Acharya Ashish Krishna

Acharya Ashish Krishna Sanatan Theologist, Astrologer, Author, Political Analyst, Musician

श्रीराम जय राम जय जय राम
02/06/2024

श्रीराम जय राम जय जय राम

श्रीराम जय राम जय जय राम
10/05/2024

श्रीराम जय राम जय जय राम

राम राम ॥ Facebook पर शास्त्रार्थ - हमारा मन्तव्य ॥इधर Facebook पर लेखन में, आरम्भिक कुछ वर्षों में तो मैं अत्यधिक सक्री...
25/06/2023

राम राम

॥ Facebook पर शास्त्रार्थ - हमारा मन्तव्य ॥

इधर Facebook पर लेखन में, आरम्भिक कुछ वर्षों में तो मैं अत्यधिक सक्रीय रहा करता था। यहाँ अनेकानेक अवसरों पर मुझसे कुतर्कपूर्ण बहस के प्रयास किये गए।
यद्यपि मैं किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध कभी कुछ नहीं लिखता/बोलता था किन्तु फिर भी अप्रिय स्थितियों का अनेकानेक बार सामना करना पड़ा। पूर्वोत्तर के वयोवृद्ध विद्वान् से लेकर छद्महिन्दुत्ववादी प्रवंचक तक तथा मांसभक्षक पुरोहित से लेकर दीर्घश्मश्रुधारी (लम्बी दाढ़ीवाले) पाखण्डी तक।

किन्तु, सर्वप्रथम तो हम अपने प्रतिकूल किसी शास्त्रचर्चा का आमन्त्रण ही स्वीकार नहीं करते। और यदि किसी शास्त्रचर्चा में जाना भी पड़े तो पहले सुनिश्चित करते हैं की चर्चा हेतु तत्पर विद्वान् का कुल कौनसा हैं, विद्वान् की विद्वत्ता का स्तर क्या/कैसा हैं और चर्चा में नियुक्त मध्यस्थ धर्माधिकारी कौन/कैसे हैं, उनकी विद्वत्ता का स्तर कैसा हैं। इतना सब जांच/परखकर ही किसी शास्त्र सभा में भाग लिया करते हैं अन्यथा कोई भी चुनौती हमे स्वीकार्य नहीं, कोई ललकार महत्त्वपूर्ण नहीं!
ऐसा इसलिए क्योंकि हमें अपने कुल में शिक्षा मिली हैं –
अज्ञ: सुखमाराध्य: सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि तं नरं न रञ्जयति।।
अर्थात् - जो अज्ञानी है उसे सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है। जो विशेष बुद्धिमान् है उसे और भी आसानी से अनुकूल बनाया जा सकता है।किन्तु जो मनुष्य अल्प ज्ञान से गर्वित है उसे स्वयं ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते (मनुष्य की तो बात ही क्या है?)।

अवलोकनार्थ, सिंह और गीदड़ की एक कथा प्रस्तुत हैं

एक गधे ने एक शेर को चुनौती दे दी कि मुझसे लड़ कर दिखा तो जंगल वाले तुझे राजा मान लेंगे लेकिन शेर गधे की बात को अनसुना कर के चुपचाप वहाँ से निकल लिया ।
एक लोमड़ी ने छुप कर यह सब देखा और सुना, तो उस से रहा नहीं गया और वो शेर के पास जा कर बोली – “क्या बात है? उस गधे ने आपको चुनौती दी फिर भी उस से लड़े क्यों नहीं? और ऐसे बिना कुछ बोले चुपचाप जा रहे हो?”

शेर ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया – “मैं शेर हूँ - जंगल का राजा हूँ और रहूँगा। सभी जानवर इस सत्य से परिचित हैं। मुझे इस सत्य को किसी को सिद्ध कर के नहीं दिखाना है। गधा तो है ही गधा और हमेशा गधा ही रहेगा। गधे की चुनौती स्वीकार करने का मतलब मैं उसके बराबर हुआ, गधे की बात का उत्तर देना भी अपना सम्मान कम करना है क्योंकि उसके स्तर की बात का उत्तर देने के लिये मुझे उसके नीचे स्तर तक उतरना पड़ेगा और मेरे उस के लिये नीचे के स्तर पर उतरने से उसका घमण्ड बढ़ेगा। मैं यदि उसके सामने एक बार दहाड़ दूँ तो उसकी लीद निकल जायेगी और वो बेहोश हो जायेगा, अगर मैं एक पंजा मार दूँ तो उसकी गर्दन टूट जायेगी और वो मर जायेगा । गधे से लड़ने से मैं निश्चित रूप से जीत जाऊँगा लेकिन उस से मेरा सम्मान नहीं बढ़ेगा वरन् जंगल के सभी जानवर बोलने लगेंगे कि शेर एक गधे से लड़ कर जीत गया और यह एक तरह से मेरा घोर अपमान ही हुआ।“

