पति-पत्नी काफी व्यथित और अंसतुलित हो गये थे।

तब अपने कुल पुरोहित महर्षि गर्ग से परामर्श किया और कष्ट से छुटकारा पाने का उपाय पूछा, गुरुदेव ने जगदम्बा मां की गाथा का पारायण करने को कहा, कारागार में होने के कारण मेरे लिए यह संभव नहीं था, अत: गुरुदेव से ही यह कार्य संपन्न कराने की प्रार्थना की।

वसुदेवजी ने कहा- मेरी प्रार्थना स्वीकार करके गुरुदेव ने विंध्याचल पर्वत पर जाकर ब्राह्मणों के साथ देवी की आराधना-अर्चना की, विधि-विधानपूर्वक देवी भागवत का नवाह्र यज्ञ किया, अनुष्ठान पूर्ण होने पर गुरुदेव ने मुझे इसकी सूचना देते हुए कहा- देवी ने प्रसन्न होकर यह आकाशवाणी की है- मेरी प्रेरणा से स्वयं विष्णु पृथ्वी के कष्ट निवारण हेतु वसुदेव-देवकी के घर अवतार लेंगे।

वसुदेव को चाहिये कि उस बालक को गोकुल ग्राम के नंद-यशोदा के घर पहुंचा दें, और उसी समय उत्पन्न यशोदा की बालिका को लाकर आठवीं संतान के रूप में कंस को सौंप दें, कंस यथावत् बालिका को धरती पर पटक देगा, वह बालिका कंस के हाथ से तत्काल छूटकर दिव्य शरीर धारण कर, मेरे ही अंश रूप से लोक कल्याण के लिए विध्यांचल पर्वत पर वास करेगी।

गर्ग मुनि के द्वारा इस अनुष्ठान फल को सुन कर मैंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आगे घटी घटनाएं मुनि के कथनानुसार पूरी कीं, और कृष्ण की रक्षा की, यह विवरण सुनाकर वसुदेव नारदजी से कहने लगे-मुनिवर! सौभाग्य से आपका आगमन मेरे लिए शुभ है, अत: आप ही मुझे देवी भागवत पुराण की कथा सुनाकर उपकृत करें।

वसुदेव के कहने पर नारद ने अनुग्रह करते हुए नवाह्र परायण किया, वसुदेव ने नवें दिन कथा समाप्ति पर नारदजी की पूजा-अर्चना की भगवती मां की माया से श्रीकृष्ण जब गुफा में प्रविष्ट हुए तो उन्होंने एक बालिका को मणि से खेलते देखा, जैसे ही कृष्ण ने बालिका से मणि ली, तो बालिका रो उठी।

बालिका के रोने की आवाज को सुनकर जामवंत वहां आ पहुंचा तथा कृष्ण से युद्ध करने लगा, दोनों में सत्ताईस दिन तक युद्ध चलता रहा, देवी की कृपा से जामवंत लगातार कमोजर पड़ता गया तथा श्रीकृष्ण शक्ति-संपन्न होते गये, अंत में उन्होंने जामवंत को पराजित कर दिया।

भगवती की कृपा से जामवंत को पूर्व स्मृति हो आई, त्रेता में रावण का वध करने वाले राम को ही द्वापर में कृष्ण के रूप में अवतरित जानकर उनकी वंदना की, अज्ञान में किए अपराध के लिए क्षमा मांगी, मणि के साथ अपनी पुत्री जांबवती को भी प्रसन्नतापूर्वक कृष्ण को समर्पित कर दिया।

मथुरा में कथा के समाप्त होने के बाद वसुदेव ब्राह्मण भोज के बाद आशीर्वाद ले रहे थे, उसी समय कृष्ण मणि और जांबवती के साथ वहां पहुच गयें, कृष्ण को वहां देखकर सभी की प्रसन्नता की कोई सीमा न रही, भगवती का आभार प्रकट करते हुए वसुदेव-देवकी ने श्रीकृष्ण का अश्रुपूरित नेत्रों से स्वागत किया, वसुदेव का सफल काम बनाकर नारद देवलोक वापस लौट गयें।