यही परिथिति Facebook पर उपस्थित गधों के साथ भी हैं। कारण-अकारण आ धमकते हैं और लग जाते हैं चुनौतियां देने। हम लोग ऐसे-ऐसों की सर्वथा अवहेलना ही करते हैं क्योंकि –
“प्रसह्यमणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्रान्तरा-त्समुद्रमपिसन्तरेत्प्रचलदूर्मिमालाकुलम्।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेन्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।“
अर्थात् – “घड़ियाल (मगर) के मुंह में हाथ डालकर उसके दांतों के बीच से मणि निकाली जा सकती है, चञ्चल तरंगों वाले समुद्र को भी हाथों के सहारे पार करना सहज है, क्रोधित साँप को भी फूल-माला की भाँति सिर पर रख लेना आसान है,परन्तु दुराग्रह ग्रस्त मूर्खों के मन को अनुकूल कर लेना बड़ा कठिन है।“

- “आशीष कृष्ण”

भगवत्कृपा॥

राम राम ॥ प्रसाद ॥शीर्ष्णःशीर्ष्णो जगतस्तस्थुषस्पतिं समया विश्वमा रजः ।सप्त स्वसारः सुविताय सूर्यं वहन्ति हरितो रथे ॥(सप...
21/06/2023

राम राम

॥ प्रसाद ॥

शीर्ष्णःशीर्ष्णो जगतस्तस्थुषस्पतिं समया विश्वमा रजः ।
सप्त स्वसारः सुविताय सूर्यं वहन्ति हरितो रथे ॥
(सप्तम् मण्डल, चतुर्थ अनुवाक्, ६७ सूक्त, मन्त्र १५)
भावार्थ – “सबके शीर्षरूप, सबके स्वामी, रथारूढ़ श्रीसूर्यनारायण को उनके सात घोड़े विश्व-कल्याण के लिए वहन करते हैं।“

--------- “आशीष कृष्णः”

भगवत्कृपा॥

राम राम ॥ भगवान् जगन्नाथ के भक्त - "माधवदास" ॥श्री माधवदास एक उच्च कोटि के संत हुए है।श्री माधवदास कान्यकुब्ज ब्राह्मण थ...
19/06/2023

राम राम

॥ भगवान् जगन्नाथ के भक्त - "माधवदास" ॥

श्री माधवदास एक उच्च कोटि के संत हुए है।श्री माधवदास कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे ।जब इनकी पत्नी स्वर्गलोकको सिधारी,तब इनके हृदयमे संसार से सहसा वैराग्य हो गया और घर छोड़ कर जगन्नाथपुरीका रास्ता पकड़ा।

वहाँ पहुंचकर समुद्रके किनारे एकांत में पड़े रहे और अपने आप को भगवत ध्यान मे तल्लीन कर दिया। ये ऐसे ध्यानमग्न हुए के अन्न-जलकी भी सुध न रही।इस प्रकार जब बिना अन्न-जलके आपको कई दिन बीत गये,तब दयालु जगन्नाथजीने लक्ष्मीजी को आज्ञा दी कि आप स्वयं उत्तम-से-उत्तम भोग सुवर्ण थालमे रखकर मेरे भक्त माधव के पास पंहुचा दे। लक्ष्मी जी प्रभु की आज्ञा पाकर सुवर्ण-थाल श्री माधवदास के पास रखकर चली आयी।जब माधवदास का ध्यान समाप्त हुआ,तब वे स्वर्ण का थाल देखकर भगवत्कृपाका अनुभव करते हुए आनंदाश्रु बहाने लगे। भोग लगाया,प्रसाद पा थालको एक ओर रख दिया;फिर ध्यानमग्न हो गए।

उधर जब भगवान के पट खुले,तब पुजारियोंने सोने का एक थाल न देख बहुत शोर-गुल मचाया। समस्त पुरी मे तलाशी होने लगी। ढूंढते-ढूंढते थाल माधवदास के पास पड़ा पाया गया। माधवदासजी को चोर समझकर उनको चाबुक पड़ने लगे।

रात्रिमें पुजारियोंको भगवान् ने स्वप्न में कहा-‘मैंने माधव की चोट अपने ऊपर ले ली,अब तुम्हारा अनिष्ट कर दूंगा;नहीं तो माधव के चरणोंपर पड़कर अपने अपराध क्षमा करवा लो।’ बेचारे पण्डा दौड़ते हुए माधवदास के पास आये और उनके चरणोमे जा गिरे। माधवदासजी ने तुरंत क्षमा प्रदानकर उन्हें निर्भय किया।

अब माधवदासजी के प्रेमकी दशा ऐसी हो गयी कि जब कभी भगवत्दर्शनके लिए मंदिरमे जाते,तब प्रभुकी मूर्तिको ही एकटक देखते रह जाते।दर्शन समाप्त होने पर तल्लीन अवस्थामे वाही खड़े खड़े पुजारियों के देखते देखते अदृश्य हो जाते। एक बार श्री माधवदासजी रात्रिमें मंदिरमे ही रुके रहे। वह जब रात्रिमें इन्हें ठण्ड लगने लगी तो स्वयं जगन्नाथजीने अपनी रजाई इन्हें ओढ़ा दी।

एक बार माधवदासजी को अतिसार रोग हो गया।वह समुद्र किनारे दूर जा पड़े।वहाँ इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे।ऐसी दशा में जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर आपकी सुश्रुषा करने लगे ,मल साफ़ करने लगे। जब मधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लिया की हो-न-हो यह प्रभु ही हैं।

यह समझ झट उनके चरण पकड़ लिए और विनीत भावसे कहने लग – ‘नाथ! मुझ जैसे अधम के लिये क्यों आपने इतना कष्ट उठाया?फिर प्रभो! आप तो सर्वशक्तिमान् हैं। अपनी शक्तिसे ही मेरे दुःख क्यों न हर लिये,वृथा इतना परिश्रम क्यों किया ?’ भगवान कहने लगे – ‘माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की।तुम जानते हो कि प्रारब्ध भोगने से ही नष्ट होता है-यह मेरा ही नियम है, इसे मै कैसे तोडू? इसीलिए केवल सेवा करके प्रारब्ध-भोग भक्तोसे करवाता हूं और इसकी सत्यता संसारको दिखलाता हूं।’भगवन् यह कहकर अंतर्धान हो गए।

इन घटनाओं से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब तो माधवदास जी की महिमा चारों ओर फैलने लगी। लोग इनको बहुत घेरने लगे। भक्तों के लिये सकामी संसारी जीवों से घिर जाना एक बड़ी आपत्ति है। आपकों यह सूझा कि अब पागल बन जाना चाहिये। बस, आप पागल बन इधर-उधर हरि-ध्वनि करते घूमने लगे। एक दिन आप एक स्त्री के द्वारपर गये और भिक्षा माँगी। वह स्त्री उस समय चौका दे रही थी, उसने मारे क्रोधसे चौकेका पोतना माधव जी के मुँह पर फेककर मारा। आप बड़े प्रसन्न होकर उस पोतने को अपने डेरेपर ले गये। उसे धो-सुखाकर भगवानके मन्दिर में जा उसकी बत्ती बनाकर जलायी, जिसका यह फल हुआ कि उस पोतनेकी बत्ती से ज्यों-ज्यों मन्दिर में प्रकाश फैलने लगा, त्यों-त्यों उस स्त्री के हृदय-मन्दिर में भी ज्ञानका प्रकाश होना प्रारम्भ हुआ। यहाँ तक कि अन्त में वह स्त्री परम भक्तिमती हो गयी और रात-दिन भगवान के ध्यान में मस्त रहने लगी।