देवी भागवत पुराण के अनुसार आगत मुनियों को यह कथा सुनाते हुए सूतजी बोले-श्रद्वालु ऋषियों! कथा श्रवण के लिए श्रद्धालु जनों को शुभ मुहूर्त निकलवाने के लिए किसी ज्योतिर्विद् से सलाह लेनी चाहियें या फिर नवरात्रों में ही यह कथा-श्रवण उपयुक्त है, इस अनुष्ठान की सूचना विवाह के समान ही अपने सभी बंधु-बांधवों, सगे-संबंधियों, परिचितों, ब्राह्मण, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों एवं स्त्रियों को भी आमंत्रित करना चाहियें।

जो जितना अधिक समय श्रवण में दे सके, उतना अवश्य दे, सभी आगंतुकों का स्वागत सत्कार आयोजक का धर्म है, कथा-स्थल को गोबर से लीपकर एक मंडप और उसके ऊपर एक गुंबद के आकार का चंदोवा लटकाकर इसके ऊपर देवी चित्र युक्त ध्वजा फहरा देनी चाहियें, कथा सुनाने के लिए सदाचारी, कर्मकांडी, निर्लोभी कुशल उपदेशक को ही नियुक्त करना चाहिये।

प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर कलश की स्थापना करनी चाहिये, गणेश, नवग्रह, योगिनी, मातृका, क्षेत्रपाल, बटुक, तुलसी विष्णु तथा शंकर आदि की पूजा करके भगवती दुर्गा की आराधना करनी चाहिये, देवी की षोडशोपचार पूजा-अर्चना करके देवी भागवत ग्रंथ की पूजा करनी चाहिये तथा देवी यज्ञ निर्विघ्न समाप्त होने की अभ्यर्थना करनी चाहिये।

प्रदक्षिणा और नमस्कार करते हुए देवी की स्तुति प्रारंभ करनी चाहिये, तत्पश्चात् ध्यानावस्थित होकर देवी कथा श्रवण करना चाहिये, कथा के श्रवणकाल में श्रोता अथवा वक्ता को क्षौर कर्म नहीं करवाना चाहियें, भूमि पर शयन ब्रह्मचर्य का पालन सादा भोजन संयम शुद्ध आचरण सत्य भाषण, तथा अहिंसा का व्रत लेना चाहिये।

तामस पदार्थ यथा-प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि का भक्षण भी वर्जित है, स्त्री-प्रसंग का बलपूर्वक त्याग करना चाहिये, नवाह्न यज्ञ की समाप्ति पर नवें दिन अनुष्ठान का उद्यापन करना चाहियें, उस दिन वक्ता तथा भागवत पुराण दोनों की पूजा करनी चाहिये, ब्राह्मण तथा कुमारिकाओं को भोजन एवं दक्षिणा देकर तृप्त करना चाहिये।

गायत्री मंत्र से होम करके स्वर्ण मंजूषा पर अधिष्ठित भागवत पुराण वक्ता ब्राह्मण को दान में देते हुए दक्षिणादि से संतुष्ट करते हुए उसे विदा करना चाहिये, पूर्वोक्त विधि-विधान से निष्काम भाव से पारायण करने वाला श्रोता श्रद्धालु मोक्षपद को और सकाम भाव से पारायण करने वाला अपने अभीष्ट को प्राप्त करता है।

कथा-श्रवण के समय किसी भी प्रकार का वार्तालाप, ध्यानभग्नता, आसन बदलने, ऊंघने या अश्रद्धा से बड़ी भारी हानि हो सकती है, अत: ऐसा नहीं करना चाहिये, सूतजी महाराज ने कहा- अठारह पुराणों में देवी भागवत् पुराण उसी प्रकार सर्वोत्तम है, जिस प्रकार नदियों में गंगा, देवों में शंकर, काव्यों में रामायण, प्रकाश स्रोतों में सूर्य, शीतलता और आह्लाद में चंद्रमा, क्षमाशीलों में पृथ्वी, गंभीरता में सागर और मंत्रों में गायत्री श्रेष्ठ हैं।

यह पुराण श्रवण सब प्रकार के कष्टों का निवारण करके आत्मकल्याण करता है, अत: इसका पारायण सभी के लिए श्रेष्ठ एवं वरेण्य है।

जय माँ भगवती!

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