एक बार एक शास्त्री पण्डित शास्त्रार्थद्वारा दिग्विजय करते हुए माधवजी के पाण्डित्य की चर्चा सुनकर शास्त्रार्थ करने जगन्नाथपुरी आये और माधवदासजी से शास्त्रार्थ करने का हठ करने लगे। भक्तों को शास्त्रार्थ निर्रथक प्रतीत होता है। माधवदासजीने बहुत मना किया, पर पंडित भला कैसे मानते ? अन्त में माधवदास जी ने एक पत्र पर यह लिखकर हस्ताक्षर कर दिया, ‘माधव हारा, पंडित जीते। पंडित जी इसपर फूले न समाए। तुरंत काशी चल दिए। वहाँ पंडितों की सभा कर वे अपनी विजय का वर्णन करने लगे और वह प्रमाणपत्र लोगों को दिखाने लगे। पंडितों ने देखा तो उस पर यह लिखा पाया, ‘पंडितजी हारे, माधव जीता।’ अब तो पंडित जी क्रोध के मारे आगबबूला हो गए। उल्टे पैर जगन्नाथपुरी पहुँचे। वहाँ माधवदासजी को जी खोल गालियाँ सुनायीं और कहा कि ‘शास्त्रार्थमें जो हारे’ वही काला मुँह कर गदहे पर चढ़ नगर भरमें घूमे।’ माधवदासजी ने बहुत समझाया, पर वे क्यों मानने लगे ? अवकाश पाकर भगवान् माधवदासजी का रूप बना पंडित जी से शास्त्रार्थ करने पहुँचे और भरी सभा में उन्हें खूब छकाया।

अन्त में उनकी शर्त के अनुसार उनका मुँह काला कर गदहेपर चढ़ा, सौ-दो-सौ बालकों को ले धूल उड़ाते नगर में सैर की। माधवदासजीने जब यह हाल सुना, तब भागे और भगवान् के चरण पकड़ उनसे पंडितजीके अपराधों की क्षमा चाही। भगवान् तुरंत अन्तर्धान ध्यान हो गए। माधवदासजी ने पंडित जी को गदहे से उताकर क्षमा माँगी, उनका रोष दूर किया।

पुरी धाम की निरंतर यात्रा करते रहने और अपने आराध्य श्री जगन्नाथ स्वामी का निरंतर चिंतन करते रहने के कारण इनका नाम माधवदास जगन्नाथी प्रसिद्ध है ।

॥भक्त और भगवान् की जय॥

----------------”आशीष कृष्णः”

“भगवत्कृपा”

राम राम ॥ रथोत्सव और आषाढीय नवरात्री ॥सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना यदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥नीलांच...
19/06/2023

राम राम

॥ रथोत्सव और आषाढीय नवरात्री ॥

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना यदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥

नीलांचल निवासाय नित्याय परमात्मने।
बलभद्र सुभद्राभ्याम् जगन्नाथाय ते नमः॥

रथोत्सव और आषाढीय नवरात्रि की शुभ-मंगलकामनाएं॥

भगवत्कृपा॥

राम राम ॥ हमारी सफलता (भगवत्कृपा से) ॥मैं आप सभी को आज सुबह घटी विलक्षण घटना बताने जा रहा हूँ। (मेरे परिवार के लिए तो सा...
14/06/2023

राम राम

॥ हमारी सफलता (भगवत्कृपा से) ॥

मैं आप सभी को आज सुबह घटी विलक्षण घटना बताने जा रहा हूँ। (मेरे परिवार के लिए तो सामान्य हैं परन्तु सर्वसाधारण हेतु विलक्षण नहीं अतिविलक्षण हो सकती हैं)।

वृंदा (अवस्था 3 वर्ष) आज सुबह-सुबह अपने पापा (मेरा शिष्य) के साथ हमारे निवास पर आई।
जिस समय पिता-पुत्री आये, वो समय सामान्यतः हमसे भेंट हो पाने का समय नहीं हैं (उस समय हम नहीं मिलते)। बच्ची के पापा यह बात भलीभांति जानते थे किन्तु बच्ची तो बच्ची ठहरी!
जब बच्ची के पापा अपना काम पूर्ण करके घर जाने लगे तब बच्ची हमारी बैठक में जाकर बैठने की हठ (जिद्द) करने लगी। खैर, बच्ची भगवती का रूप हैं, उसे बैठक में बैठाया गया और बच्ची अपनी 7 वर्षीया बड़ी बहन के साथ खेलने लगी।

शिवकांता (मेरी बहन) ने बच्ची से पूछा – “वृंदा, आइसक्रीम खाएगी?
वृंदा – “नहीं! आज द्यारस (ग्यारस/एकादशी) हैं।“
शिवा (मेरी बहन) ने पुनः पूछा – “वृंदा, चॉकलेट खाएगी?
वृंदा बोली - “नहीं! आज द्यारस (ग्यारस/एकादशी) हैं।“
शिवा ने कौतूक्वश और बहुत सी वस्तुओं का पूछा तो बच्ची का एक ही उत्तर था – “नहीं! आज द्यारस (ग्यारस/एकादशी) हैं।“

मैं संक्षेप में पुनरावृत्ति करूंगा की बैठक में आई हुई (3 साल की) बच्ची से जब मेरी बहन ने आइसक्रीम, चॉकलेट आदि अनेकों वस्तुओं का पूछा तो तीन साल की बच्ची ने यह कहकर की आज एकादशी हैं, साफ़ मना कर दिया।

यह हैं हमारी सफलता (भगवान् की कृपा से)॥

हमारा अपने शिष्यों को स्पष्ट निर्देश हैं की एकादशी व्रत नवजात शिशु को भी कराएं। धार्मिक दृढ़ता व्रतों के पालन से ही आएगी, जो भविष्य में किसी भी मज़हबी कट्टरता के विरुद्ध संघर्ष करेगी।

जब हमारे बच्चे इतने दृढ हैं की 42 डिग्री की भर-गर्मी में आइसक्रीम, चॉकलेट और कोल्डड्रिंक्स को एकादशी के दिन मना कर सके तो विचार कीजिए विधर्म को यह बच्चे किस दृष्टि से देखेंगे।

इनके सामने लव-जिहाद सरीखे किसी भी विप्लव की क्या औकात हैं?

बच्ची और उसके पापा को हमारे शुभाशीर्वाद।

- ‘आशीष कृष्णः”

भगवत्कृपा॥

राम राम ॥ “श्री हनुमानजी” की वीरता – बजरंगबली का शौर्य ॥“श्री हनुमानजी” घोषणा करते हैं :-“जयत्यतिबलों रामो लक्ष्मणश्च मह...
06/06/2023

राम राम

॥ “श्री हनुमानजी” की वीरता – बजरंगबली का शौर्य ॥

“श्री हनुमानजी” घोषणा करते हैं :-
“जयत्यतिबलों रामो लक्ष्मणश्च महाबल: । राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालित: ।।
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मण: । हनुमाञ्शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मज: ।।
न रावणसहस्त्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत् । शिलाभिश्च प्रहरत: पादपैश्च सहस्त्रश: ।।
अर्दयित्वा पुरीं लंकामभिवाद्य च मैथिलीम् । समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम् ।।“
(श्री वाल्मीकीय रामायण , सुन्दरकाण्ड , 42|33-36)

अर्थात् – “अत्यन्त बलवान भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो । श्री रघुनाथजी द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो । मैं अनायास ही महान पराक्रम करनेवाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ । मेरा नाम हनुमान हैं । मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करनेवाला हूँ । जब मैं हज़ारो वृक्ष तथा पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा , उस समय सहस्त्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते । मैं लंकापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा ।“

भगवान् श्रीराम स्वयं कहते हैं की रावण , मेघनाद , कुम्भकर्ण और वाली आदि मिलकर भी हनुमानजी की समानता नहीं करते :-
“अतुलं बलमेतद् वै वालिनो रावणस्य च ।
न त्वेताभ्यां हनुमता समं त्विति मतिर्मम ।।“
(श्री वाल्मीकीय रामायण , उत्तरकाण्ड , 35|2)

अर्थात् – “महर्षे ! इसमें संदेह नहीं की रावण और वाली के बल की कहीं तुलना नहीं थी ; परन्तु मेरा ऐसा विचार हैं की इन दोनों का बल भी “श्री हनुमानजी” के बल की समानता नहीं कर सकता था ।“

।। महाबली हनुमान जी महाराज की जय ।।

-----------------------------------------“आशीष कृष्ण”

भगवत्कृपा॥

राम राम नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं। गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥भगवत्कृपा॥
04/06/2023

राम राम

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं।
गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥

भगवत्कृपा॥

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